Saturday, October 31, 2015

Rajput saved India to become Middle east Muslim country


सन 712 ई० में अरबों ने सिंध पर आधिकार जमा कर भारत पर विजय पाने की ठान ली। इस काल में न तो कोई केन्द्रीय सत्ता थी और न कोई बुद्धिमान और कूटनीतिक शासक था जो अरबों की इस चुनौती का सामना करता। फ़लतः अरबों ने आक्रमणो की बाढ ला दी और सन 725 ई० में जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिकार जमा लिया। ऐसे लगने लगा कि शीघ्र ही मध्य पूर्व की भांति भारत में भी इस्लाम का कहर बरसने लगेगा । ऐसे समय में दो शक्तियों का वरदान साबित हुई भारत को बचाने के लिए । एक ओर जहां नागभाट ने जैसलमेर. मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली, वहां दूसरी ओर बप्पा रायडे ने चित्तौड के प्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई० में मेवाड में गुहिल वंश को स्थापित किया और इस प्रकार अरबों के भारत विजय के मनसूबों पर पानी फ़ेर दिया।
मेवाड का गुहिल वंश संसार के प्राचीनतम राज वंशों में माना जाता है। मेवाड राज्य की केन्द्रीय सत्ता का पवित्र स्थल सौराष्ट्र रहा है। जिसकी राजधानी बल्लभीपुर थी और जिसके शासक सूर्य वंशी क्षत्रिय कहलात्र थे। यही सत्ता विस्थापन के बाद जब ईडर में स्थापित हुई तो गहलौत मान से प्रचलित हुई। ईडर से मेवाड स्थापित होने पर रावल गहलौत हो गई। कालान्तर में इसकी एक शाखा सिसोदे की जागीर की स्थापना करके सिसोदिया हो गई। चुंकि यह केन्द्रीय रावल गहलौत शाखा कनिष्ठ थी। इसलिय्र इसे राणा की उपाधि मिली। उन दिनों राजपुताना में यह परम्परा थी कि लहुरी शाखा को राणा उपाधि से सम्बोधित किया जाता था। कुछ पीढियों बाद एक युद्ध में रावल शाखा का अन्त हो गया और मेवाड की केन्द्रीय सत्ता पर सिसोदिया राणा का आधिपत्य हो गया। केन्द्र और उपकेन्द्र पहचान के लिए केन्द्रीय सत्ता के राणा महाराणा हो गये। अस्तु गहलौत वंश का इतिहास ही सिसोदिया वंश का इतिहास है।
मान्यता है कि सिसोदिया क्षत्रिय भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र लव के वंशज हैं। सूर्यवंश के आदि पुरुष की 65 वीं पीढी में भगवान राम हुए 195 वीं पीढी में वृहदंतक हुये। 125 वीं पीढी में सुमित्र हुये। 155 वी. पीढी अर्थात सुमित्र की 30 वीं पीढी में गुहिल हु जो गहलोत वंश की संस्थापक पुरुष कहलाये। गुहिल से कुछ पीढी पहले कनकसेन हुए जिन्होंने सौराष्ट्र में सूर्यवंश के राज्य की स्थापना की। गुहिल का समय 540 ई० था। बटवारे में लव को श्री राम द्वारा उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र मिला जिसकी राजधानी लवकोट थी। जो वर्तमान में लाहौर है। ऐसा कहा जाता है कि कनकसेन लवकोट से ही द्वारका आये। हालांकि वोश्वस्त प्रमाण नहीं है। टाड मानते है कि 145 ई० में कनकसेन द्वारका आये तथा वहां अपने राज्य की परमार शासक को पराजित कर स्थापना की जिसे आज सौराष्ट्र क्षेत्र कहा जाता है। कनकसेन की चौथी पीढी में पराक्रमी शासक सौराष्ट्र के विजय सेन हुए जिन्होने विजय नगर बसाया। विजय सेन ने विदर्भ की स्थापना की थी। जिसे आज सिहोर कहते हैं। तथा राजधानी बदलकर बल्लभीपुर ( वर्तमान भावनगर ) बनाया। इस वंश के शासकों की सूची कर्नल टाड देते हुए कनकसेन, महामदन सेन, सदन्त सेन, विजय सेन, पद्मादित्य, सेवादित्य, हरादित्य, सूर्यादित्य, सोमादित्य और शिला दित्य बताया। – 524 ई० में बल्लभी का अन्तिम शासक शिलादित्य थे। हालांकि कुछ इतिहासकार 766 ई० के बाद शिलादित्य के शासन का पतन मानते हैं। यह पतन पार्थियनों के आक्रमण से हुआ। शिलादित्य की राजधानी पुस्पावती के कोख से जन्मा पुत्र गुहादित्य की सेविका ब्रहामणी कमलावती ने लालन पालन किया। क्योंकि रानी उनके जन्म के साथ ही सती हो गई। गुहादित्य बचपन से ही होनहार था और ईडर के भील मंडालिका की हत्या करके उसके सिहांसन पर बैठ गया तथा उसके नाम से गुहिल, गिहील या गहलौत वंश चल पडा। कर्नल टाड के अनुसार गुहादित्य की आठ पीढियों ने ईडर पर शासन किया ये निम्न हैं – गुहादित्य, नागादित्य, भागादित्य, दैवादित्य, आसादित्य, कालभोज, गुहादित्य, नागादित्य।
जेम्स टाड के अनुसार शिकार के बहाने भीलों द्वारा नागादित्य की हत्या कर दी। इस समय इसके पुत्र बप्पा की आयु मात्र तीन वर्ष की थी। बप्पा की भी एक ब्राहमणी ने संरक्षण देकर अरावली के बीहड में शरण लिया। गौरीशंकर ओझा गुहादित्य और बप्पा के बीच की वंशावली प्रस्तुत की, वह सर्वाधिक प्रमाणिक मानी गई है जो निम्न है – गुहिल, भोज, महेन्द्र, नागादित्य, शिलादित्य, अपराजित, महेन्द्र द्वितीय और कालभोज बप्पा आदि। यह एक संयोग ही है कि गुहादित्य और मेवाड राज्य में गहलोत वंश स्थापित करने वाले बप्पा का बचपन अरावली के जंगल में उन्मुक्त, स्वच्छन्द वातावरण में व्यतीत हुआ। बप्पा के एक लिंग पूजा के कारण देवी भवानी का दर्शन उन्हे मिला और बाबा गोरखनाथ का आशिर्वाद भी। बडे होने पर चित्तौड के राजा से मिल कर बप्पा ने अपना वंश स्थापित किया और परमार राजा ने उन्हे पूरा स्नेह दिया। इसी समय विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण को बप्पा ने विफ़ल कर चित्तोड से उन्हे गजनी तक खदेड कर अपने प्रथम सैन्य अभिमान में ही सफ़लता प्राप्त की। बप्पा द्वारा धारित रावल उपाधि रावल रणसिंह ( कर्ण सिंह ) 1158 ई० तक निर्वाध रुप से चलती रही। रावण रण सिंह के बाद रावल गहलोत की एक शाखा और हो गई। जो सिसोदिया के जागीर पर आसीन हुई जिसके संस्थापक माहव एवं राहप दो भाई थे। सिसोदा में बसने के कारण ये लोग सिसोदिया गहलौत कहलाये।
सत्ता परिवर्तन, स्थान परिवर्तन, व्यक्तिगत महत्वकांक्षा एवं राजपरिवार में संख्या वृद्धि से ही राजपूत वंशों में अनेक शाखाओं एवं उपशाखाओं ने जन्म लिया है। यह बाद गहलौत वंश के साथ भी देखने को मिली है। बप्पा के शासन काल मेवाड राज्य के विस्तार के साथ ही उसकी प्रतिष्ठा में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है। बप्पा के बाद गहलौत वंश की शाखाओं का निम्न विकास हुआ।
1. अहाडिया गहलौत – अहाड नामक स्थान पर बसने के कारण यह नाम हुआ।
2. असिला गहलौत – सौराष्ट्र में बप्पा के पुत्र ने असिलगढ का निर्माण अपने नाम असिल पर किया जिससे इसका नाम असिला पडा।
3. पीपरा गहलौत – बप्पा के एक पुत्र मारवाड के पीपरा पर आधिपत्य पर पीपरा गहलौत वंश चलाया।
4. मागलिक गहलौत – लोदल के शासक मंगल के नाम पर यह वंश चला।
5. नेपाल के गहलोत – रतन सिंह के भाई कुंभकरन ने नेपाल में आधिपत्य किया अतः नेपाल का राजपरिवार भी मेवाढ की शाखा है।
6. सखनियां गहलौत – रतन सिंह के भाई श्रवण कुमार ने सौराष्ट्र में इस वंश की स्थापना की।
7. सिसौद गहलौत – कर्णसिंह के पुत्र को सिसौद की जागीर मिली और सिसौद के नाम पर सिसौदिया गहलौत कहलाया।

