Thursday, October 1, 2015

Execution of Sambhaji by Aurangzeb

Execution of Sambhaji by Aurangzeb
ShankhNaad's photo.

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Chatrapati Shivaji Maharaj was one of the first persons who presented an open threat to Aurangzeb, harassing the Mughals with his guerilla tactics. He was one of the few who stood up to Aurangzeb's harassment of Hindus, opposed the re introduction of Jiziya tax, and was a thorn in his flesh, in the Deccans,turning the Marathas from a fighting force into a full fledged kingdom.
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When Shivaji passed away in 1680, his son Sambhaji took over as the ruler, and continued his father's relentless struggle against the Mughal empire. Sambhaji giving shelter to Md.Akbar, Aurangzeb's 4th son, during his revolt against his father, only aggravated the hatred he had for the Marathas.
After his defeat at Wai in 1687, Sambhaji took refuge in the Western Ghats along with his friend and advisor Kavi Kalash. However when some of the Marathas betrayed Sambhaji's position, he was captured by the Mughals and bought before Aurangzeb. Sambhaji along with Kavi Kalash was dressed as a buffoon, and made to endure mockery and insults from the Mughal soldiers there.
Sambhaji was given a choice to convert to Islam and spare his life, which he refused. Sambhaji was tortured to death, in the worst possible manner, his eyes and tongue plucked out first,nails removed, then being skinned alive. And finally along with Kavi Kalash, his limbs were hacked one by one, and finally his corpse being thrown. The severed heads of Sambhaji and Kavi Kalash were stuffed with straw and displayed as a warning.
Post independence, our history was written by leftists. They referred to the cruel Aurangzeb as the - Last Great Mughal Emperor, in our school books. Aren't we insulting our great warrior Chatrapati Sambhaji Maharaj and every Hindu by allowing them to do this ?

Why did Nehru allow Ford Foundation in India


Why did Nehru allow Ford Foundation in India ?
ShankhNaad's photo.

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Then prime minister, Jawaharlal Nehru allowed the Ford Foundation entry into India in 1952 without the complete paperwork and permissions required in law for establishing itself in this country and conducting operations in sensitive sectors on a major scale.
The Sunday Standard investigation into the foundations’ activities in India that goes back to the 1950s throw up some startling facts.
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■ The Ford and Rockefeller foundations had penetrated the Indian establishment without any government oversight.
■ It gave junkets and scholarships to senior government officials in the Nehru administration without clearance from the Indian government.
■ These officials were directly selected by the Ford and Rockefeller foundations without the knowledge of the government.
■ B K Nehru, Indira Gandhi’s cousin and the Commissioner General for Economic Affairs of Indian Embassy in Washington, advised against insistence on clearance of the funds by the Rockefeller Foundation to government employees after a meeting with its President Dean Rusk.
■ Rusk told the government that only consultations (and not approval) with the Department of Economic Affairs would be necessary before it funded bureaucrats and others.
■ Appalled at the storm brewing in his government against the foundations’ blatant efforts to woo government officials, Nehru denied he had given the necessarily approval. However, he had to backtrack after a note was shown to him, which made it obvious that the opposite was true

Wednesday, September 30, 2015

Christianity- examination and facts.

ईसाई मत की मान्यताएँ: तर्क की कसौटी पर

ऊपर से देखने पर ईसाई मत एक सभ्य,सुशिक्षित,शांतिप्रिय समाज लगता हैं। जिसका उद्देश्य ईसा मसीह की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार एवं निर्धनों, दीनों की सेवा-सहायता करना हैं। इस मान्यता का कारण ईसाई समाज द्वारा बनाई गई छवि है। यह कटु सत्य है कि ईसाई मिशनरी विश्व के जिस किसी देश में गए। उस देश के निवासियों के मूल धर्म में सदा खामियों को प्रचारित करना एवं अपने मत को बड़ा चढ़ाकर पेश करना ईसाईयों की सुनियोजित नीति रही हैं। इस नीति के बल पर वे अपने आपको श्रेष्ठ एवं सभ्य तथा दूसरों को निकृष्ट एवं असभ्य सिद्ध करते रहे हैं। इस लेख के माध्यम से हम ईसाई मत की तीन सबसे प्रसिद्द मान्यताओं की समीक्षा करेंगे जिससे पाठकों के भ्रम का निवारण हो जाये
1. प्रार्थना से चंगाई
2. पापों का क्षमा होना
Aditya Agnihotri's photo.3. गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित करना
1. प्रार्थना से चंगाई[i]

