Wednesday, November 18, 2015

तुर्क-मुगल-अफगान हमलावरो को खदेड़ने वाले गुजरात के वीर राजपूत -Rajput -mughal-turk wars

तुर्क-मुगल-अफगान हमलावरो को खदेड़ने वाले गुजरात के वीर राजपूत - पार्ट 2 🔸
 ठाकोर रणमलजी जाडेजा (खीरसरा) - जूनागढ़ के नवाब ने खीरसरा पर दो बार हमला किया लेकिन रणमलजी ने उसे हरा दिया, युद्ध की जीत की याद मे जूनागढ की दो तोपे खीरसरा के गढ़ मे मौजूद हैँ ||
 राणा वाघोजी झाला (कुवा) - मुस्लिम सुल्तान के खिलाफ बगावत करी, सुल्तान ने खलिल खाँ को भेजा लेकिन वाघोजी ने उसे मार भगाया, तब सुल्तान खुद बडी सेना लेकर आया, वाघोजी रण मे वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी रानीयां सती हुई ||
 राणा श्री विकमातजी || जेठवा (छाया) - खीमोजी के पुत्र विकमातजी द्वितीय ने पोरबंदर को मुगलो से जीत लिया। वहां पर गढ का निर्माण कराया। तब से आज तक पोरबंदर जेठवाओ की गद्दी रही है ||
 राव रणमल राठोर (ईडर) - जफर खाँ ने ईडर को जीतने के लिये हमला किया लेकिन राव रणमल ने उसे हरा दिया. श्रीधर व्यासने राव रणमल के युद्ध का वर्णन 'रणमल छंद' मे किया है ||
 तेजमलजी, सारंगजी, वेजरोजी सोलंकी (कालरी) - सुल्तान अहमदशाह ने कालरी पर आक्रमण किया, काफी दिनो तक घेराबंदी चली, खाद्यसामग्री खत्म होने पर सोलंकीओ ने शाका किया, सुल्तान की सेना के मोघल अली खान समेत 42 बडे सरदार, 1300 सैनिक और 17 हाथी मारे गये। तेजमलजी, सारंगजी और वेजरोजी वीरगति को प्राप्त हुए ||
 ठाकुर सरतानजी वाला (ढांक) - तातरखां घोरी ने ढांक पर हमला किया, सरतानजी ने सामना किया पर संख्या कम होने की वजह से समाधान कर ढांक तातर खां को सोंप ढांक के पीछे पर्वतो मे चले गये, बाद मे चारण आई नागबाई के आशिर्वाद से अपने 500 साथियो के साथ ढांक पर हमला किया और तातर खां और उसकी सेना को भगा दिया, मुस्लिमो की सेना के नगाडे आज भी उस युद्ध की याद दिलाते ढांक दरबारगढ मे मोजूद है ||
 ठाकोर वखतसिंहजी गोहिल (भावनगर) - भावनगर के पास ही तलाजा पर नूरूद्दीन का अधिकार था, ठाकोर वखतसिंहजी ने तलाजा पर आक्रमण किया। नूरुद्दीन की सेना के पास बंदूके थी लेकिन राजपूतो की तलवार के सामने टिक ना सकी। वखतसिंहजी ने खुद अपने हाथो नुरुदीन को मार तलाजा पर कब्जा किया ||
 रणमलजी जाडेजा (राजकोट) - राजकोट ठाकोर महेरामनजी को मार कर मासूमखान ने राजकोट को 'मासूमाबाद' बनाया. महेरामनजी के बडे पुत्र रणमलजी और उनके 6 भाईओने 12 वर्षो बाद मासूम खान को मार राजकोट और सरधार जीत लिया, अपने 6 भाईओ को 6-6 गांव की जागीर सोंप खुद राजकोट गद्दी पर बैठे ||
 जेसाजी और वेजाजी सरवैया (अमरेली) - जुनागढ के बादशाह ने जब इनकी जागीरे हडप ली तब बागी बनकर ये बादशाह के गांव और खजाने को लूटते रहे लेकिन कभी गरीब प्रजा को परेशान नही किया | बगावत से थककर बादशाह ने इनसे समझौता कर लिया और जागीर वापिस दे दी ||
10  रा' मांडलिक (जूनागढ) - महमूद बेगडा ने जुनागढ पर आक्रमण कर जीतना चाहा पर कई महिनो तक उपरकोट को जीत नही सका। इससे चिढ़कर जुनागढ के गांवो को लूटने लगा और प्रजा का कत्लेआम करने लगा, तब रा' मांडलिक और उनकी राजपूती सेना ने शाका कर बेगडा की सेना पर हमला कर दिया। संख्या कम होने की वजह से रा' मांडलिक ईडर की ओर सहायता प्राप्त करने निकल गये, बेगडा ने वहा उनका पीछा किया, रा' मांडलिक और उनके साथी बहादुरी से लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए ||
11  कनकदास चौहान (चांपानेर) - गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह ने चांपानेर पर हमला कर उस पर मुस्लिम सल्तनत स्थापित करने की सोची लेकिन चौहानो की तलवारो ने उसको ऐसा स्वाद चखाया की हार कर लौटते समय ही मुजफ्फर शाह की मृत्यु हो गई ||
12  विजयदास वाजा (सोमनाथ) - सुल्तान मुजफ्फरशाह ने सोमनाथ को लुंटने के लिये आक्रमण किया लेकिन विजयदास वाजा ने उसका सामना करते हुए उसे वापिस लौटने को मजबूर कर दिया, दो साल बाद सुल्तान बडी सेना लेकर आया, विजयदास ने बडी वीरता से उसका सामना कर वीरगति प्राप्त की ||
👆👆👆👆 ये तो सिर्फ गिने चुने नाम है, ऐसे वीरो के निशान आपको यहां हर कदम, हर गांव मिल जायेगे.

JADEJA RAJPUTS AND THE HISTORICAL BATTLE OF BHUCHAR MORI (भूचर-मोरी का ऐतिहासिक युद्ध सम्वत 1648)

जाडेजा राजपूतों की शौर्यगाथा का प्रतीक भूचर-मोरी का ऐतिहासिक युद्ध (सम्वंत 1648)---------------

राजपूत एक वीर स्वाभिमानी और बलिदानी कौम जिनकी वीरता के दुश्मन भी कायल थे, जिनके जीते जी दुश्मन राजपूत राज्यो की प्रजा को छु तक नही पाये अपने रक्त से मातृभूमि को लाल करने वाले जिनके सिर कटने पर भी धड़ लड़ लड़ कर झुंझार हो गए।
आज हम आपको एक ऐसे युद्ध के बारे में बताएँगे जहा क्षात्र-धर्म का पालन करते हुए एक शरणार्थी मुस्लिम को दिए हुए अपने वचन के कारण हजारो राजपुतो ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए | भूचर-मोरी का युद्ध सौराष्ट्र के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध माना जाता हे ,जहा पश्चिम के पादशाह का बिरुद मिलने वाले जामनगर के शासक और जाडेजा राजपुत राजवी जाम श्री सताजी से अपने से कई गुना अधिक बड़े और शक्तिशाली मुग़ल रियासत के सामने नहीं झुके | यह युद्ध इतना भयंकर था की इसे सौराष्ट्र का पानीपत भी कहा जाता है |इस युद्ध में दोनों पक्षों के एक लाख से ज्यादा सैनिक शहीद हुए.

युद्ध की पृष्ठभूमि-----

विक्रम सवंत १६२९ में दिल्ही के मुग़ल बादशाह जलालुदीन महमद अकबर ने गुजरात के आखिरी बादशाह मुज्जफर शाह तृतीय से गुजरात को जीत लिया | जिसके परिणाम स्वरुप मुजफ्फर शाह राजपिपला के जंगलो में जाकर कुछ समय के लिए छिप गया, फिर उसने  गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित जामनगर के राजा जाम सताजी तथा जूनागढ़ के नवाब दौलत खान और कुंडला के काठी लोमान खुमान के पास जाकेर उनसे सहायता लेकर ३०,००० हजार घुड़सवार और २०,००० सैनिक लेकर अहमदाबाद में भारी लुटपाट मचाई और अहमदाबाद, सूरत और भरूच ये तीन शहर कब्जे कर लिए | उस समय अहमदाबाद का मुग़ल सूबेदार मिर्ज़ा अब्दुल रहीम खान (खानेखाना) था | पर वो मुज्जफर शाह के हमले और लूटपाट को रोक नहीं सका | जिसकी वजह से अकबर ने अपने भाई मिर्ज़ा अजीज कोका को गुजरात के सूबेदार के रूप में नियुक्त किया | सूबेदार के रूप में नियुक्त होने के साथ ही उसने मुजफ्फर शाह को कद कर लिया, पर सन १५८३ (वि.सं. १६३९ )को मुजफ्फर शाह मुग़ल केद से भाग छुटा और सौराष्ट्र की तरफ भाग गया | मुजफ्फर शाह ने सौराष्ट्र के कई राजाओ से सहायता की मांग की, पर किसी ने उसकी मदद नहीं की, 

आखिर में जामनगर के जाम सताजी ने उसको ये कह के आश्रय दिया की “ शरणागत की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्मं है “ और उसके रहने के लिए बरडा डुंगर के क्षेत्र में व्यवस्था कर दी |



     
  इस बात की खबर अहमदाबाद के सूबेदार मिर्ज़ा अजीज कोका को मिलते ही उसने मुजफ्फर शाह को पकड़ने के लिए एक बड़ा लश्कर तैयार किया और विरमगाम के पास में पड़ाव डाला, नवरोज खान तथा सैयद कासिम को एक छोटा लश्कर देकर उसने मोरवी की और इन दोनों को मजफ्फर शाह की खोज करने के लिए भेजा | मुजफ्फर शाह जामनगर में हे इस बात की खबर मिलने पर नवरोज खान ने जाम श्री सताजी को पत्र लिखा कि----

“आप गद्दार मुजफ्फर शाह को अपने राज्य में से निकल दो “ परंतु अपने पास शरणागत के लिए आये हुए को संकट के समय त्याग देना राजपूत धर्मं के खिलाफ है” ये सोच कर जाम श्री सताजी ने नवरोज खान की इस बात को ठुकरा दिया | 

इस बात से गुस्से होकर नवरोज खान ने अपने लश्कर को जामनगर की और कुच करने का आदेश दिया | इस बात का पता चलते ही जाम साहिब ने बादशाह के लश्कर को अन्न-पानी की सामग्री उपलब्ध करानी रोक दी, और लश्कर की छावनियो पे हमला करना शुरु कर दिया तथा उनके हाथी, घोड़े व ऊंट को कब्जे में करके लश्कर को काफी नुकशान पहुँचाया |

सोरठी तवारीख में लिखा गया था की “ जाम शाहीब ने मुग़ल लश्कर को इतना नुकशान पहुँचाया और खाध्य सामग्री रोक दी थी की लश्करी छावनी में अनाज की कमी की वजह से उस समय में एक रूपये के भाव से एक शेर अनाज बिकने लगा था”

       इस बात की खबर मिर्ज़ा अजीज कोका (जो विरामगाम के पास अपना लश्करी पड़ाव डालके पड़ा था) को मिलते ही उसने भी अपने बड़े लश्कर के साथ जामनगर की और कुछ कर दी और नवरोज खान और सैयद कासिम के सैन्य के साथ जुड़ गया | जाम श्री सताजी ने अपने अस्त्र-शस्त्र और अन्न सामग्री तो जामनगर में ही रखी थी इसलिए अजीज कोका ने अपने लश्कर को जामनगर की और कुच किया | जाम साहिब को जब इस बात की खबर मिली की अजीज कोका अपने सैन्य के साथ जामनगर की तरफ आ रहा हे तब उन्होंने भी अपने सैन्य को मुग़ल लश्कर की दिशा में कुच करवाया |

जामनगर से ५० किमी के अंतर पर स्थित ध्रोल के पास भूचर-मोरी के मैदान में जाम साहिब के लश्कर और मुग़ल लश्कर का आमना-सामना हुआ | उस समय जाम श्री सताजी की मदद के लिए जूनागढ़ के नवाब दौलत खान और कुंडला के काठी लोमा खुमान भी अपने सैन्य के साथ पहुच गए थे.


