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Saturday, December 24, 2016

The History of Christmas- Around Imaginary Jesus- A saint but not a GOD equivalent.

The History of Christmas
When was Jesus born?
A.     Popular myth puts his birth on December 25th in the year 1 C.E.
B.     The New Testament gives no date or year for Jesus’ birth.  The earliest gospel – St. Mark’s, written about 65 CE – begins with the baptism of an adult Jesus.  This suggests that the earliest Christians lacked interest in or knowledge of Jesus’ birthdate.
C.     The year of Jesus birth was determined by Dionysius Exiguus, a Scythian monk, “abbot of a Roman monastery.  His calculation went as follows:
a.       In the Roman, pre-Christian era, years were counted from ab urbe condita (“the founding of the City” [Rome]).  Thus 1 AUC signifies the year Rome was founded, 5 AUC signifies the 5th year of Rome’s reign, etc.
b.     Dionysius received a tradition that the Roman emperor Augustus reigned 43 years, and was followed by the emperor Tiberius.
c.       Luke 3:1,23 indicates that when Jesus turned 30 years old, it was the 15th year of Tiberius reign.
d.      If Jesus was 30 years old in Tiberius’ reign, then he lived 15 years under Augustus (placing Jesus birth in Augustus’ 28th year of reign).
e.       Augustus took power in 727 AUC.  Therefore, Dionysius put Jesus birth in 754 AUC.

f.        However, Luke 1:5 places Jesus’ birth in the days of Herod, and Herod died in 750 AUC – four years before the year in which Dionysius places Jesus birth.
 Because of its known pagan origin, Christmas was banned by the Puritans and its observance was illegal in Massachusetts between 1659 and 1681.[4]  However, Christmas was and still is celebrated by most Christians.
 The Origins of Christmas Customs

A.     The Origin of Christmas Tree
Just as early Christians recruited Roman pagans by associating Christmas with the Saturnalia, so too worshippers of the Asheira cult and its offshoots were recruited by the Church sanctioning “Christmas Trees”.[7]  Pagans had long worshipped trees in the forest, or brought them into their homes and decorated them, and this observance was adopted and painted with a Christian veneer by the Church
The Origin of Santa Claus
a.       Nicholas was born in Parara, Turkey in 270 CE and later became Bishop of Myra.  He died in 345 CE on December 6th.  He was only named a saint in the 19th century.
b.      Nicholas was among the most senior bishops who convened the Council of Nicaea in 325 CE and created the New Testament.  The text they produced portrayed Jews as “the children of the devil”[11] who sentenced Jesus to death.
c.       In 1087, a group of sailors who idolized Nicholas moved his bones from Turkey to a sanctuary in Bari, Italy.  There Nicholas supplanted a female boon-giving deity called The Grandmother, or Pasqua Epiphania, who used to fill the children's stockings with her gifts.  The Grandmother was ousted from her shrine at Bari, which became the center of the Nicholas cult.  Members of this group gave each other gifts during a pageant they conducted annually on the anniversary of Nicholas’ death, December 6.
d.      The Nicholas cult spread north until it was adopted by German and Celtic pagans.  These groups worshipped a pantheon led by Woden –their chief god and the father of Thor, Balder, and Tiw.  Woden had a long, white beard and rode a horse through the heavens one evening each Autumn.  When Nicholas merged with Woden, he shed his Mediterranean appearance, grew a beard, mounted a flying horse, rescheduled his flight for December, and donned heavy winter clothing.
·        Christmas is a lie.  There is no Christian church with a tradition that Jesus was really born on December 25th.
·        December 25 is a day on which Jews have been shamed, tortured, and murdered.
·        Many of the most popular Christmas customs – including Christmas trees, mistletoe, Christmas presents, and Santa Claus – are modern incarnations of the most depraved pagan rituals ever practiced on earth.




