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Sunday, November 4, 2018

भारतवर्ष का प्राचीन नाम हिमवर्ष


पुराणों में बताया गया है कि प्रलयकाल के पश्चात् स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत ने रात्रि में भी प्रकाश रखने की इच्छा से ज्योतिर्मय रथ के द्वारा सात बार भूमण्डल की परिक्रमा की। परिक्रमा के दौरान रथ की लीक से जो सात मण्डलाकार गड्ढे बने, वे ही सप्तसिंधु हुए। फिर उनके अन्तर्वर्ती क्षेत्र सात महाद्वीप हुए जो क्रमशः जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप कहलाए। ये द्वीप क्रमशः दुगुने बड़े होते गए हैं और उनमें जम्बूद्वीप सबके बीच में स्थित है-
‘जम्बूद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यसंस्थितः’
(ब्रह्ममहापुराण, 18.13)
प्रियव्रत के 10 पुत्रों में से 3 के विरक्त हो जाने के कारण शेष 7 पुत्र— आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ट, मेधातिथि और वीतिहोत्र क्रमशः जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप के अधिपति हुए।
प्रियव्रत ने अपने पुत्र आग्नीध्र को जम्बूद्वीप दिया था-
‘जम्बूद्वीपं महाभाग साग्नीध्राय ददौ पिता’
मेधातिथेस्तथा प्रादात्प्लक्षद्वीपं तथापरम् ।।’
(विष्णुमहापुराण, 2.1.12)
जम्बूद्वीपाधिपति आग्नीध्र के 9 पुत्र हुए- नाभि, किंपुरुष, हरिवर्ष, इलावृत्त, रम्यक, हिरण्यमय, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमाल। सम विभाग के लिए आग्नीध्र ने जम्बूद्वीप के 9 विभाग करके उन्हें अपने पुत्रों में बाँट दिया और उनके नाम पर ही उन विभागों के नामकरण हुए-
‘आग्नीध्रसुतास्तेमातुरनुग्रहादोत्पत्तिकेनेव संहननबलोपेताः पित्रा विभक्ता आत्म तुल्यनामानियथाभागं जम्बूद्वीपवर्षाणि बुभुजः’
(भागवतमहापुराण, 5.2.21; मार्कण्डेयमहापुराण, 53.31-35)
पिता (आग्नीध्र) ने दक्षिण की ओर का ‘हिमवर्ष’ (जिसे अब ‘भारतवर्ष’ कहते हैं) नाभि को दिया-
‘पिता दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्’
(विष्णुमहापुराण, 2.1.18)
आठ विभागों के नाम तो ‘किंपुरुषवर्ष’, ‘हरिवर्ष’ आदि ही हुए, किंतु ज्येष्ठ पुत्र का भाग ‘नाभि’ से ‘अजनाभवर्ष’ हुआ।
जय एकलिंगजी ।। ✍️✍️
copyright मनीषा सिंह सूर्यवंशी की कलम से "

Monday, April 18, 2016

India was hub of Indutry until 16 th century



हमे सबसे बड़ा झूठ जब पढ़ाया गया कि भारत कृषि प्रधान देश है जब हम ये नहीं समझ पाए के हमारा ध्यान हमारी तकनीक से हटाया जा रहा है ये कृषि हमारे दिमाग में इतनी भर दी गई के हम हमारी असलियत भूल गए | 16विं सदी में भारत के हर छोटे से छोटे गाँवों में बीस से अस्सी प्रकार के व्यवसाय होते थे इतने कारीगर थे हर गाँव में |
जब दुनिया का 70% भाग भारत के बनाए हुए कपडे़ पे निर्भर था और भारत का कपडा सोने के बदले में दिया जाता था किलो से ना की मीटर से |
अंग्रेज भारत के बने जहाज खरीदते थे पुराने और ...10 वर्षों तक उन का प्रयोग करते थे उतना उन्नत व्यावसायिक और कारीगरी ज्ञान था 16विं सदी तक हमारे पास जो भवन बनाने की तकनीक थी उसे ख़त्म कर के हमे बेकार समेंटेड प्रणाली पकड़ा दी गई हमारी उद्योग-कला (Technology) समाप्त की गई और हमारा रसायन ज्ञान हम से छुपा दिया गया |
और इस अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिए हमारे केंद्र मंदिरो पे अंग्रेजो ने अभिग्रहण (Capture) किया जहाँ से सारी व्यवस्था गड़बड़ हुई |
गुरुकुलो में निःशुल्क शिक्षा होती थी, हर पाँच गाँवों में एक वैध होता था जो निःशुल्क उपचार करता था और गाँव वालों द्वारा भिक्षा या अन्य रूप में उन का भरण पोषण होता था | हर पाँच गाँवों के वेधो पे एक शल्य-चिकित्सक (Surgeon) होता था जो की शल्य क्रिया (Operation) सम्बंधित कार्य किया करता था | और भी कई ऐसी बातें है |
अंग्रेजो ने जब हमारी अर्थव्यवस्था समाप्त की तो हम सब बेरोजगार हो गए और निर्धन हो गए ना शिक्षा के लिए गुरुकुल बचे थे | ना कोई कमाई का जातीय केंद्र | 18विं सदी तक दासता (गुलामी) की चपेट में पूरी तरह से अा चुके थे क्योंकि हमारी उद्योग-कला छिन ली गई थी और वाहीं से गरीबी का सील सिला शुरू हुआ अपने पूर्वजो को भूल गए अधिकांश और इस का फ़ायदा उठा के अंग्रेजो ने मूलनिवासी सिद्धान्त (Theories) थोप दी |
मुगलो और ईसाई से लड़ाई हुई लेकिन वो कभी इस तरह की हानि नहीं पहुँचा पाए और आज भी असली खतरा इस्लाम और ईसाई मिशनरी है |

Saturday, October 31, 2015

इतिहास के नाम पर झूठ क्यों, wrong history of India

इतिहास के नाम पर झूठ क्यों
क्या आप जानते हैं कि दिल्लीके लालकिले का रहस्य क्या है और इसे किसने बनवाया था ?
दिल्ली का लाल किला शाहजहाँ से भी कई शताब्दी पहले पृथवीराजचौहान द्वारा बनवाया हुआ लाल कोट
अक्सरहमें यह पढाया जाता है कि दिल्ली का लालकिला शाहजहाँ ने बनवाया था | लेकिनयह एकसफ़ेद झूठ है और दिल्ली का लालकिला शाहजहाँ के जन्म से सैकड़ों साल पहले”महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय” द्वारा दिल्ली को बसाने के क्रम में हीबनाया गया था|
महाराज अनंगपाल तोमर और कोई नहीं बल्कि महाभारत के अभिमन्यु के वंशज तथा महाराजपृथ्वीराज चौहान के नाना जी थे| इतिहासके अनुसार लाल किला का असली नाम “लाल कोट” है, जिसे महाराज अनंगपालद्वितीय द्वारा सन 1060 ईस्वी में दिल्ली शहर कोबसाने के क्रम में ही बनवाया गया था जबकि शाहजहाँ का जन्म ही उसके सैकड़ों वर्षबाद 1592 ईस्वी में हुआ है|
दरअसल शाहजहाँ नमक मुसलमान ने इसे बसाया नहीं बल्कि पूरी तरह से नष्टकरने की असफल कोशिश की थी ताकि, वो उसकेद्वारा बनाया साबित हो सके लेकिन सच सामने आ ही जाता है| इसका सबसे बड़ा प्रमाण तोयही है कि तारीखे फिरोजशाही के पृष्ट संख्या 160 (ग्रन्थ ३) में लेखक लिखता हैकि सन 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकरदिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल ( लाल प्रासाद/ महल ) कि ओर बढ़ा और वहां उसने आरामकिया| सिर्फइतना ही नहीं अकबरनामा और अग्निपुराण दोनों ही जगह इस बात के वर्णन हैं कि महाराजअनंगपाल ने ही एक भव्य और आलिशान दिल्ली का निर्माण करवाया था|
जिसकोशाहजहाँ ने पूरी तरह से नष्ट करने की असफल कोशिश करी थी ताकि वो उसके द्वारा बनायासाबित हो सके..लेकिन सच सामने आ ही जाता है.
* इसके पूरे साक्ष्य प्रथवीराज रासोसे मिलते है .
* शाहजहाँ से 250 वर्ष पहले1398 मे तैमूर लंग ने पुरानीदिल्ली का उल्लेख करा है (जो की शाहजहाँ द्वारा बसाई बताई जाती है)
* सुअर (वराह) के मुह वालेचार नल अभी भीलाल किले के एक खास महल मे लगे है. क्या ये शाहजहाँ के इस्लाम का प्रतीक चिन्ह हैया हमारे हिंदुत्व के प्रमाण??
* किले के एक द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित हैराजपूत राजा लोग गजो( हाथियों ) के प्रति अपने प्रेम के लिए विख्यात थे ( इस्लाममूर्ति का विरोध करता है)
* दीवाने खास मे केसर कुंडनाम से कुंड बना है जिसके फर्श पर हिंदुओं मे पूज्य कमल पुष्प अंकित है, केसर कुंड हिंदू शब्दावलीहै जो की हमारे राजाओ द्वारा केसर जल से भरे स्नान कुंड के लिए प्रयुक्त होती रहीहै
* मुस्लिमों के प्रिय गुंबद या मीनार का कोई भी अस्तित्वनही है दीवानेखास और दीवाने आम मे.
* दीवानेखास के ही निकट राज की न्याय तुलाअंकित है , अपनी प्रजा मे से 99 % भाग को नीच समझने वाला मुगलकभी भी न्याय तुला की कल्पना भी नही कर सकता, ब्राह्मानोद्वारा उपदेशित राजपूत राजाओ की न्याय तुला चित्र से प्रेरणा लेकर न्याय करनाहमारे इतिहास मे प्रसीध है .
* दीवाने ख़ास और दीवाने आम की मंडप शैलीपूरी तरह से 984 के अंबर के भीतरी महल(आमेर–पुराना जयपुर) से मिलती है जो की राजपूताना शैली मे बना हुवा है .
* लाल किले से कुछ ही गज की दूरी परबने देवालय जिनमे से एक लाल जैन मंदिर और दूसरा गौरीशंकार मंदिर दोनो ही गैरमुस्लिम है जो की शाहजहाँ से कई शताब्दी पहले राजपूत राजाओं ने बनवाए हुए है.
* लाल किले का मुख्या बाजार चाँदनी चौककेवल हिंदुओं से घिरा हुआ है, समस्तपुरानी दिल्ली मे अधिकतर आबादी हिंदुओं की ही है, सनलिष्ट और घूमाओदार शैली के मकान भी हिंदू शैलीके ही है
..क्याशाजहाँ जैसा धर्मांध व्यक्ति अपने किले के आसपास अरबी, फ़ारसी, तुर्क, अफ़गानी के बजे हमहिंदुओं के लिए मकान बनवा कर हमको अपने पास बसाता ???
* एक भी इस्लामी शिलालेख मेलाल किले का वर्णन नही है
*”” गर फ़िरदौस बरुरुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्ता, हमीं अस्ता, हमींअस्ता””–अर्थात इस धरती पे अगर कहीं स्वर्ग है तो यही है, यही है, यही है….
इसअनाम शिलालेख को कभी भी किसी भवन का निर्मांकर्ता नही लिखवा सकता ..और ना ही येकिसी के निर्मांकर्ता होने का सबूत देता है
इसकेअलावा अनेकों ऐसे प्रमाण है जोकी इसके लाल कोट होने का प्रमाण देते है, और ऐसेही हिंदू राजाओ के सारे प्रमाण नष्ट करके हिंदुओं का नाम ही इतिहास से हटा दियागया है, अगरहिंदू नाम आता है तो केवल नष्ट होने वाले शिकार के रूप मे……ताकि हम हमेशा हीअहिंसा और शांति का पाठ पढ़ कर इस झूठे इतिहास से प्रेरणा ले सके…
सही है ना ???..लेकिन कबतक अपने धर्म को ख़तम करने वालो कीपूजा करते रहोगे और खुद के सम्मान को बचाने वाले महान हिंदू शासकों के नाम भुलातेरहोगे..
ऐसे ही….??????? –
1. जो जीता वही चंद्रगुप्त ना होकर…जो जीता वही सिकन्दर “कैसे” हो गया… ???
(जबकि ये बात सभी जानते हैं कि…. सिकंदर की सेना ने चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभाव को देखते
हुये ही लड़ने से मना कर दिया था.. बहुत ही बुरी तरह मनोबल टूट गया था…. जिस कारण , सिकंदर ने मित्रता के तौर पर अपने सेनापति सेल्युकशकि बेटी की शादी चन्द्रगुप्त से की थी)
2. महाराणा प्रताप “”महान””” ना होकर………अकबर “””महान””” कैसे हो गया…???(जबकि, अकबर अपने हरम में हजारों लड़कियों को रखैल के तौर पर रखता था…. यहाँ तक कि उसने अपनी बेटियो और बहनोँ की शादी तक पर प्रतिबँध लगा दिया था जबकि.. महाराणा प्रताप ने अकेले दम पर उस अकबर के लाखों की सेना को घुटनों पर ला दिया था)
3. सवाई जय सिंह को “””महान वास्तुप्रिय”””राजा ना कहकर शाहजहाँ को यह उपाधि किस आधार मिली …… ???जबकि साक्ष्य बताते हैं कि जयपुर के हवा महल से लेकर तेजोमहालय {ताजमहल} तक ….महाराजा जय सिंह ने ही बनवाया था)
4. जो स्थान महान मराठा क्षत्रिय वीर शिवाजी को मिलना चाहिये वो………. क्रूर और आतंकी औरंगजेब को क्यों और कैसे मिल गया ..????
5. स्वामी विवेकानंद और आचार्य चाणक्य की जगह… ….गांधी को महात्मा बोलकर हिंदुस्तान पर क्यों थोप दिया गया…??????
6. तेजोमहालय- ताजमहल……… ..लालकोट- लाल किला……….. फतेहपुर सीकरी का देव महल- बुलन्द दरवाजा…….. एवं सुप्रसिद्ध गणितज्ञ वराह मिहिर की मिहिरावली(महरौली) स्थित वेधशाला- कुतुबमीनार….. ……… क्यों और कैसे हो गया….?????
7. यहाँ तक कि….. राष्ट्रीय गान भी…..संस्कृत के वन्दे मातरम की जगह गुलामी का प्रतीक””जन-गण-मन हो गया”” कैसे और क्यों हो गया….??????
8. और तो और…. हमारे अराध्य भगवान् राम..कृष्ण तो इतिहास से कहाँ और कब गायब हो गये……… पता ही नहीं चला……….आखिर कैसे ????
9. यहाँ तक कि…. हमारे अराध्य भगवान राम की जन्मभूमि पावन अयोध्या …. भी कब और
कैसे विवादित बना दी गयी… हमें पता तक नहीं चला….!
कहने का मतलब ये है कि….. हमारे दुश्मन सिर्फ….बाबर , गजनवी , लंगड़ा तैमूरलंग…..ही नहीं हैं…… बल्कि आज के सफेदपोश सेक्यूलर भी हमारे उतने ही बड़े दुश्मन हैं…. जिन्होंने हम हिन्दुओं के अन्दर हीन भाबना का उदय कर सेकुलरता का बीज उत्पन्न किया ।

Monday, March 9, 2015

QUEEN RUDRAMMA DEVI-SYMBOL OF WOMEN POWER IN ANCIENT INDIA

'Rani Rudramma Devi -- A Great Warrior-Ruler of the Kakatiyas 

Rani Rudhramadevi  was one of the most prominent rulers of the Kakatiya dynasty in the Deccan Plateau, being one of the few ruling queens in Indian history. Queen Rudramma Devi remains as one of India's most important woman and very few female rulers in south India for all time. Rani Rudramma Devi ruled from 1261 or 1262 until 1295 or 1296. 

Ganapathi Deva Maharaju (1199-1261 AD), one of the most key Kakatiya rulers, gave a masculine name to his daughter Rudramma Devi, calling her "Rudra Deva", owing to her impeccable administrative abilities in performing royal duty. She was a revolutionary ruler. She encourgaed foreign visitors and messengers to visit the kingdom. She was a brilliant administrator, noble ruler, and warrior Queen. After her victory over the Yadavas, she took the title Rajagaja kesari (which had also been held by her illustrious father). Visitors such as Marco Polo spoke of her enlightened rule, happy subjects, and palace’s splendor. Though being groomed for military exploits and statecraft, Rudramba is not remembered as a patron of the arts, the unique Kakatiya style of sculpture is nevertheless traced to her reign. 

Ganapatideva had two daughters Rudramadevi and Genapamadevi. Rudramadevi or Rudramba was given in marriage to a prince of the Eastern Chalukyan lineage (of Nidadavolu) called Virabhadra. The second daughter was given in marriage to Beta of the Kota family. 