युद्ध की घटनाएँ----

इस ध्रोल के पास स्थित भुचर-मोरी के मैदान में दोनों लश्करो की और से छोटे छोटे हमले हुए लेकिन इन सभी हमलो में जाम साहिब का लश्कर जीत जाता था | २-३ माह तक ऐसा चलता लेकिन हर हमले में जाम साहिब के लश्कर की ही जीत होती थी | अजीज कोका समझ गया था की उसका लश्कर यहाँ नहीं जीत पाएगा | जिसके कारण उसने जाम साहिब को समाधान करने के लिए पत्र भिजवाया | इस बात की खबर जूनागढ़ के नवाब दौलत खान और काठी लोमा खुमान को पता चलने पर उन्होंने सोचा की “ अगर जाम साहिब ने समाधान से मना कर दिया और लड़ाई हुई तो जाम श्री सताजी की ही जीत होगी और वो हमारे राज्य भी अपने कब्जे में ले लेंगे, इसलिए हमे बादशाह के मुग़ल लश्कर के साथ मिल जाना चाहिए” | उन्होंने सूबे अजीज कोका को गुप्तचर द्वारा खबर भिजवाई की “ आप वापस हमला करो, लड़ाई शुरु होते ही हम आपके लश्कर के साथ मिल जाएँगे और जाम शाहीब के लश्कर पे हमला बोल देंगे” | ये खानगी खबर दौलत खान को मिलते ही उसने समाधान से मन हटाकर जाम साहिब को दुसरे दिन युद्ध का कह भिजवाया |

दूसरी दिन सुबह होते ही जाम साहिब श्री सताजी अपने लश्कर के साथ मुग़ल लश्कर पर टूट पडे और भयंकर युद्ध हुआ उसके परिणाम स्वरुप मुग़ल सैन्य हारने की कगार पर आ गया | ये देखकर नवाब दौलत खान और काठी लोमा खुमान जो जाम साहिब के लश्कर हरोड़ में खड़े थे , वो अपने २४,००० सैनिक के साथ जाम साहिब श्री सताजी को छोडकर मुग़ल लश्कर में मिल गए | जिसके वजह से लड़ाई तीन प्रहर तक लम्बी चली , 

उस समय जेसा वजीर ने जाम श्री सताजी को कहा की “ धोखेबाजो ने हमसे धोखा किया हे, हम लोग जीवित हे तब तक युद्ध को चालू रखेंगे आप अपने परिवार, वंश और गद्दी को बचाय रखने के लिए जामनगर चले जाइए | जाम साहिब को जेसा वजीर की ये सलाह योग्य लगने पर वे हाथी से उतरकर घोड़े पर चढ़ गए और अपने अंगरक्षक के साथ जामनगर की और चले गए, इस तरफ जेसा वजीर और कुमार जसाजी ने मुग़ल लश्कर के साथ लड़ाई को चालू रखा |

दूसरी तरफ इस युद्ध से अनजान जाम साहिब के पाटवी कुंवर अजाजी की शादी हो रही थी इसलिए वे भी जामनगर में ही थे | उनको जब जाम श्री सताजी के जामनगर आने की खबर मिली और पता चला की युद्ध अभी भी चालू ही हे , वे अपने ५००  राजपुत जो जानैया(शादी में दुल्हे की जान में साथ में होने वाले लोग ) थे तथा नाग वजीर को साथ में लेकर भूचर मोरी के मैदान में आ पहोचे | गौर तलब देखने वाली बात ये हे की इस जगह से अतीत साधू की जमात जो हिंगलाज माता की यात्रा पे जा रहे थे वे लश्कर को देखकर जाम साहिब के लश्कर में मिल गए थे |

दुसरे दिन सुबह दोनों लश्करो के बीच युद्ध शुरु हो गया | मुग़ल शाही लश्कर की दाईनी हरावल के सेनापति  सैयद कासिम, नवरंग खान और गुजर खान थे | वही बाई हरावल के सेनापति मशहुर सरदार महमद रफ़ी था | हुमायूँ के बेटे मिर्ज़ा मरहम बिच की हरावल का सेनापति था और उसके आगे मिर्ज़ा अनवर और नवाब आजिम था |

जाम श्री साहिब सताजी के सैन्य के अग्र भाग का आधिपत्य जेसा वजीर और कुंवर अजाजी ने किया था | दाईनी हरावल में कुंवर जसाजी और महेरामणजी दुंगरानी थे,वही बाई हरावल में नागडा वजीर , दाह्यो लाड़क, भानजी दल थे | दोनों और से तोपों के गोले दागने के साथ ही युद्ध शुरु हुआ ,जिसके साथ ही महमद रफ़ी ने अपने लश्कर के साथ की जाम श्री के लश्कर पे हमला किया | दूसरी तरफ नवाब अनवर तथा गुजर खान ने कुंवर अजाजी और जेसा वजीर और अतीत साधू की जमात जिसकी संख्या १५०० थी उन पर हमला बोल दिया |

एक लाख से ज्यादा सैनिक मुग़ल के शाही के लश्कर में थे ,जिसमे हिन्दू और मुस्लिम दोनों थे | जाम साहिब के सैनिक की संख्या इनके मुकाबले बहुत कम होने साथ ही में अपने २४,००० साथियो द्वारा धोखा होने पर मुग़ल लश्कर धीरे धीरे जीत की तरफ बढ़ रहा था | इस बात को देखकर कुंवर श्री अजाजी ने अपने घोड़े को दौड़ाकर मिर्ज़ा अजीज कोका के हाथी के पास ला खड़ा किया | उन्होंने अपने घोड़े से लम्बी छलांग मराके घोड़े के अगले दोनों पाव अजीज कोका के हाथी के दांत पर टिका दिए, और अपने भाले से सूबेदार पर ज़ोरदार वार किया जिसके ऊपर एक प्राचीन दोहा भी है की:-
अजमलियो अलंधे, लायो लाखासर धणि  ||
दंतूशळ पग दे, अंबाडी अणिऐ हणि || १ ||

      पर अजीज कोका हाथी की अंबाडी की कोठी में छुप गया, जिससे भाला अंबाडी के किनारे को चीरते हुए हाथी की पीठ के आरपार निकल के निचे जमीन में घुस गया | उसी समय एक मुग़ल सैनिक ने अजाजी के पीछे से आके तलवार का वार कर दिया इसे देखकर सभी राजपुत हर हर महादेव के नाद के साथ मुग़ल सैनिक पर टूट पडे | युद्ध में हजारो लोगो की क़त्ल करने के बाद जेसा वजीर , महेरामणजी दुंगराणी, भानजी दल, दह्यो लाडक, नाग वजीर और तोगाजी सोढा वीरगति को प्राप्त हुए | वही उसी तरफ मुग़ल शाही लश्कर में महमद रफ़ी, सैयद सफुर्दीन, सैयद कबीर, सैयद अली खान मारे गए |
      शाही लश्कर में मुख्य सूबा मिर्ज़ा अजीज कोका और जाम श्री के लश्कर में कुमार श्री जसाजी और थोड़े सैनिक ही बचे थे |
      युद्ध के बारे में वहा पे एक शिलालेख भी जाम अजाजी की डेरी में हे , वही बाजूमे दीवार पर एक पुरातन चित्र भी है जिसमे जाम अजाजी अपने घोड़े को कुदाकर हाथी के ऊपर बैठे हुए सूबे की तरफ भाला का प्रहार करते हे... 
                                      
                                        

सवंत सोळ अड़तालमें , श्रावण मास उदार |
          जाम अजो सुरपुर गया, वद सातम बुधवार || १ ||
                        ओगणीसे चौदह परा, विभो जाम विचार |
          महामास सुद पांचमे कीनो जिर्नोध्धार || २ ||
          जेसो, दाह्यो, नागडो, महेरामण, दलभाण |
          अजमल भेला आवटे, पांचे बौध प्रमाण || ३ ||
          आजम कोको मारिओ, सुबो मन पसताईं |
          दल केता गारत करे, रन घण जंग रचाय || ४ ||

निजामुदीन अहमद लिखते हे की ये लड़ाई हिजरी सवंत १००१ के रजब माह की तारीख ६ को हुई थी | और जामनगर के पुरातन दस्तावेज में भुचर-मोरी की लड़ाई की तारीख विक्रम सवंत १६४८ में हालारी श्रावन वाद ७ को होने को लिखी हे...|
      युध्ध में नागडा वजीर ने भी अदभुत शौर्य दिखाया था | कहते हे की जब वह छोटा था तब जब उसकी माँ बैठी हुई होती थी तब उसके स्तन को पीछे खड़ा होकर स्तन से दूध पिता था | इस घटना को एक बार जाम सताजी ने देखा तो उनको बहुत हसी आई थी |  जब नागडा वजीर युद्ध में लड़ने के लिए आया था तब उसके पिता जेसा वजीर ने कहा था की “हे नागडा तू जब छोटा था तब जाम साहिब ने तुझे तेरी मा को खड़े होकर स्तनपान करता हुआ देखा था और हस पडे थे, अब समय आ गया हे अपनी मा के दूध की ताकत दिखने का, वो दूध एक शेरनी का हे इस बात को रणभूमि में साबित करना” | 

जब युद्ध चल रहा था तब नागडा वजीर ने अदभुत शौर्य दिखाया था | उसके दोनों हाथ के पंजे कट चुके थे लेकिन उसने अपने दोनों हाथ की कलाई की हड्डी में भाले को ठुसकर दुश्मनों को मरना चालू रखा था, इतना ही नही उसकी ऊंचाई भी बहुत होने के कारण उसने बादशाही लश्कर के हाथी के पेट में अपने कटे हुए हाथ को घुसाकर हाथी के पेट में बड़े बड़े घाव(खड्डे की तरह) कर दिए थे जिसके कारण हाथी के पेट से लहू की धारा बहने लगी थी...नागडा वजीर के ऊपर दुहे भी रचे हुए हे की...

               भलीए पखे भलां, नर नागडा निपजे नहीं ||
               जोयो जोमांना,  कुंताना जेवो करण || १ ||

अर्थ:- कुंताजी से जैसे कर्ण जैसा महा पराक्रमी पुत्र उत्पन हुआ, वैसे ही जोमा से नागडा वजीर जैसा महा पराक्रमी पुत्र उत्पन हुआ, इसिलिए कहेते हे की वीरांगनाओ के सिवा महापराक्रमी वीर पुरुष उत्पन नहीं होते...||

              जहां पड़ दीठस नाग जबान, सकोकर उभगयंद समान ||
            पड़ी सहजोई सचीपहचाण, पट्टकिय नागह लोथ प्रमाण || १ ||

अर्थ:- भुचर-मोरी के मैदान में जब नागडा वजीर के लोथ अर्थात मृत शरीर को उठाया तब गयंद नामके हाथी के समान उसकी उंचाय मालुम होने से सूबेदार को उसकी ऊँचाई का विश्वास हुआ था | 

  कुमार श्री अजाजी  युद्धभूमि में शहीद हो गए और बादशाह का लश्कर नगर की तरफ आ रहा हे यह खबर मिलते ही जाम सताजी ने जनान की सभी राणी को जहाज़ में बिठाकर सुचना दी की अगर मुस्लिम सैन्य आपकी तरफ आए तो अपने जहाज़ को समुद्र में डूबा देना, और अपने कुछ बाकि बचे सैन्य के साथ पहाड़ी इलाके में बदला लेने के लिए निकल पडे क्योकि ज़्यादातर सैन्य भूचर मोरी में शहीद हो गया था |
      इस तरफ राणियो का जहाज बंदरगाह  से निकले इससे पहेले सचाणा के बारोट इसरदासजी के पुत्र गोपाल बारोट ने कुमार श्री अजाजी (जो रणक्षेत्र में शहीद हुए थे उनकी) की पगड़ी को लाकर राणी को दिखा दी | ये देखकर राणी को सत चड़ा और उन्होंने सैनिको को आज्ञा देकर अपना रथ लेकर भूचर-मोरी के रणक्षेत्र की और चल पड़ी | इस तरफ बादशाह के मुस्लिम सैनिक नगर की और आ रहे थे | उन्होंने राणी के रथ को देखकर उनपर आक्रमण कर दिया, लेकिन उस समय ध्रोल के ठाकोर साहिब अपने भायती राजपुतो के साथ वहा आ पहुचे और मुस्लिम सैन्य को बताया की ये राणी सती होने के लिए आई हे उन्होंने मुस्लिम सैन्य के साथ समझौता  करके कुंवर अजाजी की राणी जिनकी शादी भी पूरी नहीं हुई थी उनको सती होने में पूरी मदद की |

      इस युद्ध के अंत में सूबा अजीज कोका जामनगर में आया, और वह पर आके उसने भारी लुटफात मचाई | बाद में उसे पता चला की मुज्जफर शाह जूनागढ़ की और भाग गया हे | उसने नवरंग खान, सैयद कासम और गुज्जरखान को साथ में लेकर जूनागढ़ की और प्रयाण किया | इस बात की खबर जाम सताजी को मिलते ही उसने मुज्जफर शाह को बरडा डुंगर के विस्तार में शरणागत दी...