ईसाई समाज में ईसा मसीह अथवा चर्च द्वारा घोषित किसी भी संत की प्रार्थना करने से बिमारियों का ठीक होने की मान्यता पर अत्यधिक बल दिया जाता हैं। आप किसी भी ईसाई पत्रिका, किसी भी गिरिजाघर की दीवारों आदि में जाकर ऐसे विवरण (Testimonials) देख सकते हैं। आपको दिखाया जायेगा की एक गरीब आदमी था। जो वर्षों से किसी लाईलाज बीमारी से पीड़ित था। बहुत उपचार करवाया मगर बीमारी ठीक नहीं हुई। अंत में प्रभु ईशु अथवा मरियम अथवा किसी ईसाई संत की प्रार्थना से चमत्कार हुआ। और उसकी यह बीमारी सदा सदा के लिए ठीक हो गई। सबसे अधिक निर्धनों और गैर ईसाईयों को प्रार्थना से चंगा होता दिखाया जाता हैं। यह चमत्कार की दुकान सदा चलती रहे इसलिए समय समय पर अनेक ईसाईयों को मृत्यु उपरांत संत घोषित किया जाता हैं। हाल ही में भारत से मदर टेरेसा और सिस्टर अलफोंसो को संत घोषित किया गया हैं और विदेश में दिवंगत पोप जॉन पॉल को संत घोषित किया गया है। यह संत बनाने की प्रक्रिया भी सुनियोजीत होती हैं। पहले किसी गरीब व्यक्ति का चयन किया जाता हैं जिसके पास इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होते।

प्रार्थना से चंगाई में विश्वास रखने वाली मदर टेरेसा खुद विदेश जाकर तीन बार आँखों एवं दिल की शल्य चिकित्सा करवा चुकी थी[ii]। संभवत हिन्दुओं को प्रार्थना का सन्देश देने वाली मदर टेरेसा को क्या उनको प्रभु ईसा मसीह अथवा अन्य ईसाई संतो की प्रार्थना द्वारा चंगा होने का विश्वास नहीं था जो वे शल्य चिकित्सा करवाने विदेश जाती थी?

सिस्टर अलफोंसो केरल की रहने वाली थी। अपनीअपने जीवन के तीन दशकों में से करीब 20 वर्ष तक अनेक रोगों से ग्रस्त रही थी[iii]। केरल एवं दक्षिण भारत में निर्धन हिन्दुओं को ईसाई बनाने की प्रक्रिया को गति देने के लिए संभवत उन्हें भी संत का दर्जा दे दिया गया और यह प्रचारित कर दिया गया की उनकी प्रार्थना से भी चंगाई हो जाती हैं।

दिवंगत पोप जॉन पॉल स्वयं पार्किन्सन रोग से पीड़ित थे और चलने फिरने से भी असमर्थ थे। यहाँ तक की उन्होंने अपना पद अपनी बीमारी के चलते छोड़ा था[iv]। कोस्टा रिका की एक महिला के मस्तिष्क की व्याधि जिसका ईलाज करने से चिकित्सकों ने मना कर दिया था। वह पोप जॉन पॉल के चमत्कार से ठीक हो गई। इस चमत्कार के चलते उन्हें भी चर्च द्वारा संत का दर्ज दिया गया हैं।

पाठक देखेगे की तीनों के मध्य एक समानता थी। जीवन भर ये तीनों अनेक बिमारियों से पीड़ित रहे थे। मरने के बाद अन्यों की बीमारियां ठीक करने का चमत्कार करने लगे। अपने मंच से कैंसर, एड्स जैसे रोगों को ठीक करने का दावा करने वाले बैनी हिन्न (Benny Hinn) नामक प्रसिद्द ईसाई प्रचारक हाल ही में अपने दिल की बीमारी के चलते ईलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए थे[v]। वह atrial fibrillation नामक दिल के रोग से पिछले 20 वर्षों से पीड़ित है। तर्क और विज्ञान की कसौटी पर प्रार्थना से चंगाई का कोई अस्तित्व नहीं हैं। अपने आपको आधुनिक एवं सभ्य दिखाने वाला ईसाई समाज प्रार्थना से चंगाई जैसी रूढ़िवादी एवं अवैज्ञानिक सोच में विश्वास रखता हैं। यह केवल मात्र अंधविश्वास नहीं अपितु एक षड़यंत्र है। गरीब गैर ईसाईयों को प्रभावित कर उनका धर्म परिवर्तन करने की सुनियोजित साजिश हैं।

2. पापों का क्षमा होना

ईसाई मत की दूसरी सबसे प्रसिद्द मान्यता है पापों का क्षमा होना। इस मान्यता के अनुसार कोई भी व्यक्ति कितना भी बड़ा पापी हो। उसने जीवन में कितने भी पाप किये हो। अगर वो प्रभु ईशु मसीह की शरण में आता है तो ईशु उसके सम्पूर्ण पापों को क्षमा कर देते है। यह मान्यता व्यवहारिकता,तर्क और सत्यता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। व्यवहारिक रूप से आप देखेगे कि संसार में सभी ईसाई देशों में किसी भी अपराध के लिए दंड व्यवस्था का प्रावधान हैं। क्यों? कोई ईसाई मत में विश्वास रखने वाला अपराधी अपराध करे तो उसे चर्च ले जाकर उसके पाप स्वीकार (confess) करवा दिए जाये। स्वीकार करने पर उसे छोड़ दिया जाये। इसका क्या परिणाम निकलेगा? अगले दिन वही अपराधी और बड़ा अपराध करेगा क्यूंकि उसे मालूम है कि उसके सभी पाप क्षमा हो जायेगे। अगर समाज में पापों को इस प्रकार से क्षमा करने लग जाये तो उसका अंतिम परिणाम क्या होगा? जरा विचार करे।


महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश[vi] में ईश्वर द्वारा अपने भक्तों के पाप क्षमा होने पर ज्ञानवर्धक एवं तर्कपूर्ण उत्तर दिया हैं। स्वामी जी लिखते है। - "नहीं, ईश्वर किसी के पाप क्षमा नहीं करता। क्योंकि जो ईश्वर पाप क्षमा करे तो उस का न्याय नष्ट हो जाये और सब मनुष्य महापापी हो जायें। इसलिए कि क्षमा की बात सुन कर ही पाप करने वालों को पाप करने में निभर्यता और उत्साह हो जाये। जैसे राजा यदि अपराधियों के अपराध को क्षमा कर दे तो वे उत्साहपूर्वक अधिक अधिक बड़े-बड़े पाप करें। क्योंकि राजा अपना अपराध क्षमा कर देगा और उन को भी भरोसा हो जायेगा कि राजा से हम हाथ जोड़ने आदि चेष्टा कर अपने अपराध छुड़ा लेंगे और जो अपराध नहीं करते, वे भी अपराध करने में न डर कर पाप करने में प्रवृत्त हो जायेंगे। इसलिए सब कर्मों का फल यथावत् देना ही ईश्वर का काम है, क्षमा करना नहीं"।

वैदिक विचारधारा में ईश्वर को न्यायकारी एवं दयालु बताया गया हैं। परमेश्वर न्यायकारी है,क्यूंकि ईश्वर जीव के कर्मों के अनुपात से ही उनका फल देता है कम या ज्यादा नहीं। परमेश्वर दयालु है, क्यूंकि कर्मों का फल देने की व्यवस्था इस प्रकार की है जिससे जीव का हित हो सके। शुभ कर्मों का अच्छा फल देने में भी जीव का कल्याण है और अशुभ कर्मों का दंड देने में भी जीव का ही कल्याण है। दया का अर्थ है जीव का हित चिंतन और न्याय का अर्थ है, उस हितचिंतन की ऐसी व्यवस्था करना कि उसमें तनिक भी न्यूनता या अधिकता न हो।

ईसाई मत में प्रचलित पापों को क्षमा करना ईश्वर के न्यायप्रियता और दयालुता गुण के विपरीत हैं। अव्यवहारिक एवं असंगत होने के कारण अन्धविश्वास मात्र हैं।

3. गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित करना

ईसाई मत को मानने वालो में गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित कर शामिल करने की सदा चेष्टा बनी रहती हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता हैं कि जैसे वही ईसाई सच्चा ईसाई तभी माना जायेगा जो गैर ईसाईयों को ईसाई नहीं बना लेगा। ऐसा प्रतीत होता है कि ईसाईयों में आचरण और पवित्र व्यवहार से अधिक धर्मान्तरण महत्वपूर्ण हो चला हैं। धर्मांतरण के लिए ईसाई समाज हिंसा करने से भी भी पीछे नहीं हटता। अपनी बात को मैं उदहारण देकर सिद्ध करना चाहता हूँ। ईसाई प्रभुत्व वाले पूर्वोत्तर के राज्य मिजोरम से वैष्णव हिन्दू रीति को मानने वाली रियांग जनजाति को धर्मान्तरण कर ईसाई न बनने पर चर्च द्वारा समर्थित असामाजिक लोगों ने हिंसा द्वारा राज्य से निकाल दिया[vii]। हिंसा के चलते रियांग लोग दूसरे राज्यों में शरणार्थी के रूप में रहने को बाधित हैं। सरकार द्वारा बनाई गई नियोगी कमेटी के ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण के लिए अपनाये गए प्रावधानों को पढ़कर धर्मान्तरण के इस कुचक्र का पता चलता हैं[viii]। चर्च समर्थित धर्मान्तरण एक ऐसा कार्य हैं जिससे देश की अखंडता और एकता को बाधा पहुँचती हैं।