Succession: On the advice of Sivadevayya (prime minister), Ganapati Deva nominated Rudrama Devi as his successor. When she was only 14 years old, Rani Rudrama Devi succeeded her father. In the first two or three years of her conjoint rule with her father, the kingdom was thrown into confusion and disorder due to Jatavarma Sundara Pandya-I's invasion and the disastrous defeat of the Kakatiyas along with their allies at the battle of Muttukur. Though Ganapati Deva turned the tide of the invasion, he lost his territory and his hold over his feudatories.  He retired from active politics and complete power was vested with Rudrama Devi. Various inscriptions suggested that her independent rule started from 1261 AD. Rudramma Devi ruled till 1289.

Reign: Her ascendancy was resented by some nobles and her cousins only because she was a woman. They later raised a banner of revolt. Rudrama Devi wore a male attire and sat on the throne and with an iron hand ruled the kingdom keeping the enemies at bay. Pandyas and Cholas from the south Indian peninsula were a great threat and she kept them at bay with great vigour. After her accession she had to fight Harihara Deva and Murari Deva, who revolted against her. She had some efficient nobles like Jaganni Deva and Gona Ganna Reddy who helped her in suppressing revolts.

The Kalinga King Narasimha-I, who suffered a defeat previously at the hands of Ganapati Deva, took advantage of the distracted condition in the Kakatiya dominions and marched with his forces into the Godavari delta to recover his lost possessions. In the later part of the reign of Rudrama Devi, the above provinces came back under her control. Her commanders Poti Nayaka and Proli Nayaka fought against Kalinga Vira Bhanudeva-I, son and successor of Narasimha-I, and his accomplices Arjuna Deva, the Matsya chief of Oddadi and others and inflicted a crushing defeat on them. The Kakatiya power was thus re-established in coastal Andhra.

 But the biggest threat came from the West in the form of Seuna Yadavas of Devagiri. Rudrama Devi defeated Mahadeva Raja, the Seuna Yadava ruler of Devagiri (Daulatabad in Aurangabad District at present in Maharashtra) who invaded Warangal (earlier known as Orugallu or Ekasilanagaramu) Fort, the capital of the Kakatiya empire, and chased him away. She crossed Godavari chasing the Yadava ruler right into his territories and forced him to make peace. The Devagiri king had to pay ransom to the queen and made peace. Although such treasures gained after victory belonged to the royal house, she distributed the wealth among her troops.

In the south, the Nellore Kingdom came under the power of the Pandyas and was placed under their vassals. The Kayastha chief Janniga Deva re-occupied the territories of the Nelluru kingdom and freed them thus from the Pandyan sway. He and his brother Tripurari Deva I (1270-72 A.D.) continued to rule the Nelluru kingdom as the vassals of Rudrama Devi. However, with the succession of their younger brother Amba Deva to the throne in 1272 AD, the situation underwent a change.

 Rudramma Devi could not tolerate disloyal Amba Deva. By that time Prataprudra, her grandson, became old enough to share the responsibilities of the administration. He was an extraordinary war planner. He planned a three-prong attack on Amba Deva. The intention was to weaken all his support systems so that he would not have had enough strength. Of the three, the first was led by the Queen Rudramma Devi and her general Mallikarjuna. However, as the recently discovered Chandupatla (Nalgonda district) inscription dated 1283 AD indicated, Amba Deva seemed to have killed Rudramma along with Mallikarjuna Nayaka in a battle that year. However, the army of Rudramma Devi was victorious. Later, Prataparudra II, successor of Rudramma, succeeded in completely suppressing the Kayastha revolt. 

Her rule and patronage: Among Rani Rudramma Devi's accomplishments during her reign was the completion of Warangal Fort, begun by her father, in the Kakatiya capital of Warangal (one stone hill). Parts of the fort are still standing, including examples of distinctive Kakatiya sculpture. She worshipped Goddesses Bhadrakali, Ekaveera and Padmakshi. She captured important forts like Mulikinadu, Renadu, Eruva, Mutthapi Nadu and Satti.

Legacy: Rudrama Devi was one of the most outstanding queens in Indian history from the Kakatiya dynasty and people still cherish her memories. Her gender did not come on her way in discharging the duties of her exalted office. She took an active part in governing the country and strove hard to promote the best interests of the state. In spite of the wars which frequently disturbed the country, her people remained contented and happy under her rule.

Marco Polo, the Venetian traveller who paid a visit to the kingdom probably a little later, spoke highly of her administrative qualities, benign rule and greatness.
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The historians, writers and people of Chandupatla village, where an inscription that confirmed the exact death date of great Kakatiya ruler Rani Rudrama Devi was found few years ago, have appealed to the Telangana government to organise the 725th death anniversary of Rani Rudrama Devi on November 27 at this village. Until the inscription was found in 1994 at Chandupatla that confirmed the death date of Rudrama Devi as 1289 AD, November 27, there was no proof available on the death of the first Hindu woman emperor of India. According to historians, only Razia Sultana ruled parts of India from Delhi before Rudrama Devi.

Historian D. Suraya Kumar said that Rudrama Devi had initiated several welfare programmes like digging tanks for bringing many acres under cultivation, which was an inspiration for the Telangana government in restoring all the minor irrigation tanks. Besides an inscription, there are historical statues of Lord Ganesha and a warrior riding on the back of a horse in the village. 

The village tank, Rasamudram, built during the Kakatiya Samudram, also finds a mention in the inscription because the inscription was installed very close to the village tank by a soldier of Rudrama Devi’s army Puvvula Mummadi, who is believed to be a native of Chandupatla.

The inscription also says the Chief of Army of Rudrama Devi, Mallikarjuna Nayakudu, was killed on the same day, but there was no mention of the reason and the place of her death. 

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Notes and Sources:
Rao, P. Ragunadha. History and Culture of Andhra Pradesh: From the Earliest Times to 1991. New Delhi: Sterling Publishers, 2012.
http://www.thehindu.com/news/national/telangana/govt-urged-to-observe-death-anniversary-of-rani-rudrama-devi/article6618762.ece
http://www.thehansindia.com/posts/index/2014-02-25/Rudrama-Devi-the-first-woman-ruler-of-Andhra--87355'Rani Rudramma Devi -- A Great Warrior-Ruler of the Kakatiyas
Rani Rudhramadevi was one of the most prominent rulers of the Kakatiya dynasty in the Deccan Plateau, being one of the few ruling queens in Indian history. Queen Rudramma Devi remains as one of India's most important woman and very few female rulers in south India for all time. Rani Rudramma Devi ruled from 1261 or 1262 until 1295 or 1296.
Ganapathi Deva Maharaju (1199-1261 AD), one of the most key Kakatiya rulers, gave a masculine name to his daughter Rudramma Devi, calling her "Rudra Deva", owing to her impeccable administrative abilities in performing royal duty. She was a revolutionary ruler. She encourgaed foreign visitors and messengers to visit the kingdom. She was a brilliant administrator, noble ruler, and warrior Queen. After her victory over the Yadavas, she took the title Rajagaja kesari (which had also been held by her illustrious father). Visitors such as Marco Polo spoke of her enlightened rule, happy subjects, and palace’s splendor. Though being groomed for military exploits and statecraft, Rudramba is not remembered as a patron of the arts, the unique Kakatiya style of sculpture is nevertheless traced to her reign.

Ganapatideva had two daughters Rudramadevi and Genapamadevi. Rudramadevi or Rudramba was given in marriage to a prince of the Eastern Chalukyan lineage (of Nidadavolu) called Virabhadra. The second daughter was given in marriage to Beta of the Kota family.
Succession: On the advice of Sivadevayya (prime minister), Ganapati Deva nominated Rudrama Devi as his successor. When she was only 14 years old, Rani Rudrama Devi succeeded her father. In the first two or three years of her conjoint rule with her father, the kingdom was thrown into confusion and disorder due to Jatavarma Sundara Pandya-I's invasion and the disastrous defeat of the Kakatiyas along with their allies at the battle of Muttukur. Though Ganapati Deva turned the tide of the invasion, he lost his territory and his hold over his feudatories. He retired from active politics and complete power was vested with Rudrama Devi. Various inscriptions suggested that her independent rule started from 1261 AD. Rudramma Devi ruled till 1289.
Reign: Her ascendancy was resented by some nobles and her cousins only because she was a woman. They later raised a banner of revolt. Rudrama Devi wore a male attire and sat on the throne and with an iron hand ruled the kingdom keeping the enemies at bay. Pandyas and Cholas from the south Indian peninsula were a great threat and she kept them at bay with great vigour. After her accession she had to fight Harihara Deva and Murari Deva, who revolted against her. She had some efficient nobles like Jaganni Deva and Gona Ganna Reddy who helped her in suppressing revolts.
The Kalinga King Narasimha-I, who suffered a defeat previously at the hands of Ganapati Deva, took advantage of the distracted condition in the Kakatiya dominions and marched with his forces into the Godavari delta to recover his lost possessions. In the later part of the reign of Rudrama Devi, the above provinces came back under her control. Her commanders Poti Nayaka and Proli Nayaka fought against Kalinga Vira Bhanudeva-I, son and successor of Narasimha-I, and his accomplices Arjuna Deva, the Matsya chief of Oddadi and others and inflicted a crushing defeat on them. The Kakatiya power was thus re-established in coastal Andhra.
But the biggest threat came from the West in the form of Seuna Yadavas of Devagiri. Rudrama Devi defeated Mahadeva Raja, the Seuna Yadava ruler of Devagiri (Daulatabad in Aurangabad District at present in Maharashtra) who invaded Warangal (earlier known as Orugallu or Ekasilanagaramu) Fort, the capital of the Kakatiya empire, and chased him away. She crossed Godavari chasing the Yadava ruler right into his territories and forced him to make peace. The Devagiri king had to pay ransom to the queen and made peace. Although such treasures gained after victory belonged to the royal house, she distributed the wealth among her troops.
In the south, the Nellore Kingdom came under the power of the Pandyas and was placed under their vassals. The Kayastha chief Janniga Deva re-occupied the territories of the Nelluru kingdom and freed them thus from the Pandyan sway. He and his brother Tripurari Deva I (1270-72 A.D.) continued to rule the Nelluru kingdom as the vassals of Rudrama Devi. However, with the succession of their younger brother Amba Deva to the throne in 1272 AD, the situation underwent a change.
Rudramma Devi could not tolerate disloyal Amba Deva. By that time Prataprudra, her grandson, became old enough to share the responsibilities of the administration. He was an extraordinary war planner. He planned a three-prong attack on Amba Deva. The intention was to weaken all his support systems so that he would not have had enough strength. Of the three, the first was led by the Queen Rudramma Devi and her general Mallikarjuna. However, as the recently discovered Chandupatla (Nalgonda district) inscription dated 1283 AD indicated, Amba Deva seemed to have killed Rudramma along with Mallikarjuna Nayaka in a battle that year. However, the army of Rudramma Devi was victorious. Later, Prataparudra II, successor of Rudramma, succeeded in completely suppressing the Kayastha revolt.
Her rule and patronage: Among Rani Rudramma Devi's accomplishments during her reign was the completion of Warangal Fort, begun by her father, in the Kakatiya capital of Warangal (one stone hill). Parts of the fort are still standing, including examples of distinctive Kakatiya sculpture. She worshipped Goddesses Bhadrakali, Ekaveera and Padmakshi. She captured important forts like Mulikinadu, Renadu, Eruva, Mutthapi Nadu and Satti.
Legacy: Rudrama Devi was one of the most outstanding queens in Indian history from the Kakatiya dynasty and people still cherish her memories. Her gender did not come on her way in discharging the duties of her exalted office. She took an active part in governing the country and strove hard to promote the best interests of the state. In spite of the wars which frequently disturbed the country, her people remained contented and happy under her rule.
Marco Polo, the Venetian traveller who paid a visit to the kingdom probably a little later, spoke highly of her administrative qualities, benign rule and greatness.
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The historians, writers and people of Chandupatla village, where an inscription that confirmed the exact death date of great Kakatiya ruler Rani Rudrama Devi was found few years ago, have appealed to the Telangana government to organise the 725th death anniversary of Rani Rudrama Devi on November 27 at this village. Until the inscription was found in 1994 at Chandupatla that confirmed the death date of Rudrama Devi as 1289 AD, November 27, there was no proof available on the death of the first Hindu woman emperor of India. According to historians, only Razia Sultana ruled parts of India from Delhi before Rudrama Devi.
Historian D. Suraya Kumar said that Rudrama Devi had initiated several welfare programmes like digging tanks for bringing many acres under cultivation, which was an inspiration for the Telangana government in restoring all the minor irrigation tanks. Besides an inscription, there are historical statues of Lord Ganesha and a warrior riding on the back of a horse in the village.
The village tank, Rasamudram, built during the Kakatiya Samudram, also finds a mention in the inscription because the inscription was installed very close to the village tank by a soldier of Rudrama Devi’s army Puvvula Mummadi, who is believed to be a native of Chandupatla.
The inscription also says the Chief of Army of Rudrama Devi, Mallikarjuna Nayakudu, was killed on the same day, but there was no mention of the reason and the place of her death.
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Notes and Sources:
Rao, P. Ragunadha. History and Culture of Andhra Pradesh: From the Earliest Times to 1991. New Delhi: Sterling Publishers, 2012.
http://www.thehindu.com/…/govt-urged-to-…/article6618762.ece
http://www.thehansindia.com/posts/index/2014-02-25/Rudrama-Devi-the-first-woman-ruler-of-Andhra--87355

Thursday, January 15, 2015

मुंढाड राजपूत वंश,history of rajput in Haryana

न्याय का पर्याय'' मुंढाड चबूतरा , कलायत (हरियाणा) ::-- मुंढाड 360 गांव का पवित्र चबूतरा........
मुंढाड राजपूत वंश परिचय----
.........न्याय का पर्याय'' मुंढाड चबूतरा , कलायत (हरियाणा) ::-- मुंढाड 360 गांव का पवित्र चबूतरा........

मुंढाड राजपूत वंश परिचय----

कलायत नगर और मुंढाड राजपूत वंश प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध है।अंग्रेजो द्वारा लिखित सरकारी गजेटियर करनाल के पृष्ठ नं 74 पर इसका वर्णन मिलता है। महान इतिहासकर ठाकुर ईश्वर सिंह मुंढाड द्वारा राजपूत वंशावली में इस वंश का सुंदर वर्णन मिलता है।
इसके अलावा राजस्थान के प्रसिद्ध जग्गेभटो के बहीखातों में भी शक सम्वत् सहित क्षत्रिय मडाढों के 360 गांव के अधिकार के साम्राज्य का विस्तृत वर्णन मिलता है। राजपूत वंशावली के अनुसार क्षत्रिय मुंढाड आदि पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनुज भ्राता ‘लक्ष्मण’ के वंशज है। मुंढाड राजपूत प्रतिहार वंश की शाखा हैं जिनका कभी पुरे गुजरात पर शासन था।गुजरात पर शासन करने के कारण यह क्षत्रिय राजपूत वंश गुर्जर प्रतिहार और बाद में बडगूजर कहलाया।

राजौरगढ़ भी इन्ही के शासन में था।वहां का शासन छूटने के बाद ये मेवाड़ होते हुए हरियाणा आये। यहाँ पहले जिंद्रा ने जींद बसाया।1100 ई. में मडाढों के महाराजा साढदेव ने जीन्द को ब्राह्मणों को दान करके चंदेल गोत्र के राजपूतों से सातों दुर्ग जीतकर कलायत को अपनी नई राजधानी बनाया और 360 गांव को अपने अधीन कर लिया। वराहा राजपूतो को सालवन से हटाकर कब्जा किया।इनके क्षेत्र को नरदक धरा और मुंढाड वंश को नरदक धरा का राजवी कहा जाता है।
मुंढाढ़ों के राजा साढ्देव ने कलायत को अपनी राजधानी बनाया और तीन सौ साठ गाँवों को अपने आधीन कर लिया.