धन्य हे ऐसे राजपुत जाम सत्रसाल (सताजी) को जिन्होंने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए अपने राजपाट को त्याग करके एक शरणार्थी की रक्षा की |
      बादशाही लश्कर का बारूद और अन्न सामग्री पूरी होने के वजह से उन्होंने जूनागढ़ से लश्कर हटाकर जामनगर में सूबा रखकर बाकि के लश्कर को अहमदाबाद भेज दिया | मुजफ्फर शाह को अहसास हुआ की मेरे लिए जिसने अपने लाखो को शहीद कर दिया और इतनी तकलीफ उठाई उनको अब ज्यादा परेशान नहीं करना चाहिए, इसलिए वो बरडा डुंगर से भाग गया और कच्छ में राव भारमल के शरण में गया |


      जामनगर में जाम सताजी की गैरहाजरी का लाभ लेकर राणपुर के जेठवा राणा रामदेवजी के कुंवर राणा भाणजी के राणी कलाबाई ने अपनी फ़ौज से अपना गया हुआ प्रदेश जो जाम साहब में जीत लिया था उसको वापस कब्जे में कर लिया और छाया में राजधानी की स्थापना कर कुंवर खिमाजी को गद्दी पे बिठा दिया |

      जब सूबेदार को ऐसी खबर मिली की मुजफ्फर शाह जुनागढ़ में हे तो उसने वहां पर फ़ौज को भेजकर जाम सताजी को पत्र मारफत संदेसा भिजवाया की “जूनागढ़ के नवाब के ऊपर जब तक हमारा सैन्य रहे तब तक आपको शाही लश्कर के अन्न-पानी और राशन की सामग्री मोहैया करानी होगी और इस बात से जाम सताजी के साथ सुलह करके जाम सताजी को वापस वि.सं. १६४९ के माह सुद ३ को जामनगर की गद्दी को सताजी पर बिठाया |
      सूबेदार को जब पता चला की मुज्जफर शाह कच्छ में हे तो उन्होंने कच्छ के राव भारमल को संदेसा भिजवाया कच्छ के राव भारमल ने संदेसा मिलते ही मुजफ्फर शाह को अबदल्ला खान की फ़ौज में हाजिर होने के लिए भेजा, और उसे अहमदाबाद की और भेजा लेकिन रास्ते में मुज्जफर शाह ने ध्रोल के पास आत्महत्या कर ली.|

      इस तरह जाम सताजी ने एक मुस्लिम सरणार्थी को दिए हुए वचन को निभाते हुए अपनी राजपाट गवाकर और हजारो राजपूतों  की सेना के शहीद होते हुए भी अपने क्षात्र-धर्म का पालन किया |||
      ध्रोल के पादर में भुचर-मोरी के मैदान में आज भी हर साल श्रावण वद सातम को हज़ारों की संख्या में राजपुत इकठ्ठे होते हे और इन वीर शहीदों की श्रधांजली अर्पण करते हे यहाँ पर बड़ी मात्र में अन्य जाती के लोग भी इन शहीदों को श्रंधाजली अर्पण करते हे | युध्ध में इतनी भारी मात्रा में शहादत हुई थी की आज की तारीख में भी भूचर-मोरी के मैदान की मिट्टी लहू के लाल रंग की है |||


संदर्भ:-  
1. “यदुवंश प्रकाश” -- लेखक जामनगर स्टेट राजकवि “मावदानजी भीमजी रत्नु” -- पृष्ठ संख्या 191 से 228…
                2. विभा-विलास” -- देवनागरी लिपि में लिखा हुआ यदुवंश का पुष्तक जिसके लेखक हे -- चारण कवि “व्रजमालजी परबतजी माहेडू”
      3. “नगर-नवानगर-जामनगर”--- लेखस इतिहासकार हरकिशन जोषी – पृष्ठ संख्या71 से 76...
       4.  सौराष्ट्र का इतिहास” – लेखक इतिहासकार शंभूप्रसाद हरप्रसाद देसाई – पृष्ठ संख्या 563 से 567…
                5.  निजामुदीन अहमद लिखित मुग़लो के शाही दस्तावेज
      6. तारीखे सोरठ” – जूनागढ़ के नवाबी शाशन का इतिहास
      7. “मिरांते सिकंदरी” – मुग़ल शाही दस्तावेज

8-http://rajputanasoch-kshatriyaitihas.blogspot.in/2015/09/the-historical-battle-of-bhuchar-mori.html

चन्द्रवंशी पठानिया राजपूतों का सम्पूर्ण इतिहास, History of Pathania Rajput

चन्द्रवंशी पठानिया राजपूतों का सम्पूर्ण इतिहास -----------
मित्रों आज हम आपको पंजाब,जम्मू,हिमाचल प्रदेश के चंद्रवंशी पठानिया राजपूतो(Tanwar/tomar rajput Clan Pathania) के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे.यह वंश ईस्वी 1849 तक विदेशी आक्रमणकारियों के विरुध अपने संघर्षों के लिए जाना जाता है आक्रमणकारी चाहे मुसलमान हो या अंग्रेज। इस वंश के राम सिंह पठानिया अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी वीरता के लिए विख्यात हैं.यह वंश इतना बहादुर व झुझारू है के आजादी के बाद भी पठानिया राजपूतों ने सेना में 3 महावीर चक्र प्राप्त किये.....
-------------------पठानिया वंश की उत्पत्ति-------------------
इस वंश की उत्पत्ति पर कई मत हैं,
श्री ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 181-182 के अनुसार पठानिया राजपूत बनाफर वंश की शाखा है,उनके अनुसार बनाफर राजपूत पांडू पुत्र भीम की हिडिम्बा नामक नागवंशी कन्या से विवाह हुआ था हिडिम्बा से उत्पन्न पुत्र घटोत्कच के वंशज वनस्पर के वंशज बनाफर राजपूत हैं,पंजाब के पठानकोट में रहने वाले बनाफर राजपूत ही पठानिया राजपूत कहलाते है.....
किन्तु यह मत सही प्रतीत नहीं होता ,क्योंकि पठानिया राजपूतो के बनाफर राजपूत वंश से सम्बंधित होने का कोई प्रमाण नही मिलता है,

श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाडी कृत क्षत्रिय राजवंश के पृष्ठ संख्या 270-271 व 373 के अनुसार पठानिया राजपूत तंवर वंश की शाखा है,
नूरपुर के तंवर वंशी राजा बासु (1580-1613) ने अपने पुरोहित व्यास के साथ महाराणा मेवाड़ अमर सिंह से मुलाकात की थी,इसी व्यास का वंशज सुखानंद सम्वत 1941 वि० को उदयपुर आया था,बासु के समय के ताम्र पत्र के आधार पर सुखानंद के रिकॉर्ड में लिखा था कि "दिल्ली का राज छूटने के बाद राजा दिलीप के पुत्र जैतमल ने नूरपुर को अपनी राजधानी बनाया.
(वीर विनोदभाग-2 पृष्ठ संख्या 228)
निष्कर्ष---सभी वंशावलियों के रिकार्ड्स से भी यह वंश तंवर वंश की शाखा ही प्रमाणित होता है,,पंजाब में पठानकोट में रहने के कारण तंवर वंश की यह शाखा पठानिया के नाम से प्रसिद्ध हुई.वस्तुत: पठानकोट का प्राचीन नाम भी संभवत: पैटनकोट हो सकता है.

--------------पठानकोट एवं नूरपुर राज्य का इतिहास------------
Dynasty--Tanwar rajput Clan(Pathania)

Area--180 km² (1572)
राज्य का नाम--नूरपुर(पुराना नाम धमेरी)
------------इतिहास---------
पठानिया राजपूत तंवर राजा अनंगपाल तंवर के अनुज राजा जैतपाल के वंशज है जिन्होंने उत्तर भारत में धमेरी नाम के राज्य की स्थापना की और पठानकोट नामक शहर बसाया। धमेरी राज्य का नाम बाद में जा कर नूरपुर पड़ा। सं० 1849 में नूरपुर अंग्रेजो के अधीन हो गया।
इस राज्य कि स्थापना 11 वी सदी में (1095 ईस्वी)में दिल्ली के राजा अनंगपाल तंवर द्वित्य के छोटे भाई जैतपाल द्वारा की गई थी,जिन्होंने खुद को पठानकोट में स्थापित किया,उन्होंने यहाँ गजनवी काल से स्थापित मुस्लिम गवर्नर कुजबक खान को पराजित कर उसे मार भगाया और पठानकोट किला और राज्य पर अधिकार जमाया,इसके बाद जैतपाल तंवर और उनके वंशज पठानिया राजपूत कहलाने लगे,उनके बाद क्रमश: खेत्रपाल,सुखीनपाल,जगतपाल,रामपाल,गोपाल,अर्जुनपाल,वर्शपाल,जतनपाल,विदुरथपाल,किरतपाल,काखोपाल पठानकोट के राजा हुए.....
उनके बाद की वंशावली निम्नवत है------

