Wednesday, December 3, 2014

महारावल वीरमदेव सोनिगरा चौहान (जालौर)=

Photo: ""जब एक मुस्लिम शहजादी सती हुए राजपूत योद्धा के पीछे ""
==महारावल वीरमदेव सोनिगरा चौहान (जालौर)=====
राजस्थान का इतिहास शोर्य और बलिदानी गाथाओ से भरा है राजस्थान मे जहाँ भी जाऐँगे आपको वीरो कि शौर्य गाथाए सूनने को मिलेगी ऐसे स्थलो मे से एक है जालोर का स्वर्णगिरी दुर्ग जो देश भर मे अभेध दुर्गो मे गिना जाता है
“आभ फटे धर उलटे कटे बखत रा कोर सिर कटे धर लडपडे जद छूटे जालोर ”

12 वीँ शताब्दी के अँतिम वर्षो मे जालोर दुर्ग पर चौहान राजा कान्हडदेव का शासन था इनका पुत्र कूँवर वीरमदेव चौहान समस्त राजपूताना मे कुश्ती का प्रसिद्ध पहलवान था एवँ कूशल यौद्धा था छोटी आयू मे भी कई यूद्धो मे कुशल सैन्य सँचालन कर अपनी सैना को विजय दिलाई थी वीरमदेव कि ख्याति सुनकर उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व को देख कर दिल्ली के बादशाह अल्लाउदिन खिलजी कि बेटी शहजादी फिरोजा(सताई) का दिल विरमदेव पर आ गया तथा शहजादी ने किसी भी किमत पर विरमदेव से विवाह करने तथा अपनाने कि जिद पकड ली “वर वरुँ तो विरमदेव ना तो रहुँगी अकन कूँवारी ” शहजादी कि हठ सूनकर दिल्ली दरबार मे कौहराम मच गया काफी सोच विचार के बाद अपना राजनैतिक फायदा देख बादशाह खिलजी इसके लिए तैयार हुआ शादी का प्रस्ताव जालोर दुर्ग पहुँचाया गया मगर विरमदेव ने तूरँत प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा “मामा लाजै भाटियाँ कूल लाजै चौह्वान जौ मे परणुँ तुरकाणी तो पश्चिम उगे भान” (मतलब मेरे मामा भाटी वंश से है में खुद चौहान एक तुर्कन से कैसे शादी करू मेरा वंश अपवित्र हो जायेगा ऐसा तभी संभव है जब सूरज पश्चिम से उगेगा ) 

परिणामत युद्ध का ऐलान हुआ लगभग एक वर्ष तक तुर्को कि सैना जालोर पर घेरा लगाए बैठी रही फिर युद्ध प्रारँभ हुआ किल्ले की राजपूतनियो ने जौहर की रस्म निभायी मात्र 22 वर्ष कि अल्पायू मे खुद विरमदेव केसरिया बाना पहन कर सबसे आगे सैना का नैतृत्व कर रहा था और इस भयँकर यूद्ध मे विरमदेव विरगति को प्राप्त हो गया तूर्कि सैना विरमदेव का सिर दिल्ली ले गयी तथा शहजादी के सामने रख दिया जब शहजादी ने मस्तक को थाली मे रखवाया और मस्तक से शादी करने की बात कही तो मस्तक अपने आप थाली से पलट गया लेकिन शहजादी भी अपने वादे पर अडीग थी शादी करुँगी तो विरमदेव से वर्ना कूँवारी मर जाऊँगी अतँत शहजादी मस्तक को अपने हाथ मे लेकर यमूना नदी मे कूद कर विरमदेव के पिछे सती हो गयी”……………।
वीरमदेव ने अपना कर्तव्य निभाया और एक हिन्दू होने के नाते मरने को तैयार हुआ पर एक तूर्कि मुस्लिम शहजादी से शादी नही की वही एक मुस्लिम शहजादी एक हिन्दू राजा के प्रेम मे इतनी कायल हुई कि उसके लिए अपनी जान तक दे दी अतँत शहजादी मस्तक को अपने हाथ मे लेकर यमूना नदी मे कूद कर विरमदेव के पिछे सती हो गयी”
==महारावल वीरमदेव सोनिगरा चौहान (जालौर)=====
राजस्थान का इतिहास शोर्य और बलिदानी गाथाओ से भरा है राजस्थान मे जहाँ भी जाऐँगे आपको वीरो कि शौर्य गाथाए सूनने को मिलेगी ऐसे स्थलो मे से एक है जालोर का स्वर्णगिरी दुर्ग जो देश भर मे अभेध दुर्गो मे गिना जाता है
“आभ फटे धर उलटे कटे बखत रा कोर सिर कटे धर लडपडे जद छूटे जालोर ”

12 वीँ शताब्दी के अँतिम वर्षो मे जालोर दुर्ग पर चौहान राजा कान्हडदेव का शासन था इनका पुत्र कूँवर वीरमदेव चौहान समस्त राजपूताना मे कुश्ती का प्रसिद्ध पहलवान था एवँ कूशल यौद्धा था छोटी आयू मे भी कई यूद्धो मे कुशल सैन्य सँचालन कर अपनी सैना को विजय दिलाई थी वीरमदेव कि ख्याति सुनकर उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व को देख कर दिल्ली के बादशाह अल्लाउदिन खिलजी कि बेटी शहजादी फिरोजा(सताई) का दिल विरमदेव पर आ गया तथा शहजादी ने किसी भी किमत पर विरमदेव से विवाह करने तथा अपनाने कि जिद पकड ली “वर वरुँ तो विरमदेव ना तो रहुँगी अकन कूँवारी ” शहजादी कि हठ सूनकर दिल्ली दरबार मे कौहराम मच गया काफी सोच विचार के बाद अपना राजनैतिक फायदा देख बादशाह खिलजी इसके लिए तैयार हुआ शादी का प्रस्ताव जालोर दुर्ग पहुँचाया गया मगर विरमदेव ने तूरँत प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा “मामा लाजै भाटियाँ कूल लाजै चौह्वान जौ मे परणुँ तुरकाणी तो पश्चिम उगे भान” (मतलब मेरे मामा भाटी वंश से है में खुद चौहान एक तुर्कन से कैसे शादी करू मेरा वंश अपवित्र हो जायेगा ऐसा तभी संभव है जब सूरज पश्चिम से उगेगा )


परिणामत युद्ध का ऐलान हुआ लगभग एक वर्ष तक तुर्को कि सैना जालोर पर घेरा लगाए बैठी रही फिर युद्ध प्रारँभ हुआ किल्ले की राजपूतनियो ने जौहर की रस्म निभायी मात्र 22 वर्ष कि अल्पायू मे खुद विरमदेव केसरिया बाना पहन कर सबसे आगे सैना का नैतृत्व कर रहा था और इस भयँकर यूद्ध मे विरमदेव विरगति को प्राप्त हो गया तूर्कि सैना विरमदेव का सिर दिल्ली ले गयी तथा शहजादी के सामने रख दिया जब शहजादी ने मस्तक को थाली मे रखवाया और मस्तक से शादी करने की बात कही तो मस्तक अपने आप थाली से पलट गया लेकिन शहजादी भी अपने वादे पर अडीग थी शादी करुँगी तो विरमदेव से वर्ना कूँवारी मर जाऊँगी अतँत शहजादी मस्तक को अपने हाथ मे लेकर यमूना नदी मे कूद कर विरमदेव के पिछे सती हो गयी”……………।
वीरमदेव ने अपना कर्तव्य निभाया और एक हिन्दू होने के नाते मरने को तैयार हुआ पर एक तूर्कि मुस्लिम शहजादी से शादी नही की वही एक मुस्लिम शहजादी एक हिन्दू राजा के प्रेम मे इतनी कायल हुई कि उसके लिए अपनी जान तक दे दी अतँत शहजादी मस्तक को अपने हाथ मे लेकर यमूना नदी मे कूद कर विरमदेव के पिछे सती हो गयी”

जडेजा दरबार (राजपूतों) क्षत्रियों का इतिहास

Photo: +++++++++++चंद्रवंशी जडेजा राजवंश का इतिहास++++++++++++++++++
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===========जडेजा दरबार (राजपूतों) क्षत्रियों का इतिहास==================

जडेजा राजवंश गुजरात के कच्छ व सौराष्ट्र के इलाके में राज करने वाला एक झुझारू राजवंश है। जडेजा राजवंश की उत्पत्ति चंद्रवंशी क्षत्रिये हैं व इनकी उत्पत्ति यदुकुल से मानी जाती है। जडेजा चुडासमा भाटी जादौन चारो कुल यदुवंश की अलग अलग शाखाये है जो भिन्न भिन्न समय पर यदुवंश से निकली है। जडेजा वंश गुजरात का सबसे बड़ा राजपूत वंश माना जाता है। जडेजा राजपूतों के सौराष्ट्र में लगभग 700 गाँव बेस हुए है और लगभग २३०० गाँवो पर आजादी के समय इनका शाशन रहा है।गुजरात में ऐसी मान्यता है के जिन गांवों में ठाकुर जी श्री कृष्ण का मंदिर नहीं है वहां लोग सुबह उठकर किसी जडेजा के पाँव छूकर आशीर्वाद प्राप्त कर सकते है।गुजरात हाई कोर्ट भी जडेजाओ की कृष्णा जी के वंशज होने की बात प्रमाणित करता है कुछ समय पहले हुए एक केस में कोर्ट ने जाम नरेश को प्रद्युम्न जी का वारिस मानते हुए संपत्ति पर हक़ का अधिकार दिया। 