Saturday, October 31, 2015

Truth of Jesus= Reason for Osho's extradition


ओशो का वह प्रवचन, जि‍सपर ति‍लमि‍ला उठी थी अमेरि‍की सरकार और दे दि‍या जहर
ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार ने उन्‍हें हाथ-पैर में बेडि़यां डालकर गिरफ्तार किया और फिर मरने के लिए थेलियम नामक धीमा जहर दे दिया था। इतना ही नहीं, वहां बसे रजनीशपुरम को तबाह कर दिया गया था और पूरी दुनिया को यह निर्देश भी दे दिया था कि न तो ओशो को कोई देश आश्रय देगा और न ही उनके विमान को ही लैंडिंग की इजाजत दी जाएगी। ओशो से प्रवचनों की वह श्रृंखला आज भी मार्केट से गायब हैं। पढिए वह चौंकाने वाला सच
ओशो:
जब भी कोई सत्‍य के लिए प्‍यासा होता है, अनायास ही वह भारत में उत्‍सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्‍लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्‍य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे। ईसामसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्‍लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्‍योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्‍हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइाबिल में उन सालों को क्‍यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्‍हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं।
यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्‍मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्‍मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्‍होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्‍द भी नहीं सुने थे। फिर क्‍यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्‍यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्‍योंकि इस व्‍यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्‍पना की जा सकती है।
पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्‍म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्‍पष्‍ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्‍हें समझ आएगा कि क्‍यों वे बारा-बार कहते हैं- ‘ अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्‍थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्‍हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।’ यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है। उन्‍होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं।
ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्‍यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्‍क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था।
जीसस कहते हैं कि अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था। कौन हैं ये पुराने पैगंबर? वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- कि ईश्‍वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्‍वर के मुंह से ये शब्‍द भी कहलवा दिए हैं कि मैं कोई सज्‍जन पुरुष नहीं हूं, तुम्‍हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्‍यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं। पुराने टेस्‍टामेंट में ईश्‍वर के ये वचन हैं। और ईसा मसीह कहते हैं, मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्‍मा प्रेम है। यह ख्‍याल उन्‍हें कहां से आया कि परमात्‍मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्‍मा को प्रेम कहने का कोई और उल्‍लेख नहीं है। उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्‍त, भारत, लद्दाख और तिब्‍बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्‍कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्‍यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्‍य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्‍या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्‍योंकि उनकी मृत्‍यु का तो कोई उल्‍लेख है ही नहीं !
सच्‍चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्‍तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्‍योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्‍वस्‍थ है तो 60 घंटे से भी ज्‍यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्‍लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है।
यह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्‍यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्‍य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्‍या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी। पोंटियस के दस्‍तखत के बगैर यह हत्‍या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए। जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्‍मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्‍वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्‍यक्ति की हत्‍या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था।
तो पोंटियस ने जीसस के शिष्‍यों के साथ मिलकर यह व्‍यवस्‍था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्‍त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्‍थगित किया जाता रहा। ब्‍यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्‍त के पहले ही उन्‍हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्‍योंकि शरीर से रक्‍तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्‍हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्‍यगण उन्‍हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।
जीसस ने भारत में आना क्‍यों पसंद किया? क्‍योंकि युवावास्‍था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्‍होंने अध्‍यात्‍म और ब्रह्म का परम स्‍वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्‍वस्‍थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए। कश्‍मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्‍मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, जोशुआ- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। जीसस जोशुआ का ग्रीक रुपांतरण है। जोशुआ यहां आए- समय, तारीख वगैरह सब दी है। एक महान सदगुरू, जो स्‍वयं को भेड़ों का गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्‍यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहांरहे। इसी वजह से वह स्‍थान भेड़ों के चरवाहे का गांव कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है-पहलगाम, उसका काश्‍मीरी में वही अर्थ है- गड़रिए का गांव
जीसस यहां रहना चाहते थे ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें। एक छोटे से शिष्‍य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्‍यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्‍होंने मरना भी यहीं चाहा, क्‍योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)जीवन एक सौंदर्य है और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)मरना भी अत्‍यंत अर्थपूर्ण है। केवल भारत में ही मृत्‍यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्‍तुत: तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं।
यहूदियों के पैगंबर मूसा ने भी भारत में ही देह त्‍यागी थी | इससे भी अधिक आश्‍चर्यजनक तथ्‍य यह है कि मूसा (मोजिज) ने भी भारत में ही आकर देह त्‍यागी थी! उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्‍थान में बनी हैं। शायद जीसस ने ही महान सदगुरू मूसा के बगल वाला स्‍थान स्‍वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्‍यों कश्‍मीर में आकर मृत्‍यु में प्रवेश किया?
मूसा ईश्‍वर के देश इजराइल की खोज में यहूदियों को इजिप्‍त के बाहर ले गए थे। उन्‍हें 40 वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्‍होंने घोषणा की कि, यही वह जमीन है, परमात्‍मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं और अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालों, अब तुम सम्‍हालो!
मूसा ने जब इजिप्‍त से यात्रा प्रारंभ की थी तब ककी पीढ़ी लगभग समाप्‍त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गए, जवान बूढ़े हो गए और नए बच्‍चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ यात्रा की शुरुआत की थी, वह बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थेा उन्‍होंने युवा लोगों शासन और व्‍यवस्‍था का कार्यभारा सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए। यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्‍त्रों में भी, उनकी मृत्‍यु के संबंध में , उनका क्‍या हुआ इस बारे में कोई उल्‍लेख नहीं है। हमारे यहां (कश्‍मीर में ) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिब्रू भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है।
मूसा भारत क्‍यों आना चाहते थे ? केवल मृत्‍यु के लिए ? हां, कई रहस्‍यों में से एक रहस्‍य यह भी है कि यदि तुम्‍हारी मृत्‍यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत्‍ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु भी एक उत्‍सव और निर्वाण बन जाती है।
सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं नहीं हैं। लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है।