राजा जसपाल(1313-1353)---इनके नो पुत्र हुए जिनसे अलग अलग शाखाएँ चल.
राजा कैलाश पाल(1353-1397)
राजा नागपाल(1397-1438)
राजा पृथीपाल(1438-1473)
राजा भीलपाल(1473-1513)
राजा बख्त्मल(1513-1558) ये अकबर के विरुद्ध शेरशाह सूरी के पुत्र सिकन्दर सूर के विरुद्ध लडे और 1558 ईस्वी में इनकी मृत्यु हुई.
राजा पहाड़ी मल(1558-1580)
राजा बासु देव(1580/1613)-----------
राजा बासु देव के समय उनसे पठानकोट का परगना छिन गया और राजधानी धमेरी स्थान्तरित हो गई,किन्तु बाद में राजा बासु ने अपनी स्थिति को मजबूत किया और अकबर के समय उन्हें 1500 का मंसब मिला जो जहाँगीर के समय बढ़कर 3500 हो गया.हालाँकि राजा बासु पर जहाँगीर को पूरा विश्वास नहीं था जिसका जिक्र तुजुक ए जहाँगीरी में मिलता है,राजा बासु ने नूरपुर धामेरी में बड़ा दुर्ग बनवाया जो आज भी स्थित है,शाहबाद के थाने में राजा बासु की ईस्वी 1613 में मृत्यु हो गई.
राजा सूरजमल(1613-1618)---राजा बासु ने अपने बड़े पुत्र जगत सिंह को राजा बनाया पर जहाँगीर ने उसके छोटे पुत्र सूरजमल को धमेरी का राजा बनाकर तीन हजार जात और दो हजार सवार का मनसबदार बना दिया,उनकी ईस्वी 1618 में चंबा में मृत्यु हो गई.
मियां माधो सिंह को जहागीर ने राजा का ख़िताब दिया उनकी ईस्वी 1623 में मृत्यु हो गई.
राजा जगत सिंह (1618-1646)---
शाहजहाँ के समय राजा जगत सिंह फिर से धामेरी के राजा बन गये.इन्हें पहले 300 का मनसब मिला बाद में बढ़कर 1000 आदमी और 500 घोड़े का हो गया,ईस्वी 1626 में यह बढ़कर 3000 आदमी और 2 हजार घोड़ो का हो गया,ईस्वी 1641 में यह बढ़कर 5 हजार का मनसब हो गया. ईस्वी 1622 में धमेरी का नाम मल्लिका नूरजहाँ के नाम पर बदलकर नूरपुर हो गया, नूरजहाँ यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य से बहुत प्रभावित थी.शाहजहाँ ने इन्हें बंगश का मुख्याधिकारी बना दिया,ईस्वी 1640 में जगत सिंह ने शाहजहाँ के खिलाफ विद्रोह किया,शाहजहाँ ने इनके विरुद्ध सेना भेजी,जिसके बाद कड़े संघर्ष के बाद उन्होंने ईस्वी 1642 में आत्मसमर्पण किया और जहाँगीर के दरबार में पेश हुए,उनका मनसब बहाल कर दिया गया.ईस्वी 1646 में पेशावर में उनकी मृत्यु हो गई.
राजा राजरूप सिंह(1646–1661)---
राजा जगतसिंह के पुत्र राजरूप सिंह को शाहजहाँ ने कांगड़ा घाटी की फौजदारी दी थी.वे दो हजार जात और दो हजार सवार के मनसबदार थे,बाद में इसे बढ़कर 3500 कर दिया गया,ईस्वी 1661 में इन्हें गजनी का थानेदार भी बनाया गया.ईस्वी 1661 में इनकी मृत्यु हो गई.
राजा मान्धाता सिंह(1661–1700)
राजा दयाद्त्त सिंह (1700–1735)
राजा फ़तेह सिंह (1735–1770)
राजा पृथ्वीसिंह (1770–1805)
राजा वीरसिंह (1805–1846)----नूरपुर के अंतिम शासक राजा,इनके समय में सिख महाराजा रणजीत सिंह ने इस राज्य पर हमला किया जिसका वीरसिंह ने वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया किन्तु शत्रु की कई गुनी सेना होने के कारण सिखों ने इनका काफी क्षेत्र छीन लिया,इसके बाद इनके वंशजो पर काफी कम जागीर रह गई.ईस्वी 1846 में एक युद्ध में इनका निधन हो गया.

राजा जसवंत सिंह(1846–1898)---इनके समय में अंग्रेजो ने इस रियासत को अपने क्षेत्र में मिला लिया और विक्रम संवत 1914 में किले को तोड़ कर इसका आधा भाग जसवंत सिंह को दे दिया,अंग्रेजो ने इन्हें मुवाअजे के रूप में बड़ी सम्पत्ति दी.इन्ही के समय वीर वजीर राम सिंह पठानिया ने अंग्रेजो के विरुद्ध बगावत कर उनके दांत खट्टे कर दिए थे.

राजा गगन सिंह(1898–1952)---इनका जन्म ईस्वी 1882 में हुआ था,6th Viceregal Darbari in Kangra District, an honorary magistrate in Kangra District;
मार्च 1909 को वायसरॉय ने इन्हें राजा का खिताब दिया,सन 1952 ईस्वी में इनका निधन हो गया.
राजा देवेन्द्र सिंह(1952-1960)

इनके अतिरिक्त राजा भाऊ सिंह को सन 1650 में शाहपुर स्टेट मिली पर उन्होंने सन 1686 ईस्वी में इस्लाम धर्म गृहण कर लिया,उनके वंशज आज मुस्लिम पठानिया राजपूत हैं.
इस प्रकार हम देखते हैं कि पंजाब ,हिमाचल,जम्मू के पठानिया राजपूत चंद्रवंशी तंवर राजपूतो की ही शाखा हैं और इन्होने लम्बे समय तक पठानकोट,नूरपुर(धमेरी)आदि राज्यों पर राज किया है,यह वंश इतना बहादुर व झुझारू है के आजादी के बाद भी पठानिया राजपूतों ने 3 महावीर चक्र प्राप्त किये। आज पठानिया राजपूत उत्तर पंजाब व हिमाचल में फैले हुए है।सेना में आज भी बड़ी संख्या में पठानिया राजपूत मिलते हैं जिनमे बड़े बड़े आर्मी ऑफिसर भी शामिल हैं.
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सन्दर्भ सूची-----
1-श्री ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 181-182
2-श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाडी कृत क्षत्रिय राजवंश के पृष्ठ संख्या 270-271 व 373
3-वीर विनोदभाग-2 पृष्ठ संख्या 228
4-तजुक-ए-जहाँगीरी
5-http://en.wikipedia.org/wiki/Pathania
6-http://en.wikipedia.org/wiki/Nurpur,_India
7-http://www.indianrajputs.com/view/nurpur
8-http://kshatriyawiki.com/wiki/Tomar
9-A book Twarikh Rajgan-E-Pathania-E-Nurpur, Zila Kangra" i.e. History of Pathania Rajas of Nurpur by Mian Rughnath Singh Pathania.
10- http://gpathania.blogspot.in/2010/…/pathaniawho-are-we.html…
11-http://rajputanasoch/-kshatriyaitihas.blogspot.in/2015/08/blog-post.html

Tuesday, November 17, 2015

अमर सिंह राठौड़

--राजपूती आन बान शान के प्रतीक अमर सिंह राठौड़---

इन्होंने आगरा के किले में बादशाह शाहजहाँ के साले सलावत खान का भरे दरबार में सर काट लिया था क्योंकि सलावत खान ने उन्हें अपशब्द कहे थे।
अर्जुन गौड़ ने उन्हें धोखे से मार दिया।तब उनके शव को किले से वापस लाने का काम किया वीर बल्लू चम्पावत राठौड़ ने।जिन्होंने आगरा किले से अमर सिंह का शव लेकर किले की ऊँची दिवार से अपना घोडा कुदाया था।

शूरवीर अमर सिंह राठौड़(11 दिसम्बर 1613 - 25 जुलाई 1644 )का संक्षिप्त परिचय---

मारवाड़ जोधपुर के राजा गजसिंह की रानी मनसुखदे सोनगरा की कोख से सम्वत 1670(11 दिसम्बर 1613) को अमर सिंह राठौड़ का जन्म हुआ था।ये बचपन से ही बहुत वीर और स्वतंत्र प्रकृति के थे।इनकी प्रवर्ति से इनके पिता भी इनसे सशंकित हो गए और उन्होंने अमरसिंह की बजाय जसवंत सिंह को जोधपुर का युवराज बना दिया।इससे रुष्ट होकर अमर सिंह राठौड़ अपने स्वामिभक्त साथियों सहित जोधपुर छोडकर चले गए।उनकी वीरता और शौर्य से स्वयम बादशाह भी परिचित थे इसलिए उन्होंने आग्रह कर अमर सिंह राठौड़ को आगरा बुलाया और उन्हें मनसब दिया।

अमर सिंह राठौड़ को नागौर का राव बनाकर पृथक राज्य की मान्यता दे दी गई और उन्हें बडौद,झालान,सांगन आदि परगनों की जागीरे भी दी गई।धीरे धीरे अमर सिंह की कीर्ति पुरे देश में फैलने लगी और उनके पुरुषार्थ रणकौशल और वीरता से बादशाह भी बहुत प्रभावित था।किन्तु शाही दरबार में उनके शत्रुओं की संख्या बढ़ती चली गई।

बादशाह के साले सलावत खान का भरे दरबार में वध----

बादशाह के साले सलावत खान बख्शी का लड़का एक विवाद में अमर सिंह के हाथो मारा गया था इसलिये वो अमर सिंह से बदला लेने की फ़िराक में था।
जोधा केसरीसिंह जो कल्ला रायमलौत के पोते थे वो
शाही सेवा छोड़कर अमर सिंह की सेवा में चले गए और अमर सिंह ने उन्हें नागौर की जिम्मेदारी और एक जागीर दे दी जिससे बादशाह भी अमर सिंह से रुष्ट हो गया।

उसी समय एक तरबूज की बेल के छोटे से मामले में नागौर और बीकानेर राज्य में संघर्ष हो गया जिसमें बादशाह ने बीकानेर का पक्ष लिया और अमरसिंह से यमुना तट पर वनो की हाथियों की चराई का कर भी मांग लिया जिससे तनाव बढ़ गया।इन सब घटनाओ के पीछे उसी सलावत खान बक्शी का हाथ था जो लगातार बादशाह के कान भर रहा था।
अब स्वतंत्र विचारो के स्वाभिमानी यौद्धा अमर सिंह ने बादशाह का मनसब छोड़कर नागौर लौटने का मन बना लिया और बादशाह शाहजहाँ से मिलने का समय मांगा।पर बादशाह के साले सलावत खान ने मुलाकात नही होने दी।

विक्रम संवत 1701 की श्रावण सुदी 2 तिथि
(25जुलाई 1644) में अमरसिंह राठौड़ और सलावत खान में भरे दरबार में वाद विवाद हो गया और सलावत खान ने अमर सिंह को गंवार बोल दिया।इतना सुनते ही अमर सिंह राठौड़ से रहा नही गया और उन्होंने कटार निकालकर सीधे सलावत खान के पेट में घुसा दी जिससे उस दुष्ट के वहीँ प्राण निकल गए।

यह दृश्य देखकर पूरे दरबार में हड़कम्प मच गया और सभी दरबारी भाग खड़े हुए।खुद बादशाह शाहजहाँ और शहजादा दारा भी भागकर ऊपर चढ़ गए और वहीँ से उन्होंने अमर सिंह को घेर लेने का हुक्म सुना दिया।किन्तु अमर सिंह ने अकेले लड़ते हुए कई सैनिको का काम तमाम कर दिया।
फिर अर्जुन गौड़ ने धोखे से अमर सिंह पर वार किया जिससे वो गिर गए और शाही सैनिक उनपर टूट पड़े।इस संघर्ष में अर्जुन गौड़ के साथी जगन्नाथ मेड़तिया भी अमर सिंह के पक्ष में रहे।इस प्रकार अकेला लड़ता हुआ ये वीर यौद्धा वहीँ मारा गया।किले के दरवाजे पर खड़े अमर सिंह के 20 सैनिको को भी जब उनकी मृत्यु की जानकारी मिली तो उन्होंने भी तलवारे निकालकर वहीँ मुगलो से संघर्ष किया और अमर सिंह के शव को प्राप्त करने के लिए सैंकड़ो मुगलो को मारकर खुद वीरगति को प्राप्त हो गए।

बाद में ये जानकारी बल्लू चम्पावत राठौड़ को दी गयी तो उन्होंने वीरतापूर्वक अमर सिंह शव वापस लेकर आए।जिसके बाद उनकी रानियां सती हो गयी।
(बल्लू चम्पावत की वीरता पर अलग से पोस्ट की जाएगी)।

अमर सिंह राठौड़ की जयंती हर साल नागौर में समारोहपूर्वक मनाई जाती है जिसमे वीर बल्लू चम्पावत को भी श्रधान्जली अर्पित की जाती है।
राजपूती आन बान शान स्वाभिमान के प्रतीक
वीर अमर सिंह और बल्लू चम्पावत राठौड़ को शत शत नमन।
संदर्भ--
1-राजपूतो की वंशावली व् इतिहास महागाथा पृष्ठ संख्या 131-135(ठाकुर त्रिलोक सिंह धाकरे)
2-क्षत्रिय राजवंश पृष्ठ संख्या 125
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jadeja rajput and muslim war