================भूचर मोरी व नवानगर के प्रसिद्द युद्ध==========================

    महाभारत काल के बाद इतिहास के दो सबसे बड़े युद्ध भी जडेजा वंश के नेतृत्व में लड़े गए।  भूचर मोरी और नवानगर के युद्ध में जडेजा वीरों ने डट कर विदेशिओं का मुकाबला किया। ये युद्ध क्षत्रियो की वीरता व रण कौशल का उत्तम उद्धारण है जो कभी भुलाये नहीं जाने चाहिए। इन दोनों युद्धों के बारे में संछिप्त में अगली पोस्ट में विवरण दिया जायेगा।

============जडेजा शाषित पूर्व राज्य व ठिकाने=======================

1.भुज(९२३ गांव) १९ बंदूको की सलामी 
२.मोरवी(१४१ गांव) ११ बंदूको की सलामी तालूका-१
मालिया(२४ गांव ) (मोरवी के द्वारा) सज्जनपुर (७गांव ) मोरवी द्वारा 
जागीर - रोहा ,कोठारिया, लाकडीया, विजांन,,मानजल,तेरा आदि मिलाकर १९ जागीर....
नावानगर (हालार) शासित राज्य
१. नावानगर (७४१ गांव) १५ बंदूको की सलामी 
२. ध्रोल(७१ गांव) ११ बंदूको की सलामी
३. राजकोट ( ६४ गांव) ९ बंदूको की सलामी 
४. गोंडला (१२७ गांव ) ११ बंदूको की सलामी राजकोट द्वारा
५. खरेडी वीरपुर(१३ गांव) नावानगर के द्वारा
६. कोटडा सांगानी(२० गांव) गोंडला के द्वारा 
७. खिरासारा(१२ गांव ) ध्रोल द्वारा
८. जालीया देवानी(१०. गांव ) ध्रोल द्वारा
__________________तालूका_____________________________
१. गढका (७ गांव ) राजकोट द्वारा
२.गवरीदड(५ गांव) राजकोट द्वारा
३.पाल (५गांव ) राजकोट द्वारा
४.शापर(४गांव) राजकोट द्वारा
५.लोधिका सीनियर(५गांव) राजकोट द्वारा
६.लोधिका जूनियर (५गांव) राजकोट द्वारा
७.कोठारिया(१०गांव ) राजकोट द्वारा
८.मेंगनी(८गांव) गोंडला द्वारा
९.भाडवा(४गांव) गोंडला द्वारा
१०.राजपरा(९गाँव)गोंडल द्वारा
तालूकदारी(शेयरहोल्डर)
१. ध्र्रफा(२५गांव) ९ तालूकदार से ज्यादा
२.सतोदड वावडी(६गांव) 
३.देरी मूलैला(५गांव) 
४.शीशाग चाँदली (४ गांव) आदी
कूछ ३३ गाँव पालनपुर के अन्दर

==============जडेजा राजपूतों की वंशावली व संछिप्त इतिहास================

१.राजा चंद्र (त्रेता युग के तीसरे चरण मे प्रथ्वी पर कोई अच्छे राजा ना होने से इन्द्र की सूचना से चन्द्र ने अवतार लिया जिससे चन्द्रवंश चला|
२.बुद्ध ( चन्द्र के ब्रहस्पति कन्य तारा की कोख से जन्म लिया , बुद्ध ने श्राद्धदेव मुनि की बेटी इला से विवाह कर पुरूरवा नामक पराक्रमी पुत्र हुआ) 
३.पुरूरवा(इनकी राजधानी प्रयाग थी इनके गुणगान एक बार नारद ने इन्द्र सभा मे कहे जिसको सुनकर उर्वशी ने प्रथ्वी पर आकर पुरूराव से शादी की ,जिसके अयु ,सत्यायु ,ऱाय, विजय वगैरा ७ पुत्र हुए) 
४.अयु(नरूहुस ,क्षत्रावुध ,राजी राम्भ,अनीना नाम के पुत्र हुए )
५.नुहुस(जिसने १०० बार अश्वमेघ यज्ञ किया था)
६. ययाति(६ भाईयो मे सबसे बडे जिसने शुक्राचार्य की बेटी देवयानी जो कि ब्राहम्ण कन्या थी उससे हुई ,देवयानी को श्राप था के वो ब्रहामण नही रहेगी जिसके दो पुत्र हुए यदु और तुरवुश और दूसरी बीवी सरमिशठा से ३ पुत्र हुए जिसमे एक पुरूराव जिसकी ४१ वी पीढी पर राजा युधिष्टर हुए) 
७. यदु (इन राजा के कुल मे जो राजा हुए वो यदुवंशी कहलाए)
८.कोष्ठा
९.वराजीनवन
१०.स्वाही
११.रूसीकू
१२.चित्रार्थ
१३.शसबिन्धू
१४. प्रथूुसवा
१५.धर्म
१६.उस्ना
१७.रूचक
१८.जयामेघ
१९.विरालभ
२०.कराथ
२१.करून्ती
२२.धरूस्टी
२३.निवरित
२४.दरसाहा
२५.व्योम
२६.जीतूमाक
२७.विरकुट
२८.भीमराथ
२९.नावरथ
३०.दसूरथ
३१.साकून
३२.कुरांभी
३३.देवराता
३४.देवक्षत्रा
३५.मोधू
३६.कुरू
३७.अनु
३८.पुरहोत्रा
३९.अयु
४०.सातवन(इनके ७ पुत्र थे जिसमे वृष्णि गद्दी पर बैठे)
४१.वृष्णि(४ बार प्रथ्वी के सभी राजाओ को हराया, जिन्होने वेद धर्म फैलाया, उनके नाम से कुछ यादव वरूशनीक गौत्र के कहलाए)
४२. सुमित्र
४३.शईनी
४४.अनामित्र
४५.वरूशनीक
४६.चित्राराथ
४७.विदूरथ
४८.सुर
४९.भजनाम
५०.शईनी
५१.स्वायंभोज
५२.हरिदिक
५३.देवमिथ
५४.सुरसेन(जिनकी एक बेटी को राजा कुंतीभोज ने पाला जिसका नाम कुंती था .
५५.(१४ रानी जिसमे ७ मथुरा के कंस की बहन )
५६.श्री क्रष्ण
५६.श्री क्रष्ण (भगवान विष्णु के अवतार ,पटरानी मे से सबसे बडे रूकमणी जी उसके पाटवी कवंर प्रद्युमना.
५७.प्रद्युमना
५८.अनिरूध(मिश्र के सोनितपुर के राजा बाणासुर की बेटी ओखा का हरण कर शादी की थी उस बाणासुर के श्रीक्रष्ण जी ने दोनो हाथ काट डाले थे )
यादवंशथली मे जम्बुवती के पुत्र साम्ब जो खूबसूरत होने से स्त्री के परिधान पहनकर यादवकुमारो ने दुर्वासा ऋषि के पास ले जाकर प्रश्न किया की' इसको पुत्र होगा क्या?',तप भंग होने से ऋषि ने श्राप दिया के इसके जिसका जन्म होगा वो यादवकुल का नाश करेगा फिर कुछ समय बाद यादव अंदर ही अंदर लडकर मर गए श्रीक्रष्ण ने भी भौतिक शरीर त्यागा , उससे पहले श्रीक्रष्ण ने अपने सारथी दारूक और शखा उद्धवजी को बुलाकर कहा था कि उसके स्वधाम जाने के बाद द्वारिका ७दिन मे डूब जाएगी उनके महल के अलवा इसलिए सभी अर्जुन के साथ मेरे परिवार को लेकर इन्द्रप्रस्थ जाए और व्रजनाभ का राज्यभिषेक करे जब अर्जुन के साथ बचे यादवो और क्षत्रीयानि को काबा और अहीरो ने लूटा अनिरूध के पाटवी कवंर व्रजनाभ को इन्द्रप्रस्थ लाकर राज्यभिषेक किया , बाणासुर के अवसान के बाद उसका पुत्र सागीर उम्र मे म्रत्यु होने से सोनितपुर की गद्दी व्रजनाभ को मिली वो सपरिवार विक्रम संवत पूर्व २२७२ को मिश्र मे राजधानी हुई
५९. वरजनभ
६०.प्रतिवाह
६१. शुभ से ११३ 
११३. लक्ष्यराज (इस राजा से विकेरम संवत शुरू हुआ ) 
११४.प्रताप जी 
११५.गर्वगोड (इजिप्त के सोनीतपुर और आसपास के देशो मे राज ३२०० सालो तक राज टिसा रहा और रोमन ने जीत लि ा इन्होने गद्दी काबुल मे बनाई इजिप्त छोडा)
११६.भानजी से 
१३४.देवीसिंह
१३५.सुरसेन जी (यवनो ने काबुल जीत लियाइन्होने वापस यवनो से काबुल जीता और सता सिंध मे लाहौरी तक बढाई
१३६.विक्रमसेन (वापस मिश्र जीत गद्दी वहां लगाई) 
१३७.राजा देवेन्द्र (मिश्र मे गद्दी , नबी मुहम्मद ने दुनिया मे इस्लाम फैलाया हमले किये इनकी म्रत्यु के बाद सोनितपुर भी जीत लिया