MAHARAJA HARI SINGH

MAHARAJA HARI SINGH : THE LAST RULER OF JAMMU & KASHMIR By. Col. J.P. Singh (Retd).


Maharaja Hari Singh  was born on 23rd Sept 1895 in Amar Mahal Jammu which is a museum of world fame and most popular tourist attraction in Jammu. He was son of Raja General Amar Singhji; younger brother of Maharaja Partap Singh. He ascended to the throne of Jammu & Kashmir State in 1925 after the demise of Maharaja Sir Partap Singh. He was one of the most renowned ruler of British India as well as  Indian Union as a ruler of geographically largest and strategically most important empire of Jammu & Kashmir which continues to remain in the lime light for several political and historical reasons. He gained acclamation for being “The Last Ruling King of Independent India” since he continued to be Maharaja of Jammu & Kashmir till 5th  November 1952 while all other rulers of princely states had seized to be Kings by 1948.
When he was 13 years old he was sent to ‘Mayo College of Princes’ for studies. Soon after his admission in the Mayo College his father Raja Amar Singhji died . After his father’s death, British Govt in Delhi took keen interest in his education and bringing up. A British Army Officer was deputed as his guardian with the responsibility of ensuring proper education and training with the aim of grooming him to be a good ruler. After completing his education in Mayo College he was sent to ‘Imperial Cadet Corps’ at Dehradun to imbibe in him Military and  Martial traits as well as polishing his English language. Maharaja Hari Singh married Maharani Tara Devi in 1928 as his fourth wife after his previous three wives had died earlier one after the other without an issue. This marriage was on the advice of the astrologers and true to their prediction a Yuvraj was born to them on 9 March 1931 as the next Heir Apparent.
In 1915 he was appointed Commander-in-Chief of J&K State Forces when he was only 20 years old. On assuming command of the state forces, he introduced lot of reforms in the training and welfare of officers and soldiers. Central cook houses called Langars and Officers Messes were introduced by him in the state force prior to which the officers and jawans used to cook their own meals.  During the reign of Maharaja Partap Singh Union Jack used to fly on all official buildings of the State. Maharaja Hari Singh ordered their removal which was contested by the British govt but he didn’t relent. Later, on Viceroy’s request he allowed a British flag to be flown only on the residential building of the Resident thereby exerting his full authority over his sate.
His rule has been described as glorious by British historians because of several reforms that he introduced in administration and judiciary. After ascending to the throne he brought about several rules and regulations for the welfare and betterment of his subjects. There are numerous instances worth mentioning but few of them such as making primary education compulsory for all subjects; men & women, prohibiting child marriage and opening all the places of worship for his low caste subjects are most remarkable. He opened lot of new schools and colleges to promote education.  He managed to check corruption in the administration by adopting unique ways of detecting corruption, findings culprit officials and punishing them. He banned  beggar and it is said that during his rule none dared to accept bribes or deny wages for any  services rendered. He even ploughed land himself to get land holding rights to his subjects. He was made a member of the Imperial War Council from 1944 to 1946 during the World War II. During the war he visited Middle East where he joined his units which were fighting against Axis Powers. He lived with them in their temporary trenches and bunkers which encouraged them and boosted their moral. Showing his solidarity with his forces in the battlefield earned him lot of respect not only of his men but also of the Allied Powers particularly of the British Army.
Hari Singh’s rule witnessed lot of political upheavals. From 1931 onwards his rule faced Kashmiri insurrection against his rule which became a mass movement in the valley under the leadership of Sheikh Mohd Abdullah. He opposed Jinnah’s Muslim League for its communal agenda illustrated in his two nation theory; hence faced his wrath. He was victim of hostility of Indian National Congress because of Pt Nehru and Sheikh Mohd Abdullah. Immediately after independence and partition of India he saw the tragic communal riots which engulfed the State of Jammu & Kashmir as well. It was followed by an invasion of his State by Pakistani raiders. Jammu & Kashmir had become an  independent country after the lapse of British Paramountacy on 15 Aug 1947. It was during his reign that the first Indo-Pak war was fought on the soil of Jammu & Kashmir. Finally the Govt of India took over the control of J&K thus ending the 106 years old hereditary rule of the last Maharaja of India on 15th  November 1952.
Maharaja Hari Singh was a democratic and progressive ruler and knew what was to come. He had made it clear in the Round Table Conference in London that he was for independence of India for which he had to pay heavily as Britishers never trusted him thereafter. As a result he had to face many uprisings fomented and abetted  by the British. He also knew that the era of the dynastic rule was to end soon for which he prepared his son to fit in the future democratic set up of the country. Dr Karan Singh bears  testimony to it as he became the first elected head of the State as a Sadar-i-Riyasat and later Union Minister for many years and is still a Member of Parliament even 63 years after the transfer of power. In fact he should have been the President of India today. Hopefully next time. The credit for preparing him for the distinguished career in the changed political scenario goes to him.
Lord Mountbatten visited Srinagar in June 1947. He advised Maharaja Hari Singh to accede to Pakistan on the grounds of religion of majority population and geographical contiguity. Although the advice amounted to be an order because the state was part of the Dominion.  Maharaja ignored this advice and instead wanted more time to decide the future of his State. He knew that Pt Nehru and Sheikh Abdullah were for State’s accession to India which was his wish as well. But all the rail and land routes to J&K passed through Pakistan. Despite Gurdaspur District falling part of India and River Ravi becoming the boundary line, there was no road or rail link to India through Pathankot which hindered Maharaja’s early decision of accession to India. But Pt Nehru took keen interest in the development of road link to Jammu facilitating accession. When India gained independence he had the option of joining either  India or Pakistan or to remain independent. He knew the consequences of all the options for which he offered Standstill Agreement with both the Dominions, which unfortunately was not accepted by Pt Nehru which changed the course of history. Had Pt Nehru accepted it, it would have given India over two months to understand the problems of the most strategic State of the world and prepare  for anything untoward from any direction. It might have perhaps averted Pakistani attack in Oct 47 as the State would have been the joint responsibility of both the Dominions. However following the invasion by Pakistan on 21 October 1947 he appealed  to the Indian Union for help. India refused  unless he acceded to the Indian Union. He signed the instrument of accession with the govt of India on 26 October 1947 acceding his country to the Indian Union which included Jammu, Kashmir, Northern Areas, Ladakh, Trans Karakoram Tract, POK and Aksai Chin. The events mentioned above leading to the accession with Indian Union created Indo-Pak hostility which has resulted into 4 military conflicts and the ongoing proxy war in Kashmir. Due to unresolved and undemocratic nature of transition all the territories mentioned above are considered disputed.
Due to growing hostility with his Prime Minister Sheikh Abdullah, he appointed his son Yuvraj Karan Singh as his regent and left for Bombay in 1949, never to return to his State there after. He spent rest of his life in Bombay. His passions for Polo, Horse Racing and Reading kept him occupied for the remaining period of life. Lt Gen His Highness Shriman Rajrajeshwar Maharajadhiraj Sri Sir Hari Singh Indar Mahindar Bahadur Sipar-i-Sultanat, GCSI, GCIE, GCVO, KCVO, Maharaja of Jammu & Kashmir breathed his last on 26 April 1961 at Bombay. As per his will his Ashes were brought to Jammu and spread all over J&K and immersed in River Tawi at Jammu.
Amar Kshatriya Rajput Sabha is remembering the beloved rulers by celebrating his 115th Birth Anniversary  on 23 September 2010 at Raj Tilak Bhavan Purani Mandi Jammu.