यदुवंशी क्षत्रिय जाम सत्रसाल उर्फ़ सता जी जाडेजा और मुगलों से तमाचन का युद्ध(सम्वत 1639)-------
जय श्रीकृष्ण----
मजेवाड़ी के मैदान में सम्वत 1633 में जाडेजा राजपुतो ने भान जी दल जाडेजा और जेसा जी वजीर के नेत्रत्व में मुग़ल लश्कर को पस्त कर दिया था |भान जी दल जाडेजा ने मजेवाड़ी में अकबर के शिविर से 52 हाथी, 3530 घोड़े और पालकियों को अपने कब्जे में लिया था और मुगल सेनापति मिर्जा खान तथा अकबर सौराष्ट्र से भाग खड़े हुए थे. सरदार मिर्ज़ा खान ने अहमदाबाद जाकर सूबेदार शाहबुदीन अहमद खान को बताया की किस तरह जाम साहिब की फ़ौज ने उनके लश्कर का बुरी तरह नाश कर दिया और वो अपनी जान बचाकर वहा से भाग निकला | खुद अकबर भी इस हार से बहुत नाराज था | अब मुगल सेना नवानगर को नष्ट करने के प्रयोजन पर लग गई और जल्दी ही कुछ वर्ष बाद सम्वत 1639 में शाहबुदीन ने खुरम नामके सरदार को एक प्रचंड सैन्य के साथ जामनगर पर चढाई करने के लिए भेजा |

मुग़ल सूबे का बड़ा लश्कर जामनगर(नवानगर) के ऊपर आक्रमण करने के लिए आ रहा हे ये बात जाम श्री सताजी साहिब को पता चलते ही उन्होंने जेसा वजीर और कुंवर अजाजी को एक बड़ा लश्कर लेकर उनके सामने युद्ध करने के लिए चल पडे | इस सैन्य में पाटवी कुंवर अजाजी,कुंवर जसाजी,जेसा वजीर, भाराजी, रणमलजी, वेरोजी, भानजी दल, तोगाजी सोढा ये सब भी थे | जाम साहिब सताजी अपने सेना को लेकर तमाचन के गाव के पादर मे उंड नदी ने के किनारे आके अपनी सैन्य छावनी रखी | मुग़ल फ़ौज भी सामने गोलिटा नामके गाव के पास आ कर रुक गई |

मुग़ल फ़ौज के जासूसों ने सूबेदार को कहा की जाम साहिब के लश्कर में तोपे और वीर योद्धाओ का भारी मात्रा में ज़ोर हे, इसिलिए अगर समाधान हो सके तो अच्छा रहेगा | ये बात सुनकर खुरम भी अंदर से डर गया और उसने जाम सताजी को पत्र लिखा:-
“ साहेब आप तो अनामी है, आपके सब भाई, कुंवर और उमराव भी युद्ध से पीछे हठ करे ऐसे कायर नहीं हे | हम तो बादशाह के नोकर होने की वजह से बादशाह जहा हुकुम करे वह हमको जाना पड़ता हे, उनके आदेश के कारण हम यहाँ आए हुए है, पर हमारी इज्जत रहे ये अब आपके हाथ में है |”

इस पत्र को पढ़ते ही जाम साहेब ने जेसा वजीर से सलाह मशवरा करने के बाद जवाब भेजा की “ आप लोग एक मंजिल पीछे हट जाइए” ये जवाब मिलते ही खुरम ने दुसरे दिन सुबह होते ही पड़धरी गाव की दिशा में कुच की , वो एक मंजिल पीछे हट गया | ये देखकर जाम साहिब ने जाम साहिब ने उसे कुछ पोशाक-सोगात देकर उसे कुछ किए बिना अपने लश्कर को लेकर जामनगर की और रवाना हो गए | ये देखते ही कुंवर जसाजी ने जाम साहिब से कहा की हुकुम अगर आपकी अनुमति हो तो हम यहाँ पे थोड़े दिन रुकना चाहते हे | इस बात को कबुल करके जाम साहिब ने भारोजी, महेरामनजी, भानजी दल, जेसो वजीर और तोगाजी सोढा इन सब सरदारों के साथ २०,००० के सैन्य को वह पे रुकने दिया और खुद जामनगर की तरफ रवाना हो गए | कुंवर जसाजी ने तमाचन के पादर में अपना डेरा जमकर वहा पर खाने-पीने की बड़ी मिजबानी करने की तयारी करने लगे |

इस तरफ खुरम का जासूस ये सब देख रहा था | उसने फ़ौरन जाकर खुरम को बताया की जाम साहिब का लश्कर जामनगर जा चूका हे, यहाँ पर सिर्फ २०,००० का सैन्य हे | ये सब लोग मेजबानी में शराब की महफ़िल में व्यस्त हे, ये सही समय हे उनपे आक्रमण करने का | बाद में हम कुंवर को पकडके जाम साहिब को बोलेंगे की मजेवाडी के युद्ध में हुए हमारे नुकशान की भरपाई करो हमारा सामान वापस दो वरना हम आपके कुंवर को मुसलमान बना देंगे | इससे हमारी इज्जत भी रहेंगी और अहमदाबाद जाकर शाहबुदीन सूबेदार और बादशाह को भी खुश कर देंगे .|

इस बात को सुनने के बाद खुरम तैयार होकर अपने शस्त्र के साथ हाथी पर बैठा अपनी तोपों को आगे बढाया अपने सैन्य और घुड़सवार को लेकर तमाचन की तरफ चल पड़ा |

इस बात की जाम साहिब की छावनी में किसी को भनक तक नहीं थी | वह पर सभी आनंद-प्रमोद में मस्त थे | वही परअचानक आसमान में धुल उडती देख जेसा वजीर ने अपने चुनिदा सैनिको को आदेश दिया की “ये धुल किसकी हे पता करके आओ, मुझे लगता हे इन तुर्कों ने हमसे दगा किया हे | सैनिक तुरंत खबर लेके आए की खुरम की फ़ौज हमारे तरफ आगे बढ़ रही हे | इस बात को सुनते ही जेसा वजीर ने कुंवर जसाजी को कहा की “ आप जामनगर को पधारिए हम आपके सेवक यहाँ पे युद्ध करेंगे” कुंवर जेसाजी ने जवाब दिया की “ इस समय अगर में पीठ दिखा कर चला गया तो में राजपुत नहीं रहूँगा, जीतना हारना सब उपरवाले के हाथ में है, पर रणमैदान छोड़ कर चला जाना क्षात्र-धर्मं के खिलाफ है |”

कुंवर जसाजी ने ये कहकर अपनी फ़ौज को तैयार किया और उंड नदी को पार करते हुए सामने की तरफ आ पहोचे | दोनों तरफ से तोपों और बंदुके चलने लगी और कई सैनिक मरने लगे | ये देखकर बारोट कानदासजी रोह्डीआ ने जेसा वजीर से कहा की “हे वजीर तु सब युद्ध कला जनता हे, फिर भी हमारे लोग यहाँ मर रहे है, और तू कुछ बोल क्यों नहीं रहा ? इस तरह लड़ने से हमारी जीत नहीं होगी, मेरी मानो तो हर हर महादेव का नारा बुलाकर अब केसरिया करने का वक़्त आ गया हे, अपने घोड़े पर बैठकर मुग़ल सेना से भिड़ जाओ , फिर उन तुर्कों की क्या औकाद है हम देखते ही उनका संहार कर डालेंगे”

ये सुनकर जेसा वजीर और कुंवर जसाजी, भानजी दल, मेरामणजी, भाराजी सब हर हर महादेव का नारा लगाकर केसरिया करने को तैयार हो गए | हाथ में भाले लेकर सब मुग़ल सेना से भीड़ पडे तलवारे निकल कर सबको काटने लगे चारो तरफ खून ही दिख रहा था, मांसाहारी पक्षी आसमान में दिखने लगे, पुरा रणमैदान रक्त से लाल हो गया था | इतना बड़ा राजपुतो और मुगलो के बीच में युद्ध हुआ था की देखते ही देखते वह १५,००० लाशो से रणमैदान भर गया | खुरम की फ़ौज के सैनिक डर के मारे भागने लगे | खुरम खुद अपने हाथी में से उतरकर घोड़े पर बैठ के भाग गया | जाम श्री सताजी साहिब के सैन्य ने विसामण नाम के गाव तक मुग़ल फ़ौज का मारते मारते पिछा किया | वहां से वे रुक गए जीत के ढोल बजाते हुए रणमैदान में वापस आ कर बादशाही खजाने तंबू, मुग़ल के नगारे, ३२ हाथी, सेंकडो घोड़े, तोपे, रथ आदि लेकर कुंवर जसाजी के साथ जामनगर पधारे |

इतनी सी छोटी उमर में कुंवर जसाजी का ये अदभुत पराक्रम देखकर जाम सताजी बहुत खुश हो गए | उन्होंने जेसा वजीर, महेरामणजी, भाराजी , भानजी दल तथा तोगाजी सोढा आदि सरदारों को अमूल्य भेट अर्पण की इसके साथ ही जो सैनिक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए थे उनके परिवार को जागीर में जमीने और अमुक रमक देने का वचन दिया |

जाडेजा राजपुतो ने अपने राजा की गैरहाजरी में भी उनके सरदारों ने सूझ-बूझ का परिचय देकर और अपने से ज्यादा बड़ी मुगल फ़ौज जिससे लड़ने से भी बड़े-बड़े राजा महाराजा डरते थे उसको न केवल हराकर बल्कि रण-मैदान से भगाकर अदम्य शाहस और राजपुती शौर्य का परिचय दिया था |

References:
1- Yaduvansh prakash...pratham khand... page no 185,
2- Saurastra ka itihas page no.559
3---
http://rajputanasoch-kshatriyaitihas.blogspot.in/2015/09/the-battle-of-tamacha.html
4- भंवर अभिजीत सिंह जाडेजा जी 

जाडेजा राजपूतों की शौर्यगाथा का प्रतीक भूचर-मोरी का ऐतिहासिक युद्ध

(सम्वंत 1648)---------------
राजपूत एक वीर स्वाभिमानी और बलिदानी कौम जिनकी वीरता के दुश्मन भी कायल थे, जिनके जीते जी दुश्मन राजपूत राज्यो की प्रजा को छु तक नही पाये अपने रक्त से मातृभूमि को लाल करने वाले जिनके सिर कटने पर भी धड़ लड़ लड़ कर झुंझार हो गए।
आज हम आपको एक ऐसे युद्ध के बारे में बताएँगे जहा क्षात्र-धर्म का पालन करते हुए एक शरणार्थी मुस्लिम को दिए हुए अपने वचन के कारण हजारो राजपुतो ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए | भूचर-मोरी का युद्ध सौराष्ट्र के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध माना जाता हे ,जहा पश्चिम के पादशाह का बिरुद मिलने वाले जामनगर के शासक और जाडेजा राजपुत राजवी जाम श्री सताजी से अपने से कई गुना अधिक बड़े और शक्तिशाली मुग़ल रियासत के सामने नहीं झुके | यह युद्ध इतना भयंकर था की इसे सौराष्ट्र का पानीपत भी कहा जाता है |इस युद्ध में दोनों पक्षों के एक लाख से ज्यादा सैनिक शहीद हुए.
युद्ध की पृष्ठभूमि-----
विक्रम सवंत १६२९ में दिल्ही के मुग़ल बादशाह जलालुदीन महमद अकबर ने गुजरात के आखिरी बादशाह मुज्जफर शाह तृतीय से गुजरात को जीत लिया | जिसके परिणाम स्वरुप मुजफ्फर शाह राजपिपला के जंगलो में जाकर कुछ समय के लिए छिप गया, फिर उसने गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित जामनगर के राजा जाम सताजी तथा जूनागढ़ के नवाब दौलत खान और कुंडला के काठी लोमान खुमान के पास जाकेर उनसे सहायता लेकर ३०,००० हजार घुड़सवार और २०,००० सैनिक लेकर अहमदाबाद में भारी लुटपाट मचाई और अहमदाबाद, सूरत और भरूच ये तीन शहर कब्जे कर लिए | उस समय अहमदाबाद का मुग़ल सूबेदार मिर्ज़ा अब्दुल रहीम खान (खानेखाना) था | पर वो मुज्जफर शाह के हमले और लूटपाट को रोक नहीं सका | जिसकी वजह से अकबर ने अपने भाई मिर्ज़ा अजीज कोका को गुजरात के सूबेदार के रूप में नियुक्त किया | सूबेदार के रूप में नियुक्त होने के साथ ही उसने मुजफ्फर शाह को कद कर लिया, पर सन १५८३ (वि.सं. १६३९ )को मुजफ्फर शाह मुग़ल केद से भाग छुटा और सौराष्ट्र की तरफ भाग गया | मुजफ्फर शाह ने सौराष्ट्र के कई राजाओ से सहायता की मांग की, पर किसी ने उसकी मदद नहीं की,
आखिर में जामनगर के जाम सताजी ने उसको ये कह के आश्रय दिया की “ शरणागत की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्मं है “ और उसके रहने के लिए बरडा डुंगर के क्षेत्र में व्यवस्था कर दी |