Thursday, October 1, 2015

Christian conversion even time of tragedy-Like Mother Teresa


While Nepal is suffering, missionaries are busy selling Jesus
ShankhNaad's photo.


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Aditya Agnihotri's photo.Mohan Bhagwat stands vindicated. When the RSS Chief, referring to Teresa said "..service is devalued if conversions are done in the name of service or work", the entire media kicked up a furore. Political parties and Christian groups blamed him of inciting religious hatred. The Delhi Catholic Archdiocese claimed that the Christian community was in a state of shock over Bhagw...at's comment. But the recent, unfortunate event of an earthquake in Nepal, proved that what Mr Bhagwat said, is not far from the truth.
News and pictures from Nepal after the massive earthquake has shocked the entire world. People from all over, are finding ways to reach out to those, who are affected by the natural disaster. But amidst all the chaos, tragedies and tears, Christian Missionaries are shamelessly selling Jesus and Christianity. It is more shocking because many of these individuals and organizations are influential and they reach many people via social media and other channels. In a disturbing trend, Christian Missionaries prey on poor vulnerable people during tragedies and look at disasters like this, as an opportunity to convert people.
The true intention of the missionaries stands exposed on social media, and now even the main stream media is forced to report them.
http://www.independent.co.uk/…/nepal-earthquake-us-pastor-t…
http://shankhnaad.net/…/241-how-the-nepal-earthquake-traged…

Wednesday, September 30, 2015

Christianity- examination and facts.