==============राजा देवेन्द्र के बाद युवराज=============================
* अ्सपत-
(मिश्र की गद्दी पर बैठे उनको मुहम्मद जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाया जिसका कुल वाकर के अनुसार उनके वंशज चागडा मुगल कहलाए जिसके वंश मे अकबर हुआ --कुछ इतिहासकार दंतकथा कहते है कि माता हिंगलाज ने ४ को छुपा दिया और एक अस्पत को सौंपा , जिसको मुह(जड) मे छुपाया वो जडेजा कहलाए ,चुड मे छुपाया वो चुडसमा कहलाए ,भाथी मे छुपाया वो भाटी कहलाए .)
*गजपत.
(विक्रम संवत ७०८ के वैशख शुद्ध तेज को शनिवार रोहिणी नक्षत्र मे गजनी शहर बसाया और किला बनवाया और अपने बडे भाई नरपत जी को गद्दी पर बैठाया और खुद हिन्द सौराष्ट्र की तरफ मैत्रा मां के भक्त थे इसलिए यहां आ बसे जिनके वंशज रा कहलाए बाद मे चुडासमा सरवैया और रायजादा कहलाए जूनागढ मे इन्होने ७०० साल राज किया)
*भूपत
(गजनी और खुरासन के प्रदेश के बीच भूपत ने राज्य चलाया,बाद मे पंजाब और सिंध मे राज्य किया ,केहूद रावल ने देवराजगढ बंधवाया, देवराज रावल के बादमे ६ थी पीढी पर जैसल जी हुए उन्होने जैसलमेर मे राजधानी बनवाई )
१३८.जाम नरपत संवत ६८३ से ७०१ (बादशाह फिरोजखान को हराकर अपने पुरखो की गद्दी जीत अफगान मे खुदकी सत्ता जमाई)
१३९.जाम सामत(समा) संवत(७०१-५८)फिरोज खान के शहजादे ने तुर्किस्तान से मुस्लिम राजाओ का सहारा लेकर गजनी पर जीत ली सामत अय्याशी थे तो युद्ध की तैयारी ना पाए और थोडे लास्कर के साथ लाहौरी मे गद्दी डाली और सिंध मे राज बढाया जिनके वंशज सिंध मे सामा कहलाए)
१४०.जाम जेहो संवत ७५७ से ८३१ (खलीफा उमर से लडाई हुई और जीते )
१४१. जाम नेतो संवत(८३१ से ८५५) खलीफा वालिफ ने सिंध पर हमला कर अपनी सत्ता जमाई , सब राजाओ ने लगान दी ,जाम नेता ने नही दी
१४२. जाम नोतीयार संवत(८६६-८७०) इरानी बादशाह ममुरासिद चित्तौड से हारकर वापस आ रहा था उनको लूटा और बंदी बनाया)
१४३. जाम गहगिर (ओधर)संवत ८७०-८८१ (रोमन के साथ व्यापार संबंध बढाये )
१४४. जाम ओथो संवत(८८१-८९८ ( कश्मीर के राजा जयपीड की बेटी की शादी अपने बेटे के साथ हुई थी)
१४५. जाम राहु संवत(८९८-९१८) कन्नौज के राजा माहिरभोज और अनंग पिड कश्मीर के साथ रिश्ते बढाए)
१४६. जाम ओढार संवत(९३१-४२) (काबुल,कंदहार, पेशावार मे फैले हिन्दू राजाओ को संघठित कर मुस्लिम को रोका था) 
१४८. जाम लखियार भड संवत(९४२-९५६) (नग्गर सैमे बसाया और वहां राजगद्दी बनायी जो हाल नगरठाठे के नाम से पहचाना जाता है 
१४९. जाम लाखो धूरारो संवत(९५७-९८६) अपने दोनो पैर से घोडे को झूलाते थे काफी बलवान राजा थे , पतगढ के राजा वीरम चावडा की बेटी से ४ पुत्र हुए मोड वैराया, संध और ओथो और खैरागढ के राजा सूर्य सिंह उफर श्रवण की बेटी चन्द्रकुवंर से उन्नड , जीहो , फुल और मानाई )
जाम उन्नड सिंध की गदी पर आये और मोड़ अपने मामा की गदी पटगढ़ छीन ली और उनके वंश कच्छ में (जिन्होने केरा कोट का अजोड़ किल्ला बन्धवाया)चला जिसके वंश में जाम लाखो पुलाणि हुवे जो आज भी पुरे गुजरात में सु प्रशिद्ध हे जो अटकोट में भीमदेव सोलंकी के सामने युद्ध में काम आये इनको पुत्र न होने से उनका भतीजा जाम पुनवरो गद्दी पर आया जिसने पदरगढ़ का कछ कला का विसाल किल्ला बनवाया )
१५०• जाम उन्नड सवंत (९८५ -९९१)
(महान दानेस्वरि ,अभि किसी राजा को कवी उपमा देते हे तो 'उन्नड के अवतार' के नाम से देते हे)
१५१.जाम समेत उर्फ़ समो सवंत (९९१-१०४१)
(जाम उन्नड के बाद नगर सैम पर जाम समो ने राज किया बादसाह नसरुदीन को हराया और पंजाब की तरफ खदेड़ा)
१५२.जाम काकू सवंत(१०४१-१०६२)
(धर्मसालि राजा थे रामेश्वर की यात्रा ५ बार की और राज्य को मजबूत किया)
१५३ जाम रायघन सवंत(१०६२-१०९२)
(तुर्की वंस में महमद गिजनी हुवा जिसने हिन्द पर १७ बार हमला किया जिसने सोमनाथ मंदिर तोडा और मंदिर का कुछ हिसा मकामदीना में और कुछ अपनी कचेरी में लगवाया मंदिर तोड़ कर लौटते वख्त राय घन जी ने जलाशयो में जहर डलवाया जिससे उसका काफी सैन्य मरा)
१५४.जाम प्रताप उर्फ पली सवंत(१०९२-१११२)
(पंजाव के राजा अनंगपल को मदद की थी १०६४ में उनके साथ उज्जैन ग्वालियर कनोज अजमेर के राजा भी मदद् को आये थे)
१५५.जाम संधभड़ सवंत(११२-११८२)
(दो पुत्र हुवे जाम जाड़ो और वेरजि)
१५६ जाम जाड़ो सवंत(११८२-१२०३)
(इनके वंसज जडेजा कहलाये इनको पुत्र न होंने से अपने भतीजे को गदी पर बिठाया बादमे उनको पुत्र हुवा जिसका नाम धयोजि था)
जाम लाखो जडेजा सवंत (१२०३-१२३१)
(धायोजी का पक्ष ज्यादा मजबूत होने से और जगडा होने से जाम लाखों अपने भाई क साथ कछ की और आ बसे और अलग अलग राजा ओ को हराकर कछ में सत्ता जमायी उधर सिंध में धयोजी निर्वंश गुजर गए)
१५८•जाम रायघनजी सावंत(१२३१-१२७१)
(इनके समय में जत काफी बलवान थे कन्नौज के राजा जयचंद ने संयोगिता का स्वमवर रखा था जिसमे जाम रायघन भी गये थे ये हिंदुस्तान का आखरी राजसूय यग्न था इन्होंने पृथ्वीराज को ५ हजार का सैन्य मदद को भेजा था और अपने एक पुत्र होथीजी को भी इनके ४ पुत्र हुवे जाम गजनजी(बारा की जागीर दी),देदोजी( कंथकोट अंजार वागड़ वगेरा दिया)होथीजी(गजोड़ की जागीर दी)और आठो जी(जिनसे कछ भुज की साख चली और राज इनको दिया)..बड़े को गदी न देने से ये जगडा १२ पीढ़ी तक चला 
१५९ जाम गजनजी सवंत( १२७१-१३०१)
बारा की गद्दी पर राज किया और उनके चाचा के अंदर)
१६०जाम हालोजि सवंत १३०१-१३३१)
(इनके नाम से कुछ का कुछ प्रदेश हलार जाना जाता ह उनके वंसज जाम रावल ने भी हलार बसाया काठियावाड़ में)
१६१ जाम रायघन२ से 
१७०.जाम श्री रावल जाम सवंत(१५६१-१६१८)
(यादवकुल नरेश अजेय राजा नवानगर(जाम नगर)बसाया और काफी युद्ध लड़े और काठियावाड़ में अपनी सता जमायी मिठोय का महान युद्ध जित काठियावाड़ के सभी राजा ओ को हराया अश्व के दातार छोटे भाई हरध्रोल जी से ध्रोल राज्य की साखा चली )
१७१.जाम श्री विभाजी सवंत (१६१८-१६२५)
( ,तमाचन का युद्ध ,बादसाह खुर्रम क साथ का युद्ध ,जूनागढ़ नवाब को हराना महान राजवी जाम सत्रसल को गद्दी और दूसरे बेटे भानजी को कलावड दिया और उनसे खरेदी और वीरपुर का राजवंश चला )
१७२ जाम श्री सत्रासाल उर्फ सत्ता जी सवंत (१६२५-१६६४)
(भूचर मोरी का युद्ध सौराष्ट्र के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध सरना गत रक्षा के लिए राजपूत धर्म का उदाहरन जामनगर में १४०००मंदिर निर्माण छोटी कशी बनाया जाम जैसाजी को गद्दी बाकि से राजकोट गोंडल का का राजवंश चला )
===========जडेजा दरबार (राजपूतों) क्षत्रियों का इतिहास==================

जडेजा राजवंश गुजरात के कच्छ व सौराष्ट्र के इलाके में राज करने वाला एक झुझारू राजवंश है। जडेजा राजवंश की उत्पत्ति चंद्रवंशी क्षत्रिये हैं व इनकी उत्पत्ति यदुकुल से मानी जाती है। जडेजा चुडासमा भाटी जादौन चारो कुल यदुवंश की अलग अलग शाखाये है जो भिन्न भिन्न समय पर यदुवंश से निकली है। जडेजा वंश गुजरात का सबसे बड़ा राजपूत वंश माना जाता है। जडेजा राजपूतों के सौराष्ट्र में लगभग 700 गाँव बेस हुए है और लगभग २३०० गाँवो पर आजादी के समय इनका शाशन रहा है।गुजरात में ऐसी मान्यता है के जिन गांवों में ठाकुर जी श्री कृष्ण का मंदिर नहीं है वहां लोग सुबह उठकर किसी जडेजा के पाँव छूकर आशीर्वाद प्राप्त कर सकते है।गुजरात हाई कोर्ट भी जडेजाओ की कृष्णा जी के वंशज होने की बात प्रमाणित करता है कुछ समय पहले हुए एक केस में कोर्ट ने जाम नरेश को प्रद्युम्न जी का वारिस मानते हुए संपत्ति पर हक़ का अधिकार दिया।