महाराजा हरि सिंह के राज्याभिषेक का दुर्लभ वीडियो
जम्मू-काश्मीर के अंतिम नरेश महाराजा हरि सिंह (Colonel His Highness Shriman Rajrajeshwar Maharajadhiraj Sri Sir Hari Singh Indar Mahindar Bahadur, Sipar-i-Sultanat, Maharaja of Jammu and Kashmir, KCIE, KCVO : 1925-1961) के राज्याभिषेक का दुर्लभ वीडियो (सितम्बर, 1925)

Europeans crooked History of India


पश्चिम एसिया और भारत-भारतीय इतिहास में अंग्रेजों द्वारा इतनी भयानक जालसाजी हुयी है कि कोई भी वर्णन पश्चिम या मध्य एसिया के इतिहास से नहीं मिलता है और पूर्व भाग के बारे में बिलकुल ही भूल गये। राजतरंगिणी के अनुसार गोनन्द वंश का ६२वां राजा हिरण्यकुल था जिसने लौकिकाब्द २२५२-२३१२ अर्थात् ८२४-७६४ ई.पू. तक शासन किया। उसका पुत्र वसुकुल (७६४-७०४) तथा मिहिरकुल (७०४-६३४) ई.पू. था। उसके पूर्व इसी गोनन्द वंश का ५१वां शासक हुष्क था जिसके पुत्रों जुष्क और कनिष्क ने १२९४-१२३४ ई.पू. तक शासन किया। कनिष्क को उज्जैन के परमारवंशी राजा विक्रमादित्य (८२ ई.पू. -१९ ई) के पौत्र शालिवाहन (७८-१२८ ई.) के शक से जोड़ कर परमार वंश का नाम उड़ा दिया। यदि यह जालसाजी सही है तो सम्पूर्ण बाइबिल और इसाई इतिहास झूठा हो जायेगा। प्रायः ४ ई.पू. में विक्रमादित्य राज्य के मगध से २ ज्योतिषी गये थे जिन्होंने ईसा को महापुरुष बताया था। उस समय विक्रमादित्य और इजरायल के रोमन राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। शूली पर बेहोश हो कर उतरने के बाद ईसा मसीह कश्मीर आये जिनका निवास हजरत बल (बहाल = रहना) कहा जाता है। यह शालिवाहन राज्य में हुआ। इसाई मान्यता के अनुसार ईसा के शिष्य थोमस ८२ ई. में मद्रास (चेन्नई) आये थे (शालिवाहन शक के ४ वर्ष बाद)। अतः उस समय भारत आश्रय स्थल था, आक्रमण का शिकार नहीं था।
उससे पूर्व असीरिया का उदय नबोनासर काल में होने पर भारत पर पहला आक्रमण ८२४ ई.पू. में हुआ जिसका प्रतिरोध खारावेल की गज सेना ने मथुरा में किया (खारावेल प्रशस्ति, शासन के ४ वर्ष बाद नन्द शक १६३४ ई.पू. का ८०३ वर्ष, राज्य के ११ वर्ष पर मथुरा में शकों की पराजय)। यह विफल होने पर रानी सेमिरामी (ग्रीक नाम) ने सभी पड़्सी राज्यों की सहायता से ३५ लाख की सेना इकट्ठी की तथा ऊंटों को खोल पहना कर १०,००० नकली हाथी तैयार किये (होमर के ट्राय या भास के स्वप्नवासवदत्ता की तरह)। यह असुरों का सबसे बड़ा आक्रमण था जिसके प्रतिरोध के लिये विष्णु अवतार बुद्ध मगध में अजिन ब्राह्मण के पुत्र रूप में उत्पन्न हुये। सिद्धार्थ बुद्ध (१८८७-१८०७ ई.पू.) ने मगध राजाओं से दोस्ती कर केवल सारनाथ-गया के बीच के लोगों को मोहित किया था, असुरों को नहीं। उसके बाद गौतम बुद्ध (५वी सदी ई.पू.) ने वैदिक मार्ग नष्ट करने के लिये उत्तर प्रदेश में प्रयत्न किये। इन दोनों ने केवल वेद का विरोध किया असुरों का नहीं।
विष्णु बुद्ध ने ७५६ ई.पू. में आबू पर्वत पर ४ राजाओं का संघ राजा शूद्रक की अध्यक्षता में किया। इस समय शूद्रक शक आरम्भ हुआ (यल्ल का ज्योतिष दर्पण)। शूद्रक का नाम इन्द्राणीगुप्त (मृच्छकटिकम्) था, ब्राह्मण होने पर भी ४ राजाओं का प्रधान सेवक (जैसे आज प्रधान मन्त्री अपने को कहते हैं) होने के कारण उनको सम्मान के लिये शूद्र कहा गया। ४ जो भारत रक्षा में अग्रणी होने के कारण अग्निवंशी कहे गये-परमार प्रतिहार, चाहमान और शुक्ल (चालुक्य)। इन सबकी वंश परम्परा ७५६ ई.पू. से आरम्भ होती है पर कर्नल टाड ने उन सभी को हूण वंशी सिद्ध करने के लिये उनका काल ७३० ई.पू कर पुराना सभी अन्धकार युग कर दिया। इसके लिये उसको राणा कुम्भा का ताम्र-पट्ट तोड़ना पड़ा जिसमें उन्होंने अपने को ब्राह्मण बप्पा रावल का वंशज कहा था जो गोरखनाथ के आदेश से राजा बने थे। यही उनके द्वारा गीतगोविन्द व्याख्या की भूमिका में भी है। स्वयं गोरखनाथ को भी लुप्त कर यह शंकराचार्य का काल कर दिया जो अंग्रेजों के अनुसार मुस्लिम आक्रमण होने पर बौद्धों का विरोध कर रहे थे। सबसे बड़े असुर आक्रमण (७५६ ई.पू. सेमिरामी की ३५ लाख सेना + घुड़सवार+नकली हाथी प्रायः ४ लाख) को इसी संघ ने पराजित किया। सभी पाश्चात्य इतिहास इसका वर्णन करते हैं पर भारत में इसके २०० वष बाद से राज्य व्यवस्था कही जाती है। ६१२ ई.पू. में दिल्ली के चाहमान राजा ने असुर (असीरिया) राजधानी निनेवे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जिसका बाइबिल में ५ स्थानों पर वर्णन है। इस समय चाहमान शक आरम्भ हुआ जिसका प्रयोग वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त (बृहत् संहित १३/३) ने किया है। इसके बाद ४५६ ई.पू. में शक आक्रमण हुये जिनका प्रतिरोध मालवा के राजा श्रीहर्ष ने कर मालव गण समाप्त कर दिया (राजतरंगिणी, कथा सरित् सागर, अलबिरुनि आदि)। श्रीहर्ष शासन समाप्त होने पर आन्ध्र वंशी राजाओं के सेनापति घटोत्कच (मेगास्थनीज आदि ग्रीक लेखकों द्वारा इसका अनुवाद नाई किया है) ने उसे समाप्त कर अपने पुत्र चन्द्रगुप्त-१ को राजा बनाया। इस समय सिकन्दर का आक्रमण हुआ था और उसके लेखकों ने आन्ध्र राजाओं की सेना का तथा चन्द्रगुप्त समुद्रगुप्त का वर्णन किया है। उसके बाद सेल्यूकस आक्रमण का समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तम्भ लेख में वर्णन है। उसके पुत्र चन्द्रगुप्त-२ ने उसे पराजित कर उसकी पुत्री से विवाह किया जिसका विस्तृत वर्णन देवी-चन्द्रगुप्तम् नाटक तथा उसके आधार पर जयशंकर प्रसाद के ध्रुवस्वामिनी नाटक (१९३० ई.) में है। गुप्त काल समाप्त होने पर ८२ ई.पू. में उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य का साम्राज्य बना जिस काल में ईसा मसीह का जन्म, सीजर की पराजय, बन्दी बनना और इस कारण ब्रूटस द्वारा उसकी हत्या तथा ४६ ई,पू. मे विक्रम वर्ष १० के पौष मास से मिलाने के लिये जूलियन वर्ष ७ दिन बाद आरम्भ हुआ। उनके पौत्र शालिवाहन काल में ईसा तथा उनके शिष्यों ने भारत में शरण लिया। गणना के लिये शालिवाहन शक तथा पर्व के लिये विक्रम सम्वत् आज भी चल रहे हैं। शक सम्वत्सर का अर्थ नहीं समझने वालों द्वारा बनाया गया राष्ट्रीय-शक-सम्वत् न तो राष्ट्रीय है, न शक है, न सम्वत् है। विक्रमादित्य राज्य के बाद कुछ समय विप्लव स्थिति थी जब (१९-३० ई.) में तातार, तुर्क, हूण और चीनी लोगों ने आक्रमण किये जिनका तिब्बत तथा चीन इतिहास में भी उल्लेख है। इस समय गुप्तवंश की एक शाखा ने गुजरात के वलभी में राज्य स्थापित किया, जिसके नष्ट होने पर ३१९ ई. में वलभी भङ्ग शक आरम्भ हुआ (अलबिरुनि)। प्रायः इसी समय अंग्रेजों ने मूल गुप्त राज्य का आरम्भ कर दिया है।
जिस समय हूण शकों का आक्रमण कहा जाता है उस समय उत्तर भारत में हर्षवर्धन तथा अग्निवंशी राजाओं का शासन था। हुएनसांग या फाहियान ने इस काल में किसी शक आक्रमण का नाम नही सुना था जो मध्य एसिया रास्ते से ही आये थे।