इस बात की खबर अहमदाबाद के सूबेदार मिर्ज़ा अजीज कोका को मिलते ही उसने मुजफ्फर शाह को पकड़ने के लिए एक बड़ा लश्कर तैयार किया और विरमगाम के पास में पड़ाव डाला, नवरोज खान तथा सैयद कासिम को एक छोटा लश्कर देकर उसने मोरवी की और इन दोनों को मजफ्फर शाह की खोज करने के लिए भेजा | मुजफ्फर शाह जामनगर में हे इस बात की खबर मिलने पर नवरोज खान ने जाम श्री सताजी को पत्र लिखा कि----
“आप गद्दार मुजफ्फर शाह को अपने राज्य में से निकल दो “ परंतु अपने पास शरणागत के लिए आये हुए को संकट के समय त्याग देना राजपूत धर्मं के खिलाफ है” ये सोच कर जाम श्री सताजी ने नवरोज खान की इस बात को ठुकरा दिया |
इस बात से गुस्से होकर नवरोज खान ने अपने लश्कर को जामनगर की और कुच करने का आदेश दिया | इस बात का पता चलते ही जाम साहिब ने बादशाह के लश्कर को अन्न-पानी की सामग्री उपलब्ध करानी रोक दी, और लश्कर की छावनियो पे हमला करना शुरु कर दिया तथा उनके हाथी, घोड़े व ऊंट को कब्जे में करके लश्कर को काफी नुकशान पहुँचाया |
सोरठी तवारीख में लिखा गया था की “ जाम शाहीब ने मुग़ल लश्कर को इतना नुकशान पहुँचाया और खाध्य सामग्री रोक दी थी की लश्करी छावनी में अनाज की कमी की वजह से उस समय में एक रूपये के भाव से एक शेर अनाज बिकने लगा था”
इस बात की खबर मिर्ज़ा अजीज कोका (जो विरामगाम के पास अपना लश्करी पड़ाव डालके पड़ा था) को मिलते ही उसने भी अपने बड़े लश्कर के साथ जामनगर की और कुछ कर दी और नवरोज खान और सैयद कासिम के सैन्य के साथ जुड़ गया | जाम श्री सताजी ने अपने अस्त्र-शस्त्र और अन्न सामग्री तो जामनगर में ही रखी थी इसलिए अजीज कोका ने अपने लश्कर को जामनगर की और कुच किया | जाम साहिब को जब इस बात की खबर मिली की अजीज कोका अपने सैन्य के साथ जामनगर की तरफ आ रहा हे तब उन्होंने भी अपने सैन्य को मुग़ल लश्कर की दिशा में कुच करवाया |
जामनगर से ५० किमी के अंतर पर स्थित ध्रोल के पास भूचर-मोरी के मैदान में जाम साहिब के लश्कर और मुग़ल लश्कर का आमना-सामना हुआ | उस समय जाम श्री सताजी की मदद के लिए जूनागढ़ के नवाब दौलत खान और कुंडला के काठी लोमा खुमान भी अपने सैन्य के साथ पहुच गए थे.
युद्ध की घटनाएँ----
इस ध्रोल के पास स्थित भुचर-मोरी के मैदान में दोनों लश्करो की और से छोटे छोटे हमले हुए लेकिन इन सभी हमलो में जाम साहिब का लश्कर जीत जाता था | २-३ माह तक ऐसा चलता लेकिन हर हमले में जाम साहिब के लश्कर की ही जीत होती थी | अजीज कोका समझ गया था की उसका लश्कर यहाँ नहीं जीत पाएगा | जिसके कारण उसने जाम साहिब को समाधान करने के लिए पत्र भिजवाया | इस बात की खबर जूनागढ़ के नवाब दौलत खान और काठी लोमा खुमान को पता चलने पर उन्होंने सोचा की “ अगर जाम साहिब ने समाधान से मना कर दिया और लड़ाई हुई तो जाम श्री सताजी की ही जीत होगी और वो हमारे राज्य भी अपने कब्जे में ले लेंगे, इसलिए हमे बादशाह के मुग़ल लश्कर के साथ मिल जाना चाहिए” | उन्होंने सूबे अजीज कोका को गुप्तचर द्वारा खबर भिजवाई की “ आप वापस हमला करो, लड़ाई शुरु होते ही हम आपके लश्कर के साथ मिल जाएँगे और जाम शाहीब के लश्कर पे हमला बोल देंगे” | ये खानगी खबर दौलत खान को मिलते ही उसने समाधान से मन हटाकर जाम साहिब को दुसरे दिन युद्ध का कह भिजवाया |
दूसरी दिन सुबह होते ही जाम साहिब श्री सताजी अपने लश्कर के साथ मुग़ल लश्कर पर टूट पडे और भयंकर युद्ध हुआ उसके परिणाम स्वरुप मुग़ल सैन्य हारने की कगार पर आ गया | ये देखकर नवाब दौलत खान और काठी लोमा खुमान जो जाम साहिब के लश्कर हरोड़ में खड़े थे , वो अपने २४,००० सैनिक के साथ जाम साहिब श्री सताजी को छोडकर मुग़ल लश्कर में मिल गए | जिसके वजह से लड़ाई तीन प्रहर तक लम्बी चली ,
उस समय जेसा वजीर ने जाम श्री सताजी को कहा की “ धोखेबाजो ने हमसे धोखा किया हे, हम लोग जीवित हे तब तक युद्ध को चालू रखेंगे आप अपने परिवार, वंश और गद्दी को बचाय रखने के लिए जामनगर चले जाइए | जाम साहिब को जेसा वजीर की ये सलाह योग्य लगने पर वे हाथी से उतरकर घोड़े पर चढ़ गए और अपने अंगरक्षक के साथ जामनगर की और चले गए, इस तरफ जेसा वजीर और कुमार जसाजी ने मुग़ल लश्कर के साथ लड़ाई को चालू रखा |
दूसरी तरफ इस युद्ध से अनजान जाम साहिब के पाटवी कुंवर अजाजी की शादी हो रही थी इसलिए वे भी जामनगर में ही थे | उनको जब जाम श्री सताजी के जामनगर आने की खबर मिली और पता चला की युद्ध अभी भी चालू ही हे , वे अपने ५०० राजपुत जो जानैया(शादी में दुल्हे की जान में साथ में होने वाले लोग ) थे तथा नाग वजीर को साथ में लेकर भूचर मोरी के मैदान में आ पहोचे | गौर तलब देखने वाली बात ये हे की इस जगह से अतीत साधू की जमात जो हिंगलाज माता की यात्रा पे जा रहे थे वे लश्कर को देखकर जाम साहिब के लश्कर में मिल गए थे |
दुसरे दिन सुबह दोनों लश्करो के बीच युद्ध शुरु हो गया | मुग़ल शाही लश्कर की दाईनी हरावल के सेनापति सैयद कासिम, नवरंग खान और गुजर खान थे | वही बाई हरावल के सेनापति मशहुर सरदार महमद रफ़ी था | हुमायूँ के बेटे मिर्ज़ा मरहम बिच की हरावल का सेनापति था और उसके आगे मिर्ज़ा अनवर और नवाब आजिम था |
जाम श्री साहिब सताजी के सैन्य के अग्र भाग का आधिपत्य जेसा वजीर और कुंवर अजाजी ने किया था | दाईनी हरावल में कुंवर जसाजी और महेरामणजी दुंगरानी थे,वही बाई हरावल में नागडा वजीर , दाह्यो लाड़क, भानजी दल थे | दोनों और से तोपों के गोले दागने के साथ ही युद्ध शुरु हुआ ,जिसके साथ ही महमद रफ़ी ने अपने लश्कर के साथ की जाम श्री के लश्कर पे हमला किया | दूसरी तरफ नवाब अनवर तथा गुजर खान ने कुंवर अजाजी और जेसा वजीर और अतीत साधू की जमात जिसकी संख्या १५०० थी उन पर हमला बोल दिया |
एक लाख से ज्यादा सैनिक मुग़ल के शाही के लश्कर में थे ,जिसमे हिन्दू और मुस्लिम दोनों थे | जाम साहिब के सैनिक की संख्या इनके मुकाबले बहुत कम होने साथ ही में अपने २४,००० साथियो द्वारा धोखा होने पर मुग़ल लश्कर धीरे धीरे जीत की तरफ बढ़ रहा था | इस बात को देखकर कुंवर श्री अजाजी ने अपने घोड़े को दौड़ाकर मिर्ज़ा अजीज कोका के हाथी के पास ला खड़ा किया | उन्होंने अपने घोड़े से लम्बी छलांग मराके घोड़े के अगले दोनों पाव अजीज कोका के हाथी के दांत पर टिका दिए, और अपने भाले से सूबेदार पर ज़ोरदार वार किया जिसके ऊपर एक प्राचीन दोहा भी है की:-
अजमलियो अलंधे, लायो लाखासर धणि ||
दंतूशळ पग दे, अंबाडी अणिऐ हणि || १ ||
पर अजीज कोका हाथी की अंबाडी की कोठी में छुप गया, जिससे भाला अंबाडी के किनारे को चीरते हुए हाथी की पीठ के आरपार निकल के निचे जमीन में घुस गया | उसी समय एक मुग़ल सैनिक ने अजाजी के पीछे से आके तलवार का वार कर दिया इसे देखकर सभी राजपुत हर हर महादेव के नाद के साथ मुग़ल सैनिक पर टूट पडे | युद्ध में हजारो लोगो की क़त्ल करने के बाद जेसा वजीर , महेरामणजी दुंगराणी, भानजी दल, दह्यो लाडक, नाग वजीर और तोगाजी सोढा वीरगति को प्राप्त हुए | वही उसी तरफ मुग़ल शाही लश्कर में महमद रफ़ी, सैयद सफुर्दीन, सैयद कबीर, सैयद अली खान मारे गए |
शाही लश्कर में मुख्य सूबा मिर्ज़ा अजीज कोका और जाम श्री के लश्कर में कुमार श्री जसाजी और थोड़े सैनिक ही बचे थे |
युद्ध के बारे में वहा पे एक शिलालेख भी जाम अजाजी की डेरी में हे , वही बाजूमे दीवार पर एक पुरातन चित्र भी है जिसमे जाम अजाजी अपने घोड़े को कुदाकर हाथी के ऊपर बैठे हुए सूबे की तरफ भाला का प्रहार करते हे...
सवंत सोळ अड़तालमें , श्रावण मास उदार |
जाम अजो सुरपुर गया, वद सातम बुधवार || १ ||
ओगणीसे चौदह परा, विभो जाम विचार |
महामास सुद पांचमे कीनो जिर्नोध्धार || २ ||
जेसो, दाह्यो, नागडो, महेरामण, दलभाण |
अजमल भेला आवटे, पांचे बौध प्रमाण || ३ ||
आजम कोको मारिओ, सुबो मन पसताईं |
दल केता गारत करे, रन घण जंग रचाय || ४ ||
निजामुदीन अहमद लिखते हे की ये लड़ाई हिजरी सवंत १००१ के रजब माह की तारीख ६ को हुई थी | और जामनगर के पुरातन दस्तावेज में भुचर-मोरी की लड़ाई की तारीख विक्रम सवंत १६४८ में हालारी श्रावन वाद ७ को होने को लिखी हे...|
युध्ध में नागडा वजीर ने भी अदभुत शौर्य दिखाया था | कहते हे की जब वह छोटा था तब जब उसकी माँ बैठी हुई होती थी तब उसके स्तन को पीछे खड़ा होकर स्तन से दूध पिता था | इस घटना को एक बार जाम सताजी ने देखा तो उनको बहुत हसी आई थी | जब नागडा वजीर युद्ध में लड़ने के लिए आया था तब उसके पिता जेसा वजीर ने कहा था की “हे नागडा तू जब छोटा था तब जाम साहिब ने तुझे तेरी मा को खड़े होकर स्तनपान करता हुआ देखा था और हस पडे थे, अब समय आ गया हे अपनी मा के दूध की ताकत दिखने का, वो दूध एक शेरनी का हे इस बात को रणभूमि में साबित करना” |
जब युद्ध चल रहा था तब नागडा वजीर ने अदभुत शौर्य दिखाया था | उसके दोनों हाथ के पंजे कट चुके थे लेकिन उसने अपने दोनों हाथ की कलाई की हड्डी में भाले को ठुसकर दुश्मनों को मरना चालू रखा था, इतना ही नही उसकी ऊंचाई भी बहुत होने के कारण उसने बादशाही लश्कर के हाथी के पेट में अपने कटे हुए हाथ को घुसाकर हाथी के पेट में बड़े बड़े घाव(खड्डे की तरह) कर दिए थे जिसके कारण हाथी के पेट से लहू की धारा बहने लगी थी...नागडा वजीर के ऊपर दुहे भी रचे हुए हे की...
भलीए पखे भलां, नर नागडा निपजे नहीं ||
जोयो जोमांना, कुंताना जेवो करण || १ ||
अर्थ:- कुंताजी से जैसे कर्ण जैसा महा पराक्रमी पुत्र उत्पन हुआ, वैसे ही जोमा से नागडा वजीर जैसा महा पराक्रमी पुत्र उत्पन हुआ, इसिलिए कहेते हे की वीरांगनाओ के सिवा महापराक्रमी वीर पुरुष उत्पन नहीं होते...||
जहां पड़ दीठस नाग जबान, सकोकर उभगयंद समान ||
पड़ी सहजोई सचीपहचाण, पट्टकिय नागह लोथ प्रमाण || १ ||
अर्थ:- भुचर-मोरी के मैदान में जब नागडा वजीर के लोथ अर्थात मृत शरीर को उठाया तब गयंद नामके हाथी के समान उसकी उंचाय मालुम होने से सूबेदार को उसकी ऊँचाई का विश्वास हुआ था |
कुमार श्री अजाजी युद्धभूमि में शहीद हो गए और बादशाह का लश्कर नगर की तरफ आ रहा हे यह खबर मिलते ही जाम सताजी ने जनान की सभी राणी को जहाज़ में बिठाकर सुचना दी की अगर मुस्लिम सैन्य आपकी तरफ आए तो अपने जहाज़ को समुद्र में डूबा देना, और अपने कुछ बाकि बचे सैन्य के साथ पहाड़ी इलाके में बदला लेने के लिए निकल पडे क्योकि ज़्यादातर सैन्य भूचर मोरी में शहीद हो गया था |
इस तरफ राणियो का जहाज बंदरगाह से निकले इससे पहेले सचाणा के बारोट इसरदासजी के पुत्र गोपाल बारोट ने कुमार श्री अजाजी (जो रणक्षेत्र में शहीद हुए थे उनकी) की पगड़ी को लाकर राणी को दिखा दी | ये देखकर राणी को सत चड़ा और उन्होंने सैनिको को आज्ञा देकर अपना रथ लेकर भूचर-मोरी के रणक्षेत्र की और चल पड़ी | इस तरफ बादशाह के मुस्लिम सैनिक नगर की और आ रहे थे | उन्होंने राणी के रथ को देखकर उनपर आक्रमण कर दिया, लेकिन उस समय ध्रोल के ठाकोर साहिब अपने भायती राजपुतो के साथ वहा आ पहुचे और मुस्लिम सैन्य को बताया की ये राणी सती होने के लिए आई हे | उन्होंने मुस्लिम सैन्य के साथ समझौता करके कुंवर अजाजी की राणी जिनकी शादी भी पूरी नहीं हुई थी उनको सती होने में पूरी मदद की |
इस युद्ध के अंत में सूबा अजीज कोका जामनगर में आया, और वह पर आके उसने भारी लुटफात मचाई | बाद में उसे पता चला की मुज्जफर शाह जूनागढ़ की और भाग गया हे | उसने नवरंग खान, सैयद कासम और गुज्जरखान को साथ में लेकर जूनागढ़ की और प्रयाण किया | इस बात की खबर जाम सताजी को मिलते ही उसने मुज्जफर शाह को बरडा डुंगर के विस्तार में शरणागत दी...
धन्य हे ऐसे राजपुत जाम सत्रसाल (सताजी) को जिन्होंने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए अपने राजपाट को त्याग करके एक शरणार्थी की रक्षा की |
बादशाही लश्कर का बारूद और अन्न सामग्री पूरी होने के वजह से उन्होंने जूनागढ़ से लश्कर हटाकर जामनगर में सूबा रखकर बाकि के लश्कर को अहमदाबाद भेज दिया | मुजफ्फर शाह को अहसास हुआ की मेरे लिए जिसने अपने लाखो को शहीद कर दिया और इतनी तकलीफ उठाई उनको अब ज्यादा परेशान नहीं करना चाहिए, इसलिए वो बरडा डुंगर से भाग गया और कच्छ में राव भारमल के शरण में गया |
जामनगर में जाम सताजी की गैरहाजरी का लाभ लेकर राणपुर के जेठवा राणा रामदेवजी के कुंवर राणा भाणजी के राणी कलाबाई ने अपनी फ़ौज से अपना गया हुआ प्रदेश जो जाम साहब में जीत लिया था उसको वापस कब्जे में कर लिया और छाया में राजधानी की स्थापना कर कुंवर खिमाजी को गद्दी पे बिठा दिया |
जब सूबेदार को ऐसी खबर मिली की मुजफ्फर शाह जुनागढ़ में हे तो उसने वहां पर फ़ौज को भेजकर जाम सताजी को पत्र मारफत संदेसा भिजवाया की “जूनागढ़ के नवाब के ऊपर जब तक हमारा सैन्य रहे तब तक आपको शाही लश्कर के अन्न-पानी और राशन की सामग्री मोहैया करानी होगी और इस बात से जाम सताजी के साथ सुलह करके जाम सताजी को वापस वि.सं. १६४९ के माह सुद ३ को जामनगर की गद्दी को सताजी पर बिठाया |
सूबेदार को जब पता चला की मुज्जफर शाह कच्छ में हे तो उन्होंने कच्छ के राव भारमल को संदेसा भिजवाया कच्छ के राव भारमल ने संदेसा मिलते ही मुजफ्फर शाह को अबदल्ला खान की फ़ौज में हाजिर होने के लिए भेजा, और उसे अहमदाबाद की और भेजा लेकिन रास्ते में मुज्जफर शाह ने ध्रोल के पास आत्महत्या कर ली.|
इस तरह जाम सताजी ने एक मुस्लिम सरणार्थी को दिए हुए वचन को निभाते हुए अपनी राजपाट गवाकर और हजारो राजपूतों की सेना के शहीद होते हुए भी अपने क्षात्र-धर्म का पालन किया |||
ध्रोल के पादर में भुचर-मोरी के मैदान में आज भी हर साल श्रावण वद सातम को हज़ारों की संख्या में राजपुत इकठ्ठे होते हे और इन वीर शहीदों की श्रधांजली अर्पण करते हे यहाँ पर बड़ी मात्र में अन्य जाती के लोग भी इन शहीदों को श्रंधाजली अर्पण करते हे | युध्ध में इतनी भारी मात्रा में शहादत हुई थी की आज की तारीख में भी भूचर-मोरी के मैदान की मिट्टी लहू के लाल रंग की है |||
संदर्भ:-
1. “यदुवंश प्रकाश” -- लेखक जामनगर स्टेट राजकवि “मावदानजी भीमजी रत्नु” -- पृष्ठ संख्या 191 से 228…
2. “विभा-विलास” -- देवनागरी लिपि में लिखा हुआ यदुवंश का पुष्तक जिसके लेखक हे -- चारण कवि “व्रजमालजी परबतजी माहेडू”
3. “नगर-नवानगर-जामनगर”--- लेखस इतिहासकार हरकिशन जोषी – पृष्ठ संख्या 71 से 76...
4. “सौराष्ट्र का इतिहास” – लेखक इतिहासकार शंभूप्रसाद हरप्रसाद देसाई – पृष्ठ संख्या 563 से 567…
5. "वंश सुधाकर" -- राज बारोट श्री अभेसंगभाई पोपटभाई
6.राष्ट्रीय शायर ज़वेरचंद मेघाणी लिखित "समरांगन" पुस्तक जो इस युध्ध पर आधारित है...
7. भगवत-गो-मंडल पुस्तक
8. रासमाणा भाग 1-2 -- किन्लोस फोर्बेस
9. जाडेजा राजपूतो का इतिहास -- राजवैध जिवराम कालिदास
10. जामनगर की यशगाथा -- रतिलाल माधवानी
11. जामनगर का इतिहास --दोलारराय मांकड़
12. निजामुदीन अहमद लिखित मुग़लो के शाही दस्तावेज
13. “तारीखे सोरठ” – जूनागढ़ के नवाबी शाशन का इतिहास
14. “मिरांते सिकंदरी” – मुग़ल शाही दस्तावेज
15. Jam The Great -- Maneklal Shah
16. land of Ranji & Dulip
जब शरणागत 140 सुमरा-मुस्लिम कन्या को बचाने के लिए जाडेजा राजपुतो ने किया जौहर और शाका...====================