================भूचर मोरी व नवानगर के प्रसिद्द युद्ध==========================


महाभारत काल के बाद इतिहास के दो सबसे बड़े युद्ध भी जडेजा वंश के नेतृत्व में लड़े गए। भूचर मोरी और नवानगर के युद्ध में जडेजा वीरों ने डट कर विदेशिओं का मुकाबला किया। ये युद्ध क्षत्रियो की वीरता व रण कौशल का उत्तम उद्धारण है जो कभी भुलाये नहीं जाने चाहिए। इन दोनों युद्धों के बारे में संछिप्त में अगली पोस्ट में विवरण दिया जायेगा।

============जडेजा शाषित पूर्व राज्य व ठिकाने=======================

1.भुज(९२३ गांव) १९ बंदूको की सलामी
२.मोरवी(१४१ गांव) ११ बंदूको की सलामी तालूका-१
मालिया(२४ गांव ) (मोरवी के द्वारा) सज्जनपुर (७गांव ) मोरवी द्वारा
जागीर - रोहा ,कोठारिया, लाकडीया, विजांन,,मानजल,तेरा आदि मिलाकर १९ जागीर....
नावानगर (हालार) शासित राज्य
१. नावानगर (७४१ गांव) १५ बंदूको की सलामी
२. ध्रोल(७१ गांव) ११ बंदूको की सलामी
३. राजकोट ( ६४ गांव) ९ बंदूको की सलामी
४. गोंडला (१२७ गांव ) ११ बंदूको की सलामी राजकोट द्वारा
५. खरेडी वीरपुर(१३ गांव) नावानगर के द्वारा
६. कोटडा सांगानी(२० गांव) गोंडला के द्वारा
७. खिरासारा(१२ गांव ) ध्रोल द्वारा
८. जालीया देवानी(१०. गांव ) ध्रोल द्वारा
__________________तालूका_____________________________
१. गढका (७ गांव ) राजकोट द्वारा
२.गवरीदड(५ गांव) राजकोट द्वारा
३.पाल (५गांव ) राजकोट द्वारा
४.शापर(४गांव) राजकोट द्वारा
५.लोधिका सीनियर(५गांव) राजकोट द्वारा
६.लोधिका जूनियर (५गांव) राजकोट द्वारा
७.कोठारिया(१०गांव ) राजकोट द्वारा
८.मेंगनी(८गांव) गोंडला द्वारा
९.भाडवा(४गांव) गोंडला द्वारा
१०.राजपरा(९गाँव)गोंडल द्वारा
तालूकदारी(शेयरहोल्डर)
१. ध्र्रफा(२५गांव) ९ तालूकदार से ज्यादा
२.सतोदड वावडी(६गांव)
३.देरी मूलैला(५गांव)
४.शीशाग चाँदली (४ गांव) आदी
कूछ ३३ गाँव पालनपुर के अन्दर

==============जडेजा राजपूतों की वंशावली व संछिप्त इतिहास================

१.राजा चंद्र (त्रेता युग के तीसरे चरण मे प्रथ्वी पर कोई अच्छे राजा ना होने से इन्द्र की सूचना से चन्द्र ने अवतार लिया जिससे चन्द्रवंश चला|
२.बुद्ध ( चन्द्र के ब्रहस्पति कन्य तारा की कोख से जन्म लिया , बुद्ध ने श्राद्धदेव मुनि की बेटी इला से विवाह कर पुरूरवा नामक पराक्रमी पुत्र हुआ)
३.पुरूरवा(इनकी राजधानी प्रयाग थी इनके गुणगान एक बार नारद ने इन्द्र सभा मे कहे जिसको सुनकर उर्वशी ने प्रथ्वी पर आकर पुरूराव से शादी की ,जिसके अयु ,सत्यायु ,ऱाय, विजय वगैरा ७ पुत्र हुए)
४.अयु(नरूहुस ,क्षत्रावुध ,राजी राम्भ,अनीना नाम के पुत्र हुए )
५.नुहुस(जिसने १०० बार अश्वमेघ यज्ञ किया था)
६. ययाति(६ भाईयो मे सबसे बडे जिसने शुक्राचार्य की बेटी देवयानी जो कि ब्राहम्ण कन्या थी उससे हुई ,देवयानी को श्राप था के वो ब्रहामण नही रहेगी जिसके दो पुत्र हुए यदु और तुरवुश और दूसरी बीवी सरमिशठा से ३ पुत्र हुए जिसमे एक पुरूराव जिसकी ४१ वी पीढी पर राजा युधिष्टर हुए)
७. यदु (इन राजा के कुल मे जो राजा हुए वो यदुवंशी कहलाए)
८.कोष्ठा
९.वराजीनवन
१०.स्वाही
११.रूसीकू
१२.चित्रार्थ
१३.शसबिन्धू
१४. प्रथूुसवा
१५.धर्म
१६.उस्ना
१७.रूचक
१८.जयामेघ
१९.विरालभ
२०.कराथ
२१.करून्ती
२२.धरूस्टी
२३.निवरित
२४.दरसाहा
२५.व्योम
२६.जीतूमाक
२७.विरकुट
२८.भीमराथ
२९.नावरथ
३०.दसूरथ
३१.साकून
३२.कुरांभी
३३.देवराता
३४.देवक्षत्रा
३५.मोधू
३६.कुरू
३७.अनु
३८.पुरहोत्रा
३९.अयु
४०.सातवन(इनके ७ पुत्र थे जिसमे वृष्णि गद्दी पर बैठे)
४१.वृष्णि(४ बार प्रथ्वी के सभी राजाओ को हराया, जिन्होने वेद धर्म फैलाया, उनके नाम से कुछ यादव वरूशनीक गौत्र के कहलाए)
४२. सुमित्र
४३.शईनी
४४.अनामित्र
४५.वरूशनीक
४६.चित्राराथ
४७.विदूरथ
४८.सुर
४९.भजनाम
५०.शईनी
५१.स्वायंभोज
५२.हरिदिक
५३.देवमिथ
५४.सुरसेन(जिनकी एक बेटी को राजा कुंतीभोज ने पाला जिसका नाम कुंती था .
५५.(१४ रानी जिसमे ७ मथुरा के कंस की बहन )
५६.श्री क्रष्ण
५६.श्री क्रष्ण (भगवान विष्णु के अवतार ,पटरानी मे से सबसे बडे रूकमणी जी उसके पाटवी कवंर प्रद्युमना.
५७.प्रद्युमना
५८.अनिरूध(मिश्र के सोनितपुर के राजा बाणासुर की बेटी ओखा का हरण कर शादी की थी उस बाणासुर के श्रीक्रष्ण जी ने दोनो हाथ काट डाले थे )
यादवंशथली मे जम्बुवती के पुत्र साम्ब जो खूबसूरत होने से स्त्री के परिधान पहनकर यादवकुमारो ने दुर्वासा ऋषि के पास ले जाकर प्रश्न किया की' इसको पुत्र होगा क्या?',तप भंग होने से ऋषि ने श्राप दिया के इसके जिसका जन्म होगा वो यादवकुल का नाश करेगा फिर कुछ समय बाद यादव अंदर ही अंदर लडकर मर गए श्रीक्रष्ण ने भी भौतिक शरीर त्यागा , उससे पहले श्रीक्रष्ण ने अपने सारथी दारूक और शखा उद्धवजी को बुलाकर कहा था कि उसके स्वधाम जाने के बाद द्वारिका ७दिन मे डूब जाएगी उनके महल के अलवा इसलिए सभी अर्जुन के साथ मेरे परिवार को लेकर इन्द्रप्रस्थ जाए और व्रजनाभ का राज्यभिषेक करे जब अर्जुन के साथ बचे यादवो और क्षत्रीयानि को काबा और अहीरो ने लूटा अनिरूध के पाटवी कवंर व्रजनाभ को इन्द्रप्रस्थ लाकर राज्यभिषेक किया , बाणासुर के अवसान के बाद उसका पुत्र सागीर उम्र मे म्रत्यु होने से सोनितपुर की गद्दी व्रजनाभ को मिली वो सपरिवार विक्रम संवत पूर्व २२७२ को मिश्र मे राजधानी हुई
५९. वरजनभ
६०.प्रतिवाह
६१. शुभ से ११३
११३. लक्ष्यराज (इस राजा से विकेरम संवत शुरू हुआ )
११४.प्रताप जी
११५.गर्वगोड (इजिप्त के सोनीतपुर और आसपास के देशो मे राज ३२०० सालो तक राज टिसा रहा और रोमन ने जीत लि ा इन्होने गद्दी काबुल मे बनाई इजिप्त छोडा)
११६.भानजी से
१३४.देवीसिंह
१३५.सुरसेन जी (यवनो ने काबुल जीत लियाइन्होने वापस यवनो से काबुल जीता और सता सिंध मे लाहौरी तक बढाई
१३६.विक्रमसेन (वापस मिश्र जीत गद्दी वहां लगाई)
१३७.राजा देवेन्द्र (मिश्र मे गद्दी , नबी मुहम्मद ने दुनिया मे इस्लाम फैलाया हमले किये इनकी म्रत्यु के बाद सोनितपुर भी जीत लिया