इसीलिए हमारे देश के संभवत शायद ही कोई चिंतक ऐसे हुए हो जिन्होंने प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण करने की निंदा न की हो। महान चिंतक एवं समाज सुधारक स्वामी दयानंद का एक ईसाई पादरी से शास्त्रार्थ हो रहा था। स्वामी जी ने पादरी से कहा की हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के तीन तरीके है। पहला जैसा मुसलमानों के राज में गर्दन पर तलवार रखकर जोर जबरदस्ती से बनाया जाता था। दूसरा बाढ़, भूकम्प, प्लेग आदि प्राकृतिक आपदा जिसमें हज़ारों लोग निराश्रित होकर ईसाईयों द्वारा संचालित अनाथाश्रम एवं विधवाश्रम आदि में लोभ-प्रलोभन के चलते भर्ती हो जाते थे और इस कारण से आप लोग प्राकृतिक आपदाओं के देश पर बार बार आने की अपने ईश्वर से प्रार्थना करते है और तीसरा बाइबिल की शिक्षाओं के जोर शोर से प्रचार-प्रसार करके। मेरे विचार से इन तीनों में सबसे उचित अंतिम तरीका मानता हूँ। स्वामी दयानंद की स्पष्टवादिता सुनकर पादरी के मुख से कोई शब्द न निकला। स्वामी जी ने कुछ ही पंक्तियों में धर्मान्तरण के पीछे की विकृत मानसिकता को उजागर कर दिया[ix]

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ईसाई धर्मान्तरण के सबसे बड़े आलोचको में से एक थे। अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी लिखते है "उन दिनों ईसाई मिशनरी हाई स्कूल के पास नुक्कड़ पर खड़े हो हिन्दुओं तथा देवी देवताओं पर गलियां उड़ेलते हुए अपने मत का प्रचार करते थे। यह भी सुना है की एक नया कन्वर्ट (मतांतरित) अपने पूर्वजों के धर्म को, उनके रहन-सहन को तथा उनके गलियां देने लगता है। इन सबसे मुझमें ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई।" इतना ही नहीं गांधी जी से मई, 1935 में एक ईसाई मिशनरी नर्स ने पूछा कि क्या आप मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगाना चाहते है तो जवाब में गांधी जी ने कहा था,' अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा धंधा ही बंद करा दूँ। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिन्दू परिवारों में जहाँ मिशनरी पैठे है, वेशभूषा, रीतिरिवाज एवं खानपान तक में अंतर आ गया है[x]


समाज सुधारक एवं देशभक्त लाला लाजपत राय द्वारा प्राकृतिक आपदाओं में अनाथ बच्चों एवं विधवा स्त्रियों को मिशनरी द्वारा धर्मान्तरित करने का पुरजोर विरोध किया गया जिसके कारण यह मामला अदालत तक पहुंच गया। ईसाई मिशनरी द्वारा किये गए कोर्ट केस में लाला जी की विजय हुई एवं एक आयोग के माध्यम से लाला जी ने यह प्रस्ताव पास करवाया की जब तक कोई भी स्थानीय संस्था निराश्रितों को आश्रय देने से मना न कर दे तब तक ईसाई मिशनरी उन्हें अपना नहीं सकती[xi]
समाज सुधारक डॉ अम्बेडकर को ईसाई समाज द्वारा अनेक प्रलोभन ईसाई मत अपनाने के लिए दिए गए मगर यह जमीनी हकीकत से परिचित थे की ईसाई मत ग्रहण कर लेने से भी दलित समाज अपने मुलभुत अधिकारों से वंचित ही रहेगा। डॉ आंबेडकर का चिंतन कितना व्यवहारिक था यह आज देखने को मिलता है।''जनवरी 1988 में अपनी वार्षिक बैठक में तमिलनाडु के बिशपों ने इस बात पर ध्यान दिया कि धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जाति के ईसाई परंपरागत अछूत प्रथा से उत्पन्न सामाजिक व शैक्षिक और आर्थिक अति पिछड़ेपन का शिकार बने हुए हैं। फरवरी 1988 में जारी एक भावपूर्ण पत्र में तमिलनाडु के कैथलिक बिशपों ने स्वीकार किया 'जातिगत विभेद और उनके परिणामस्वरूप होने वाला अन्याय और हिंसा ईसाई सामाजिक जीवन और व्यवहार में अब भी जारी है। हम इस स्थिति को जानते हैं और गहरी पीड़ा के साथ इसे स्वीकार करते हैं।' भारतीय चर्च अब यह स्वीकार करता है कि एक करोड़ 90 लाख भारतीय ईसाइयों का लगभग 60 प्रतिशत भाग भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार है। उसके साथ दूसरे दर्जे के ईसाई जैसा अथवा उससे भी बुरा व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों को अपनी बस्तियों तथा गिरिजाघर दोनों जगह अलग रखा जाता है। उनकी 'चेरी' या बस्ती मुख्य बस्ती से कुछ दूरी पर होती है और दूसरों को उपलब्ध नागरिक सुविधओं से वंचित रखी जाती है। चर्च में उन्हें दाहिनी ओर अलग कर दिया जाता है। उपासना (सर्विस) के समय उन्हें पवित्र पाठ पढऩे की अथवा पादरी की सहायता करने की अनुमति नहीं होती। बपतिस्मा, दृढि़करण अथवा विवाह संस्कार के समय उनकी बारी सबसे बाद में आती है। नीची जातियों से ईसाई बनने वालों के विवाह और अंतिम संस्कार के जुलूस मुख्य बस्ती के मार्गों से नहीं गुजर सकते। अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों के कब्रिस्तान अलग हैं। उनके मृतकों के लिए गिरजाघर की घंटियां नहीं बजतीं, न ही अंतिम प्रार्थना के लिए पादरी मृतक के घर जाता है। अंतिम संस्कार के लिए शव को गिरजाघर के भीतर नहीं ले जाया जा सकता। स्पष्ट है कि 'उच्च जाति' और 'निम्न जाति' के ईसाइयों के बीच अंतर्विवाह नहीं होते और अंतर्भोज भी नगण्य हैं। उनके बीच झड़पें आम हैं। नीची जाति के ईसाई अपनी स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष छेड़ रहे हैं, गिरजाघर अनुकूल प्रतिक्रिया भी कर रहा है लेकिन अब तक कोई सार्थक बदलाव नहीं आया है। ऊंची जाति के ईसाइयों में भी जातिगत मूल याद किए जाते हैं और प्रछन्न रूप से ही सही लेकिन सामाजिक संबंधोंं में उनका रंग दिखाई देता है[xii]
           महान विचारक वीर सावरकर धर्मान्तरण को राष्ट्रान्तरण मानते थे। आप कहते थे "यदि कोई व्यक्ति धर्मान्तरण करके ईसाई या मुसलमान बन जाता है तो फिर उसकी आस्था भारत में न रहकर उस देश के तीर्थ स्थलों में हो जाती है जहाँ के धर्म में वह आस्था रखता है, इसलिए धर्मान्तरण यानी राष्ट्रान्तरण है।
इस प्रकार से प्राय: सभी देशभक्त नेता ईसाई धर्मान्तरण के विरोधी रहे है एवं उसे राष्ट्र एवं समाज के लिए हानिकारक मानते है।