परिहार(प्रतिहार),बडगूजर,सिकरवार,मुंढाड,खड़ाड ये चारो राजपूत वंश एक ही शाखा से हैं और राघव(रघुवंशी)कहलाते हैं इसलिए आपस में शादी ब्याह नही करते।परिहारों(प्रतिहारो)ने कन्नौज को राजधानी बनाकर पुरे उत्तर भारत पर शासन किया।कन्नौज के प्रतिहार(परिहार)राजपूत राजाओं में नागभट्ट और मिहिरभोज बहुत प्रतापी हुए हैं जिन्होंने अरबो को भारत में घुसने नही दिया।

मुंढाड राजपूतो ने तैमूर का डटकर सामना किया,बाबर के समय मोहन सिंह मुंढाड ने इसी परम्परा को आगे बढ़ाया।समय समय पर ये महाराणा मेवाड़ की और से भी मुगलो के खिलाफ लड़े।जोधपुर के बालक राजा अजीत सिंह राठौर को ओरंगजेब से बचाकर ले जाने में इन्होने दुर्गादास राठौर का सहयोग किया।अंग्रेजो के खिलाफ भी इन्होंने जमकर लोहा लिया।
तभी इनके बारे में कहा जाता है,,
"मुगल हो या गोरे,लड़े मुंढाडो के छोरे"।

धर्म परिवर्तन ने इस वंश को बहुत सीमित कर दिया।हरियाणा में अधिकांश राजपूतो द्वारा इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया और विभाजन के बाद मुस्लिम राजपूत रांघड पाकिस्तान चले गए।जिससे हरियाणा में राजपूतो की संख्या बेहद कम हो गयी और जो हरियाणा राजपूतो का गढ़ था वो आज जाटलैंड बन गया है।
अब मुंढाड राजपूत वंश हरियाणा के 60 गांव में बसता है। 

अन्य जातियों में मुंढाड वंश-----
कुछ मुंढाड राजपूतो द्वारा दूसरी जातियों की स्त्रियों से विवाह के कारण उनकी सन्तान वर्णसनकर होकर दूसरी जातियों में मिल गए।धुल मंधान जाट इन्ही मुंढाड राजपूतो के वंशज हैं इसी प्रकार गूजर और अहिरो में भी मडाड वंश मिलता है। 

लाल चबूतरे की स्थापना---

इसके बाद इसी वंश ने तीन सौ साठ गाँवों की छतीस बिरादरियों को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए मुग़ल शाशक औरंगजेब के शाशनकाल में बड़े मुंढाड चबूतरे की नींव रखी। यह बड़ा चबूतरा मडाढ 360 वर्तमान में जिसे लाल चबूतरा भी कहते हैं, 
जब भी इन गाँवों में किसी भी जाति वर्ग का विवाद होता था तो इस चबूतरे को साक्षी मानकर विभिन्न गाँवों के प्रतिनिधियों की पंचायत होती थी और फैसले किये जाते थे यही कारण है की आज भी इस चबूतरे को न्याय का पर्याय माना जाता है और इसे पुराने ज़माने की कचहरी कहा जाता है।

यह बड़ा चबूतरा पुराने जमाने की कोर्ट से कम नहीं था। हर वर्ग का आरोपी इस पवित्र व न्यायप्रिय चबूतरे के ऊपर पांव रखने पर स्वयं की अत्मा की सच्चाई उगलने पर मजबूर हो जाता था। आज भी यह बड़ा चबूतरा हर वर्ग के न्याय व शक्ति का प्रतीक है। आजादी से पहले इस बड़े चबूतरे का प्रचलन खूब चला और आजादी के बाद यह प्रचलन आसपास के कुछ गांव तक ही सिमट कर रह गया। 
अगर किसी वर्ग के व्यक्ति ने अपनी लापरवाही के कारण झूठ भी बोल दिया तो उस व्यक्ति का वंश ही मिट जाता था। यह सच कई वर्ग के व्यक्तियों पर साबित हुआ। आज भी इस चबूतरे के सामने से 36 बिरादरी का कोई भी नर या नारी निकलता है तो वह अपना शीश झुकाकर निकलता है।

बड़े बड़े राजनेता इस चबूतरे पर माथा टेककर राजनीती में विधायक सांसद और मंत्री,सीएम बने हैं जिनमे लाला बृजभान मुनक वाले, ओमप्रभा जैन,गीता भुक्कल,जयप्रकाश प्रमुख हैं।

आज भी कलायत गांव व अन्य किसी भी गांव पर कोई आपत्ति आती है तो इस चबूतरे पर ही हल किया जाता है। कलायत के क्षत्रिय मुडाढों ने काफी वर्षों से क्षत्रिय मडाढ सभा रजिस्टर्ड का गठन किया हुआ है, 
समय-समय पर क्षत्रिय मडाढों की सभा होती रहती है तथा इस कलायत क्षत्रिय मडाढ सभा के संस्थापक रविन्द्र सूर्यवंशी व पूर्व प्रधान मोहन राणा तथा वर्तमान प्रधान सलिन्दर राणा हैं। इसी बड़े चबूतरे पर आज भी हरियाणा राज्य व अन्य राज्यों की महापंचायतों के फैसले सुनाए जाते हैं।
note-यह पोस्ट ठाकुर ईश्वर सिंह मुंढाड जी की राजपूत वनशावली के पृष्ठ संख्या 93 से 96,ब्रिटिश कालीन करनाल गजेटियर,Thakur's era page की कलायत लाल चबूतरा आर्टिकल के आधार पर तैयार की गयी है।कोई त्रुटि हो या पूरक जानकारी हो तो कमेंट में जानकारी देने की कृपा करें।हम तथ्य का परीक्षण कर आर्टिकल एडिट कर देंगे।
निवेदन-कृपया पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।कॉपी पेस्ट न करें। कलायत नगर और मुंढाड राजपूत ...वंश प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध है।अंग्रेजो द्वारा लिखित सरकारी गजेटियर करनाल के पृष्ठ नं 74 पर इसका वर्णन मिलता है। महान इतिहासकर ठाकुर ईश्वर सिंह मुंढाड द्वारा राजपूत वंशावली में इस वंश का सुंदर वर्णन मिलता है।
इसके अलावा राजस्थान के प्रसिद्ध जग्गेभटो के बहीखातों में भी शक सम्वत् सहित क्षत्रिय मडाढों के 360 गांव के अधिकार के साम्राज्य का विस्तृत वर्णन मिलता है। राजपूत वंशावली के अनुसार क्षत्रिय मुंढाड आदि पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनुज भ्राता ‘लक्ष्मण’ के वंशज है। मुंढाड राजपूत प्रतिहार वंश की शाखा हैं जिनका कभी पुरे गुजरात पर शासन था।गुजरात पर शासन करने के कारण यह क्षत्रिय राजपूत वंश गुर्जर प्रतिहार और बाद में बडगूजर कहलाया।

राजौरगढ़ भी इन्ही के शासन में था।वहां का शासन छूटने के बाद ये मेवाड़ होते हुए हरियाणा आये। यहाँ पहले जिंद्रा ने जींद बसाया।1100 ई. में मडाढों के महाराजा साढदेव ने जीन्द को ब्राह्मणों को दान करके चंदेल गोत्र के राजपूतों से सातों दुर्ग जीतकर कलायत को अपनी नई राजधानी बनाया और 360 गांव को अपने अधीन कर लिया। वराहा राजपूतो को सालवन से हटाकर कब्जा किया।इनके क्षेत्र को नरदक धरा और मुंढाड वंश को नरदक धरा का राजवी कहा जाता है।
मुंढाढ़ों के राजा साढ्देव ने कलायत को अपनी राजधानी बनाया और तीन सौ साठ गाँवों को अपने आधीन कर लिया.

परिहार(प्रतिहार),बडगूजर,सिकरवार,मुंढाड,खड़ाड ये चारो राजपूत वंश एक ही शाखा से हैं और राघव(रघुवंशी)कहलाते हैं इसलिए आपस में शादी ब्याह नही करते।परिहारों(प्रतिहारो)ने कन्नौज को राजधानी बनाकर पुरे उत्तर भारत पर शासन किया।कन्नौज के प्रतिहार(परिहार)राजपूत राजाओं में नागभट्ट और मिहिरभोज बहुत प्रतापी हुए हैं जिन्होंने अरबो को भारत में घुसने नही दिया।
मुंढाड राजपूतो ने तैमूर का डटकर सामना किया,बाबर के समय मोहन सिंह मुंढाड ने इसी परम्परा को आगे बढ़ाया।समय समय पर ये महाराणा मेवाड़ की और से भी मुगलो के खिलाफ लड़े।जोधपुर के बालक राजा अजीत सिंह राठौर को ओरंगजेब से बचाकर ले जाने में इन्होने दुर्गादास राठौर का सहयोग किया।अंग्रेजो के खिलाफ भी इन्होंने जमकर लोहा लिया।
तभी इनके बारे में कहा जाता है,,
"मुगल हो या गोरे,लड़े मुंढाडो के छोरे"।
धर्म परिवर्तन ने इस वंश को बहुत सीमित कर दिया।हरियाणा में अधिकांश राजपूतो द्वारा इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया और विभाजन के बाद मुस्लिम राजपूत रांघड पाकिस्तान चले गए।जिससे हरियाणा में राजपूतो की संख्या बेहद कम हो गयी और जो हरियाणा राजपूतो का गढ़ था वो आज जाटलैंड बन गया है।
अब मुंढाड राजपूत वंश हरियाणा के 60 गांव में बसता है।
अन्य जातियों में मुंढाड वंश-----
कुछ मुंढाड राजपूतो द्वारा दूसरी जातियों की स्त्रियों से विवाह के कारण उनकी सन्तान वर्णसनकर होकर दूसरी जातियों में मिल गए।धुल मंधान जाट इन्ही मुंढाड राजपूतो के वंशज हैं इसी प्रकार गूजर और अहिरो में भी मडाड वंश मिलता है।
लाल चबूतरे की स्थापना---
इसके बाद इसी वंश ने तीन सौ साठ गाँवों की छतीस बिरादरियों को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए मुग़ल शाशक औरंगजेब के शाशनकाल में बड़े मुंढाड चबूतरे की नींव रखी। यह बड़ा चबूतरा मडाढ 360 वर्तमान में जिसे लाल चबूतरा भी कहते हैं,
जब भी इन गाँवों में किसी भी जाति वर्ग का विवाद होता था तो इस चबूतरे को साक्षी मानकर विभिन्न गाँवों के प्रतिनिधियों की पंचायत होती थी और फैसले किये जाते थे यही कारण है की आज भी इस चबूतरे को न्याय का पर्याय माना जाता है और इसे पुराने ज़माने की कचहरी कहा जाता है।
यह बड़ा चबूतरा पुराने जमाने की कोर्ट से कम नहीं था। हर वर्ग का आरोपी इस पवित्र व न्यायप्रिय चबूतरे के ऊपर पांव रखने पर स्वयं की अत्मा की सच्चाई उगलने पर मजबूर हो जाता था। आज भी यह बड़ा चबूतरा हर वर्ग के न्याय व शक्ति का प्रतीक है। आजादी से पहले इस बड़े चबूतरे का प्रचलन खूब चला और आजादी के बाद यह प्रचलन आसपास के कुछ गांव तक ही सिमट कर रह गया।
अगर किसी वर्ग के व्यक्ति ने अपनी लापरवाही के कारण झूठ भी बोल दिया तो उस व्यक्ति का वंश ही मिट जाता था। यह सच कई वर्ग के व्यक्तियों पर साबित हुआ। आज भी इस चबूतरे के सामने से 36 बिरादरी का कोई भी नर या नारी निकलता है तो वह अपना शीश झुकाकर निकलता है।
बड़े बड़े राजनेता इस चबूतरे पर माथा टेककर राजनीती में विधायक सांसद और मंत्री,सीएम बने हैं जिनमे लाला बृजभान मुनक वाले, ओमप्रभा जैन,गीता भुक्कल,जयप्रकाश प्रमुख हैं।
आज भी कलायत गांव व अन्य किसी भी गांव पर कोई आपत्ति आती है तो इस चबूतरे पर ही हल किया जाता है। कलायत के क्षत्रिय मुडाढों ने काफी वर्षों से क्षत्रिय मडाढ सभा रजिस्टर्ड का गठन किया हुआ है,
समय-समय पर क्षत्रिय मडाढों की सभा होती रहती है तथा इस कलायत क्षत्रिय मडाढ सभा के संस्थापक रविन्द्र सूर्यवंशी व पूर्व प्रधान मोहन राणा तथा वर्तमान प्रधान सलिन्दर राणा हैं। इसी बड़े चबूतरे पर आज भी हरियाणा राज्य व अन्य राज्यों की महापंचायतों के फैसले सुनाए जाते हैं।
note-यह पोस्ट ठाकुर ईश्वर सिंह मुंढाड जी की राजपूत वनशावली के पृष्ठ संख्या 93 से 96,ब्रिटिश कालीन करनाल गजेटियर,Thakur's era page की कलायत लाल चबूतरा आर्टिकल के आधार पर तैयार की गयी है