==============राजा देवेन्द्र के बाद युवराज=============================
* अ्सपत-
(मिश्र की गद्दी पर बैठे उनको मुहम्मद जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाया जिसका कुल वाकर के अनुसार उनके वंशज चागडा मुगल कहलाए जिसके वंश मे अकबर हुआ --कुछ इतिहासकार दंतकथा कहते है कि माता हिंगलाज ने ४ को छुपा दिया और एक अस्पत को सौंपा , जिसको मुह(जड) मे छुपाया वो जडेजा कहलाए ,चुड मे छुपाया वो चुडसमा कहलाए ,भाथी मे छुपाया वो भाटी कहलाए .)
*गजपत.
(विक्रम संवत ७०८ के वैशख शुद्ध तेज को शनिवार रोहिणी नक्षत्र मे गजनी शहर बसाया और किला बनवाया और अपने बडे भाई नरपत जी को गद्दी पर बैठाया और खुद हिन्द सौराष्ट्र की तरफ मैत्रा मां के भक्त थे इसलिए यहां आ बसे जिनके वंशज रा कहलाए बाद मे चुडासमा सरवैया और रायजादा कहलाए जूनागढ मे इन्होने ७०० साल राज किया)
*भूपत
(गजनी और खुरासन के प्रदेश के बीच भूपत ने राज्य चलाया,बाद मे पंजाब और सिंध मे राज्य किया ,केहूद रावल ने देवराजगढ बंधवाया, देवराज रावल के बादमे ६ थी पीढी पर जैसल जी हुए उन्होने जैसलमेर मे राजधानी बनवाई )
१३८.जाम नरपत संवत ६८३ से ७०१ (बादशाह फिरोजखान को हराकर अपने पुरखो की गद्दी जीत अफगान मे खुदकी सत्ता जमाई)
१३९.जाम सामत(समा) संवत(७०१-५८)फिरोज खान के शहजादे ने तुर्किस्तान से मुस्लिम राजाओ का सहारा लेकर गजनी पर जीत ली सामत अय्याशी थे तो युद्ध की तैयारी ना पाए और थोडे लास्कर के साथ लाहौरी मे गद्दी डाली और सिंध मे राज बढाया जिनके वंशज सिंध मे सामा कहलाए)
१४०.जाम जेहो संवत ७५७ से ८३१ (खलीफा उमर से लडाई हुई और जीते )
१४१. जाम नेतो संवत(८३१ से ८५५) खलीफा वालिफ ने सिंध पर हमला कर अपनी सत्ता जमाई , सब राजाओ ने लगान दी ,जाम नेता ने नही दी
१४२. जाम नोतीयार संवत(८६६-८७०) इरानी बादशाह ममुरासिद चित्तौड से हारकर वापस आ रहा था उनको लूटा और बंदी बनाया)
१४३. जाम गहगिर (ओधर)संवत ८७०-८८१ (रोमन के साथ व्यापार संबंध बढाये )
१४४. जाम ओथो संवत(८८१-८९८ ( कश्मीर के राजा जयपीड की बेटी की शादी अपने बेटे के साथ हुई थी)
१४५. जाम राहु संवत(८९८-९१८) कन्नौज के राजा माहिरभोज और अनंग पिड कश्मीर के साथ रिश्ते बढाए)
१४६. जाम ओढार संवत(९३१-४२) (काबुल,कंदहार, पेशावार मे फैले हिन्दू राजाओ को संघठित कर मुस्लिम को रोका था)
१४८. जाम लखियार भड संवत(९४२-९५६) (नग्गर सैमे बसाया और वहां राजगद्दी बनायी जो हाल नगरठाठे के नाम से पहचाना जाता है
१४९. जाम लाखो धूरारो संवत(९५७-९८६) अपने दोनो पैर से घोडे को झूलाते थे काफी बलवान राजा थे , पतगढ के राजा वीरम चावडा की बेटी से ४ पुत्र हुए मोड वैराया, संध और ओथो और खैरागढ के राजा सूर्य सिंह उफर श्रवण की बेटी चन्द्रकुवंर से उन्नड , जीहो , फुल और मानाई )
जाम उन्नड सिंध की गदी पर आये और मोड़ अपने मामा की गदी पटगढ़ छीन ली और उनके वंश कच्छ में (जिन्होने केरा कोट का अजोड़ किल्ला बन्धवाया)चला जिसके वंश में जाम लाखो पुलाणि हुवे जो आज भी पुरे गुजरात में सु प्रशिद्ध हे जो अटकोट में भीमदेव सोलंकी के सामने युद्ध में काम आये इनको पुत्र न होने से उनका भतीजा जाम पुनवरो गद्दी पर आया जिसने पदरगढ़ का कछ कला का विसाल किल्ला बनवाया )
१५०• जाम उन्नड सवंत (९८५ -९९१)
(महान दानेस्वरि ,अभि किसी राजा को कवी उपमा देते हे तो 'उन्नड के अवतार' के नाम से देते हे)
१५१.जाम समेत उर्फ़ समो सवंत (९९१-१०४१)
(जाम उन्नड के बाद नगर सैम पर जाम समो ने राज किया बादसाह नसरुदीन को हराया और पंजाब की तरफ खदेड़ा)
१५२.जाम काकू सवंत(१०४१-१०६२)
(धर्मसालि राजा थे रामेश्वर की यात्रा ५ बार की और राज्य को मजबूत किया)
१५३ जाम रायघन सवंत(१०६२-१०९२)
(तुर्की वंस में महमद गिजनी हुवा जिसने हिन्द पर १७ बार हमला किया जिसने सोमनाथ मंदिर तोडा और मंदिर का कुछ हिसा मकामदीना में और कुछ अपनी कचेरी में लगवाया मंदिर तोड़ कर लौटते वख्त राय घन जी ने जलाशयो में जहर डलवाया जिससे उसका काफी सैन्य मरा)
१५४.जाम प्रताप उर्फ पली सवंत(१०९२-१११२)
(पंजाव के राजा अनंगपल को मदद की थी १०६४ में उनके साथ उज्जैन ग्वालियर कनोज अजमेर के राजा भी मदद् को आये थे)
१५५.जाम संधभड़ सवंत(११२-११८२)
(दो पुत्र हुवे जाम जाड़ो और वेरजि)
१५६ जाम जाड़ो सवंत(११८२-१२०३)
(इनके वंसज जडेजा कहलाये इनको पुत्र न होंने से अपने भतीजे को गदी पर बिठाया बादमे उनको पुत्र हुवा जिसका नाम धयोजि था)
जाम लाखो जडेजा सवंत (१२०३-१२३१)
(धायोजी का पक्ष ज्यादा मजबूत होने से और जगडा होने से जाम लाखों अपने भाई क साथ कछ की और आ बसे और अलग अलग राजा ओ को हराकर कछ में सत्ता जमायी उधर सिंध में धयोजी निर्वंश गुजर गए)
१५८•जाम रायघनजी सावंत(१२३१-१२७१)
(इनके समय में जत काफी बलवान थे कन्नौज के राजा जयचंद ने संयोगिता का स्वमवर रखा था जिसमे जाम रायघन भी गये थे ये हिंदुस्तान का आखरी राजसूय यग्न था इन्होंने पृथ्वीराज को ५ हजार का सैन्य मदद को भेजा था और अपने एक पुत्र होथीजी को भी इनके ४ पुत्र हुवे जाम गजनजी(बारा की जागीर दी),देदोजी( कंथकोट अंजार वागड़ वगेरा दिया)होथीजी(गजोड़ की जागीर दी)और आठो जी(जिनसे कछ भुज की साख चली और राज इनको दिया)..बड़े को गदी न देने से ये जगडा १२ पीढ़ी तक चला
१५९ जाम गजनजी सवंत( १२७१-१३०१)
बारा की गद्दी पर राज किया और उनके चाचा के अंदर)
१६०जाम हालोजि सवंत १३०१-१३३१)
(इनके नाम से कुछ का कुछ प्रदेश हलार जाना जाता ह उनके वंसज जाम रावल ने भी हलार बसाया काठियावाड़ में)
१६१ जाम रायघन२ से
१७०.जाम श्री रावल जाम सवंत(१५६१-१६१८)
(यादवकुल नरेश अजेय राजा नवानगर(जाम नगर)बसाया और काफी युद्ध लड़े और काठियावाड़ में अपनी सता जमायी मिठोय का महान युद्ध जित काठियावाड़ के सभी राजा ओ को हराया अश्व के दातार छोटे भाई हरध्रोल जी से ध्रोल राज्य की साखा चली )
१७१.जाम श्री विभाजी सवंत (१६१८-१६२५)
( ,तमाचन का युद्ध ,बादसाह खुर्रम क साथ का युद्ध ,जूनागढ़ नवाब को हराना महान राजवी जाम सत्रसल को गद्दी और दूसरे बेटे भानजी को कलावड दिया और उनसे खरेदी और वीरपुर का राजवंश चला )
१७२ जाम श्री सत्रासाल उर्फ सत्ता जी सवंत (१६२५-१६६४)
(भूचर मोरी का युद्ध सौराष्ट्र के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध सरना गत रक्षा के लिए राजपूत धर्म का उदाहरन जामनगर में १४०००मंदिर निर्माण छोटी कशी बनाया जाम जैसाजी को गद्दी बाकि से राजकोट गोंडल का का राजवंश चला