[i] Read Congregation for the doctrine of the faith: Instruction on prayers for healing published from Vatican
[ii] Ref. The final Verdict by Aroup Chatterjee
[iii] Popular Christianity in India: Riting between the Lines edited by Selva J. Raj, Corinne G. Dempsey.Page 129
[iv] Vatican hid Pope's Parkinson's disease diagnosis for 12 years: News published in The telegraph, Rome on 19 Mar 2006
[v] Pulliam Bailey, Sarah (25 March 2015). "Televangelist Benny Hinn has been admitted to the hospital for heart trouble" The Washington Post.
[vi] सप्तम समुल्लास
[vii] Religious cleansing of Hindus,Dr. Koenraad ELST, speaking in The Hague, 7 Feb. 2004, at the Agni conference on the persecution of Hindus in various countries.
[viii] The Niyogi committee gave the following recommendations:[2]
 (1) those missionaries whose primary object is proselytisation should be asked to withdraw and the large influx of foreign missionaries should be checked;
 (2) the use of medical and other professional services as a direct means of making conversions should be prohibited by law;
 (3) attempts to convert by force or fraud or material inducements, or by taking advantage of a person’s inexperience or confidence or spiritual weakness or thoughtlessness, or by penetrating into the religious conscience of persons for the purpose of consciously altering their faith, should be absolutely prohibited;
 (4) the Constitution of India should be amended in order to rule out propagation by foreigners and conversions by force, fraud and other illicit means;
 (5) legislative measures should be enacted for controlling conversion by illegal means;
 (6) rules relating to registration of doctors, nurses and other personnel employed in hospitals should be suitably amended to provide a condition against evangelistic activities during professional service; and
 (7) Circulation of literature meant for religious propaganda without approval of the State Government should be prohibited.  
 [Vindicated by Time: The Niyogi Committee Report](edited by Sita Ram Goel, 1998)
[ix] Biography of Swami Dayanand
[x] M.K. Gandhi, Christian Missions, Ahmedabad, 1941 and Collected Works
[xi] Socio-Religious Reform Movements in British India by K W Jones
[xii] Caste based Discrimination inside church is common practice. Read news published as title “SC Christians Allege Caste Discrimination” in The New Indian Express dated Wednesday, September 30, 2015.
from vedictruth.blogspot.com

Evidence of oldest civilization in India >,30,000 BCE.

Homo Sapiens ie we , our DNA shows that we are here from 30, 000 B C E . All our History of Vedic period or later called Hindu civilization by invaders to Bharat varsha is not older than 30, 000 B C E . earliest signs of civilization detected so far goes back to 17000 B C at Poompuhar off the coast of Tamil Nadu. The oldest site known as cradle of civilisation so far was gobekli tepe in turkey dates back to 13500 B C . but recent two major ancient city finds in gulf of khambhat and 5 km in the sea off the poompuhar coast in Tamil Nadu were built 19000 years ago and dates back to 17000 B C and another couple of millennium went in to reaching that level of architectural expertise in Indian civilisation . these cities went underwater after sea levels rose by 400 feet in 17000 b c 
 
 

Tuesday, September 29, 2015

भारत में ईसाई मत के कारनामे -Christian and Islam are more or less same-Conversion game.