Beef, cow -Why not to slaughter, Benefits of cow


हमारा देश लम्बे समय तक अंग्रेंजो का गुलाम रहा ,सेकड़ो वर्षो तक इस
देश को अंग्रेंजो ने गुलाम बनाने
की काफी तैयारी की थी
सन 1813 में अंग्रेंजो की संसद हाउस ऑफ़ कॉमन्स में एक
बहस चली 24 जुन 1813 को वो बहस पूरी हुई
और वहाँ से एक प्रस्ताव पारित किया
भारत में गरीबी पैदा करनी है
भुखमरी लानी है भारत
की समृदि को तोडन है इनको यदि शारीरिक और
मानसिक रूप से कमज़ोर करना है
तो भारत की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करना पड़ेगा इसे बरबाद
करना पड़ेगा
इसके लिय भारत का केन्द्र बिन्दु भारत
की कृषि पद्धति को भी बरबाद करना पड़ेगा । भारत
की अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर
टिकी हुई है
इनकी कृषि गाय पर टिकी हुई है गाय के
बिना भारतीय कृषि हो नहीं सकती
दूसरा इनको ये पता चला के भारत के कोने कोने में गाय
की पूजा होती है इनके 33 करोड़
देवी देवता इसमें वास करते है
तब उन्होंने एक बढ़ा फैसला लिया यदि भारतीय कृषि को बरबाद
करना है भारतीय संस्कृति का नाश करना है तो गाय का नाश
करना चाहिय
भारत मे पहला गौ का कत्लखाना 1707 ईस्वी में रॉबर्ट क्लाएव
ने खोला था जिसमें गाय को काट कर उसके मॉस को अंग्रेंजी फोज़
को खिलाया जाने लगा
गो वंश का नाश शुरू हो गया।
बीच दौर में अंग्रेंजो को एक और महत्वपूर्ण बात
पता चली के यदि गो वंश का नाश करना है तो उसके लिय जहाँ से
इसकी उत्पति होती है उस
नन्दी को मरवाना होगा
तो अग्रेंजो ने गाय से ज्यादा नन्दी का कत्ल करवाना शुरू किया।
1857 में मंगल पाण्डे को जब फांसी सजा हुई
थी इसका मूल प्रश्न गाय
का ही था इसी मूल प्रश्न से हिन्दुस्तान में
क्रांति की शुरुआत हुई थी
उस जमाने में अंग्रेंजो ने पुरे भारत में लगभग 350 कत्लखाने खुलवाये|
1939 में लाहोर शहर में अंग्रेंजो ने एक
मशीनी कत्लखाना खोला बढे पैमाने में वहाँ गो और
नंदी का कत्ल हो सकत था
इस कत्ल खाने को बंद करने के लिय सबसे जबरदस्त आंदोलन किया पंडित
नेहरू ने और आंदोलन सफल भी हुआ
कत्लखाना बंद हो गया पंडित नेहरू ने कहा यदि वो अज़ाद हिंदुस्तान के
किसी महत्वपूर्ण पद पर पहुंचे तो वो ऐसा कानून बना देंगे जिसे
हिंदुस्तान में गाय का कत्ल बंद हो जायेगा
1939 में लाहोर शहर में अंग्रेंजो ने एक
मशीनी कत्लखाना खोला बढे पैमाने में वहाँ गो और
नंदी का कत्ल हो सकत था
इस कत्ल खाने को बंद करने के लिय सबसे जबरदस्त आंदोलन किया पंडित
नेहरू ने और आंदोलन सफल भी हुआ
कत्लखाना बंद हो गया पंडित नेहरू ने कहा यदि वो अज़ाद हिंदुस्तान के
किसी महत्वपूर्ण पद पर पहुंचे तो वो ऐसा कानून बना देंगे जिसे
हिंदुस्तान में गाय का कत्ल बंद हो जायेगा
चांस की बात नेहरू भारत के सबसे उँचे शिखर पर बैठे और
डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत के राष्ट्रपति बने
दुःख की बात ये है दोनों अपने शासन काल में गो के लिय ऐसा कोई
कानून ही नहीं बना पाये| बाकी बहुत
सारे कानून उन्होंने बनाये
आज अज़ादी के 67 साल में पुरे भारत में लगभग 36000
कत्लखाने है जिसमें कुछ कत्लखाने ऐसे है जिसमें 10 हज़ार पशु रोज़
काटे जाते है
भारत वर्तमान में विश्व का 3 नम्बर गो मॉस निर्यात करने वाला देश बन
गया है
भविष्य में इन कत्ल खानो को हाई टेक किया जाना है
अंग्रेंजो ने 1910 से 1940 तक लगभग 10 करोड़ से ज्यादा गो वंश
को खत्म किया गया ।
अज़ादी के 50 साल बाद 1947 से 1997 तक लगभग 48
करोड़ गो वंश का नाश किया जा चूका है
अगर भारत में इन 48 करोड़ गो वंश को यदि बचा लिया गया होता तो भारत में
सम्पति और सम्पदा कितनी होती पैसा कितना होता
एक गाय 1 साल में 25 हज़ार रुपय का फ़र्टिलाइज़र (खाद )
पैदा करती है जो हम फ़र्टिलाइज़र करोडो रुपय का आयात करते
है वो करोडो रूपया बचता
यदि 48 करोड़ गाय बचती तो हमने कितनी खाद
का नुकसान किया है
1 गाय यदि 1 साल में 10 से 15 हज़ार रुपय का दूध
देती हो तो कितने रुपय का नुकसान हुआ है गाय के दूध,मूत्र
से 108 तरह की दवाये बनती है
कैंसर,मधुमेह तक का इलाज़ है गाय के मूत्र में
भारत को पेट्रोल और डीज़ल बहार से आयात करना पढ़ता है
बायो गैस से भारत की पेट्रोल, डीज़ल,गैस सिलेंडर
और बेरोज़गारी की समस्या को भी ख़त्म
किया जा सकता है ये पशुधन

Friday, October 30, 2015

ताजमहल में नहीं दफनाई गई थीं मुमताज, truth of mumtaj mahal ,Taj mahal


ताजमहल में नहीं यहां दफनाई गई थीं मुमताज, बच्चे को जन्म देते हुई थी मौत


ताजमहल में नहीं यहां दफनाई गई थीं मुमताज, बच्चे को जन्म देते हुई थी मौत
(बुरहानपुर के जैनाबाद में स्थित मुमताज महल का मकबरा) 
1 नवंबर को मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस है। इस मौके पर dainikbhaskar.com आज आपको बताने जा रहा है प्रदेश के बुरहानपुर में बेगम मुमताज महल के बारे में।
इंदौर। अपनी कई ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाने वाले मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले में ही शाहजहां की बेगम मुमताज की असली कब्र है। बुरहानपुर में अपनी चौदहवीं संतान को जन्म देने के दौरान मुमताज की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्हें छह महीने तक यहीं दफनाया गया। जिसके बाद उनकी कब्र को आगरा ले जाया गया।
जैनाबाद में है असली कब्र 
सम्राट शाहजहां की बेगम मुमताज की मौत न तो आगरा में हुई और न ही उसे वहां दफनाया गया। असल में मुमताज की मौत मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले की जैनाबाद तहसील में हुई थी। मुमताज की कब्र ताप्ती नदी के पूर्व में आज भी स्थित है। इतिहासकारों के अनुसार लोधी ने जब 1631 में विद्रोह का झंडा उठाया था तब शाहजहां अपनी पत्नी मुमताज महल को लेकर बुरहानपुर आ गया था। उन दिनों मुमताज गर्भवती थी। सात जून 1631 में बच्चे को जन्म देते समय उसकी मौत हो गई। दूसरे दिन गुरुवार की शाम उसे वहीँ आहुखाना के बाग में दफना दिया गया। यह इमारत आज भी खस्ता हाल में है। इतिहासकारों के मुताबिक मुमताज की मौत के बाद शाहजहां का मन हरम में नहीं रम सका। कुछ दिनों के भीतर ही उसके बाल सफ़ेद हो गए। बादशाह जब तक बुरहानपुर में रहे नदी में उतरकर बेगम की कब्र पर हर जुमेरात को वहां गए। जिस जगह मुमताज की लाश रखी गई थी उसकी चारदीवारी में दीये जलाने के लिए आले बने हैं। यहां 40 दिन तक दीये जलाए गए। कब्र के पास एक इबादतगाह भी मौजूद है। एक दिन उसने मुमताज की कब्र पर हाथ रखकर कसम खाई कि तेरी याद में एक ऐसी इमारत बनवाऊंगा, जिसके बराबर की दुनिया में दूसरी नहीं होगी। बताते हैं कि शाहजहां की इच्छा थी कि ताप्ती नदी के तट पर ही मुमताज की स्मृति में एक भव्य इमारत बने। शाहजहां ने ईरान से शिल्पकारों को जैनाबाद बुलवाया। शिल्पकारों ने ताप्ती नदी के का निरीक्षण कर इस जगह पर कोई इमारत बनाने से मना कर दिया। तब शहंशाह ने आगरा की और रुख किया। जिस स्थान पर आज ताजमहल है उसको लेकर लोगों के अलग-अलग मत है।
लाश लाने में खर्च हुए आठ करोड़
कहा जाता है कि इसे बनाने के लिए ईरान, तुर्की, फ़्रांस और इटली से शिल्पकारों को बुलया गया। उस समय वेनिस से प्रसिद्ध सुनार व जेरोनियो को बुलवाया गया था. शिराज से उस्ताद ईसा आफंदी भी आए, जिन्होंने ताजमहल क रूपरेखा तैयार की थी। उसी के अनुरूप कब्र की जगह तय की गई। 22 सालों बाद जब इसका काम पूरा हो गया तो मुमताज के शव को पुनः दफनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। बुरहानपुर के जैनाबाद से मुमताज के जनाजे को एक विशाल जुलूस के साथ आगरा ले जाया गया और ताजमहल के गर्भगृह में दफना दिया गया। जुलूस पर उस समय आठ करोड़ रुपये खर्च हुए थे।
बुरहानपुर में ही असली कब्र
बुहरानपुर स्टेशन से लगभग दस किलोमीटर दूर शहर के बीच बहने वाली ताप्ती नदी के उस पर जैनाबाद (फारुकी काल), जो कभी बादशाहों की शिकारगाह (आहुखाना) हुआ करता था। दक्षिण का सूबेदार बनाने के बाद शहजादा दानियाल ने इस जगह को अपने पसंद के अनुरूप महल, हौज, बाग-बगीचे के बीच नहरों का निर्माण करवाया। लेकिन 8 अप्रेल 1605 को मात्र तेईस साल की उम्र मे सूबेदार की मौत हो गई। इसके बाद आहुखाना उजड़ने लगा। जहांगीर के शासन काल में अब्दुल रहीम खानखाना ने ईरान से खिरनी एवं अन्य प्रजातियों के पौधे मंगवाकर आहुखाना को फिर से ईरानी बाग के रूप में विकसित कराया। इस बाग का नाम शाहजहां की पुत्री आलमआरा के नाम पर रखा गया।