बात हे विक्रम सवंत 1356(ई.स. 1309) की तब गुजरात के कच्छ क्षेत्र में जाडेजा राजपुतो का राज था |कच्छ के वडसर में जाडेजा राजवी जाम अबडाजी गद्दी पर बिराजमान थे | जाम अबडाजी एक महाधर्मात्मा और वीरपुरुष होने की वजह से उनको “अबडो-अडभंग, अबडो अणनमी” नाम से भी जाना जाता था |


उस समय सिंध के उमरकोट में हमीर सुमरा(सुमरा परमार वंश की शाखा थे जो धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बन गए थे।अब सिंध पाकिस्तान में हैं) जिसको सोरठ के चुडासमा राजवी रा’नवघन ने अपनी मुँह बोली बहेन जासल का अपहरण करने पर मार डाला था, उसके वंश में धोधा और चनसेर नामके दो मुस्लिम-सुमरा शाशक राज करते थे | इन दोनों भाईओ के बिच में आपसी कलह बहुत चलता रहेता था, जिसकी वजह से छोटे भाई चनसेर ने उमरकोट की गद्दी हथियाने के लिए दिल्ली के शाशक अलाउदिन-खिलजी से जाके कहा की “आपके जनान-खाने के लिए अच्छी सी सुन्दर सुमरी कन्या मैंने राखी हुई थी, पर मेरे भाई धोधे ने मेरा राज्य हथिया लिया और खुद सिंध की गद्दी पर बैठ गया | इसलिए में आपके पास सहायता मांगने के लिए आय हु” और कहा की “आप खुद सिंध पधारिए और मुझे मेरी गद्दी वापस दिलवाए तथा स्वयं उस स्वरूपवान सुमरी कन्याओ को कब्जे में ले कर दिल्ही अपने जनान-खाने के लिए ले जाए |