राजमाता वीरांगना जिया रानी

इतिहास के भूले बिसरे पन्नों से रानी कत्युरी की कहानी----- जरुर पढ़ें और शेयर करें
Photo: कुमायूं (उतराखण्ड) के कत्युरी राजवंश की वीर राजमाता वीरांगना जिया रानी(मौला देवी पुंडीर)----------
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जय राजपुताना----------
मित्रों इतिहास में कुछ ऐसे अनछुए व्यक्तित्व होते हैं जिनके बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते मगर एक क्षेत्र विशेष में उनकी बड़ी मान्यता होती है और वे लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं,
आज हम आपको एक ऐसी ही वीरांगना से परिचित कराएँगे जिनकी कुलदेवी के रूप में आज तक उतराखंड में पूजा की जाती है.
उस वीरांगना का नाम है राजमाता जिया रानी(मौला देवी पुंडीर) जिन्हें कुमायूं की रानी लक्ष्मीबाई कहा जाता है ----------------
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जिया रानी(मौला देवी पुंडीर) jiya rani pundir-------
जिया रानी का बचपन का नाम मौला देवी था,वो हरिद्वार(मायापुर) के राजा अमरदेव पुंडीर की पुत्री थी,ईस्वी 1192 में देश में तुर्कों का शासन स्थापित हो गया था,मगर उसके बाद भी किसी तरह दो शताब्दी तक हरिद्वार में पुंडीर राज्य बना रहा,मगर तुर्कों के हमले लगातार जारी रहे और न सिर्फ हरिद्वार बल्कि गढ़वाल और कुमायूं में भी तुर्कों के हमले होने लगे,ऐसे ही एक हमले में कुमायूं (पिथौरागढ़) के कत्युरी राजा प्रीतम देव ने हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की सहायता के लिए अपने भतीजे ब्रह्मदेव को सेना के साथ सहायता के लिए भेजा,ज्सिके बाद राजा अमरदेव पुंडीर ने अपनी पुत्री मौला देवी का विवाह कुमायूं के कत्युरी राजवंश के राजा प्रीतमदेव उर्फ़ पृथ्वीपाल से कर दिया,मौला देवी प्रीतमपाल की दूसरी रानी थी,उनके धामदेव,दुला,ब्रह्मदेव पुत्र हुए जिनमे ब्रह्मदेव को कुछ लोग प्रीतम देव की पहली पत्नी से मानते हैं,मौला देवी को राजमाता का दर्जा मिला और उस क्षेत्र में माता को जिया कहा जाता था इस लिए उनका नाम जिया रानी पड़ गया,कुछ समय बाद जिया रानी की प्रीतम देव से अनबन हो गयी और वो अपने पुत्र के साथ गोलाघाट चली गयी जहां उन्होंने एक खूबसूरत रानी बाग़ बनवाया,यहाँ जिया रानी 12 साल तक रही.........
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तैमुर का हमला-------------
ईस्वी 1398 में मध्य एशिया के हमलावर तैमुर ने भारत पर हमला किया और दिल्ली मेरठ को रौंदता हुआ वो हरिद्वार पहुंचा जहाँ उस समय वत्सराजदेव पुंडीर(vatsraj deo pundir) शासन कर रहे थे,उन्होंने वीरता से तैमुर का सामना किया मगर शत्रु सेना की विशाल संख्या के आगे उन्हें हार का सामना करना पड़ा,पुरे हरिद्वार में भयानक नरसंहार हुआ,जबरन धर्मपरिवर्तन हुआ और राजपरिवार को भी उतराखण्ड के नकौट क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी वहां उनके वंशज आज भी रहते हैं और मखलोगा पुंडीर के नाम से जाने जाते हैं,
तैमूर ने एक टुकड़ी आगे पहाड़ी राज्यों पर भी हमला करने भेजी,जब ये सूचना जिया रानी को मिली तो उन्होंने इसका सामना करने के लिए कुमायूं के राजपूतो की एक बड़ी सेना का गठन किया,तैमूर की सेना और जिया रानी के बीच रानीबाग़ क्षेत्र में युद्ध हुआ जिसमे मुस्लिम सेना की हार हुई,इस विजय के बाद जिया रानी के सैनिक कुछ निश्चिन्त हो गये,पर वहां दूसरी अतिरिक्त मुस्लिम सेना आ पहुंची जिससे जिया रानी की सेना की हार हुई,और सतीत्व की रक्षा के लिए एक गुफा में जाकर छिप गयी,
जब प्रीतम देव को इस हमले की सूचना मिली तो वो स्वयं सेना लेकर आये और मुस्लिम हमलावरों को मार भगाया,इसके बाद में वो जिया रानी को पिथौरागढ़ ले आये,प्रीतमदेव की मृत्यु के बाद मौला देवी ने बेटे धामदेव के संरक्षक के रूप में शासन भी किया था।वो स्वयं शासन के निर्णय लेती थी। माना जाता है कि राजमाता होने के चलते उसे जियारानी भी कहा जाता है। मां के लिए जिया शब्द का प्रयोग किया जाता था। रानीबाग में जियारानी की गुफा नाम से आज भी प्रचलित है। कत्यूरी वंशज प्रतिवर्ष उनकी स्मृति में यहां पहुंचते हैं।

यहाँ जिया रानी की गुफा के बारे में एक और किवदंती प्रचलित है---------------

"कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल उर्फ़ प्रीतम देव की पत्नी रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही मुस्लिम सेना ने घेरा डाल दिया। रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थी।उसने अपने ईष्ट का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। मुस्लिम सेना ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे कहीं नहीं मिली। कहते हैं, उन्होंने अपने आपको अपने घाघरे में छिपा लिया था। वे उस घाघरे के आकार में ही शिला बन गई थीं। गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं - मानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था। यहीं उसने अपना बाग लगाया था और यहीं उसने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। वह सदा के लिए चली गई परन्तु उसने अपने सतीत्व की रक्षा की। तब से उस रानी की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है।कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम स्थित रानीबाग में जियारानी की गुफा का ऐतिहासिक महत्व है"""

कुमायूं के राजपूत आज भी वीरांगना जिया रानी पर बहुत गर्व करते हैं,
उनकी याद में दूर-दूर बसे उनके वंशज (कत्यूरी) प्रतिवर्ष यहां आते हैं। पूजा-अर्चना करते हैं। कड़ाके की ठंड में भी पूरी रात भक्तिमय रहता है।
महान वीरांगना सतीत्व की प्रतीक पुंडीर वंश की बेटी और कत्युरी वंश की राजमाता जिया रानी को शत शत नमन.....
जय राजपूताना..................
कुमायूं (उतराखण्ड) के कत्युरी राजवंश की वीर राजमाता वीरांगना जिया रानी(मौला देवी पुंडीर)----------
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जय राजपुताना----------
मित्रों इतिहास में कुछ ऐसे अनछुए व्यक्तित्व होते हैं जिनके बारे 
में ज्यादा लोग नहीं जानते मगर एक क्षेत्र विशेष में उनकी बड़ी मान्यता होती है और वे लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं,
आज हम आपको एक ऐसी ही वीरांगना से परिचित कराएँगे जिनकी कुलदेवी के रूप में आज तक उतराखंड में पूजा की जाती है.
उस वीरांगना का नाम है राजमाता जिया रानी(मौला देवी पुंडीर) जिन्हें कुमायूं की रानी लक्ष्मीबाई कहा जाता है

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जिया रानी(मौला देवी पुंडीर) jiya rani pundir-------
जिया रानी का बचपन का नाम मौला देवी था,वो हरिद्वार(मायापुर) के राजा अमरदेव पुंडीर की पुत्री थी,ईस्वी 1192 में देश में तुर्कों का शासन स्थापित हो गया था,मगर उसके बाद भी किसी तरह दो शताब्दी तक हरिद्वार में पुंडीर राज्य बना रहा,मगर तुर्कों के हमले लगातार जारी रहे और न सिर्फ हरिद्वार बल्कि गढ़वाल और कुमायूं में भी तुर्कों के हमले होने लगे,ऐसे ही एक हमले में कुमायूं (पिथौरागढ़) के कत्युरी राजा प्रीतम देव ने हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की सहायता के लिए अपने भतीजे ब्रह्मदेव को सेना के साथ सहायता के लिए भेजा,ज्सिके बाद राजा अमरदेव पुंडीर ने अपनी पुत्री मौला देवी का विवाह कुमायूं के कत्युरी राजवंश के राजा प्रीतमदेव उर्फ़ पृथ्वीपाल से कर दिया,मौला देवी प्रीतमपाल की दूसरी रानी थी,उनके धामदेव,दुला,ब्रह्मदेव पुत्र हुए जिनमे ब्रह्मदेव को कुछ लोग प्रीतम देव की पहली पत्नी से मानते हैं,मौला देवी को राजमाता का दर्जा मिला और उस क्षेत्र में माता को जिया कहा जाता था इस लिए उनका नाम जिया रानी पड़ गया,कुछ समय बाद जिया रानी की प्रीतम देव से अनबन हो गयी और वो अपने पुत्र के साथ गोलाघाट चली गयी जहां उन्होंने एक खूबसूरत रानी बाग़ बनवाया,यहाँ जिया रानी 12 साल तक रही.........
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तैमुर का हमला-------------
ईस्वी 1398 में मध्य एशिया के हमलावर तैमुर ने भारत पर हमला किया और दिल्ली मेरठ को रौंदता हुआ वो हरिद्वार पहुंचा जहाँ उस समय वत्सराजदेव पुंडीर(vatsraj deo pundir) शासन कर रहे थे,उन्होंने वीरता से तैमुर का सामना किया मगर शत्रु सेना की विशाल संख्या के आगे उन्हें हार का सामना करना पड़ा,पुरे हरिद्वार में भयानक नरसंहार हुआ,जबरन धर्मपरिवर्तन हुआ और राजपरिवार को भी उतराखण्ड के नकौट क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी वहां उनके वंशज आज भी रहते हैं और मखलोगा पुंडीर के नाम से जाने जाते हैं,
तैमूर ने एक टुकड़ी आगे पहाड़ी राज्यों पर भी हमला करने भेजी,जब ये सूचना जिया रानी को मिली तो उन्होंने इसका सामना करने के लिए कुमायूं के राजपूतो की एक बड़ी सेना का गठन किया,तैमूर की सेना और जिया रानी के बीच रानीबाग़ क्षेत्र में युद्ध हुआ जिसमे मुस्लिम सेना की हार हुई,इस विजय के बाद जिया रानी के सैनिक कुछ निश्चिन्त हो गये,पर वहां दूसरी अतिरिक्त मुस्लिम सेना आ पहुंची जिससे जिया रानी की सेना की हार हुई,और सतीत्व की रक्षा के लिए एक गुफा में जाकर छिप गयी,
जब प्रीतम देव को इस हमले की सूचना मिली तो वो स्वयं सेना लेकर आये और मुस्लिम हमलावरों को मार भगाया,इसके बाद में वो जिया रानी को पिथौरागढ़ ले आये,प्रीतमदेव की मृत्यु के बाद मौला देवी ने बेटे धामदेव के संरक्षक के रूप में शासन भी किया था।वो स्वयं शासन के निर्णय लेती थी। माना जाता है कि राजमाता होने के चलते उसे जियारानी भी कहा जाता है। मां के लिए जिया शब्द का प्रयोग किया जाता था। रानीबाग में जियारानी की गुफा नाम से आज भी प्रचलित है। कत्यूरी वंशज प्रतिवर्ष उनकी स्मृति में यहां पहुंचते हैं।