बादशाहनामा के लेखक अब्दुल हामिद लाहौरी साहब के मुताबिक शाहजहां की
प्रेयसी मुमताज महल की जब प्रसव के दौरान मौत हो गई तो उसे यहीं पर स्थाई
रूप से दफ़न कर दिया गया था।
जिसके लिए आहुखाने के एक बड़े हौज़ को बंद करके तल घर बनाया गया और
वहीँ पर मुमताज के जनाजे को छह माह रखने के बाद शाहजहां का बेटा शहजादा
शुजा,सुन्नी बेगम और शाह हाकिम वजीर खान,मुमताज के शव को लेकर बुहरानपुर
के इतवारागेट-दिल्ली दरवाज़े से होते हुए आगरा ले गए,,
जहां पर यमुना के तट पर स्थित राजा मान सिंह के पोते राजा जय सिंह के बाग में
में बने तेजो महालय (ताजमहल) में सम्राट शाहजहां की प्रेयसी एवं पत्नी मुमताज
महल के जनाजे को दोबारा दफना दिया गया।
— भाष्कर प्रस्तुति,,,
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Tipu Sultan


TIPU SULTAN MASS MURDERED HINDUS IN KERALA AND COASTAL KARNATAKA. WORST HIT RECEIVED BY KERALA (God’s own country) He even undertook ISLAMIFICATION of city names.