Katoch Rajput-History of Rajputs

जय ज्वाला माई की _/\_
खम्मा घणी !!! समस्त क्षत्रिय परिवार को राजपुताना सोच परिवार की तरफ से नव वर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ !!!
आज हम अपनी इस पोस्ट के द्वारा दुनिया के सबसे पुराने माने जाने वाले राजवंश यानि कटोच राजपूत वंश से अवगत करवाएंगे।
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====कटोच वंश के गोत्र,कुलदेवी आदि=====
गोत्र-अत्री
ऋषि-कश्यप 
देवी-ज्वालामुखी देवी
वंश-चन्द्रवंश,भुमिवंश 
गद्दी एवं राज्य-मुल्तान,जालन्धर,नगरकोट,कांगड़ा,गुलेर,जसवान,सीबा,दातारपुर,लम्बा आदि 
शाखाएँ-जसवाल,गुलेरिया,सबैया,डढवाल,धलोच आदि 
उपाधि-मिया 
वर्तमान निवास-हिमाचल प्रदेश,जम्मू कश्मीर,पंजाब आदि 
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=== कटोच वंश का परिचय ===
सेपेल ग्रिफिन के अनुसार कटोच राजपूत वंश विश्व का सबसे पुराना राजवंश है। कटोच चंद्रवंशी क्षत्रिय माने जाते है। कटोच राजघराना एवं राजपूत वंश महाभारत काल से भी पहले से उत्तर भारत के हिमाचल व पंजाब के इलाके में राज कर रहा है। महाभारत काल में कटोच राज्य को त्रिगर्त  राज्य के नाम से जाना जाता था और आज के कटोच राजवंशी त्रिगर्त राजवंश के ही उत्तराधिकारी है।कल्हण कि राजतरंगनी में त्रिगर्त राज्य का जिक्र है,कल्हण के अनुसार कटोच वंश के राजा इन्दुचंद कि दो राजकुमारियों का विवाह कश्मीर के राजा अनन्तदेव(१०३०-१०४०)के साथ हुआ था,
पृथ्वीराज रासो में इस वंश का नाम कारटपाल मिलता है,
अबुल फजल ने भी नगरकोट राज्य,कांगड़ा दुर्ग एवं ज्वालामुखी मन्दिर का जिक्र किया है,
यूरोपियन यात्री विलियम फिंच ने 1611 में अपनी यात्रा में कांगड़ा का जिक्र किया था,डा व्युलर लिखता है की कांगड़ा राज्य का एक नाम सुशर्मापुर था जो कटोच वंश को प्राचीन त्रिगर्त वंश के शासक सुशर्माचन्द का वंशज सिद्ध करता है,
त्रिगर्त राज्य की सीमाएँ एक समय पूर्वी पाकिस्तान से लेकर उत्तर में लद्दाख तथा पूरे हिमाचल प्रदेश में फैलि हुईं थी। त्रिगर्त राज्य का जिक्र रामायण एवं महाभारत में भी भली भांति मिलता है। कटोच राजा सुशर्माचन्द्र ने दुर्योधन का साथ देते हुए पांडवों के विरुद्ध युद्ध लड़ा था। सुशर्माचन्द्र का अर्जुन से युद्ध का जिक्र भी महाभारत में मिलता है। त्रिगर्त राज्य की मत्स्य और विराट राज्य के साथ शत्रुता का जिक्र महाभारत में उल्लेखित है।
कटोच वंश का जिक्र सिकंदर के युद्ध रिकार्ड्स में भी जाता है। इस वंश ने सिकंदर के भारत पर आक्रमण के समय उससे युद्ध छेड़ा और काँगड़ा राज्य को बचाने में सक्षम रहे। 
ब्रह्म पूराण के अनुसार कटोच वंश के मूल पुरुष राजा भूमि चन्द्र माने जाते है,इस कारण इस वंश को भुमिवंश भी कहा जाता है.इन्होने जालन्धर असुर को नष्ट किया था जिस कारण देवी ने प्रसन्न होकर इन्हें जालन्धर असुर का राज्य त्रिगर्त राज्य दिया था,इस वंश का राज्य पहले मुल्तान में था,बाद में जालन्धर में इनका शासन हुआ,जालन्धर और त्रिगर्त पर्यायवाची शब्द है
भुमिचंद ने सन ४३०० ईसा पूर्व में कटोच वंश एवं त्रिगर्त राज्य की स्थापना की। यह वंश कितना पुराना इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है के महाभारत कल के राजा सुशर्माचंद राजा भूमिचन्द्र के २३४ वीं पीढ़ी में पैदा हुए।
इस प्राचीन चंद्रवंशी राजवंश ने सदियों से विदेशी,देशी हमलावरों का वीरतापूर्वक सामना किया है,
हिमाचल प्रदेश का मसहूर काँगड़ा किला भी कटोच वंश के क्षत्रियों की धरोहर है। कटोच वंश के बारे में काँगड़ा किले में बने महाराजा संसारचन्द्र संग्रहालय से बहूत कुछ जाना जा सकता है।
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==== कटोच वंश के वर्तमान टिकाई मुखिया और राजपरिवार ====
राजा श्री आदित्य देव चन्द्र कटोच , कटोच वंश के ४८८ वे राजा और काँगड़ा राजपरिवार के मुखिया  एवं लम्बा गाँव के जागीरदार है। यह पदवी इन्हे सं १९८८ से प्राप्त है। ४ दिसंबर १९६८ में इनकी शादी जोधपुर राजघराने की चंद्रेश कुमारी से हुई। इनके पुत्र टिक्का ऐश्वर्या चन्द्र कटोच कटोच वंश के भावी मुखिया है।
काँगड़ा राजघराने ने सन १८०० के आस पास से ही अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का युद्ध छेड़ दिया था। संघर्ष काफी समय तक चला जिसमे इस परिवार को काँगड़ा गंवाना पड़ा। आख़िरकार सं १८१० में दोनों पक्षों के बीच संधि हुई और काँगड़ा राजपरिवार को लम्बा गांव की जागीर मिली। तत्पश्चात काँगड़ा राजपरिवार और कटोच राजपूतो के राजगद्दी लम्बा गॉव के जागीरदार के मानी जाती है।
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=== कटोच वंश की शाखाएँ === 
कटोच वंश की चार मुख्य शाखाएँ है :
1. जसवाल : ११७० ईस्वीं में जसवान का राज्य स्थापित होने के बाद यह शाख अलग हुई। 
2. गुलेरिया : १४०५ ईस्वीं में कटोचों के गुलेर राज्य स्थापित होने के बाद कटोच से यह शाखा अलग हुई। 
3. सबैया : १४५० ईस्वी के दौरान गुलेर से सिबा राज्य अलग होने के बाद सिबा के गुलेर सबैया कटोच कहलाए।
4. डढ़वाल : १५५० में इस शाखा ने दातारपुर राज्य की स्थापना की, इस शाखा का नाम डढा नामक स्थान पर बसावट के कारन पड़ा। 
कटोच वंश की अन्य शाखाए धलोच,गागलिया,गदोहिया,जडोत,गदोहिया आदि भी है।
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==== कटोच वंश की संछिप्त वंशावली और तत्कालीन समय का जुड़ा हुआ इतिहास ====
C. 7800 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख 
राजनका (राजपूत का प्रयायवाची शब्द) भूमि चन्द्र से इस वंश की शुरुआत हुई।जिन्होंने त्रिगर्त राज्य जालन्धर असुर को मारकर प्राप्त किया,मुल्तान(मूलस्थान)इन्ही का राज्य था.
C. 7800 - 4000 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
त्रिगर्त राजवंश यानी मूल कटोच वंशियों ने श्री राम के खिलाफ युद्ध लड़ा(रामायण में उल्लेखित)
C. 4000 - 1500 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
त्रिगता नरेश शुशर्माचंद ने काँगड़ा किले की स्थापना की और पांडवों के खिलाफ युद्ध लड़ा। 
( महाभारत में उल्लेखित)
C. 900 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
कटोच राजाओं ने ईरानी व असीरिआई आक्रमणकारियों के खिलाफ युद्ध लड़ा और पंजाब की रक्षा की।
C. 500 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
राजनका परमानन्द चन्द्र ने सिकंदर के खिलाफ युद्ध लड़ा।
C. 275 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
कटोच राजाओं ने अशोक महान के खिलाफ युद्ध लड़े और मुल्तान हार गए।
C. 100 AD
काँगड़ा राजघराने ने कन्नौज के खिलाफ बहुत सारे युद्ध लड़े।
C. 470 AD
काँगड़ा के राजाओं ने हिमालय पर प्रभुत्व ज़माने के लिए कश्मीर के राजाओं के साथ कई युद्ध किए।
C. 643 AD
Hsuan Tsang ने कांगड़ा राज्य का दौरा किया उस समय इस राज्य को जालंधर के नाम से जाना जाने लगा था।
C. 853 AD
राजनका पृथ्वी चन्द्र का राज्य अभिषेक हुआ।
C. 1009 AD
महमूद ग़ज़नी ने सन 1009 में काँगड़ा(भीमनगर)पर आक्रमण किया।इस हमले के समय जगदीशचन्द्र यहाँ के राजा थे,
C. 1170 AD
काँगड़ा राज्य जस्वान और काँगड़ा दो भागों में विभाजित हुआ। राजा पूरब चन्द्र कटोच से जस्वान राज्य पर गद्दी जमाई और कटोच वंश में जसवाल शाखा की शुरुआत हुई। कटोच और मुहम्मद घोरी के बीच में युद्ध छिड़ा जिसमे(१२२० AD) कटोच जालंधर हार गए।
C. 1341 AD
राजनका रुपचंद्र की अगुवाई में कटोचों के दिल्ली तक के इलाके पर हमला किया और लूटा। तुग़लक़ों ने डर और सम्मान में इन्हे मियां की उपाधि दी। कटोचों ने तैमूर के खिलाफ भी युद्ध लड़ा।
C. 1405 AD
काँगड़ा राज्य फिर से दो भागों में बटा और गुलेर राज्य की स्थापना हुई। गुलेर राज्य के कटोच आज के गुलेरिआ राजपूत कहलाए।
C.1450 AD
गुलेर राज्य भी दो भागों में बट गया और नए सिबा राज्य की स्थापना हुई। सिबा राज्य के कटोच सिबिया राजपूत कहलाए।
C. 1526 - 1556 AD
शेरशाह सूरी ने हमला किया पर उसकी पराजय हुई। उसके बाद अकबर ने काँगड़ा पर हमला किया जिसमे कटोच वंश कि हार हुई,कटोच राजा ने अकबर को संधि का न्योता भेजा जिसे अकबर ने स्वीकारा। बाद में मुग़लों ने काँगड़ा किले पर ५२ बार हमला किया पर हर बार उन्हें मूह की खानी पड़ी।इसके बाद जहाँगीर ने भी हमला किया,
C. 1620 AD
जहांगीर और शाहजहाँ के समय मुग़लों का काँगड़ा किले पर कब्ज़ा हुआ।
C. 1700 AD
महाराजा भीम चन्द्र ने ओरंगजेब कि हिन्दू विरोधी नीतियों के कारण गुरु गोविन्द सिंह जी के साथ औरंगज़ेब के खिलाफ युद्ध किया। गुरु गोविन्द सिंह जी ने उन्हें धरम रक्षक की उपाधि दी।पंजाब में आज भी इनकी बहादुरी के गीत गाये जाते हैं.
C. 1750 AD
महाराजा घमंडचन्द्र को अहमदशाह अब्दाली  द्वारा जालंधर और ११ पहाड़ी राज्यों का निज़ाम बनाया गया।
C. 1775 AD to C. 1820 AD
काँगड़ा राज्य के लिए यह स्वर्णिम युग कहा जाता है। राजा संसारचन्द्र द्वितीय की छत्र छाँव में राज्य खुशहाली से भरा।
C. 1820 AD
काँगड़ा राज्य के पतन का समय :गोरखों ने कांगड़ा राज्य पर हमला किया,राजा संसारचंद ने सिख राजा रणजीत सिंह से मदद मांगी मगर मदद के बदले महाराजा रणजीत सिंह की सिख सेना ने काँगड़ा और सीबा के किलों पर कब्ज़ा कर लिया। सीबा का किला राजा राम सिंह ने सिखों की सेना को हरा कर दुबारा जीत लिया। सिखों के दुर्व्यवहार ने महाराजा संसारचंद को बहुत आहत किया..
* 1820 - 1846 AD
सिखों ने काँगड़ा को अंग्रेजो ( ईस्ट इंडिया कंपनी को) सौंप दिया। कटोच राजाओ ने कांगड़ा की आजादी की जंग छेडी। यह आजादी के लिए प्रथम युद्धों और संघर्षों में से था। राजा प्रमोद चन्द्र के नेतृत्व में लड़ी गयी यह जंग कटोच हार गए। राजा प्रमोद चन्द्र को अल्मोड़ा जेल में बंधी बना कर रखा गया। वहां उनकी मृत्यु हो गई।
*1924 AD
महाराजा जय चन्द्र काँगड़ा- लम्बा गाँव को महराजा की उपाधि से नवाजा गया और ११ बंदूकों की सलामी उन्हें दी जाने लगी।
*1947 AD
महाराजा ध्रुव देव चन्द्र ने काँगड़ा को भारत में मिलाने की अनुमति दी।
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=====कांगड़ा का किला======
कांगड़ा का दुर्ग स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है,ये दुर्ग इतना विशाल और मजबूत था की इसे देवकृत माना जाता था,इसे नगरकोट अथवा भीमनगर का दुर्ग भी कहा जाता था,कटोच राजवंश के पूर्वज सुशर्माचंद द्वारा निर्मित इस दुर्ग पर पहला हमला महमूद गजनवी ने किया,इसके बाद गौरी,तैमूर,शेरशाह सूरी,अकबर,शाहजहाँ,गोरखों,सिखों ने भी हमला किया,सदियों तक यह महान दुर्ग अपने ऐश्वर्य,आक्रमण,विनाश के बीच झूलता रहा,यह दुर्ग प्राचीन चन्द्रवंशी कटोच राजपूतों के गौरवशाली इतिहास कि गवाही देता है,
कांगड़ा का अजेय दुर्ग जिसे दुश्मन कि तोपें भी न तोड़ सकी वो सन 1905 में आये भयानक भूकम्प में धराशाई हो गया,मगर इसके खंडर आज भी चंद्रवंशी कटोच राजवंश के गौरवशाली अतीत कि याद दिलाते हैं.
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Katoch is the name of a Rajput clan belonging to the chandravanshi Kshatriya lineage. Their traditional areas of residence was Trigarta Kingdom, Jalandhar, Multan i.e. the areas of residence are mainly in the Indian states of Punjab,Punjab hills (Himachal Pradesh). Katoch Dynasty is an offshoot of Trigratraje Dynasty.

The Katoch dynasty is considered to be the oldest surviving royal dynasty in the world.They first find mention in the Hindu epics Ramayana and Mahabharata and the second mention is in the recorded history of Alexander the Great's war records. One of the Indian kings who in the time of Alexander ruled the area near Kangra is said to be a Katoch king. In Mahabharata they are referred to as Trigarta who fought Arjuna. Raja Susarma Chandra fought Pandava Arjuna. He was an ally of Duryodhana and sworn enemy of the Virat and Matsya Kingdoms.The katoch's were also known for their sword skills.

In past centuries, they ruled several princely states in the region. The originator of the clan was Rajanaka Bhumi Chand. Their famous Maharaja Sansar Chand II was a great ruler. The ruler Rajanaka Bhumi Chand Katoch founded the Jwalaji Temple in Himachal Pradesh.

The history of the Katoch Dynasty has been showcased at the Maharaja Sansar Chand Museum adjoining the Kangra Fort. The Museum provides audio guides for the fort and the museum.The Maharaja Sansar Chandra Museum was officially inaugurated by His Holiness the Dalai Lama on the 6th of April 2011.

===========Present Head State and Clan Head===============
The head of royal family of Kangra is considered as the head of Katoch dynasty. After the fall of Kangra to the Britishers (East India Company) in 1820's ,the royal family was granted a jagir of 20 villages at Lambagraon. Therefrom, the head of house at Lambagraon is considered as the head of Katoch dynasty.

Raja Shri ADITYA DEV CHAND KATOCH, 488th and present Raja of his line, Head of the Royal House of Kangra, Jagirdar of Lambagraon, Rajgir and Mahal Moria since 1988 (Clouds End Villa, Dharamsala, District Kangra, Himachal Pradesh, India) educated at the Doon School, Dehra Dun; married 4th December 1968, Rani Shrimati Chandresh Kumari, daughter of HH Raj Rajeshwar Maharajadhiraj Maharaja Shri Hanwant Singhji Sahib Bahadur of Jodhpur, and his wife, HH Maharani Krishna Kumari Ba Sahiba, and has issue.

Tikka Aishwariya Chand Katoch, born 16th January 1970, married about 1997, Tikkarani Shailaja Kumari, daughter of HH Raja Vikram Singhji of Sailana, and his wife, HH Rani Chandra Kumari, and has issue.
Natiraj Ambikeshwar Dev Chand Katoch, born 22nd December 1998.

=============Chronology of the Katoch dynasty and Periodical Brief History=================
C. 7800 BC
Rajanaka Bhumi Chand founded the Katoch Dynasty

C. Description of this Dynasty found between the reign 7800 BC - 4000 BC
The Rajas of Kangra fought against the Hindu deity lord Rama

C. Description of this Dynasty found between the reign 4000 BC - 1500 BC
Raja sushurma chand built the fort of Kangra and fought against pandavas in epic mahabharta

C. 900 BC
The Katoch kings fought the Persian and Assyrian attacks on Punjab

C. 500 BC to
Rajanaka Paramanand Chandra, fought Alexander the Great

C. 275 BC

The Katoch Rajas fought Ashoka the Great and lost their lands in Multan
C. 100 AD

The Rajas of Kangra fought numerous battles against the Rajas of Kannauj

C. 470 AD
The Rajas of Kangra fought the Rajas of Kashmir for the supremacy in the hills

C. 643 AD
Hsuan Tsang visited the Kingdom of Kangra (then known as "Jallandhra")

C. 853 AD
Rajanaka Prithvi Chandra's reign

C. 1009 AD
Mahmud of Ghazni invades Kangra

C. 1170 AD
Kingdom of Kangra is divided into two parts, Kangra and Jaswan
The Katoch armies fight against Muhammad of Ghor (the lands of Jalandhar were lost c. 1220 AD)

C. 1341 AD
Rajanaka Rup Chandra's looting expeditions take him till the gates of Delhi
The Katoch kings fight Taimur
Tughlaqs grant the title of Mian to the Katoch Royal Family

C. 1405 AD
Further division of the Kangra State; state of Guler is founded

C.1450 AD
Further Guler State is also divided and a new State namely Siba is founded.

C. 1526 - 1556 AD
Sikandar Shah Suri and the Rajas of Kangra combine their forces against Akbar but are defeated
The Raja of Kangra renders his alliance to Emperor Akbar and in return in given the title of Maharaja
Later, the Mughals attack the Kangra Fort 52 times but fail to capture it.

C. 1620 AD
Mughals occupy the fort of Kangra

C. 1700 AD
Maharaja Bhim Chandra unites with Guru Gobind Singh against Aurangzeb
He receives the title of Dharam Rakshak from the Guru

C. 1750 AD
Maharaja Ghamand Chandra is made the (first ever Rajput) Nizam of Jalandhar by the Durranis

C. 1775 AD to C. 1820 AD
The golden age of Kangra under Raja Sansar Chand-II
Kangra miniature painting flourishes under him

C. 1820 AD
Decline of the Kangra state
Kangra Fort occupied by the Sikhs after a war but the Fort of Siba was re-captured by Raja Ram Singh after defeated the army of Maharaja Ranjit Singh.
Later Katoch Kings re-captured Kangra Fort after defeated Sikh Armies.

1846 AD
The Sikhs cede Kangra to the HEIC
The Katoch kings fight for their independence against the British. Raja Pramod Chand loses the battle and is taken prisoner to Almoda – he dies there

1924 AD
Maharaja Jai Chandra of Kangra-Lambagraon is granted the title of "Maharaja" as a hereditary distinction, and a salute of 11 guns as a personal honour.

1947 AD
Maharaja Dhruv Dev Chandra (last ruler of Kangra-Lambagraon) merges his estate with the Dominion of India, when India gains Independence

1972 AD
The Princely Order is abolished in India and the Rajas of Kangra-Lambagraon become ordinary citizens. The current head of the Katoch Clan is Maharaja Aditya Katoch. His wife Rani Chandresh Kumari was the Union Minister of Culture for India in 2014.
The district of Kangra is merged with the newly founded state of Himachal Pradesh.Siba State is simply incorporated in India.
Raja Ram Singh of Sibaia clan defeated the army of Maharaja Ranjit Singh and re-captured the fort of Siba State. The British attempts to conquer the Siba State were thwarted by Sunder Singh (Raja Sahib), brother of Raja Ram Singh. Sunder Singh also established Tantpalan domense. Tantpalan domense, presently, falls in District:Hoshiarpur(Punjab)

=====Branches of Katoch Dynasty==========
Jaswal - Raja Naginder Singh is the present head of Jaswal Clan
Guleria - Raja Brijesh Chand Guleria is the present head of Guleria Clan
Sibaia - Raja Dr.Ashok K.Thakur is the present head of Sibaia Clan
Dadhwal - Kanwar Deepak singh is the present head of Dadwal Clan
Dhaloch - Pratap singh Dhaloch is the present head of Dhaloch 

=====References======
* H.A. Rose, A glossary of the tribes and castes of the Punjab and North-West India, Volume 1, page 263
*Mark Brentnall, The Princely and Noble Families of the Former Indian Empire: Himachal Pradesh, page 312
* Dharam Prakash Gupta, "Seminar on Katoch dynasty trail". Himachal Plus. On line.
* Mark Brentnall, The Princely and Noble Families of the Former Indian Empire: Himachal Pradesh, page 312
* A beautiful article from famous Rajput and Military Historian Airavat Singh ji
* http://kshatriyawiki.com/wiki/Katoch
*राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 292 से 299 देवी सिंह मंडावा 
*क्षत्रिय राजवंश पृष्ठ संख्या 359 रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी 
*राजपूत वंशावली पृष्ठ संख्या 35,183 ईश्वर सिंह मुंडाढKatoch is the name of a Rajput clan belonging to the chandravanshi Kshatriya lineage. Their traditional areas of residence was Trigarta Kingdom, Jalandhar, Multan i.e. the areas of residence are mainly in the Indian states of Punjab,Punjab hills (Himachal Pradesh). Katoch Dynasty is an offshoot of Trigratraje Dynasty.
The Katoch dynasty is considered to be the oldest surviving royal dynasty in the world.They first find mention in the Hindu epics Ramayana and Mahabharata and the second mention is in the recorded history of Alexander the Great's war records. One of the Indian kings who in the time of Alexander ruled the area near Kangra is said to be a Katoch king. In Mahabharata they are referred to as Trigarta who fought Arjuna. Raja Susarma Chandra fought Pandava Arjuna. He was an ally of Duryodhana and sworn enemy of the Virat and Matsya Kingdoms.The katoch's were also known for their sword skills.