इस बात को सुनकर अलाउदीन खिलजी ने अपना लश्कर लेकर सिंध पर चड़ाई की और अपने सेनापति हुसैन खान के द्वारा धोधा को संदेसा भिजवाया की दिल्लीपति अलाउदीन खिलजी के साथ उस सुमरी कन्याओ का विवाह करवाओ” लेकिन धोधा ने इस बात से मन कर दिया और वो अलाउदीन के साथ लड़ने के लिए तैयार हो गया | और युद्ध में जाते समय उसने अपने वफादार भाग सुमरे को कहा की अगर मुझे कुछ हो जाए तो इन सुमरियो को कच्छ के जाम अबडाजी के पास भेज देना, एक वो ही वीर पुरुष हे जो इन सुमरियो को बचा सकते हे | इतना कह कर धोधा सुमरा अपनी फ़ौज के साथ अलाउदीन से भीड़ गया | उसकी सेना अलाउदीन की विशाल सेना के सामने बहुत छोटी होने के कारण वो युद्ध भूमि में ही मारा गया | जब सरदार हुसैन खान ने घोघे की लाश को पैरो से लात मरी तब उसके भाई चनसेर को बहुत अफ़सोस हुआ और उसने हुसैन खान का सिर धड से अलग कर दिया, बाद में वो भी अलाउदीन के लश्कर द्वारा मारा गया | बाद में अलाउदीन ने जब उमरकोट नगर में जाके देखा तो वह पे सुमरि कन्याओ का नमो निशान नहीं था | उसे बाद में पता चला की सभी सुमरी कन्या कच्छ की तरह जा चुकी हे, इसलिए उसने अपने लश्कर को कच्छ की तरफ कुच करवाया |

इस तरफ कच्छ में भाग सुमरा उस 147 मुस्लिम कन्याओ के साथ कच्छ के वडसर के पास आए, पर ये सुमरी कन्या बहुत चलने के कारण थकी हुई थी जिससे उनको कच्छ के रोहा पर्वत पर आराम करने के लिए कहेकर खुद जाम अबडाजी से मिला और उनसे कहा की “मुझे सिंध के धोधा सुमरा ने आपके पास भेजा हे और सब हकीकत जाम अबडाजी को बताई की अब आप ही इन सुमरी कन्याओ को अलाउदीन के जनान खाने से बचा सकते हे” इसे सुनकर अबडाजी ने संदेशा भिजवाया की की...

भले आवयु भेनरू, अबडो चयतो ईय
अनदिठी आडो फीरां, से डिठे दियां किय...?
(अर्थ:- मेरी बहेनो अच्छा किया आप मेरे पास आ गई, अगर मेरे ध्यान में भी कुछ नही हो फिर भी में उसको बचाने के लिए जाता हु, आप तो स्वयं मेरे पास आई हों अब आपको कैसे जाने दूँ, आप निश्चिंत रहिये।)
और इन सुमरी कन्या को लाने के लिए जाम अबडाजी ने बैल-गाडे भिजवाए पर इन बैल-गाड़े को सुमरी कन्या दुश्मन का लश्कर समज बैठी और डर के मारे इन 147 सुमरी कन्या में से 7 ने वही पर आत्म-हत्या कर लि | बाकि की 140 सुमरी कन्या वहा से वडसर आ पहुची | बादशाह का लश्कर वडसर की तरफ आ रहा हे इस बात को जानकर जाम अबडाजी ने रोहा पर्वत के उपर रात को मशाले जलवाकर खुद बादशाह के लश्कर को युद्ध के लिए आमत्रित किया...!!!अलाउदीन का लश्कर वडसर के पास आ कर रुक गया और दोनों तरफ फौजे इक्कठा हो गई |
जाम अबडाजी की सेना में ओरसा नामका एक मेघवाल जाती का आदमी भी था जो बहुत ही बहादुर था, उसने जाम अबडाजी को कहा की अगर आज्ञा दे तो में अकेला ही रात को जाकर उस अलाउदीन का सिर काट के आपके पास रख दु, लेकिन जाम अबडाजी ने उसे कहा की “ऐसे कपट से वार दुशमन को मारने वाला में जाम अबडाजी नहीं हु फिर भी तुम कुछ ऐसा करो जिससे अलाउदीन की रूह कांप उठे” | ये ओरसा मेघवाल जाती से था जो मृत पशुओ की खाल उतारने का कम करते थे, उसने एक युक्ति निकाली और रात को वो कुत्ते की खाल पहेनकर अलाउदीन के लश्कर में भीतर जाता हुआ उसके तंबू में घुस गया, उसका मन तो सोते हुए अलाउदीन का सिर काटने का ही था, पर जाम अबडाजी के मना करने की वजह से उसने अलाउदीन का शाही खंजर निकल लिया और उसकी जगह अपना खाल उधेड़ने वाला खंजर रख दिया | सुबह फिर जाम अबडाजी ने अलाउदीन खिलजी को संदेशा भिजवाया की “अगर में चाहू तो कपट से तेरा सिर धड से अलग करवा सकता था लेकिन क्षत्रिय ना ही ऐसा करते हे न ही दुसरो से करवाते हैे, इसलिए अब अभी समय है चला जा यहाँ से और भूल जा मुस्लिम सुमरी कन्या को”, और निशानी के तौर पर उसको उसका शाही खंजर भिजवाया | जिसे देखकर अलाउदीन हक्का-बक्का रह गया | उसने सोचा की जिसका एक आदमी उसके इशारे पे ये कार्य कर सकता हे उसके साथ युद्ध नही करता ही अच्छा हैे | इसलिए उसने जाम अबडाजी जो पत्र लिखा की अगर आप उस मुस्लिम सुमरी कन्याओ को मेरे हवाले कर दे तो में आपको कोई भी नुकशान नहीं करूँगा | लेकिन जाम अबडाजी ने जवाब दिया की “मैंने उन सुमरी कन्या को वचन दिया हे की जब तक में जिन्दा हु तब तक आपको उनके साथ कुछ नहीं करने दूंगा, और क्षत्रिय कभी अपनी जुबान से नहीं हिलता” भूल जा उस कन्या को |

इसे सुनकर दुसरे दिन सुबह फिर अलाउदीन ने अबडाजी के लश्कर पर हमला बोल दिया | जाम अबडाजी और ओरसा अपनी सेना के साथ अलाउदीन के लश्कर को काटते काटते उसके हाथी के पास पहुच गए थे तभी ओरसा पर किसी ने पीछे से हमला कर उसे मार डाला | इस पराक्रम को देखकर अलाउदीन ने दूसरी बार जाम अबडाजी को सुलह के लिए संदेसा भिजवाया लेकिन जाम अबडाजी अपनी बात से हिलने वाले कहा थे | दुसरे दिन फिर युद्ध शुरु हो गया इस तरह ये युद्ध ७२ दिनों तक चलता रहा धीरे धीरे जाम अबडाजी का सैन्य कम होता जा रहा था | आखिर में उन्होंने अपनि राणी और राज घराने की औरतो को बुलाकर कहा की अब अंत आ गया हे हम ज्यादा देर तक अलाउदीन के लश्कर का सामना नहीं कर सकेंगे | और उन्होंने सुमरी कन्याओ को वडसर गाव से 2 कोस दूर पर्वत पर भिजवाया और साथ में दूध का प्याला देकर कहा की जब इस दूध का रंग लाल हो जाए तो समाज लेना में इस दुनिया में नहीं रहा |

जिसे सुनकर राजपुत क्षत्राणी ने वडसर के गढ़ के बीचो बिच चंदन की लकड़ी इकठ्ठा की उसकी श्रीफल धुप आदि से पूजा करके फिर चिता जलाके एक के बाद एक राजपुत क्षत्राणी “जय भवानी” के नारे के साथ चिता पर चड गई और इस तरह जौहर व्रत का अनुष्ठान किया | जिसके बाद सभी राजपुत योध्दाओं ने माथे पे राजपुत क्षत्राणी की भस्म लगाकर केसरिया साफा पहेनकर “हर हर महादेव” के नारे के साथ अलाउदीन के लश्कर पर टूट पडे |

जाम अबडाजी अदभुत पराक्रम दिखाकर युद्ध भूमि में सहीद हो गए | एस तरफ सुमरी कन्या के पास रखे दूध के प्याले में दूध का रंग लाल हो गया | वे समज गई की अब उनको बचाने वाला कोई नहीं रहा | कहेते है की उस समय उनकी ऊपरवाले की प्रार्थना से ज़मीन फट गई और सभी सुमरी कन्या उसमे समा गई, एक कन्या का दुप्पटा बहार रह गया था क्योकि उसको किसी मर्द ने छुआ था | अलाउदीन के हाथ में कुछ नहीं लगा और वो भारी पस्तावे के साथ वापस चला गया | बाद में वडसर की गद्दी पे अबडाजी के पुत्र डुंगरसिंह जो लड़ाई के वक़्त उसके माम के यहाँ थे वो बेठे |

ये घटना विक्रम सवंत 1356 में फागुन वद 1 को हुई थी | इस युद्ध में जाम अबडाजी के भाई जाम मोडजी भी सहीद हुए थे | आज भी वडसर गाव जो कच्छ जिल्ले की नलिया तहेसिल में स्थित हे, उस वडसर गाव में नदी के किनारे जाम अबडाजी और जाम मोडजी दोनों के स्मारक मौजूद हे, और हर साल वहा पे होली के दुसरे दिन यानि फागुन वद 1 को इन स्मारकों को लोग वहा पे आकर पूजा करते हैे | और हर साल जन्माष्टमी को वह पे मेला भी लगता है |

कच्छ का लोकसाहित्य में आज भी जाम अबडाजी को याद किया जाता हे उनपे बने काव्यो द्वारा, जिसमे से कुछ पंक्तिया यहाँ पे रख रहे हे....

अठ मुंठुं जे ज्युं मुछदियुं, सोरो हाथ धडो,
सरण रखंधळ सुमरीऊँ, अभंग भड अबडो ||
(अर्थ:- जिसकी मुछे आठ मुठ जितनी लंबी है, और जिसका शरीर सोलह बाज़ुओ जितना ताकतवर है, वो अनभंग अबडा ही शरणागत सुमरियो की रक्षा कर सकता है)

जखरा ! तू जस खरो ब्या मीडे ऐ खान,
मिट्टी उन मकान, असल हुई इतरी ||
(अर्थ:- हे जाम जखरा(अबडाजी का दूसरा नाम) सही में यशस्वी तो तू ही है. दुसरे तो मात्रा कहेने के है | तू जिस मिट्टी से बना है, वो सिर्फ तेरे लिए ही बनी थी किसी और के लिए नहीं |)

जखरा ! तुं जिए, तोजो, मंचो केनि म सुणा,
अखिये ने हिये, नालो तोजे नेहजो ||
(अर्थ:- हे जखरा जाम , तू सदा इतिहास में अमर रहेगा | हमारी आंखे और अंतर में तेरा नाम हमेशा अमर रहेगा |)

जखरे जेडो जुवान, दिसां न को देहमे,
मिट्टी उन मकान असल हुई इतरी ||
(अर्थ:- जाम जखरा जेसा वीर पुरे देशमें एक भी नहीं है, वो जिस मिट्टी से बना था उस मिट्टी से और कोई नहीं बना |)

संदर्भ---:1.http://rajputanasoch-kshatriyaitihas.blogspot.hk/2015/09/140.html
2. यदुवंश प्रकाश- लेखक राजकवि मावदानजी भीमजी रत्नु - पृष्ठ संख्या 81 से 85.
3. कच्छ- कलाधर(कच्छ का इतिहास) - लेखक दुलेराय काराणी - पृष्ठ संख्या 120 से 140.

A special Thanks and Credit for this Post to : Bhanwar Abhijitsinh Jadeja