Tipu Sultan lived in an era when the British Crown wasn’t ruling India. India was on its way to reviving and restoring its ancient ideals and way of life after the prolonged darkness of the Islamic era ended with Aurangzeb’s death in 1707. The Marathas had emerged as the most powerful and the largest political force then. It’s therefore both a misleading and a fraudulent claim that Tipu fought the British in the sense of the then British Government. Tipu waged war against the British East India Company. He waged the war purely for territorial and imperial purposes and not because he was spurred by patriotism towards India as a nation. He was primarily an immensely cruel Muslim zealot motivated by the goal of establishing Islam in India. Indeed, the notion of India as—roughly speaking—a nation state took root in the minds of the early crop of Indian freedom fighters after the British Crown took over the country and declared it as one of their colonies. This fact is intentionally blanked out by our clever-by-half historical frauds of the Marxist school in their vile endeavour to project Tipu as some kind of a valiant saviour. If Tipu is indeed this heroic freedom fighter who fought against British tyranny, why don’t our secular scum extend the same logic to the Marathas as well?
Another popular myth is in wide currency as far as Karnataka is concerned. Girish Karnad among others has played a huge part in recent times to perpetuate this myth that Tipu Sultan was an unsullied patron and promoter of the Kannada language. About 4 years ago, he frothed at the mouth in a Kannada daily when the then Education Minister D.H. Shankara Murthy correctly claimed that Tipu was an opponent of Kannada.
Dr. S L Bhyrappa then tore into Girish Karnad’s perverted history concerning Tipu’s life and deeds. Here are some excerpts from that piece by Dr. S.L Bhyrappa (translation mine):
Kannada was the official language of the Mysore state when the Wodeyar dynasty ruled over the Mysore kingdom…When Tipu took over, he changed the administrative language from Kannada to Farsi(Persian). We can witness this till date. Karnataka Government’s land and revenue records use Farsi terminology. For instance, a usage like “Ramesh’s son Suresh” is written as “Suresh bin Ramesh.” Our state has retained terms like “Khata,” “Khirdi,” “Pahani,” “Khanesuvari,” “Gudasta,” and “Baranamoona,” a direct holdover from Tipu’s times. Not just that—Tipu changed the names of entire cities and towns:
EVEN THE PLACE-NAMES WERE CHANGED
Gopal Rao had written all these on the basis of the writings of Tipu’s own son, Ghulam Muhammad, and Muslim historians like Kirmani. Even the Hindu names of places, the Sultan could not tolerate. Therefore, Mangalapuri (Mangalore) was changed to Jalalabad, Cannanore (Kanwapuram) to Kusanabad, Bepur (Vaippura) to Sultanpatanam or Faruqui, Mysore to Nazarabad, Dharwar to Quarshed-Sawad, Gutti to Faiz-Hissar, Ratnagiri to Mustafabad, Dindigul to Khaliqabad, Calicut (Kozhikode) to Islamabad,Brahmapuri to Sultanpet,Coorg to Zafarabad, Devanahalli to Yusufabad,Krishnagiri to Phalk-il-azam,Penukonda to Fakrabad,Sira to Rustumabad. Sankridurga to Muzaffarabad,Sakleshpur to Manjarabad and Chitradurga to Farook yab Hissar.It was after the death of Tipu Sultan that the local people reverted to old names.
Though Muslims in Malabar speak, read and write Malayalam even today just as Tamil Muslims in Tamil Nadu read, write and speak in Tamil. Thanks to Tipu, Muslims in Karnataka speak only Urdu. This is the direct result of Tipu’s insistence that Farsi and Urdu were the only permitted mediums of instruction.
This linguistic assault apart, we need to examine the full extent of the unfettered barbarism Tipu Sultan unleashed in serving the cause of Islam. Here’s what comes out of the mouth of this Islamic zealot par excellence, someone who belongs in the same Hall of Islamic Savagery that Aurangzeb occupies.
We can turn to S L Bhyrappa again:
A collection of papers entitled Tipu Sultan’s Dreams was recovered by the British Colonel William Kirkpatrick from the Srirangapatanam palace after Tipu was killed in the Fourth Anglo-Mysore War in 1799. These are written in Tipu’s own hand in Farsi. Kirkpatrick himself translated several of these from Farsi to English. The India Office in London still retains the original and some translations. Tipu himself speaks in these papers, the strongest and firsthand evidence of his fanaticism. He always refers to Hindus as Kaffirs and the British as Christians. In some of these papers, he recounts a recurring dream in which a a long-bearded Maulvi frequently appears. Tipu goes to Mecca on a pilgrimage; Prophet Mohammad tells a long-bearded Arab, “Tell Tipu that I shall not enter Heaven without Tipu.” Tipu then embarks on a mission to convert all non-Muslims to Islam and then Islamizes all non-Islamic nations…. He talks nothing about modernizing India and fumes that the Christians (British) are the biggest obstacle that he must urgently remove.
The most glaring instance where Tipu’s Islam-inspired savagery played out in all its cruel glory is his brutal Malabar campaign. He managed to do in a very brief span what centuries of Islamic incursions had failed to do to large parts of Kerala.
The account of his savage raid of the Malabar region makes your stomach churn. Here is how he gloats about it in a letter to the Governor of Bekal written in January 1790:
Don’t you know I have achieved a great victory recently in Malabar and over four lakh Hindus were converted to Islam? I am determined to march against that cursed Raman Nair (Rajah of Travancore) very soon. Since I am overjoyed at the prospect of converting him and his subjects to Islam, I have happily abandoned the idea of going back to Srirangapatanam now.
Equally, the Malabar Manual written by William Logan, the Collector of Malabar makes for painful reading. A horrified Logan describes in detail the kind of barbarism Tipu’s hordes inflicted on the Hindus of Kerala. To read a sample, head here. In fact, the extent and scope of Tipu’s cruelty appalled even the British who had by then developed imperial ambitions in India.
Here is how the Preface of G.A. Henty’s The Tiger of Mysore describes Tipu:
…our struggle with Tippoo Saib was…marked by a long endurance of wrong, and a toleration of abominable cruelties perpetrated upon Englishmen and our native allies….Tippoo…revelled in acts of the most abominable cruelty. It would seem that he massacred for the very pleasure of massacring, and hundreds…were killed by famine, poison, or torture, simply to gratify his lust for murder. Patience was shown towards this monster until patience became a fault, and our inaction was naturally ascribed by him to fear.
He wanted to become an Emperor after defeating the British. He wanted to achieve his ambition after consulting the astrologers. There were a few Brahmin astrologers in Sree Ranganatha Swami Temple. They predicted that if some of the suggested remedial rituals were performed, Tipu would achieve his cherished ambition. Believing that he could become the undisputed ruler of the whole of South India, after defeating the British, he performed all the suggested rituals in the Sree Ranaganatha Swami Temple, besides giving costly presents to the astrologers. This act is being widely interpreted by secularist historians as love and respect for Hindu religion and traditions! They also doubt if there were any Hindu temples which were desecrated or destroyed by Tipu Sultan and his Islamic army in Malabar.