In past centuries, they ruled several princely states in the region. The originator of the clan was Rajanaka Bhumi Chand. Their famous Maharaja Sansar Chand II was a great ruler. The ruler Rajanaka Bhumi Chand Katoch founded the Jwalaji Temple in Himachal Pradesh.
The history of the Katoch Dynasty has been showcased at the Maharaja Sansar Chand Museum adjoining the Kangra Fort. The Museum provides audio guides for the fort and the museum.The Maharaja Sansar Chandra Museum was officially inaugurated by His Holiness the Dalai Lama on the 6th of April 2011.
===========Present Head State and Clan Head===============
The head of royal family of Kangra is considered as the head of Katoch dynasty. After the fall of Kangra to the Britishers (East India Company) in 1820's ,the royal family was granted a jagir of 20 villages at Lambagraon. Therefrom, the head of house at Lambagraon is considered as the head of Katoch dynasty.
Raja Shri ADITYA DEV CHAND KATOCH, 488th and present Raja of his line, Head of the Royal House of Kangra, Jagirdar of Lambagraon, Rajgir and Mahal Moria since 1988 (Clouds End Villa, Dharamsala, District Kangra, Himachal Pradesh, India) educated at the Doon School, Dehra Dun; married 4th December 1968, Rani Shrimati Chandresh Kumari, daughter of HH Raj Rajeshwar Maharajadhiraj Maharaja Shri Hanwant Singhji Sahib Bahadur of Jodhpur, and his wife, HH Maharani Krishna Kumari Ba Sahiba, and has issue.
Tikka Aishwariya Chand Katoch, born 16th January 1970, married about 1997, Tikkarani Shailaja Kumari, daughter of HH Raja Vikram Singhji of Sailana, and his wife, HH Rani Chandra Kumari, and has issue.
Natiraj Ambikeshwar Dev Chand Katoch, born 22nd December 1998.
=============Chronology of the Katoch dynasty and Periodical Brief History=================
C. 7800 BC
Rajanaka Bhumi Chand founded the Katoch Dynasty
C. Description of this Dynasty found between the reign 7800 BC - 4000 BC
The Rajas of Kangra fought against the Hindu deity lord Rama
C. Description of this Dynasty found between the reign 4000 BC - 1500 BC
Raja sushurma chand built the fort of Kangra and fought against pandavas in epic mahabharta
C. 900 BC
The Katoch kings fought the Persian and Assyrian attacks on Punjab
C. 500 BC to
Rajanaka Paramanand Chandra, fought Alexander the Great
C. 275 BC
The Katoch Rajas fought Ashoka the Great and lost their lands in Multan
C. 100 AD
The Rajas of Kangra fought numerous battles against the Rajas of Kannauj
C. 470 AD
The Rajas of Kangra fought the Rajas of Kashmir for the supremacy in the hills
C. 643 AD
Hsuan Tsang visited the Kingdom of Kangra (then known as "Jallandhra")
C. 853 AD
Rajanaka Prithvi Chandra's reign
C. 1009 AD
Mahmud of Ghazni invades Kangra
C. 1170 AD
Kingdom of Kangra is divided into two parts, Kangra and Jaswan
The Katoch armies fight against Muhammad of Ghor (the lands of Jalandhar were lost c. 1220 AD)
C. 1341 AD
Rajanaka Rup Chandra's looting expeditions take him till the gates of Delhi
The Katoch kings fight Taimur
Tughlaqs grant the title of Mian to the Katoch Royal Family
C. 1405 AD
Further division of the Kangra State; state of Guler is founded
C.1450 AD
Further Guler State is also divided and a new State namely Siba is founded.
C. 1526 - 1556 AD
Sikandar Shah Suri and the Rajas of Kangra combine their forces against Akbar but are defeated
The Raja of Kangra renders his alliance to Emperor Akbar and in return in given the title of Maharaja
Later, the Mughals attack the Kangra Fort 52 times but fail to capture it.
C. 1620 AD
Mughals occupy the fort of Kangra
C. 1700 AD
Maharaja Bhim Chandra unites with Guru Gobind Singh against Aurangzeb
He receives the title of Dharam Rakshak from the Guru
C. 1750 AD
Maharaja Ghamand Chandra is made the (first ever Rajput) Nizam of Jalandhar by the Durranis
C. 1775 AD to C. 1820 AD
The golden age of Kangra under Raja Sansar Chand-II
Kangra miniature painting flourishes under him
C. 1820 AD
Decline of the Kangra state
Kangra Fort occupied by the Sikhs after a war but the Fort of Siba was re-captured by Raja Ram Singh after defeated the army of Maharaja Ranjit Singh.
Later Katoch Kings re-captured Kangra Fort after defeated Sikh Armies.
1846 AD
The Sikhs cede Kangra to the HEIC
The Katoch kings fight for their independence against the British. Raja Pramod Chand loses the battle and is taken prisoner to Almoda – he dies there
1924 AD
Maharaja Jai Chandra of Kangra-Lambagraon is granted the title of "Maharaja" as a hereditary distinction, and a salute of 11 guns as a personal honour.
1947 AD
Maharaja Dhruv Dev Chandra (last ruler of Kangra-Lambagraon) merges his estate with the Dominion of India, when India gains Independence
1972 AD
The Princely Order is abolished in India and the Rajas of Kangra-Lambagraon become ordinary citizens. The current head of the Katoch Clan is Maharaja Aditya Katoch. His wife Rani Chandresh Kumari was the Union Minister of Culture for India in 2014.
The district of Kangra is merged with the newly founded state of Himachal Pradesh.Siba State is simply incorporated in India.
Raja Ram Singh of Sibaia clan defeated the army of Maharaja Ranjit Singh and re-captured the fort of Siba State. The British attempts to conquer the Siba State were thwarted by Sunder Singh (Raja Sahib), brother of Raja Ram Singh. Sunder Singh also established Tantpalan domense. Tantpalan domense, presently, falls in District:Hoshiarpur(Punjab)
=====Branches of Katoch Dynasty==========
Jaswal - Raja Naginder Singh is the present head of Jaswal Clan
Guleria - Raja Brijesh Chand Guleria is the present head of Guleria Clan
Sibaia - Raja Dr.Ashok K.Thakur is the present head of Sibaia Clan
Dadhwal - Kanwar Deepak singh is the present head of Dadwal Clan
Dhaloch - Pratap singh Dhaloch is the present head of Dhaloch

====कटोच वंश के गोत्र,कुलदेवी आदि=====
गोत्र-अत्री
ऋषि-कश्यप
देवी-ज्वालामुखी देवी
वंश-चन्द्रवंश,भुमिवंश
गद्दी एवं राज्य-मुल्तान,जालन्धर,नगरकोट,कांगड़ा,गुलेर,जसवान,सीबा,दातारपुर,लम्बा आदि
शाखाएँ-जसवाल,गुलेरिया,सबैया,डढवाल,धलोच आदि
उपाधि-मिया
वर्तमान निवास-हिमाचल प्रदेश,जम्मू कश्मीर,पंजाब आदि
==============================
=== कटोच वंश का परिचय ===
सेपेल ग्रिफिन के अनुसार कटोच राजपूत वंश विश्व का सबसे पुराना राजवंश है। कटोच चंद्रवंशी क्षत्रिय माने जाते है। कटोच राजघराना एवं राजपूत वंश महाभारत काल से भी पहले से उत्तर भारत के हिमाचल व पंजाब के इलाके में राज कर रहा है। महाभारत काल में कटोच राज्य को त्रिगर्त राज्य के नाम से जाना जाता था और आज के कटोच राजवंशी त्रिगर्त राजवंश के ही उत्तराधिकारी है।कल्हण कि राजतरंगनी में त्रिगर्त राज्य का जिक्र है,कल्हण के अनुसार कटोच वंश के राजा इन्दुचंद कि दो राजकुमारियों का विवाह कश्मीर के राजा अनन्तदेव(१०३०-१०४०)के साथ हुआ था,
पृथ्वीराज रासो में इस वंश का नाम कारटपाल मिलता है,
अबुल फजल ने भी नगरकोट राज्य,कांगड़ा दुर्ग एवं ज्वालामुखी मन्दिर का जिक्र किया है,
यूरोपियन यात्री विलियम फिंच ने 1611 में अपनी यात्रा में कांगड़ा का जिक्र किया था,डा व्युलर लिखता है की कांगड़ा राज्य का एक नाम सुशर्मापुर था जो कटोच वंश को प्राचीन त्रिगर्त वंश के शासक सुशर्माचन्द का वंशज सिद्ध करता है,
त्रिगर्त राज्य की सीमाएँ एक समय पूर्वी पाकिस्तान से लेकर उत्तर में लद्दाख तथा पूरे हिमाचल प्रदेश में फैलि हुईं थी। त्रिगर्त राज्य का जिक्र रामायण एवं महाभारत में भी भली भांति मिलता है। कटोच राजा सुशर्माचन्द्र ने दुर्योधन का साथ देते हुए पांडवों के विरुद्ध युद्ध लड़ा था। सुशर्माचन्द्र का अर्जुन से युद्ध का जिक्र भी महाभारत में मिलता है। त्रिगर्त राज्य की मत्स्य और विराट राज्य के साथ शत्रुता का जिक्र महाभारत में उल्लेखित है।
कटोच वंश का जिक्र सिकंदर के युद्ध रिकार्ड्स में भी जाता है। इस वंश ने सिकंदर के भारत पर आक्रमण के समय उससे युद्ध छेड़ा और काँगड़ा राज्य को बचाने में सक्षम रहे।
ब्रह्म पूराण के अनुसार कटोच वंश के मूल पुरुष राजा भूमि चन्द्र माने जाते है,इस कारण इस वंश को भुमिवंश भी कहा जाता है.इन्होने जालन्धर असुर को नष्ट किया था जिस कारण देवी ने प्रसन्न होकर इन्हें जालन्धर असुर का राज्य त्रिगर्त राज्य दिया था,इस वंश का राज्य पहले मुल्तान में था,बाद में जालन्धर में इनका शासन हुआ,जालन्धर और त्रिगर्त पर्यायवाची शब्द है
भुमिचंद ने सन ४३०० ईसा पूर्व में कटोच वंश एवं त्रिगर्त राज्य की स्थापना की। यह वंश कितना पुराना इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है के महाभारत कल के राजा सुशर्माचंद राजा भूमिचन्द्र के २३४ वीं पीढ़ी में पैदा हुए।
इस प्राचीन चंद्रवंशी राजवंश ने सदियों से विदेशी,देशी हमलावरों का वीरतापूर्वक सामना किया है,
हिमाचल प्रदेश का मसहूर काँगड़ा किला भी कटोच वंश के क्षत्रियों की धरोहर है। कटोच वंश के बारे में काँगड़ा किले में बने महाराजा संसारचन्द्र संग्रहालय से बहूत कुछ जाना जा सकता है।
===========================================
==== कटोच वंश के वर्तमान टिकाई मुखिया और राजपरिवार ====
राजा श्री आदित्य देव चन्द्र कटोच , कटोच वंश के ४८८ वे राजा और काँगड़ा राजपरिवार के मुखिया एवं लम्बा गाँव के जागीरदार है। यह पदवी इन्हे सं १९८८ से प्राप्त है। ४ दिसंबर १९६८ में इनकी शादी जोधपुर राजघराने की चंद्रेश कुमारी से हुई। इनके पुत्र टिक्का ऐश्वर्या चन्द्र कटोच कटोच वंश के भावी मुखिया है।
काँगड़ा राजघराने ने सन १८०० के आस पास से ही अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का युद्ध छेड़ दिया था। संघर्ष काफी समय तक चला जिसमे इस परिवार को काँगड़ा गंवाना पड़ा। आख़िरकार सं १८१० में दोनों पक्षों के बीच संधि हुई और काँगड़ा राजपरिवार को लम्बा गांव की जागीर मिली। तत्पश्चात काँगड़ा राजपरिवार और कटोच राजपूतो के राजगद्दी लम्बा गॉव के जागीरदार के मानी जाती है।
==========================================
=== कटोच वंश की शाखाएँ ===
कटोच वंश की चार मुख्य शाखाएँ है :
1. जसवाल : ११७० ईस्वीं में जसवान का राज्य स्थापित होने के बाद यह शाख अलग हुई।
2. गुलेरिया : १४०५ ईस्वीं में कटोचों के गुलेर राज्य स्थापित होने के बाद कटोच से यह शाखा अलग हुई।
3. सबैया : १४५० ईस्वी के दौरान गुलेर से सिबा राज्य अलग होने के बाद सिबा के गुलेर सबैया कटोच कहलाए।
4. डढ़वाल : १५५० में इस शाखा ने दातारपुर राज्य की स्थापना की, इस शाखा का नाम डढा नामक स्थान पर बसावट के कारन पड़ा।
कटोच वंश की अन्य शाखाए धलोच,गागलिया,गदोहिया,जडोत,गदोहिया आदि भी है।
=========================================
==== कटोच वंश की संछिप्त वंशावली और तत्कालीन समय का जुड़ा हुआ इतिहास ====
C. 7800 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
राजनका (राजपूत का प्रयायवाची शब्द) भूमि चन्द्र से इस वंश की शुरुआत हुई।जिन्होंने त्रिगर्त राज्य जालन्धर असुर को मारकर प्राप्त किया,मुल्तान(मूलस्थान)इन्ही का राज्य था.
C. 7800 - 4000 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
त्रिगर्त राजवंश यानी मूल कटोच वंशियों ने श्री राम के खिलाफ युद्ध लड़ा(रामायण में उल्लेखित)
C. 4000 - 1500 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
त्रिगता नरेश शुशर्माचंद ने काँगड़ा किले की स्थापना की और पांडवों के खिलाफ युद्ध लड़ा।
( महाभारत में उल्लेखित)
C. 900 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
कटोच राजाओं ने ईरानी व असीरिआई आक्रमणकारियों के खिलाफ युद्ध लड़ा और पंजाब की रक्षा की।
C. 500 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
राजनका परमानन्द चन्द्र ने सिकंदर के खिलाफ युद्ध लड़ा।
C. 275 ईसा पूर्व के दौरान कटोच वंश का उल्लेख
कटोच राजाओं ने अशोक महान के खिलाफ युद्ध लड़े और मुल्तान हार गए।
C. 100 AD
काँगड़ा राजघराने ने कन्नौज के खिलाफ बहुत सारे युद्ध लड़े।
C. 470 AD
काँगड़ा के राजाओं ने हिमालय पर प्रभुत्व ज़माने के लिए कश्मीर के राजाओं के साथ कई युद्ध किए।
C. 643 AD
Hsuan Tsang ने कांगड़ा राज्य का दौरा किया उस समय इस राज्य को जालंधर के नाम से जाना जाने लगा था।
C. 853 AD
राजनका पृथ्वी चन्द्र का राज्य अभिषेक हुआ।
C. 1009 AD
महमूद ग़ज़नी ने सन 1009 में काँगड़ा(भीमनगर)पर आक्रमण किया।इस हमले के समय जगदीशचन्द्र यहाँ के राजा थे,
C. 1170 AD
काँगड़ा राज्य जस्वान और काँगड़ा दो भागों में विभाजित हुआ। राजा पूरब चन्द्र कटोच से जस्वान राज्य पर गद्दी जमाई और कटोच वंश में जसवाल शाखा की शुरुआत हुई। कटोच और मुहम्मद घोरी के बीच में युद्ध छिड़ा जिसमे(१२२० AD) कटोच जालंधर हार गए।
C. 1341 AD
राजनका रुपचंद्र की अगुवाई में कटोचों के दिल्ली तक के इलाके पर हमला किया और लूटा। तुग़लक़ों ने डर और सम्मान में इन्हे मियां की उपाधि दी। कटोचों ने तैमूर के खिलाफ भी युद्ध लड़ा।
C. 1405 AD
काँगड़ा राज्य फिर से दो भागों में बटा और गुलेर राज्य की स्थापना हुई। गुलेर राज्य के कटोच आज के गुलेरिआ राजपूत कहलाए।
C.1450 AD
गुलेर राज्य भी दो भागों में बट गया और नए सिबा राज्य की स्थापना हुई। सिबा राज्य के कटोच सिबिया राजपूत कहलाए।
C. 1526 - 1556 AD
शेरशाह सूरी ने हमला किया पर उसकी पराजय हुई। उसके बाद अकबर ने काँगड़ा पर हमला किया जिसमे कटोच वंश कि हार हुई,कटोच राजा ने अकबर को संधि का न्योता भेजा जिसे अकबर ने स्वीकारा। बाद में मुग़लों ने काँगड़ा किले पर ५२ बार हमला किया पर हर बार उन्हें मूह की खानी पड़ी।इसके बाद जहाँगीर ने भी हमला किया,
C. 1620 AD
जहांगीर और शाहजहाँ के समय मुग़लों का काँगड़ा किले पर कब्ज़ा हुआ।
C. 1700 AD
महाराजा भीम चन्द्र ने ओरंगजेब कि हिन्दू विरोधी नीतियों के कारण गुरु गोविन्द सिंह जी के साथ औरंगज़ेब के खिलाफ युद्ध किया। गुरु गोविन्द सिंह जी ने उन्हें धरम रक्षक की उपाधि दी।पंजाब में आज भी इनकी बहादुरी के गीत गाये जाते हैं.
C. 1750 AD
महाराजा घमंडचन्द्र को अहमदशाह अब्दाली द्वारा जालंधर और ११ पहाड़ी राज्यों का निज़ाम बनाया गया।
C. 1775 AD to C. 1820 AD
काँगड़ा राज्य के लिए यह स्वर्णिम युग कहा जाता है। राजा संसारचन्द्र द्वितीय की छत्र छाँव में राज्य खुशहाली से भरा।
C. 1820 AD
काँगड़ा राज्य के पतन का समय :गोरखों ने कांगड़ा राज्य पर हमला किया,राजा संसारचंद ने सिख राजा रणजीत सिंह से मदद मांगी मगर मदद के बदले महाराजा रणजीत सिंह की सिख सेना ने काँगड़ा और सीबा के किलों पर कब्ज़ा कर लिया। सीबा का किला राजा राम सिंह ने सिखों की सेना को हरा कर दुबारा जीत लिया। सिखों के दुर्व्यवहार ने महाराजा संसारचंद को बहुत आहत किया..
* 1820 - 1846 AD
सिखों ने काँगड़ा को अंग्रेजो ( ईस्ट इंडिया कंपनी को) सौंप दिया। कटोच राजाओ ने कांगड़ा की आजादी की जंग छेडी। यह आजादी के लिए प्रथम युद्धों और संघर्षों में से था। राजा प्रमोद चन्द्र के नेतृत्व में लड़ी गयी यह जंग कटोच हार गए। राजा प्रमोद चन्द्र को अल्मोड़ा जेल में बंधी बना कर रखा गया। वहां उनकी मृत्यु हो गई।
*1924 AD
महाराजा जय चन्द्र काँगड़ा- लम्बा गाँव को महराजा की उपाधि से नवाजा गया और ११ बंदूकों की सलामी उन्हें दी जाने लगी।
*1947 AD
महाराजा ध्रुव देव चन्द्र ने काँगड़ा को भारत में मिलाने की अनुमति दी।
====================================
=====कांगड़ा का किला======
कांगड़ा का दुर्ग स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है,ये दुर्ग इतना विशाल और मजबूत था की इसे देवकृत माना जाता था,इसे नगरकोट अथवा भीमनगर का दुर्ग भी कहा जाता था,कटोच राजवंश के पूर्वज सुशर्माचंद द्वारा निर्मित इस दुर्ग पर पहला हमला महमूद गजनवी ने किया,इसके बाद गौरी,तैमूर,शेरशाह सूरी,अकबर,शाहजहाँ,गोरखों,सिखों ने भी हमला किया,सदियों तक यह महान दुर्ग अपने ऐश्वर्य,आक्रमण,विनाश के बीच झूलता रहा,यह दुर्ग प्राचीन चन्द्रवंशी कटोच राजपूतों के गौरवशाली इतिहास कि गवाही देता है,
कांगड़ा का अजेय दुर्ग जिसे दुश्मन कि तोपें भी न तोड़ सकी वो सन 1905 में आये भयानक भूकम्प में धराशाई हो गया,मगर इसके खंडर आज भी चंद्रवंशी कटोच राजवंश के गौरवशाली अतीत कि याद दिलाते हैं.
=====================================================