यहाँ जिया रानी की गुफा के बारे में एक और किवदंती प्रचलित है---------------

"कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल उर्फ़ प्रीतम देव की पत्नी रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही मुस्लिम सेना ने घेरा डाल दिया। रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थी।उसने अपने ईष्ट का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। मुस्लिम सेना ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे कहीं नहीं मिली। कहते हैं, उन्होंने अपने आपको अपने घाघरे में छिपा लिया था। वे उस घाघरे के आकार में ही शिला बन गई थीं। गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं - मानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था। यहीं उसने अपना बाग लगाया था और यहीं उसने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। वह सदा के लिए चली गई परन्तु उसने अपने सतीत्व की रक्षा की। तब से उस रानी की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है।कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम स्थित रानीबाग में जियारानी की गुफा का ऐतिहासिक महत्व है"""

कुमायूं के राजपूत आज भी वीरांगना जिया रानी पर बहुत गर्व करते हैं,
उनकी याद में दूर-दूर बसे उनके वंशज (कत्यूरी) प्रतिवर्ष यहां आते हैं। पूजा-अर्चना करते हैं। कड़ाके की ठंड में भी पूरी रात भक्तिमय रहता है।
महान वीरांगना सतीत्व की प्रतीक पुंडीर वंश की बेटी और कत्युरी वंश की राजमाता जिया रानी को शत शत नमन.....
जय राजपूताना

JAM RAWAL-RAJPUT KING ESTABLISHED JAMNAGAR

======= Battle of Mithoi ==========
Jam Rawal captured Majority of area Of Saurashtra by defeating all kings
af that area and the great kingdomNawanagarwas established, the
capital city was called Jamnagar, which is still a promonent city of
Saurashtra. Jamnagar was founded by Jam Rawal on 7th day of shrawan
mounth of first quarter of v.s. 1596. The Jam Rawalwas never defeated
in his life in any battle. In v.s.1606, Jam Rawal defeatedcombined forces
of all kings of Saurashtra and Gujrat, even Sultan of Ahmedabad
supported opposition by giving 140 guns, which Jam Rawal did not
possess. Even ThenJam Rawal defeated all in great battle of “Mithoi”, the
site near present day refinery of reliance. In thatBattle the younger brother
of Jam Rawal: Hardholji became Martyr. It was the great battle; “MITHOI
BATTLE”. The combined forcesof all kings of saurashtra and Gujrat with
support of sultan of Ahmedabad, was about 2,50,000 in numbers and
army of Jam Rawal was about 1,50,000. Combined forces had 140 big
guns (Cannons), none in possession of Jam Rawal's army. There was a
meeting of ‘think tank’ of Jam Rawal’s army before battle started, in

which it was decided that we can only win the battle if we can neutralise
the power ofcannons if a particular screw is fitted at specific site of the
cannon, a cannon cannot fire. So a huge meeting of all armymen of Jam
Rawal's army was called, in which a ‘Beedu’ was circulated in which it
was declared "Is there any brave Rajput who can fit a screw in all the 140
big guns of combined enemy forces, That brave Rajput will be
awardedwith 12 villages", according to the principles of ‘beedu’, if
nobody accepts that challenge, then a holi brahmin-man is killed in front
of whole meeting and the ‘great sin’ of brahma-hatya applies to all the
people present in the meeting. The beedu is circulated maximally four
times, even then if no body accepts the challenge, a holy brahmin man is
killed. Nobodytook challenge till three rounds, but on the fourth
circulation, one great brave man TOGAJI SODHA took up the challeng
along with three JADEJA rajputs, and went to opposition camps in name
of strangers, eager to know about the big-guns. With great bravery,
chivalry and skills TOGAJI SODHA and his other three collegues,
rendered all the 140 big guns of enemies totally useless. In later part,
when enemies realised, there was fierce fight between soldiers of
enemies and these brave 4 persons of Army of Jam Rawal. There were
84 wounds in body of TOGAJI SODHA ,when he came back after
successfully completing the task of desarming all the 140 big guns.
TOGAJI SODHA was one of the greatest war hero of that centuryin the
world at that time, Jam Rawals army had quite few of them. There was a
great panic in the camp of combined forces once they realised that only 4
soldiers of Jam Rawal's army destroyed all of our guns, then what will
happen if all 1,50,000 soldiers come to fight us. Asa last resort, a huge
meeting ofall 2,50,000 soldiers of combined forceswas called and acting
in same way as Jam Rawal’s strategy, they also circulated a ‘beedu’, that
'Is there any brave person in our clan who canbring the severed head of
Jam Rawal?' A soldier named Karsanji took up the challenge. Karsanji
went by putting a white flag on his ‘bhalo’ (spear). A white cloth