ईसाई मत की मान्यताएँ: तर्क की कसौटी पर

ऊपर से देखने पर ईसाई मत एक सभ्य,सुशिक्षित,शांतिप्रिय समाज लगता हैं। जिसका उद्देश्य ईसा मसीह की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार एवं निर्धनों, दीनों की सेवा-सहायता करना हैं। इस मान्यता का कारण ईसाई समाज द्वारा बनाई गई छवि है। यह कटु सत्य है कि ईसाई मिशनरी विश्व के जिस किसी देश में गए। उस देश के निवासियों के मूल धर्म में सदा खामियों को प्रचारित करना एवं अपने मत को बड़ा चढ़ाकर पेश करना ईसाईयों की सुनियोजित नीति रही हैं। इस नीति के बल पर वे अपने आपको श्रेष्ठ एवं सभ्य तथा दूसरों को निकृष्ट एवं असभ्य सिद्ध करते रहे हैं। इस लेख के माध्यम से हम ईसाई मत की तीन सबसे प्रसिद्द मान्यताओं की समीक्षा करेंगे जिससे पाठकों के भ्रम का निवारण हो जाये
1. प्रार्थना से चंगाई
2. पापों का क्षमा होना
Aditya Agnihotri's photo.3. गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित करना
1. प्रार्थना से चंगाई[i]

ईसाई समाज में ईसा मसीह अथवा चर्च द्वारा घोषित किसी भी संत की प्रार्थना करने से बिमारियों का ठीक होने की मान्यता पर अत्यधिक बल दिया जाता हैं। आप किसी भी ईसाई पत्रिका, किसी भी गिरिजाघर की दीवारों आदि में जाकर ऐसे विवरण (Testimonials) देख सकते हैं। आपको दिखाया जायेगा की एक गरीब आदमी था। जो वर्षों से किसी लाईलाज बीमारी से पीड़ित था। बहुत उपचार करवाया मगर बीमारी ठीक नहीं हुई। अंत में प्रभु ईशु अथवा मरियम अथवा किसी ईसाई संत की प्रार्थना से चमत्कार हुआ। और उसकी यह बीमारी सदा सदा के लिए ठीक हो गई। सबसे अधिक निर्धनों और गैर ईसाईयों को प्रार्थना से चंगा होता दिखाया जाता हैं। यह चमत्कार की दुकान सदा चलती रहे इसलिए समय समय पर अनेक ईसाईयों को मृत्यु उपरांत संत घोषित किया जाता हैं। हाल ही में भारत से मदर टेरेसा और सिस्टर अलफोंसो को संत घोषित किया गया हैं और विदेश में दिवंगत पोप जॉन पॉल को संत घोषित किया गया है। यह संत बनाने की प्रक्रिया भी सुनियोजीत होती हैं। पहले किसी गरीब व्यक्ति का चयन किया जाता हैं जिसके पास इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होते।

प्रार्थना से चंगाई में विश्वास रखने वाली मदर टेरेसा खुद विदेश जाकर तीन बार आँखों एवं दिल की शल्य चिकित्सा करवा चुकी थी[ii]। संभवत हिन्दुओं को प्रार्थना का सन्देश देने वाली मदर टेरेसा को क्या उनको प्रभु ईसा मसीह अथवा अन्य ईसाई संतो की प्रार्थना द्वारा चंगा होने का विश्वास नहीं था जो वे शल्य चिकित्सा करवाने विदेश जाती थी?

सिस्टर अलफोंसो केरल की रहने वाली थी। अपनीअपने जीवन के तीन दशकों में से करीब 20 वर्ष तक अनेक रोगों से ग्रस्त रही थी[iii]। केरल एवं दक्षिण भारत में निर्धन हिन्दुओं को ईसाई बनाने की प्रक्रिया को गति देने के लिए संभवत उन्हें भी संत का दर्जा दे दिया गया और यह प्रचारित कर दिया गया की उनकी प्रार्थना से भी चंगाई हो जाती हैं।