=====References======
* H.A. Rose, A glossary of the tribes and castes of the Punjab and North-West India, Volume 1, page 263
*Mark Brentnall, The Princely and Noble Families of the Former Indian Empire: Himachal Pradesh, page 312
* Dharam Prakash Gupta, "Seminar on Katoch dynasty trail". Himachal Plus. On line.
* Mark Brentnall, The Princely and Noble Families of the Former Indian Empire: Himachal Pradesh, page 312
* A beautiful article from famous Rajput and Military Historian Airavat Singh ji
* http://kshatriyawiki.com/wiki/Katoch

 *राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 292 से 299 देवी सिंह मंडावा
*क्षत्रिय राजवंश पृष्ठ संख्या 359 रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी
*राजपूत वंशावली पृष्ठ संख्या 35,183 ईश्वर सिंह मुंडाढ

शूरवीर सम्राट विक्रमादित्य/ Great King Vikramaditya

******शूरवीर सम्राट विक्रमादित्य*****
कृपया इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

******शूरवीर सम्राट विक्रमादित्य*****

 अंग्रेज और वामपंथी इतिहासकार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य को एतिहासिक शासक न मानकर एक मिथक मानते हैं।जबकि कल्हण की राजतरंगनी,कालिदास 
,नेपाल की वंशावलिया और अरब लेखक,अलबरूनी उन्हें वास्तविक महापुरुष मानते हैं।
उनके समय शको ने देश के बड़े भू भाग पर कब्जा जमा लिया था।विक्रम ने शको को भारत से मार भगाया और अपना राज्य अरब देशो तक फैला दिया था। 
उनके नाम पर विक्रम सम्वत चलाया गया। विक्रमादित्य ईसा मसीह के समकालीन थे और उस वक्त उनका शासन अरब तक फैला था। विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में वर्णन मिलता है।
इनके पिता का नाम गन्धर्वसेन था एवं प्रसिद्ध योगी भर्तहरी इनके भाई थे।
विक्रमादित्य के इतिहास को अंग्रेजों ने जान-बूझकर तोड़ा और भ्रमित किया और उसे एक मिथ‍कीय चरित्र बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, क्योंकि विक्रमादित्य उस काल में महान व्यक्तित्व और शक्ति का प्रतीक थे, जबकि अंग्रेजों को यह सिद्ध करना जरूरी था कि ईसा मसीह के काल में दुनिया अज्ञानता में जी रही थी। दरअसल, विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्र तक फैला था और संपूर्ण धरती के लोग उनके नाम से परिचित थे। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। इनमें कालिदास भी थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।
विक्रमादित्य के समय ज्योतिषाचार्य मिहिर, महान कवि कालिदास थे। 
राजा विक्रम उनकी वीरता, उदारता, दया, क्षमा आदि गुणों की अनेक गाथाएं भारतीय साहित्य में भरी पड़ी हैं।
अधिकांश विद्वान विक्रमादित्य को परमार वंशी क्षत्रिय राजपूत मानते हैं। मालवा के परमार वंशी राजपूत राजा भोज विक्रमादित्य को अपना पूर्वज मानते थे।
जो भी हो पर इतना निर्विवाद सत्य है कि सम्राट विक्रमादित्य भारतीय इतिहास के सर्वश्रेष्ठ शासक थे।अंग्रेज और वामपंथी इतिहासकार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य को एतिहासिक शासक न मानकर एक मिथक मानते हैं।जबकि कल्हण की राजतरंगनी,कालिदास ...
,नेपाल की वंशावलिया और अरब लेखक,अलबरूनी उन्हें वास्तविक महापुरुष मानते हैं।
उनके समय शको ने देश के बड़े भू भाग पर कब्जा जमा लिया था।विक्रम ने शको को भारत से मार भगाया और अपना राज्य अरब देशो तक फैला दिया था।
उनके नाम पर विक्रम सम्वत चलाया गया। विक्रमादित्य ईसा मसीह के समकालीन थे और उस वक्त उनका शासन अरब तक फैला था। विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में वर्णन मिलता है।
इनके पिता का नाम गन्धर्वसेन था एवं प्रसिद्ध योगी भर्तहरी इनके भाई थे।
विक्रमादित्य के इतिहास को अंग्रेजों ने जान-बूझकर तोड़ा और भ्रमित किया और उसे एक मिथ‍कीय चरित्र बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, क्योंकि विक्रमादित्य उस काल में महान व्यक्तित्व और शक्ति का प्रतीक थे, जबकि अंग्रेजों को यह सिद्ध करना जरूरी था कि ईसा मसीह के काल में दुनिया अज्ञानता में जी रही थी। दरअसल, विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्र तक फैला था और संपूर्ण धरती के लोग उनके नाम से परिचित थे। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। इनमें कालिदास भी थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।


 विक्रमादित्य के समय ज्योतिषाचार्य मिहिर, महान कवि कालिदास थे।
राजा विक्रम उनकी वीरता, उदारता, दया, क्षमा आदि गुणों की अनेक गाथाएं भारतीय साहित्य में भरी पड़ी हैं।
अधिकांश विद्वान विक्रमादित्य को परमार वंशी क्षत्रिय राजपूत मानते हैं। मालवा के परमार वंशी राजपूत राजा भोज विक्रमादित्य को अपना पूर्वज मानते थे।
जो भी हो पर इतना निर्विवाद सत्य है कि सम्राट विक्रमादित्य भारतीय इतिहास के सर्वश्रेष्ठ शासक थे।

Love Story of Man Singh and Gurjar"Mrignayani" #rajput #mansingh

--- इतिहास कि अनोखी प्रेम कहानी और क्षत्रियों में रक्त की शुद्धता बनाए रखने के संकल्प का उत्तम उद्धारण ---

ये चित्र ग्वालियर के गूजरी महल का है जो इतिहास कि शानदार इमारतो में से एक हैं ।

राजपूत राजा राजा मान सिहं तोमर और गुज्जर जाति कि एक आम लडकी ' मृगनयनी ' की ।
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उन दिनों अक्सर मुगलों के आक्रमण होते रहते थे। सिकन्दर लोदी और गयासुद्दीन खिलजी ने कई बार ग्वालियर के किले पर धावा किया, पर वे सफल न हो सके। तब उन्होने आसपास के गांवो को नष्ट कर उनकी फसलें लूटना शुरू कर दिया। उन्होने कई मन्दिरों को तोड-फोड डाला और लोगों को इतना तंग किया कि वे हमेशा भयभीत बने रहते। खासकर स्त्रियों को बहुत ही भय रहता। उन दिनों औरतों का खूबसूरत होना खतरे से खाली न रहता। कारण, मुगल उनपर आंखें लगाए रहते थें। गांवों की कई सुन्दर, भोली लडकिंया उनकी शिकार हो चुकी थी।
ऐसे समय में ग्वालियर के पास राई नामक गांव में एक गरीब गुज्जर किसान के यंहा निन्नी नामक एक सुन्दर लडकी थी। सिकन्दर लोदी के आक्रमण के समय उसके माता-पिता मारे गए थें और अब एक भाई के सिवा उसका संसार में कोई न था। वहीं उसकी रक्षा और भरण-पोषण करता था। उनके पास एक कच्चा मकान और छोटा-सा खेत था, जिसपर वे अपनी गुजर करते थे। दोनों भाई-बहिन शिकार में निपुण थें और जंगली जानवार मारा करते थे। दोनों अपनी गरीबी में भी बडे खुश रहते और गांव के सभी सामाजिक और धार्मिक कार्यों में हिससा लेते रहते थे। उनका स्वभाव और व्यवहार इतना अच्छा था कि पूरा गांव उन्हे चाहता था।

धीरे-धीरे निन्नी के अनुपम भोले सौन्दर्य की खबर आसपास फैलने लगी और एक दिन मालवा के सुल्तान गयासुद्दिन को भी इसका पता लग गया। वह तो औरत और शराब के लिए जान देता ही था। उसने झट अपने आदमियों को बुलवाया और राई गांव की खूबसूरत लडकी निन्नी गूजरी को अपने महल में लाने के लिए हुक्म दिया। अन्त में दो घुडसवार इस काम के लिए चुने गए। सुल्तान ने उनसे साफ कह दिया कि यदि वे उस लडकी को लाने में कामयाब न हुए तो उनका सिर धड से अलग कर दिया जाएगा। और यदि वे उसे ले आए तो उन्हें मालामाल कर दिया जाएगा।
निन्नी गूजरी अपनी एक सहेली के साथ जंगल में शिकार को गई थी। उस दिन शाम तक उन्हें कोई शिकार नहीं मिला और वे निराश होकर लौटने ही वाली थी कि उन्हे दूर झाडी के पास कुछ आहट सुनाई दी। लाखी थककर चूर हो गई थी इसलिए वह तो वहीं बैठ गई, किन्तु निन्नी अपने तीर और भालों के साथ आगे बढ गई। झाडी के पास पहूंचने पर उसने शिकार की खोज की, पर उसे कुछ नजर नहीं आया। वह लौटने ही वाली थी कि फिर से आहट मिली। उसने देखा कि झाडी के पास एक बडे झाड के पीछे से दो घुडसवार निकले और उसकी ओर आने लगे। पहले तो निन्नी कुछ घबराई, किन्तु फिर अपना साहस इकट्ठा कर वह उनका सामना करने के लिए अडकर खडी हो गई। जैसे ही घुडसवार उससे कुछ कदम दूरी पर आए, उसने कडकती हुई आवाज हुई आवाज में चिल्लाकर कहा, तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए हो ? दोनों सवार घोडो पर से उतर गए। उनमें से एक ने कहा, हम सुल्तान गयासुद्दीन के सिपाही है, और तुम्हे लेने आए हैं। सुल्तान तुम्हे अपनी बेगम बनाना चाहता है। सवार के मुंह से इन शब्दों के निकलते ही निन्नी ने अपना तीर कमान पर चढा उसकी एक आँख को निशाना बना तेजी से फेंका। फिर दूसरा तीर दूसरी आँख पर फेंका, किन्तु वह उसकी हथेली पर अडकर रह गया, क्योंकि सवार के दोनों हाथ आखों पर आ चुके थे। इसी बीच दूसरा सवार घोडे पर चढकर तेजी से वापस लौटने लगा। निन्नी ने उसपर पहले भाले से और फिर तीरों से वार किया। वह वहीं धडाम से नीचे गिर गया। पहले सवार की आंखों से रक्त बह रहा था। निन्नी ने एक भाला उसकी छाती पर पूरी गति से फेंका और चीखकर वह भी जमीन पर लोटने लगा। फिर निन्नी तेजी से वापस चल पडी और हांफती हुई लाखी के घर पहुंची। लाखी पास के नाले से पानी पीकर लौटी थी और आराम कर रही थी। निन्नी से घुडसवारों का हाल सुन, उसके चेहरे का रंग उड गया। किन्तु निन्नी ने उसे हिम्मत दी और शिघ्रता से वापस चलने को कहा।

दूसरे दिन पूरे राई गांव में निन्नी की बहादुरी का समाचार बिजली की तरह फैल गया। ग्वालियर के राजपूत राजा मानसिंह तोमर को भी इस घटना की सूचना मिली। वे इस बहादुर लडकी से मिलने के लिए उत्सुक हो उठे। उसके बाद तो जो भी आदमी राई गांव से आते वे इस लडकी के बारे में अवश्य पूछते। एक दिन गांव का पूजारी मन्दिर बनवाने की फरियाद ले मानसिंह के पास पहुंचा। उसने भी निन्नी की वीरता के कई किस्से राजा को सुनाए। राजा को यह सुनकर बडा आश्चर्य हुआ कि निन्नी अकेली कई सूअरों और अरने-भैंसों को केवल तीरों और भालों से मार गिराती है। अन्त में मानसिंह ने पुजारी के द्वारा गांव में संदेशा भेज दिया कि वे शीघ्र ही गांव का मन्दिर बनवाने और लोगों की हालत देखने राई गांव आएंगे। 