M.A. Gopal Rao, stated a few years ago in one of his articles: ‘In a deliberately designed taxation scheme, the religious prejudice of Tipu Sultan became quite clear. His co-religionists, Muslims, were exempted from house tax, commodity tax and also the levy on other items of household use. Those who were converted to Muhammadanism, were also given similar tax exemptions. He had even made provisions for the education of their children. Tipu Sultan discontinued the practice of appointing Hindus in different administrative and military jobs as practised by his father, Hyder Ali Khan, in the past. He had deep hatred towards all non-Muslims. During the entire period of sixteen years of his regime, Purnaiyya was the only Hindu who had adorned the post of Dewan or minister under Tipu Sultan. In 1797 (two years before his death) among the 65 senior Government posts, not even a single Hindu was retained. All the Mustadirs were also Muslims. Among the 26 civil and military officers captured by the British in 1792 there were only 6 non-Muslims.
In 1789, when the Nizam of Hyderabad and other Muslim rulers decided that only Muslims would be appointed henceforth in all Government posts, Tipu Sultan also adopted the same policy in his Mysore State. Just because they were Muslims, even those who were illiterate and inefficient, were also appointed to important Government posts. Even for getting promotions, one still had to be a Muslim under Tipu Sultan’s regime. Considering the interest and convenience of only Muslim officers, all the records relating to tax revenue, were ordered to be written in Persian rather than in Marathi and Kannada as followed earlier. He even tried to make Persian the State language in place of Kannada.
The Muslim officers, occupying important posts at all levels, were all dishonest and unreliable persons. Even when people complained to him with evidences against those officers, Tipu Sultan did not care to inquire about the complaints lodged.”
ISLAMIC ATROCITIES IN COORG, BEDNUR, AND MANGALORE
The cruelties which Tipu Sultan committed in Coorg, has no parallel in history. On one occasion, he forcibly converted over ten thousand Hindus to Muhammadanism. On another occasion, he captured and converted to Islam more than one thousand Hindu Coorgis before imprisoning them in the Sreerangapatanam fortress. In the period of confusion and anarchy prevailing in Sreerangapatanam during the last war of Tipu Sultan against the British, all the Coorgi prisoners escaped from the prison and became Hindus again after reaching their native kingdom. Against the solemn oath given to the Raja of Coorg, Tipu Sultan forcibly abducted a young princess from the Coorg royal family and made her his wife against her will.
The atrocities committed by Tipu Sultan in Bidnur in North Karnataka during and after its capture by him, were most barbarous and beyond description. Ayaz Khan who was Kammaran Nambiar from Chirackal Kingdom before his forcible conversion to Islam by Hyder Ali Khan, had been appointed as Governor of Bidnur. Tipu Sultan was jealous of and opposed to Ayaz Khan from the very beginning because Hyder Ali Khan had considered the latter more intelligent and smart. When Ayaz Khan learnt that Tipu Sultan was scheming to kill him secretly, he escaped to Bombay with plenty of gold. Tipu Sultan came to Bednur and forcibly converted its entire population to Islam. The people accepted Islam for the sake of their lives.
After the capture of Mangalore, thousands of Christians were also forcibly sent to Sreerangapatanam where all of them were circumcised and converted to Islam. Tipu Sultan’s justification was that during the Portuguese domination, prior to the arrival of the British, many Muslims had been converted to Christianity by their Missionaries. He proudly proclaimed his action as a sort of punishment for the conversion of many Muslims by the Portuguese.
Then he marched upto Kumbla on the northern borders of Kerala, forcibly converting to Islam every Hindu on the way. This time, his argument (repeated by the Muslim and secularist historians of today) was that if all belonged to one religion – Muhammadanism – there would be unity and consequently it would be easy to defeat the British!
INSIDE MALABAR
In Malabar, the main target of Tipu Sultan’s atrocities were Hindus and Hindu temples. According to Lewis B. Boury, the atrocities committed by Tipu Sultan against Hindus in Malabar were worse and more barbarous than those committed against the Hindus in Hindustan by the notorious Mahmud of Ghazni, Alauddin Khalji, and Nadir Shah. He disputes in his book Mukherjee’s version that Tipu Sultan had converted only his opponents. Normally even a cruel person kills or tortures only his enemies. But that argument does not justify the cruelties committed by him against innocent women and children.
DANCE OF THE ISLAMIC SATAN
According to the Malabar Manual of William Logan who was the District Collector for some time, Thrichambaram and Thalipparampu temples in Chirackal Taluqa, Thiruvangatu Temple (Brass Pagoda) in Tellicherry, and Ponmeri Temple near Badakara were all destroyed by Tipu Sultan. The Malabar Manual mention that the Maniyoor mosque was once a Hindu temple. The local belief is that it was converted to a mosque during the days of Tipu Sultan.
Vatakkankoor Raja Raja Varma in his famous literary work, History of Sanskrit Literature in Kerala, has written the following about the loss and destruction faced by the Hindu temples in Kerala during the military regime (Padayottam) of Tipu Sultan: “There was no limit as to the loss the Hindu temples suffered due to the military operations of Tipu Sultan. Burning down the temples, destruction of the idols installed therein and also cutting the heads of cattle over the temple deities were the cruel entertainments of Tipu Sultan and his equally cruel army. It was heartrending even to imagine the destruction caused by Tipu Sultan in the famous ancient temples of Thalipparampu and Thrichambaram. The devastation caused by this new Ravana’s barbarous activities have not yet been fully rectified.”
KOZHIKODE MADE A GRAVEYARD
As per the provisions of the Treaty of Mangalore of 1784, the British had allowed Tipu Sultan to have his suzerainty over Malabar. ‘In consequence, the Hindus of Malabar had to suffer the most severe enormities the world had ever known in history,’ observes K.V. Krishna Iyer, in his famous book, Zamorins of Calicut, based on historical records available from the royal house of Zamorins in Calicut. “When the second-in-line of Zamorins, Eralppad, refused to cooperate with Tipu Sultan in his military operations against Travancore because of Tipu’s crude methods of forcible circumcision and conversion of Hindus to Islam, the enraged Tipu Sultan took a solemn oath to circumcise and convert the Zamorin and his chieftains and Hindu soldiers to Islamic faith,” he adds.
L.B. Boury writes: “To show his ardent devotion and steadfast faith in Muhammaddan religion, Tipu Sultan found Kozhikode to be the most suitable place. It was because the Hindus of Malabar refused to reject the matriarchal system, polyandry and half-nakedness of women that the ‘great reformer’ Tipu Sultan tried to honour the entire population with Islam.” To the Malabar people, the Muslim harem, Muslim polygamy and the Islamic ritual of circumcision were equally repulsive and opposed to the ancient culture and tradition in Kerala. Tipu Sultan sought a marriage alliance with the matriarchal Muslim family of Arackal Bibi in Cannanore. Kozhikode was then a centre of Brahmins and had over 7000 Brahmin families living there. Over 2000 Brahmin families perished as a result of Tipu Sultan’s Islamic cruelties. He did not spare even women and children. Most of the men escaped to forests and foreign lands.
Elamkulam Kunjan Pillai wrote in the Mathrubhoomi Weekly of December 25, 1955: “Muhammadans greatly increased in number. Hindus were forcibly circumcised in thousands. As a result of Tipu’s atrocities, strength of Nairs and Chamars (Scheduled Castes) significantly diminished in number. Namboodiris also substantially decreased in number.”
The German missionary Guntest has recorded: ‘Accompanied by an army of 60,000, Tipu Sultan came to Kozhikode in 1788 and razed it to the ground. It is not possible even to describe the brutalities committed by that Islamic barbarian from Mysore.” C.A. Parkhurst also noted that ‘Almost the entire Kozhikode was razed to the ground.”