suggests that ‘we want to surrender!’, so he was allowed to go to
deepest part of army camp of Jam Rawal. Karsanji insisted that he will
personally hand over the message to Jam Rawal only, not to anyone else.
HARDHOLJI, younger brother of Jam Rawal, and also commander of Jam
Rawal’s army, told Karsanji that he was Jam Rawal, give me ur message.
Karsanji thoght he was Jam Rawal, and immediately took his spear and
stuck a blow on Hardholji and he was severely hurt and later died and
became martyr. Jam Rawal was very furious and ordered to kill Karsanji,
but by that time Karsanji ran very very fast on his horse and went out of
army camp. There was a young boy of 16 years name Meramanji Hala (a
sub-branch of jadejarajputs) was busy bathing his horse in river
‘SINHAN’, name of his horse was “Patti”, a female horse. He heard the
noise and saw a person running away and hundreds of people shouting
and running after him. He soon realised and immediately took his horse
and ran after enemy soldier Karsanji. There was a great race and still
some good distance was there between him and enemy. In between
came river-pit some 50 feet wide, MERAMANJI asked his horse ‘patti’,
that ‘this is the time of test of bravery for Hala clan of Jadeja,and it is in
ur hand’. Patti jumped 50 feet river-pit and Meramanji Hala jadeja stood
up on horse and threw his spear on Karsanji. The spear of Karsanji
pierced through Karsanji's heart, his horse and wentdeep into the soil.
This was the force of one of the greatest warroirs of the century
Meramanji Hala Jadeja. Then thousands of soldiers and Jam Rawal
came and saw the bravery, chivalry of Meramanji. Jam Rawal was never
a poet, but after seeing this great bravery, there were spontaneous words
from mouth of Jam Rawal ”HALAJI TARA HATH VAKHANU KE PATTI
TARA PAGALA VAKHANU” (What to praise? Whether I should praise the
hands of Meramanji Halaji or the legs of Patti horse! I am confused), and
these words became the words of great bravery song of Gujrati
Language, inspiring lacs and crores of people since centuries to fight for
the Nation.
============ मिठोई का युद्ध ===================
चंद्रवंशी जडेजा राजवंश में जाम रावल नाम के महान अजेय शासक हुए,जिन्होंने अपने जीवन काल में कभी एक युद्ध भी नही हारा और पूरे सौराष्ट्र के राजाओ को हरा कर नवानगर राज्य स्थापित किया।नवानगर
राज्य की राजधानी जिससे आज जामनगर कहा जाता है, जाम रावल ने इस शहर की स्थापना विक्रमी सम्वत 1596 में श्रावण मॉस के 7 वे दिन की।
विक्रमी संवत 1606 में जाम रावल ने अपने जीवन काल का सबसे बड़ा युद्ध लड़ा जिससे मिठोई का महान युद्ध भी कहा जाता है। इस युद्ध में जाम रावल के विरुद्ध समस्त सौराष्ट्र एवं गुजरात की सेनाए लड़ी थी। जिसमे
वाला जेठवा वढेर चौहान परमार झाला वाघेला गोहिल काठी जूनागढ़ के मुस्लिम सुल्तान अपने अपने सैन्य के साथ जुड़े और मिठोई तक आकर पड़ाव डाला. अहमदाबाद के सुल्तान के द्वारा मदद के लिए140 तोप भेजने के बावजूद भी जाम रावल की सेना ने अपने तलवारों की मदद से इस युद्ध में बहादुरी से जीत हासिल की।यह युद्ध योद्धाओं के शौर्ये और बन्दूको पर तलवारो के भारी हुनर की जीत के लिए भी जाना जाता है एवं क्षत्रियों के गौरव और बहादुरी का प्रतीक है
इधर जाम रावल ने भी रिश्तेदारों भायतो को बुलाकर युद्ध की तैयारी करवाई. ध्रोल से उनके लघुबंधु ठाकोर श्री हर्ध्रोल जी भी अपनी सेना के साथ आ गये और योद्धा भी जुड़े रथ को तैयार कर माँ आशापुरा का और पितामह कृष्ण का स्मरण कर सबने सत्रु के सामने कूच
किया,दुश्मन की तोपों और भारी फ़ौज का मुकाबला करने के लिए जाम रावल ने युद्ध से पहले सलाहकारों के साथ विचार विमर्श किया।अपने सारे सामंतों को बुलाकर सलाह मशवरा किया ,वजीर नोंघंन ने सलाह दी के 3 हिस्सों में फौज को बाटकर एक को बीच मे और दो को दाये और बाये की और रखते हे जैसे ही शत्रु तोप चलाये बिचवाली टुकड़ी लेट जाये और तोप
चल जाने के बाद पीछे हटना, पीछे है जानकार वो दुबारा तोप नहीं भरेंगे और हम फायदा उठाकर हमला कर देंगे ' जाम श्री रावल जी सुनकर कहते हे की --
हु रावल जो हटु,सती तजदे पियसाधी||
होवते कलह रावल हटु,माने किम् संसार मन||
अब जीवन मरण प्रम उपरा, देवा क्रम अश्वमेघ दन||१||
अर्थात अगर मेरु पर्वत चड़ै और पृथ्वी पर सूर्य प्रकाश न दे,योगेश्वर जो योगभ्रष्ट होकर समाधी तोड़े,माँ पार्वती शंकर का साथ छोड़े तो में रावल जाम युद्ध में पीछे हटूं और फिर मै संसार में कैसे जियूं? जीवन और मृत्यु
ईश्वर के अधीन है, हम सामने जाकर अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त करेंगे.......
बहुत सोचने के बादयह परामर्श निकला गया के युद्ध तभी जीता जा सकता है जब दुश्मन की तोपों को निष्क्रिय किया जा सके। तोपों को निष्क्रिय करने के लिए तोपों में एक निश्चित जगह खूंट घुसाने के विधि सुझाई गयी जिससे तोपें चल ही ना पाए। इस कार्य को करने के लिए एक विशाल राजपूतों की सभा बुलाई गयी, इस प्रकार की सभा को उन दिनों बीड़ू कहा जाता था। बीड़ू का एक नियम था यदि सभा में मौजूद कोई क्षत्रिये बीड़ू में राखी गयी चुनौती को नहीं कबूलता तो उस दिन की सभा में एक ब्राह्मण की बलि दी जाएगी जिसकी ब्रह्मा हत्या का पाप सभा में मजूद सभी क्षत्रियो को लगेगा। बलि से पहले बीड़ू के फरमान को ४ बार
पढ़ा गया। पहले तीन बार में किसी ने तोपों में खूंट गाड़ने
की चुनौती नहीं कबूली पर चौथी बारी में तोगा जी सोढा नाम के बहादुर राजपूत ने अन्य तीन जडेजा राजपूतो के साथ चुनौती को स्वीकारा।
तोप नष्ट करने की जिम्मेवारी लिए तोगा और 3 वीर जडेजा कुमार के साथ अनजान मुसाफिर खानपान की तलास में आये ऐसा जताकर दुश्मन के खेमे में घुस गए और एक एक कर तमाम तोपचियों को मार कर सभी एक १४० तोपों को निष्क्रिय कर आए।तोगा जी सोढा अपने समय के एक महान योद्धा थे और ऐसे कई योद्धा जाम रावल के सैन्यरत्न थे।
जब दुश्मन को पता चला के केवल ४ योद्धा आ सभी तोपों व असलाह को निष्क्रिय कर गए तो संयुक्त सेना के खेमे में हड़कम्प मच गया।केवल चार योद्धाओ की इतनी बड़ी बहादुरी देख दुशमन सेना में बेचैनी व हार के अंदेशे
का डर भर गया जब उन्होंने ने सोचा के ऐसे 150000 सैनिक अभी और है जिनका उन्हें सामना करना पड़ेगा। परिणाम स्वरुप दुश्मन ने भी बीड़ू का आयोजन किया और उसमे जाम रावल के कटे सर को लाने की चुनौती सभी क्षत्रियों के सामने रखी गयी। इस कार्य की जिम्मेवारी करसनजी झाला नामक क्षत्रिये ने ली।
करसन जी झाला भी सफ़ेद ध्वज उठाये दुश्मन के खेमे की और बढ़ चला। सफ़ेद ध्वज का अर्थ आत्मसमर्पण से होता है इसलिए करसन जी को सेना के भीतरी खेमों में आने की इजाजत मिली।करसन जी ने सेना के सामने
आत्मसमर्पण की शर्त राखी के वे केवल जाम रावल जी के सामने झुकेंगे और सन्देश पढ़ेंगे। उस सेना में मजूद हरदौल जी जो की जाम रावल के छोटे भाई थे और नवानगर के सेनापति भी थे करसन की मंशाओं को भाप गए और खुद करसन के आगे जाम रावल के रूप में खड़े हो गए। करसन ने हरदौल जी को जाम रावल समझ तुरंत उनकी गर्दन पर खंजर से हमला कर दिया जिसमे वे घायल हो गए और अंत में वीरगति को प्राप्त हुए।इस घटना के बारे में सुन जाम नरेश जी इतने क्रोधित हो उठे के उन्होंने तुरंत कारसन का सर धड़ से अलग करने के निर्देश दिए। परन्तु कारसेन जी मोके का फायदा उठा कर अपने घोड़े पर बहुत तेजी से जडेजाओ के खेमे से दूर भाग चले। रास्ते में एक सोलह साल का लड़का जिसका नाम मेरमणजी हाला ( जडेजाओ की शाख ) था, अपनी पट्टी नामक घोड़ी को सिंहं नदी के किनारे नहला रहा था। उसने अचानक एक आदमी को घोड़े पर अपनी और भागते देखा जिसके पीछे काफी सैनिक लगे हुए थे। मेरमण तुरंत परिस्तिथि को समझ गया और कारसेन के पीछे लग गया। दुश्मन के खेमे और कारसेन की स्तिथ में अभी भी काफी अंतर था। मेरमण जी ने कारसेन जी का बड़ी बहादुरी से पीछा किया के तभी एक 50 फुट चोर नाला दोनों के बीच आ गया। मेरमण जी ने नाले की चौड़ाई को देखते हुए अपनी घोड़ी पट्टी से कहा आज जडेजा वंश की हाला शाख की इज्जत तुम्हारे हाथों में है। पट्टी पचास फुट चौड़े नाले को बड़ी बहादुरी से दो बार में टॉप गयी और दूसरी और जा खड़ी हुई। मेरमण जी ने तुरंत अपने शरीर को संभाला और पट्टी पर खड़े होकर कारसेन की और पूरी ताकत से
भाला फेंका।भाला सीधा कारसेन के दिल को भेद गया और वे वहीँ धराशाई हो गए।
मेरमण जी की इस बहादुरी को वह आ कर जाम रावल और हजारो जडेजा सैनिको ने देखा।जाम रावल जी कवि नही थे पर उन्होंने मेरमण की इस बहादुरी को देख कर अपने घोड़े से उतर कर देखा तो मेरमण जी की आँख जोर लगाने की वजह से बहार दिख रही थी और घोड़े के भी मुठ बेठ गए थे ये देख उनके मुह से उसके लिए कुछ अनमोल पंक्तियाँ निकली

”हाला जी तेरा हाथ बखानू के पट्टी तेरा पागला बखानू ”
जिसका अर्थ है हाला जी मैं किसकी तारीफ करू इस बहादुरी के आपके हाथों की या पट्टी घोड़ी के टांगों की मैं खुद ही इतना चकित हूँ।ये पंक्तियाँ आज भी अनेको गुजराती देश भक्ति के गानो में इस्तेमाल की जाती है और लाखों लोगों के लिए प्रेरणा की स्त्रोत बनीं। वर्षाऋतु में चले इस युद्ध में पानी के साथ लहू भी इतना बहता चला गया अनेक योद्धा अपना कौशल दिखाने लगे,शत्रु का 12 हजार सैनिक मारे गए और इधर
जाम जी के 4 हजार योद्धा काम आये, इसके बाद जाम रावल की सेना ने युद्ध में भी इसी प्रकार कर कौशल
दिखाया और संख्या में बेहद कम होने के बावजूद भी दुश्मन की संयुक्त सेना पर जीत हासिल की।लड़ाई के बाद सभी शत्रु राजा भाग गये जाम का सैन्य उनका पीछा करने लगा,भागते शत्रु का पीछा करना क्षत्रिय धर्म नही है कहकर जाम ने सेना वापिस बुलाई और जेठवा को हालार में से ,काठीओ को भादर नदी के उस पार, देदा और झाला को मछु नदी के उस पार खदेड़ा जो आजादी तक चला अपने भाई को खोने के गम में जाम रावल ने नया मुल्क जमीन न जीतने की प्रतिज्ञा ली और
सभी भायतो को 12-12गाव दिये ,आहीर को मायत्रु गाऊँ दिया और मत्वा लोगो को मत्वा गाव दिया अपने चारण को 2 गाव देकर राज्य स्थिर किया ये युद्ध इतिहास के पन्नो में अमर हो गया पर कई लोक कथाओ में आज भी जीवित है।===========================================

WHY AND WHAT MAKE WOMEN ATTRACTIVE TO MEN- FOR REPRODUCTION PER NATURE LAWS


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