राजा के आगमन की सूचना पाते ही गूजरों में खुशी की लहर फैल गई। हर कोई उनके स्वागत की तैयारियों में लग गया। लोगों ने अपने कच्चे मकानों को छापना और लीपन-पोतना शुरू कर दिया। जिनके पास पैसे थे उन्होने अपने लिए उस दिन पहनने के लिए एक जोडा नया कपड बनवा लिया। किन्तु जिनके पास पैसे नहीं थे उन्होने भी नदी के पानी में अपने पुराने फटे कपडों को खूबसाफकर लिया और उत्सुकता से उस दिन की राह देखने लगे। आखिर वह दिन आ ही गया। उस दिन हर दरवाजे पर आम के पतो के बंदनवार बांाधे गए और सब लोग अपने साफ कपडो को पहन, गांव के बाहर रास्ते पर राजा के स्वागत के लिए जमा हो गए। सामने औरतों की कतारें थी। वे अपने सिर पर मिटी के घडे पानी से भरकर रखे थी। और उनपर मीठे तेल के दीये जल रहे थे। सबके सामने निन्नी को खडा किया गया था, जो एक थाली में अक्षत, कुमकुम, फूल और आरती उतारने के लिए घी का एक दीया रखे हुए थी। उसने मोटे, पर साफ कपडे पहने थे। उसके बाजू से गांव का पुजारी था तथा बाकी पुरूष पंक्ति बनाकर औरतों के पीछे खडे हुए थे। जैसे ही राजा की सवारी पहुंची, पूरे गांव के लोगों ने मिलकर एक स्वर से उनकी जय-जयकार की। फिर पुजारी ने आगे बढकर पहले उनका स्वागत किया। उनके भाल पर हन्दी और कुमकुम का टीका लगाया और माला पहनाई। राजा ने ब्राहण के पैर छुए और पुजारी ने उन्हें आर्शीवाद दिया। इसके बाद पुजारी ने राजा को निन्नी का परिचय दिया। निन्नी सिर झुकाए खडी थी। उसने झट कुमकुम, अक्षत राजा के माथे पर लगाया। फूल उनकी पगडी पर फेंके और आरती उतारने लगी। मानसिंह की दृष्टि निन्नी के भोले चेहरे पर अटकी हुई थी। आरती समाप्त होते ही मानसिंह ने देखा कि निन्नी के फेंके फूलों मे से एक जमीन पर गिर पडा हैं। उन्होने झुककर उसे उठाया और अपनी पगडी में खोंस लिया। कई स्त्रियों ने यह दृश्य देखा और आपस में एक दूसरे की तरफ देखते हुए मुस्कराने लगी। विशेषकर लाख चुप न रह सकी और उसने निन्नी को चिमटी देकर चुफ से कान में कह हि दिया-’’राजा ने तुम्हारी पूजा स्वीकार कर ली हैं। अब तो तू जल्दी ही ग्वालियर की रानी बनेगी।‘‘ निन्नी के गोरे गालों पर लज्जा की लालिमा छा गई। ‘चल हट!‘ कहकर वह भीड में खो गई और राजा मन्दिर की ओर चल पडे। 

मन्दिर के पास ही राजा का पडाव डाला गया। रात्रि के समय लोगों की सभा में राजा ने मन्दिर बनवाने के लिए पांच हजार रुपयों के दान की घोषणा की। गांव में कुआं खुदवाने तथा सडक सुधारने के लिए दस हजार रुपये देने का वायदा किया। अंत में राजा ने गांव के लोगों को मुगलों से सतर्क रहने और उनका सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा। उन्होंने सबके सामने निन्नी की सुनी हुई बहादुरी की भी तारीफ की और दूसरे दिन निन्नी के जंगली जानवरों के शिकार को देखने की इच्छा प्रकट की। पुजारी ने निन्नी के भाई अटल की ओर इशारा किया। अटल ने बिना निन्नी से पूछे खडे होकर स्वीकृति दे दी। इसके बाद बहुत रात तक भजन-कीर्तन हुआ और फिर लोग अपने-अपने घर चले गए। 

दुसरे दिन शिकार की तैयारियां हुई। राजा मानसिंह के लिए एक मचान बनाया गया। निन्नी ने अपने सब हथियार साफ करके उन्हें तेज किया। बीच-बीच में निन्नी विचारों में खो जाती। कभी ग्वालियर की रानी बनने की मधुर कल्पना उसे गुमशुदा जाती तो कभी अपने एकमात्र प्रिय भाई का ख्याल, गांव का सुखी, स्वतंत्र जीवन, सांक नदी का शीतल जल, और जंगल के शिकार का आनन्द उसे दूसरे संसार में ले जाते। इसीसमय अटल ने तेजी से घर में प्रवेश किया और निन्नी को जल्दी चलने के लिए कहा। राजा ने जंगल की ओर निकल चुके थं। इसी समय लाखी भी आ गई और निन्नी लाखी के साथ शिकार के लिए चल पडी। कुछ हथियार निन्नी रखे थी और कुछ उसने लाखी को पकडा दिए थे। 

जंगल में राजा के आदमी ढोल पीट रहे थे, ताकि जानवर अपने छिपे हुए स्थानों से बाहर निकल पडें। राजा मानसिंह मचान पर बैठे थे। निन्नी और लाखी एक बडे झाड के नीचे खडी हुई थी। थोडी देर के बाद हिरण-परिवार झाडी से निकला और भागने लगा। निन्नी ने एक तीर जोर से फेंका, जो मादा हिरण को लगा, और वही वगिर पडी। नरहिरण तेजी से भगा, पर निन्नी ने उसे भी मार गिराया । इसके बाद निनी ने दौडकर दो हिरण के बच्चों ाके , जो अकेले बच गए थे, उठा लिया और गोद में रखकर झाड के नीचे ले आई। मानसिंह ने यह दृश्य देखा और मन ही मन निन्नी के कोमल हदय की प्रशंसा करने लगे। इसके बाद तो एक-एक करके कई जंगली जानवर बाहर निकले और निनी ने कभी तरों और कभी भलों से उन्हे पहले ही प्रयत्न में मार गिराया। फिर एक बडा जंगली अरना भैंसा निकला। निनी ने पूरी ताकत से दो तीर फेंके, जो सीधे भैंस के शरीर को भेद गए। किन्तु वह गिरा नहीं। घायल होने के कारण वह क्रोध में आकर चिघाडता हुआ निन्नी की ओर झपटा। मानसिंह ने अपनी बदूंक निकाल ली और वे भैंसे पर गोली चलाने ही वाले थे कि उन्होंने देखा-निन्नी ने दौडकर अरने भैसें के सींग पकड लिए है और पूरा जोर लगाकर वह उन्हे मरोड रही है। फिर बिजली की सी गति से उसने एक तेज भाला उसके माथे पर भोंक दिया। भैंसा अतिंम बार जोर से चिघाडा और जमीन पर गिर पडा।

मानसिंह मचान से उतरे और सीधे निनी के पास गए। उन्होंने अपने गले से कीमती मोती की माला उतारी और उसे निन्नी के गले में पहना दी। निन्नी ने झुककर राजा को प्रणाम किया और एक ओर हो गई। लाखी ने देखा, राजा और निन्नी चुप खडे हैं। वह जानवरों के शरीरों से तीर और भाले निकालने का बहाना कर वहंा से खिसक गई। तब मानसिंह ने निन्नी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, ’’शक्ति और सौन्दर्य का कैसा सुन्दर मेल है तुममें ! निन्नी, सचमुच तुम तो ग्वालियर के महल मे ही शोभा दोगी। क्या तुम मुझसे विवाह करने के लिए तैयार हो?‘‘ निन्नी के पास जवाब देने के लिए शब्द ही नहीं थें। वह क्षण भर मोन रही !  फिर अत्यंत नम्र और भोले स्वर में बोली-’’ फिर मुझे गांव का यह सुन्दर स्वतंत्र जीवन कहां मिलेगा !  वहां मुझे शिकार के लिए जंगल और जानवर कहां मिलेंगे; और यह सांक नदी; जिसका शीतल जल मुझे इतना प्यारा लगता है वहां कहां मिलेगा? मानसिंह जो निन्नी का हाथ अभी भी अपने हाथों में रखे थे, बोले, ’’तुम्हारी सब इच्छाए वहां भी पूरी होगी। निन्नी, केवल वचन दो, मैं तुम्हारे लिए सांक नदी को ग्वालियर के महल तक ले जा सकता हूँ।‘‘ निन्नी अब क्या कहती। वह चुप हो गई। और मानसिंह उसके मौन का अर्थ समझ गए। इसी समय अटल और अन्य लोग वहां पहुंचे और निन्नी का हाथ छोड राजा मानसिंह उनमें मिल गए।

उसी दिन संध्या समय मानसिंह ने पुजारी के द्वारा अटल गुज्जर के पास निन्नी से विवाह का प्रस्ताव भेजा। पहले अटल विश्वास न कर सका, किन्तु जब स्वंय मानसिंह ने उससे विवाह की बात कही, तब तो अटल की खुशी का ठिकाना न रहा। दूसरे ही दिन विवाह होना था। अटल इंतजाम मे लग गया। लोग उससे पूछते कि वह पैसा कहाँ से लाएगा और इतना बडा ब्याह कैसे करेगा? अटल गर्व से जवाब देता, ’’मै कन्या दूंगा और एक गाय दूंगा। सूखी हल्दी और चावल का टीका लगाऊगा। घर में बहुत से जानवरों के चमडे रखे हैं उन्हे बेचकर बहन के गले के लिए चांदी की एक हसली दुंगा और क्या चाहिए?‘‘ मानसिंह ने अटल की कठिनाईया सुनी तो उसे सदेंशा भेजा कि वे ग्वालियर से शादि करने को तैयार है और दोनों तरफ का खर्चा भी वे पूरा करेंगे।इससे अटल के स्वाभिमान को बड धक्का पहुंचा। उसने तुरन्त संदेशा भेजा कि उसे यह बात मंजूर नहीं। आज तक कहीं ऐसा नहीं हुआ कि लडकी को लडके के घर ले जाकर विवाह किया गया हो गरीब से गरीब लडकी वाले भी अपने घर में ही लडकी का कन्यादान देते हैं। इस पर मानसिंह चुप हो गए। 
अटल ने रात भर जागकर सब तैयारिया की। उसने जंगल से लडकी और आम के पते लाकर मांडप बनाया अनाज बेचकर कपडे का एक जोडा निन्नी के लिए तैयार किया तथा गांव वालों ाके बांटने के लिए गुड लिया। इस तरह दूसरे दिन वैदिक रीति से राजा मानसिंह और निन्नी का ब्याह पूरा हुआ। गांव के लोगों से जो कुछ बन पडा उन्होने निन्नी को दिया। विदा के समय निन्नी अटल से लिपटकर खूब रोई। उसने रोते हुए कहा, ’’भैया अब लाखी को भाभी बनाकर जल्दी घर ले आओं तुम्हे बहुत तकलीफ होगी।‘‘ भाई ने उसे आश्वासन दिया और इस प्रकार निनी भाई की झोपडी को छोड ग्वालियर के महल के लिए रवाना हो गई।
विवाह के बाद महल कि राजपूत राणियो ने गुज्जर जाति कि रानि का विरोध किया इसी कारण राणा जी मे '' गुजरी महल '' का निर्माण करवाया ।

यही गूजर किसान की लडकी निन्नी, जिसका नाम असल में मृगनयनी था, ग्वालियर की गूजरी रानी के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुई। उसमें जैसी सौन्दर्य की कोमलता थी, वैसी ही शूर वीरता भी थी। राजा मानसिंह उसे बहुत ही चाहते थे और कुछ समय तक ऐसा लगा कि राजा उसके पीछे पागल है किन्तु निन्नी ने उन्हे हमेशा कर्तव्य कि और प्रेरित किया वह सव्य संगित व चित्रकला सिखने लगी जिससे उसका समय व्यस्त रहता और मानसिंह भी उस समय अपने राज्य के कार्यो में लगे रहते युद्व के समय निन्नी हमेशा मानसिंह को उत्साहित कर प्रजा के रक्षा के लिए तत्पर रहती इस प्रकार निन्नी सचमुच एक योग्य कुशल रानी सिद्व हुई उसने राज्य में सगींत, चित्र, कला, शिल्पकला को प्रोत्साहन करना बैजू नामक प्रसिद्व गायक ने किसी समय नई-नई राग-रागिनाए बनाई थी ग्वालियर में बने हुए मान मन्दिर और गूजरी महल आज भी उस समय की उन्नत शिल्पकला के नमूने है राई गांव से गूजरी महल तक बनी हुई नहर जिसमें सांक नदी का जल ग्वालियर तक ले जाया गया था आज भी दिखाई देता है।

इनके पुत्र को क्षत्रिय राजपूतों मे शामिल नहीं किया । क्योकि क्षत्रिय वो है जो एक क्षत्राणि की कोख से जन्मा हो।
मृगनयनी से दो पुत्र हुए जिन्हें लेकर गुर्जरी महल छोड़ टिगड़ा के जंगलो में चली गयी उन्होंने एक नया गोत्र अपनाया जो आज गुर्जुर में आता है ...^तोंगर^ जिसका अर्थ यह है 
तोमर+गुर्जर = तोंगर
इसलिए मृग्नयनि पुत्र को कुछ जागीर देकर गूजरों मे शामिल किया गया।
ये राजपूत राजा मानसिंह तोमर के गूजरी पत्नी के वंशज आज तोंगर गुज्जर कहलाते हैं और तोमर राजपूतो को चुनाव में समर्थन कर उनके प्रति सम्मान दिखाते हैं।

इसी तरह राजपूत पुरुशों के दूसरी जाति की महिल/सम्बन्ध से उन जातियों में चौहान तोमर गहलौत परमार सोलँकि वंश चले हैं।ये राजपूतों की उदारता को भी प्रदर्शित करता है।
इस प्रकार राजपूत राजा की गूजरी रानी निन्नी/मृगनयनी ने ग्वालियर के तौमर राज्य में चार चांद जोड दिए और उस काल को इतिहास में अमर कर दिया।