भारत में ईसाई मत के कारनामे



 भारत देश में ईसाई मत का आगमन  52 AD में संत थॉमस का आगमन दक्षिण भारत में हुआ। भारत में ईसाईयों के इतिहास में दो हस्तियों के कारनामे सबसे अधिक प्रसिद्द हैं।
पहले फ्रांसिस ज़ेवियर और दूसरे रोबर्ट दी नोबिली।
पुर्तग़ालियों के भारत आने और गोवा में जम जाने के बाद ईसाई पादरियों ने भारतीयों का बलात् धर्म-परिवर्तन करना शुरू कर दिया[ii]। इस अत्याचार को आरम्भ करने वाले ईसाई पादरी का नाम 
फ्रांसिस ज़ेवियर (Francis Xavier, 7 April 1506–3 December 1552) था। फ्रांसिस ज़ेवियर ने हिन्दुओं को धर्मान्तरित करने का भरसक प्रयास किया मगर उसे आरम्भ में विशेष सफलता नहीं मिली। उसने देखा की उसके और ईसा मसीह की भेड़ों की संख्या में वृद्धि करने के मध्य हिन्दू ब्राह्मण सबसे अधिक बाधक हैं। फ्रांसिस जेविअर के अपने ही शब्दों में ब्रह्माण उसके सबसे बड़े शत्रु थे क्यूंकि वे उन्हें धर्मांतरण करने में सबसे बड़ी रुकावट थे। फ्रांसिस ज़ेवियर ने इस समस्या के समाधान के लिए ईसाई शासन का आश्रय लिया। वाइसराय द्वारा यह आदेश लागू किया गया कि सभी ब्राह्मणों को पुर्तगाली शासन की सीमा से बाहर कर दिया जाये । गोवा में किसी भी स्थान पर नए मंदिर के निर्माण एवं पुराने मंदिर की मरमत करने की कोई इजाज़त नहीं होगी[iii]। इस पर भी असर न देख अगला आदेश लागू किया गया की जो भी हिन्दू ईसाई शासन के मार्ग में बाधक बनेगा उसकी सम्पति जप्त कर ली जाएगी। इससे भी सफलता न मिलने अधिक कठोरता से अगला आदेश लागू किया गया। राज्य के सभी ब्राह्मणों को धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने का अथवा देश छोड़ने का फरमान जारी हुआ। इस आदेश के साथ हिन्दुओं विशेष रूप से ब्राह्मणों पर भयंकर अत्याचार आरम्भ हो गये। हिन्दू पंडित और वैद्य पालकी पर सवारी नहीं कर सकता था। ऐसा करने वालो को दण्डित किया जाता था। यहाँ तक जेल में भी ठूस दिया जाता था[iv]। हिन्दुओं को ईसाई बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। ईसाई बनने पर राज संरक्षण की प्राप्ति होना एवं हिन्दू बने रहने पर प्रताड़ित होने के चलते हजारों हिन्दू ईसाई बन गए[v]। हिन्दुओं को विवाह आदि पर उत्सव करने की मनाही करी गई। ईसाई शासन के अत्याचारों के चलते हिन्दू बड़ी संख्या में पलायन के लिए विवश हुए[vi]फ्रांसिस ज़ेवियर के शब्दों में परिवर्तित हुए हिन्दुओं को ईसाई बनाते समय उनके पूजा स्थलों को,उनकी मूर्तियों को उन्हें तोड़ने देख उसे अत्यंत प्रसन्नता होती थी। हजारों हिन्दुओं को डरा धमका कर, अनेकों को मार कर, अनेकों को जिन्दा जला कर, अनेकों की संपत्ति जब्त कर, अनेकों को राज्य से निष्कासित कर अथवा जेलों में डाल कर ईसाई मत ने अपने आपको शांतिप्रिय एवं न्यायप्रिय सिद्ध किया[vii]। हिन्दुओं पर हुए अत्याचार का वर्णन करने भर में लेखनी कांप उठती है।
 गौरी और गजनी का अत्याचारी इतिहास फिर से सजीव हो उठा था[
 विडंबना देखिये की ईसा मसीह के लिए भेड़ों की संख्या में वृद्धि के बदले फ्रांसिस जेविअर को ईसाई समाज ने संत की उपाधि से नवाजा गया। गोवा प्रान्त में एक गिरिजाघर में फ्रांसिस ज़ेवियर की अस्थिया सुरक्षित रखी गई है। हर वर्ष कुछ दिनों के लिए इन्हें दर्शनार्थ रखा जाता है। सबसे बड़ी विडंबना देखिये इनके दर्शन एवं सम्मान करने गोवा के वो ईसाई आते है जिनके पूर्वज कभी हिन्दू थे एवं उन्हें इसी ज़ेवियर ने कभी बलात ईसाई बनाया गया था।
रोबर्ट दी नोबिली नामक ईसाई का आगमन 1606 में मदुरै, दक्षिण भारत में हुआ। उसने पाया की वहां पर हिन्दुओं को धर्मान्तरित करना लगभग असंभव ही है। उसने देखा की हिन्दू समाज में ब्राह्मणों की विशेष रूप से प्रतिष्ठा हैं। इसलिए उसने धूर्तता करने की सोची। उसने पारम्परिक धोती पहन कर एक ब्राह्मण का वेश धरा। जनेऊ, शिखा रख कर शाकाहारी भोजन करना आरम्भ कर दिया। उसने यह प्रचलित कर दिया की वह सुदूर रोम से आया हुआ ब्राह्मण है। उसके पूर्वज भारत से रोम गए थे। उसने तमिल और संस्कृत भाषा में ग्रन्थ रचना करने का नया प्रपंच भी किया। इस ग्रन्थ को उसने "वेद" का नाम दिया। ब्राह्मण वेश धरकर नोबिली ने सत्संग करना आरम्भ कर दिया। उसके सत्संग में कुछ हिन्दू आने लग गए। धीरे धीरे उसने सत्संग में ईसाई प्रार्थनों का समावेश कर दिया। उसके प्रभाव से अनेक हिन्दू ईसाई बन गए[ix] कालांतर में मैक्समूलर ने नोबिली के छदम "वेद" का रहस्य उजागर कर दिया। पाठक सोच रहे होंगे की मैक्समूलर ने ऐसा क्यों किया। जबकि दोनों ईसाई थे। उत्तर सुनकर रोंगटे खड़े हो जायेगे। नोबिली ईसाइयत के एक सम्प्रदाय रोमन कैथोलिक से सम्बंधित था जबकि मैक्समूलर प्रोटोस्टेंट सम्प्रदाय से सम्बंधित था। दोनों के आपसी जलन और फुट ने इस भेद का भंडाफोड़ कर दिया। जहाँ पर धर्म का स्थान मज़हब/मत मतान्तर ले लेते हैं। वहां पर ऐसा ही होता है।