कुलधरा

कुलधरा..जहा आज भी लोग जाने से डरते हे.राजस्थान के जैसलमेर शहर से 18 किमी दूर स्थित कुलधरा गाव आज से 500 साल पहले 600 घरो और 85 गावो का पालीवाल ब्रह्मिनो का साम्राज्य ऐसा राज्य था जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती हे… रेगिस्तान के बंजर धोरो में पानी नहीं मिलता वहा पालीवाल ब्रह्मिनो ने ऐसा चमत्कार किया जो इंसानी दिमाग से बहुत परे थी. उन्होंने जमीन पे उपलब्ध पानी का प्रयोग नहीं किया,न बारिश के पानी को संग्रहित किया बल्कि रेगिस्तान के मिटटी में मोजूद पानी के कण को खोजा और अपना गाव जिप्सम की सतह के ऊपर बनाया,उन्होंने उस समय जिप्सम की जमीन खोजी ताकि बारिश का पानी जमीन सोखे नहीं. और आवाज के लिए गाव ऐसा बंसाया की दूर से अगर दुश्मन आये तो उसकी आवाज उससे 4 गुना पहले गाव के भीतर आ जाती थी. हर घर के बीच में आवाज का ऐसा मेल था जेसे आज के समय में टेलीफोन होते हे. जैसलमेर के दीवान और राजा को ये बात हजम नहीं हुई की ब्राह्मण इतने आधुनिक तरीके से खेती करके अपना जीवन यापन कर सकते हे तो उन्होंने खेती पर कर लगा दिया पर पालीवाल ब्रह्मिनो ने कर देने से मना कर दिया. उसके बाद दीवान सलीम सिंह को गाव के मुख्या की बेटी पसंद आ गयी तो उसने कह दिया या तो बेटी दीवान को दे दो या सजा भुगतने के लिए तयार रहे. ब्रह्मिनो को अपने आत्मसम्मान से
समझोता बिलकुल बर्दास्त नहीं था इसलिए रातो रात 85 गावो की एक महापंच्यात बेठी और निर्णय हुआ की रातो रात कुलधरा खाली करके वो चले जायेंगे. रातो रात 85 गाव के ब्राह्मण कहा गए केसे गए और कब गए इस चीज का पता आजतक नहीं लगा.पर जाते
जाते पालीवाल ब्राह्मण शाप दे गए की ये कुलधरा हमेसा वीरान रहेगा इस जमीन पे कोई फिर से आके नहीं बस पायेगा. आज भी जैसलमेर में जो तापमान रहता हे गर्मी हो या सर्दी,कुलधरा गाव में आते ही तापमान में 4 डिग्री की बढ़ोतरी हो जाती हे.विज्ञानिको की टीम जब पहुची तो उनके मशीनो में आवाज और तरगो की रिकॉर्डिंग हुई जिससे ये पता चलता हे की कुलधरा में आज भी कुछ शक्तिया मोजूद हे जो इस गाव में किसी को रहने नहीं देती.मशीनो में रिकॉर्ड तरंग ये बताती हे की वहा मोजूद शक्तिया कुछ संकेत देती हे.
आज भी कुलधरा गाव की सीमा में आते हे मोबाइल नेटवर्क और रेडियो कम करना बंद कर देते हे पर जेसे ही गाव की सीमा से बाहर आते हे मोबाइल और रेडियो शुरू हो जाते हे.. आज भी कुलधरा शाम होते ही खाली हो जाता हे और कोई इन्सान वहा जाने की हिम्मत नहीं करता.जैसलमेर जब भी जाना हो तो कुलधरा जरुर जाए, आज तक चैनल वाले तो जा आये, उनका वीडियो है youtube पर. ब्राह्मण के क्रोध और आत्मसम्मान का प्रतीक हे कुलधरा.