नोट-हिसार हरियाणा का गूजरी महल एक मुस्लिम सुल्तान ने अपनी गूजरी प्रेमिका के लिए बनवाया था वो ग्वालियर के गूजरी महल से अलग है।इसमें भृमित न हों।
सन्दर्भ-khabarexpress.com--- इतिहास कि अनोखी प्रेम कहानी और क्षत्रियों में रक्त की शुद्धता बनाए रखने के संकल्प का उत्तम उद्धारण ---
ये चित्र ग्वालियर के गूजरी महल का है जो इतिहास कि शानदार इमारतो में से एक हैं ।
राजपूत राजा राजा मान सिहं तोमर और गुज्जर जाति कि एक आम लडकी ' मृगनयनी ' की ।
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उन दिनों अक्सर मुगलों के आक्रमण होते रहते थे। सिकन्दर लोदी और गयासुद्दीन खिलजी ने कई बार ग्वालियर के किले पर धावा किया, पर वे सफल न हो सके। तब उन्होने आसपास के गांवो को नष्ट कर उनकी फसलें लूटना शुरू कर दिया। उन्होने कई मन्दिरों को तोड-फोड डाला और लोगों को इतना तंग किया कि वे हमेशा भयभीत बने रहते। खासकर स्त्रियों को बहुत ही भय रहता। उन दिनों औरतों का खूबसूरत होना खतरे से खाली न रहता। कारण, मुगल उनपर आंखें लगाए रहते थें। गांवों की कई सुन्दर, भोली लडकिंया उनकी शिकार हो चुकी थी।
ऐसे समय में ग्वालियर के पास राई नामक गांव में एक गरीब गुज्जर किसान के यंहा निन्नी नामक एक सुन्दर लडकी थी। सिकन्दर लोदी के आक्रमण के समय उसके माता-पिता मारे गए थें और अब एक भाई के सिवा उसका संसार में कोई न था। वहीं उसकी रक्षा और भरण-पोषण करता था। उनके पास एक कच्चा मकान और छोटा-सा खेत था, जिसपर वे अपनी गुजर करते थे। दोनों भाई-बहिन शिकार में निपुण थें और जंगली जानवार मारा करते थे। दोनों अपनी गरीबी में भी बडे खुश रहते और गांव के सभी सामाजिक और धार्मिक कार्यों में हिससा लेते रहते थे। उनका स्वभाव और व्यवहार इतना अच्छा था कि पूरा गांव उन्हे चाहता था।
धीरे-धीरे निन्नी के अनुपम भोले सौन्दर्य की खबर आसपास फैलने लगी और एक दिन मालवा के सुल्तान गयासुद्दिन को भी इसका पता लग गया। वह तो औरत और शराब के लिए जान देता ही था। उसने झट अपने आदमियों को बुलवाया और राई गांव की खूबसूरत लडकी निन्नी गूजरी को अपने महल में लाने के लिए हुक्म दिया। अन्त में दो घुडसवार इस काम के लिए चुने गए। सुल्तान ने उनसे साफ कह दिया कि यदि वे उस लडकी को लाने में कामयाब न हुए तो उनका सिर धड से अलग कर दिया जाएगा। और यदि वे उसे ले आए तो उन्हें मालामाल कर दिया जाएगा।
निन्नी गूजरी अपनी एक सहेली के साथ जंगल में शिकार को गई थी। उस दिन शाम तक उन्हें कोई शिकार नहीं मिला और वे निराश होकर लौटने ही वाली थी कि उन्हे दूर झाडी के पास कुछ आहट सुनाई दी। लाखी थककर चूर हो गई थी इसलिए वह तो वहीं बैठ गई, किन्तु निन्नी अपने तीर और भालों के साथ आगे बढ गई। झाडी के पास पहूंचने पर उसने शिकार की खोज की, पर उसे कुछ नजर नहीं आया। वह लौटने ही वाली थी कि फिर से आहट मिली। उसने देखा कि झाडी के पास एक बडे झाड के पीछे से दो घुडसवार निकले और उसकी ओर आने लगे। पहले तो निन्नी कुछ घबराई, किन्तु फिर अपना साहस इकट्ठा कर वह उनका सामना करने के लिए अडकर खडी हो गई। जैसे ही घुडसवार उससे कुछ कदम दूरी पर आए, उसने कडकती हुई आवाज हुई आवाज में चिल्लाकर कहा, तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए हो ? दोनों सवार घोडो पर से उतर गए। उनमें से एक ने कहा, हम सुल्तान गयासुद्दीन के सिपाही है, और तुम्हे लेने आए हैं। सुल्तान तुम्हे अपनी बेगम बनाना चाहता है। सवार के मुंह से इन शब्दों के निकलते ही निन्नी ने अपना तीर कमान पर चढा उसकी एक आँख को निशाना बना तेजी से फेंका। फिर दूसरा तीर दूसरी आँख पर फेंका, किन्तु वह उसकी हथेली पर अडकर रह गया, क्योंकि सवार के दोनों हाथ आखों पर आ चुके थे। इसी बीच दूसरा सवार घोडे पर चढकर तेजी से वापस लौटने लगा। निन्नी ने उसपर पहले भाले से और फिर तीरों से वार किया। वह वहीं धडाम से नीचे गिर गया। पहले सवार की आंखों से रक्त बह रहा था। निन्नी ने एक भाला उसकी छाती पर पूरी गति से फेंका और चीखकर वह भी जमीन पर लोटने लगा। फिर निन्नी तेजी से वापस चल पडी और हांफती हुई लाखी के घर पहुंची। लाखी पास के नाले से पानी पीकर लौटी थी और आराम कर रही थी। निन्नी से घुडसवारों का हाल सुन, उसके चेहरे का रंग उड गया। किन्तु निन्नी ने उसे हिम्मत दी और शिघ्रता से वापस चलने को कहा।
दूसरे दिन पूरे राई गांव में निन्नी की बहादुरी का समाचार बिजली की तरह फैल गया। ग्वालियर के राजपूत राजा मानसिंह तोमर को भी इस घटना की सूचना मिली। वे इस बहादुर लडकी से मिलने के लिए उत्सुक हो उठे। उसके बाद तो जो भी आदमी राई गांव से आते वे इस लडकी के बारे में अवश्य पूछते। एक दिन गांव का पूजारी मन्दिर बनवाने की फरियाद ले मानसिंह के पास पहुंचा। उसने भी निन्नी की वीरता के कई किस्से राजा को सुनाए। राजा को यह सुनकर बडा आश्चर्य हुआ कि निन्नी अकेली कई सूअरों और अरने-भैंसों को केवल तीरों और भालों से मार गिराती है। अन्त में मानसिंह ने पुजारी के द्वारा गांव में संदेशा भेज दिया कि वे शीघ्र ही गांव का मन्दिर बनवाने और लोगों की हालत देखने राई गांव आएंगे।
राजा के आगमन की सूचना पाते ही गूजरों में खुशी की लहर फैल गई। हर कोई उनके स्वागत की तैयारियों में लग गया। लोगों ने अपने कच्चे मकानों को छापना और लीपन-पोतना शुरू कर दिया। जिनके पास पैसे थे उन्होने अपने लिए उस दिन पहनने के लिए एक जोडा नया कपड बनवा लिया। किन्तु जिनके पास पैसे नहीं थे उन्होने भी नदी के पानी में अपने पुराने फटे कपडों को खूबसाफकर लिया और उत्सुकता से उस दिन की राह देखने लगे। आखिर वह दिन आ ही गया। उस दिन हर दरवाजे पर आम के पतो के बंदनवार बांाधे गए और सब लोग अपने साफ कपडो को पहन, गांव के बाहर रास्ते पर राजा के स्वागत के लिए जमा हो गए। सामने औरतों की कतारें थी। वे अपने सिर पर मिटी के घडे पानी से भरकर रखे थी। और उनपर मीठे तेल के दीये जल रहे थे। सबके सामने निन्नी को खडा किया गया था, जो एक थाली में अक्षत, कुमकुम, फूल और आरती उतारने के लिए घी का एक दीया रखे हुए थी। उसने मोटे, पर साफ कपडे पहने थे। उसके बाजू से गांव का पुजारी था तथा बाकी पुरूष पंक्ति बनाकर औरतों के पीछे खडे हुए थे। जैसे ही राजा की सवारी पहुंची, पूरे गांव के लोगों ने मिलकर एक स्वर से उनकी जय-जयकार की। फिर पुजारी ने आगे बढकर पहले उनका स्वागत किया। उनके भाल पर हन्दी और कुमकुम का टीका लगाया और माला पहनाई। राजा ने ब्राहण के पैर छुए और पुजारी ने उन्हें आर्शीवाद दिया। इसके बाद पुजारी ने राजा को निन्नी का परिचय दिया। निन्नी सिर झुकाए खडी थी। उसने झट कुमकुम, अक्षत राजा के माथे पर लगाया। फूल उनकी पगडी पर फेंके और आरती उतारने लगी। मानसिंह की दृष्टि निन्नी के भोले चेहरे पर अटकी हुई थी। आरती समाप्त होते ही मानसिंह ने देखा कि निन्नी के फेंके फूलों मे से एक जमीन पर गिर पडा हैं। उन्होने झुककर उसे उठाया और अपनी पगडी में खोंस लिया। कई स्त्रियों ने यह दृश्य देखा और आपस में एक दूसरे की तरफ देखते हुए मुस्कराने लगी। विशेषकर लाख चुप न रह सकी और उसने निन्नी को चिमटी देकर चुफ से कान में कह हि दिया-’’राजा ने तुम्हारी पूजा स्वीकार कर ली हैं। अब तो तू जल्दी ही ग्वालियर की रानी बनेगी।‘‘ निन्नी के गोरे गालों पर लज्जा की लालिमा छा गई। ‘चल हट!‘ कहकर वह भीड में खो गई और राजा मन्दिर की ओर चल पडे।
मन्दिर के पास ही राजा का पडाव डाला गया। रात्रि के समय लोगों की सभा में राजा ने मन्दिर बनवाने के लिए पांच हजार रुपयों के दान की घोषणा की। गांव में कुआं खुदवाने तथा सडक सुधारने के लिए दस हजार रुपये देने का वायदा किया। अंत में राजा ने गांव के लोगों को मुगलों से सतर्क रहने और उनका सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा। उन्होंने सबके सामने निन्नी की सुनी हुई बहादुरी की भी तारीफ की और दूसरे दिन निन्नी के जंगली जानवरों के शिकार को देखने की इच्छा प्रकट की। पुजारी ने निन्नी के भाई अटल की ओर इशारा किया। अटल ने बिना निन्नी से पूछे खडे होकर स्वीकृति दे दी। इसके बाद बहुत रात तक भजन-कीर्तन हुआ और फिर लोग अपने-अपने घर चले गए।
दुसरे दिन शिकार की तैयारियां हुई। राजा मानसिंह के लिए एक मचान बनाया गया। निन्नी ने अपने सब हथियार साफ करके उन्हें तेज किया। बीच-बीच में निन्नी विचारों में खो जाती। कभी ग्वालियर की रानी बनने की मधुर कल्पना उसे गुमशुदा जाती तो कभी अपने एकमात्र प्रिय भाई का ख्याल, गांव का सुखी, स्वतंत्र जीवन, सांक नदी का शीतल जल, और जंगल के शिकार का आनन्द उसे दूसरे संसार में ले जाते। इसीसमय अटल ने तेजी से घर में प्रवेश किया और निन्नी को जल्दी चलने के लिए कहा। राजा ने जंगल की ओर निकल चुके थं। इसी समय लाखी भी आ गई और निन्नी लाखी के साथ शिकार के लिए चल पडी। कुछ हथियार निन्नी रखे थी और कुछ उसने लाखी को पकडा दिए थे।
जंगल में राजा के आदमी ढोल पीट रहे थे, ताकि जानवर अपने छिपे हुए स्थानों से बाहर निकल पडें। राजा मानसिंह मचान पर बैठे थे। निन्नी और लाखी एक बडे झाड के नीचे खडी हुई थी। थोडी देर के बाद हिरण-परिवार झाडी से निकला और भागने लगा। निन्नी ने एक तीर जोर से फेंका, जो मादा हिरण को लगा, और वही वगिर पडी। नरहिरण तेजी से भगा, पर निन्नी ने उसे भी मार गिराया । इसके बाद निनी ने दौडकर दो हिरण के बच्चों ाके , जो अकेले बच गए थे, उठा लिया और गोद में रखकर झाड के नीचे ले आई। मानसिंह ने यह दृश्य देखा और मन ही मन निन्नी के कोमल हदय की प्रशंसा करने लगे। इसके बाद तो एक-एक करके कई जंगली जानवर बाहर निकले और निनी ने कभी तरों और कभी भलों से उन्हे पहले ही प्रयत्न में मार गिराया। फिर एक बडा जंगली अरना भैंसा निकला। निनी ने पूरी ताकत से दो तीर फेंके, जो सीधे भैंस के शरीर को भेद गए। किन्तु वह गिरा नहीं। घायल होने के कारण वह क्रोध में आकर चिघाडता हुआ निन्नी की ओर झपटा। मानसिंह ने अपनी बदूंक निकाल ली और वे भैंसे पर गोली चलाने ही वाले थे कि उन्होंने देखा-निन्नी ने दौडकर अरने भैसें के सींग पकड लिए है और पूरा जोर लगाकर वह उन्हे मरोड रही है। फिर बिजली की सी गति से उसने एक तेज भाला उसके माथे पर भोंक दिया। भैंसा अतिंम बार जोर से चिघाडा और जमीन पर गिर पडा।
मानसिंह मचान से उतरे और सीधे निनी के पास गए। उन्होंने अपने गले से कीमती मोती की माला उतारी और उसे निन्नी के गले में पहना दी। निन्नी ने झुककर राजा को प्रणाम किया और एक ओर हो गई। लाखी ने देखा, राजा और निन्नी चुप खडे हैं। वह जानवरों के शरीरों से तीर और भाले निकालने का बहाना कर वहंा से खिसक गई। तब मानसिंह ने निन्नी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, ’’शक्ति और सौन्दर्य का कैसा सुन्दर मेल है तुममें ! निन्नी, सचमुच तुम तो ग्वालियर के महल मे ही शोभा दोगी। क्या तुम मुझसे विवाह करने के लिए तैयार हो?‘‘ निन्नी के पास जवाब देने के लिए शब्द ही नहीं थें। वह क्षण भर मोन रही ! फिर अत्यंत नम्र और भोले स्वर में बोली-’’ फिर मुझे गांव का यह सुन्दर स्वतंत्र जीवन कहां मिलेगा ! वहां मुझे शिकार के लिए जंगल और जानवर कहां मिलेंगे; और यह सांक नदी; जिसका शीतल जल मुझे इतना प्यारा लगता है वहां कहां मिलेगा? मानसिंह जो निन्नी का हाथ अभी भी अपने हाथों में रखे थे, बोले, ’’तुम्हारी सब इच्छाए वहां भी पूरी होगी। निन्नी, केवल वचन दो, मैं तुम्हारे लिए सांक नदी को ग्वालियर के महल तक ले जा सकता हूँ।‘‘ निन्नी अब क्या कहती। वह चुप हो गई। और मानसिंह उसके मौन का अर्थ समझ गए। इसी समय अटल और अन्य लोग वहां पहुंचे और निन्नी का हाथ छोड राजा मानसिंह उनमें मिल गए।
उसी दिन संध्या समय मानसिंह ने पुजारी के द्वारा अटल गुज्जर के पास निन्नी से विवाह का प्रस्ताव भेजा। पहले अटल विश्वास न कर सका, किन्तु जब स्वंय मानसिंह ने उससे विवाह की बात कही, तब तो अटल की खुशी का ठिकाना न रहा। दूसरे ही दिन विवाह होना था। अटल इंतजाम मे लग गया। लोग उससे पूछते कि वह पैसा कहाँ से लाएगा और इतना बडा ब्याह कैसे करेगा? अटल गर्व से जवाब देता, ’’मै कन्या दूंगा और एक गाय दूंगा। सूखी हल्दी और चावल का टीका लगाऊगा। घर में बहुत से जानवरों के चमडे रखे हैं उन्हे बेचकर बहन के गले के लिए चांदी की एक हसली दुंगा और क्या चाहिए?‘‘ मानसिंह ने अटल की कठिनाईया सुनी तो उसे सदेंशा भेजा कि वे ग्वालियर से शादि करने को तैयार है और दोनों तरफ का खर्चा भी वे पूरा करेंगे।इससे अटल के स्वाभिमान को बड धक्का पहुंचा। उसने तुरन्त संदेशा भेजा कि उसे यह बात मंजूर नहीं। आज तक कहीं ऐसा नहीं हुआ कि लडकी को लडके के घर ले जाकर विवाह किया गया हो गरीब से गरीब लडकी वाले भी अपने घर में ही लडकी का कन्यादान देते हैं। इस पर मानसिंह चुप हो गए।
अटल ने रात भर जागकर सब तैयारिया की। उसने जंगल से लडकी और आम के पते लाकर मांडप बनाया अनाज बेचकर कपडे का एक जोडा निन्नी के लिए तैयार किया तथा गांव वालों ाके बांटने के लिए गुड लिया। इस तरह दूसरे दिन वैदिक रीति से राजा मानसिंह और निन्नी का ब्याह पूरा हुआ। गांव के लोगों से जो कुछ बन पडा उन्होने निन्नी को दिया। विदा के समय निन्नी अटल से लिपटकर खूब रोई। उसने रोते हुए कहा, ’’भैया अब लाखी को भाभी बनाकर जल्दी घर ले आओं तुम्हे बहुत तकलीफ होगी।‘‘ भाई ने उसे आश्वासन दिया और इस प्रकार निनी भाई की झोपडी को छोड ग्वालियर के महल के लिए रवाना हो गई।
विवाह के बाद महल कि राजपूत राणियो ने गुज्जर जाति कि रानि का विरोध किया इसी कारण राणा जी मे '' गुजरी महल '' का निर्माण करवाया ।
यही गूजर किसान की लडकी निन्नी, जिसका नाम असल में मृगनयनी था, ग्वालियर की गूजरी रानी के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुई। उसमें जैसी सौन्दर्य की कोमलता थी, वैसी ही शूर वीरता भी थी। राजा मानसिंह उसे बहुत ही चाहते थे और कुछ समय तक ऐसा लगा कि राजा उसके पीछे पागल है किन्तु निन्नी ने उन्हे हमेशा कर्तव्य कि और प्रेरित किया वह सव्य संगित व चित्रकला सिखने लगी जिससे उसका समय व्यस्त रहता और मानसिंह भी उस समय अपने राज्य के कार्यो में लगे रहते युद्व के समय निन्नी हमेशा मानसिंह को उत्साहित कर प्रजा के रक्षा के लिए तत्पर रहती इस प्रकार निन्नी सचमुच एक योग्य कुशल रानी सिद्व हुई उसने राज्य में सगींत, चित्र, कला, शिल्पकला को प्रोत्साहन करना बैजू नामक प्रसिद्व गायक ने किसी समय नई-नई राग-रागिनाए बनाई थी ग्वालियर में बने हुए मान मन्दिर और गूजरी महल आज भी उस समय की उन्नत शिल्पकला के नमूने है राई गांव से गूजरी महल तक बनी हुई नहर जिसमें सांक नदी का जल ग्वालियर तक ले जाया गया था आज भी दिखाई देता है।
इनके पुत्र को क्षत्रिय राजपूतों मे शामिल नहीं किया । क्योकि क्षत्रिय वो है जो एक क्षत्राणि की कोख से जन्मा हो।
मृगनयनी से दो पुत्र हुए जिन्हें लेकर गुर्जरी महल छोड़ टिगड़ा के जंगलो में चली गयी उन्होंने एक नया गोत्र अपनाया जो आज गुर्जुर में आता है ...^तोंगर^ जिसका अर्थ यह है
तोमर+गुर्जर = तोंगर
इसलिए मृग्नयनि पुत्र को कुछ जागीर देकर गूजरों मे शामिल किया गया।
ये राजपूत राजा मानसिंह तोमर के गूजरी पत्नी के वंशज आज तोंगर गुज्जर कहलाते हैं और तोमर राजपूतो को चुनाव में समर्थन कर उनके प्रति सम्मान दिखाते हैं।
इसी तरह राजपूत पुरुशों के दूसरी जाति की महिल/सम्बन्ध से उन जातियों में चौहान तोमर गहलौत परमार सोलँकि वंश चले हैं।ये राजपूतों की उदारता को भी प्रदर्शित करता है।
इस प्रकार राजपूत राजा की गूजरी रानी निन्नी/मृगनयनी ने ग्वालियर के तौमर राज्य में चार चांद जोड दिए और उस काल को इतिहास में अमर कर दिया।
नोट-हिसार हरियाणा का गूजरी महल एक मुस्लिम सुल्तान ने अपनी गूजरी प्रेमिका के लिए बनवाया था वो ग्वालियर के गूजरी महल से अलग है।इसमें भृमित न हों।
सन्दर्भ-khabarexpress.com