नोबिली को ईसाई समाज में दक्षिण भारत में धर्मान्तरण के लिए बड़े सम्मान से देखा जाता है। पाठक स्वयं विचार करे। वेश बदल कर धोखा देने वाला नकल करने वाला सम्मान के योग्य है अथवा तिरस्कार के योग्य है? प्रसिद्द राष्ट्रवादी लेखक सीता राम गोयल द्वारा ईसाई समाज द्वारा हिन्दू वेश धारण करने, हिन्दू मंदिरों के समान गिरिजाघर बनाने, हिन्दू धर्मग्रंथों के समान ईसाई भजन एवं मंत्र बनाने, हिन्दू देवी देवताओं के समान ईसा मसीह एवं मरियम की मूर्तियां बनाने, ईसाई शिक्षण संस्थान को गुरुकुल की भाँति नकल करने की अपने ग्रंथों में भरपूर आलोचना करी है[x]। विचार करे क्या ईसाईयों को अपने धर्म ग्रंथों एवं सिद्धांतों पर इतना अविश्वास है की उन्हें नकल का सहारा लेकर अपने मत का प्रचार करना पड़ता है। धर्म की मूल सत्यता पर टीकी है। न की जूठ,फरेब, नकल और धोखे पर टिकी हैं।

भारत देश के विशाल इतिहास के ईसाईयों के अत्याचार, जूठ, धोखे से सम्बंधित दो कारनामों का सत्य इतिहास मैंने अपने समक्ष रखा हैं। यह इतिहास उस काल का है जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत की स्थापना नहीं हुई थी। पाठक कल्पना करे अंग्रेजों के संरक्षण में ईसाईयों ने कैसे कैसे कारनामे करे होगे।



डॉ विवेक आर्य


[i] The myth of Saint Thomas and the Mylapore Shiva Temple by Ishwar Sharan, Voice of India, New Delhi, 1991


[ii] Alfredo DeMello, “The Portuguese Inquisition in Goa”


[iii] Viceroy António de Noronha issued in 1566, an order applicable to the entire area under Portuguese rule:

“I hereby order that in any area owned by my master, the king, nobody should construct a Hindu temple and such temples already constructed should not be repaired without my permission. If this order is transgressed, such temples shall be, destroyed and the goods in them shall be used to meet expenses of holy deeds, as punishment of such transgression.”


[iv] Priolkar, A. K. The Goa Inquisition. (Bombay, 1961)


[v] Shirodhkar, P. P., Socio-Cultural life in Goa during the 16th century, p. 35


[vi] Shirodhkar, P. P., Socio-Cultural life in Goa during the 16th century, p. 35


[vii] Charles Dellon ,L'Inquisition de Goa (The Inquisition of Goa)


[viii] The words Auto da fé reverberated throughout Goa, reminiscent of the furies of Hell, which concept, incidentally does not exist in the Hindu pantheon. On April 1st 1650 for instance, four people were burnt to death, the next auto da fé was on December 14, 1653, when 18 were put to the flames, accused of the crime of heresy. And from the 8th April 1666 until the end of 1679 – during which period Dellon was tried – there were eight autos da fé, inwhich 1208 victims were sentenced. In November 22, 1711 another auto da fé took place involving 41 persons. Another milestone was on December 20, 1736, when the Inquisition burnt an entire family of Raaim, Salcete, destroying their house, putting salt on their land, and placing a stone padrao, which still existed in the place (at least in 1866)-Alfredo De Mello (‘Memoirs of Goa’ Chapter 21)


[ix] History of Hindu Christian encounters by Sita Ram Goel, Chap 4


[x] The masquerade of Robert Di Nobili has been described in detail in Sita Ram Goel, Catholic Ashrams: Sannyasins or Swindlers?, Voice of India, New Delhi, 1995.

Sunday, September 27, 2015

Maharani Ahilya Bai Holkar

MARATHA PHILOSPHER QUEEN & MOTHER OF THE MALWAS AND PROTECTOR OF DHARMA .... ONE OF THE GREATEST OF HINDU WOMEN !!!
MAHARANI AHILYABAI HOLKAR ~ Her Highness Maharani Shrimant Akhand Soubhagyavati Ahilya Bai Sahiba ~ Maratha Holkar Queen of Indore & Queen of the Malwa Kingdom

1 December 1767 – 13 August 1795
Coronation : 11 December 1767
Consort : Khanderao Holkar
Born May 31, 1725
Died August 13, 1795
Maharani Ahilya Bai Holkar (31 May 1725 – 13 August 1795), was the Holkar Queen of the Maratha ruled Malwa kingdom, India. Rajmata Ahilyabai was born in the village of Chondi (चोंडी) in Jamkhed, Ahmednagar, Maharashtra.
Malhar Rao Holkar, a commander in the service of the Peshwa Bajirao and lord of the Malwa territory, stopped in Chaundi on his way to Pune and, according to legend, saw the eight-year-old Ahilyabai at the temple service in the village. Recognising her piety and her character, he brought the girl to the Holkar territory as a bride for his son, Khanderao (1723–1754). She was married to Khanderao in 1733.
Ahilyabai's husband Khanderao Holkar was killed in the battle of Kumbher in 1754. Twelve years later, her father-in-law, Malhar Rao Holkar, died. A year after that she was coronated as the queen of the Malwa kingdom. She tried to protect her kingdom from Thugs, the plunderers. She personally led armies into battle. She appointed Tukojirao Holkar as the Chief of Army.
She moved the capital to Maheshwar south of Indore on the Narmada River.Among Ahilyabai's accomplishments was the development of Indore from a small village to a prosperous and beautiful city; her own capital, however, was in nearby Maheshwar, a town on the banks of the Narmada river.
Maharani Ahilyabai was a great builder and patron of many Hindu temples which embellished Maheshwar and Indore. She also built temples and Dharmshala (free lodging) at sacred sites outside her kingdom, at prominent religious places like Dwarka in Gujarat east to the Kashi Vishwanath Temple at Varanasi on the Ganges, Ujjain, Nasik, Vishnupad Mandir, Gaya and Parali Baijnath in Maharashtra. Seeing the destroyed and desecrated temple in Somanath, Rani Ahilyabai built a temple where Lord Shiva is still worshipped by Hindus.
Ahilyabai never observed purdah but held daily public audience and was always accessible to anyone who needed her ear.There are many stories of her care for her people. She helped widows retain their husbands’ wealth. She made sure that a widow was allowed to adopt a son; in fact, in one instance, when her minister refused to allow the adoption unless he was suitably bribed, she is said to have sponsored the child herself, and given him clothes and jewels as part of the ritual.
Ahilyabai’s capital at Maheshwar was the scene of literary, musical, artistic and industrial enterprise. She entertained the famous Marathi poet, Moropant and the shahir, Anantaphandi from Maharashtra, and also patronised the Sanskrit scholar, Khushali Ram. Craftsmen, sculptors and artists received salaries and honours at her capital, and she even established a textile industry in the city of Maheshwar.
Maheshwar is also known for its distinctive handwoven sarees called Maheshwari exquisitely woven ‘Maheshwari’ sarees. Maheshwari Sarees were introduced into Maheshwar 250 years ago by Rani Ahilyabai, and are renowned throughout India for their unique weave. Woven mostly in cotton, the typical Maheshwari saree has a plain body and sometimes stripes or checks in several variations. The mat bordered designs have a wide range in leaf and floral patterns. The pallav is particularly distinctive with 5 stripes, 3 coloured and 2 white alternating, running along its width. Maheshwari has a reversible border, known as bugdi.

Facebook Mark Zuckerberg ispirated from Visiting Temple In India-Modi interacts with Facebook