दिवंगत पोप जॉन पॉल स्वयं पार्किन्सन रोग से पीड़ित थे और चलने फिरने से भी असमर्थ थे। यहाँ तक की उन्होंने अपना पद अपनी बीमारी के चलते छोड़ा था[iv]। कोस्टा रिका की एक महिला के मस्तिष्क की व्याधि जिसका ईलाज करने से चिकित्सकों ने मना कर दिया था। वह पोप जॉन पॉल के चमत्कार से ठीक हो गई। इस चमत्कार के चलते उन्हें भी चर्च द्वारा संत का दर्ज दिया गया हैं।

पाठक देखेगे की तीनों के मध्य एक समानता थी। जीवन भर ये तीनों अनेक बिमारियों से पीड़ित रहे थे। मरने के बाद अन्यों की बीमारियां ठीक करने का चमत्कार करने लगे। अपने मंच से कैंसर, एड्स जैसे रोगों को ठीक करने का दावा करने वाले बैनी हिन्न (Benny Hinn) नामक प्रसिद्द ईसाई प्रचारक हाल ही में अपने दिल की बीमारी के चलते ईलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए थे[v]। वह atrial fibrillation नामक दिल के रोग से पिछले 20 वर्षों से पीड़ित है। तर्क और विज्ञान की कसौटी पर प्रार्थना से चंगाई का कोई अस्तित्व नहीं हैं। अपने आपको आधुनिक एवं सभ्य दिखाने वाला ईसाई समाज प्रार्थना से चंगाई जैसी रूढ़िवादी एवं अवैज्ञानिक सोच में विश्वास रखता हैं। यह केवल मात्र अंधविश्वास नहीं अपितु एक षड़यंत्र है। गरीब गैर ईसाईयों को प्रभावित कर उनका धर्म परिवर्तन करने की सुनियोजित साजिश हैं।

2. पापों का क्षमा होना

ईसाई मत की दूसरी सबसे प्रसिद्द मान्यता है पापों का क्षमा होना। इस मान्यता के अनुसार कोई भी व्यक्ति कितना भी बड़ा पापी हो। उसने जीवन में कितने भी पाप किये हो। अगर वो प्रभु ईशु मसीह की शरण में आता है तो ईशु उसके सम्पूर्ण पापों को क्षमा कर देते है। यह मान्यता व्यवहारिकता,तर्क और सत्यता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। व्यवहारिक रूप से आप देखेगे कि संसार में सभी ईसाई देशों में किसी भी अपराध के लिए दंड व्यवस्था का प्रावधान हैं। क्यों? कोई ईसाई मत में विश्वास रखने वाला अपराधी अपराध करे तो उसे चर्च ले जाकर उसके पाप स्वीकार (confess) करवा दिए जाये। स्वीकार करने पर उसे छोड़ दिया जाये। इसका क्या परिणाम निकलेगा? अगले दिन वही अपराधी और बड़ा अपराध करेगा क्यूंकि उसे मालूम है कि उसके सभी पाप क्षमा हो जायेगे। अगर समाज में पापों को इस प्रकार से क्षमा करने लग जाये तो उसका अंतिम परिणाम क्या होगा? जरा विचार करे।


महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश[vi] में ईश्वर द्वारा अपने भक्तों के पाप क्षमा होने पर ज्ञानवर्धक एवं तर्कपूर्ण उत्तर दिया हैं। स्वामी जी लिखते है। - "नहीं, ईश्वर किसी के पाप क्षमा नहीं करता। क्योंकि जो ईश्वर पाप क्षमा करे तो उस का न्याय नष्ट हो जाये और सब मनुष्य महापापी हो जायें। इसलिए कि क्षमा की बात सुन कर ही पाप करने वालों को पाप करने में निभर्यता और उत्साह हो जाये। जैसे राजा यदि अपराधियों के अपराध को क्षमा कर दे तो वे उत्साहपूर्वक अधिक अधिक बड़े-बड़े पाप करें। क्योंकि राजा अपना अपराध क्षमा कर देगा और उन को भी भरोसा हो जायेगा कि राजा से हम हाथ जोड़ने आदि चेष्टा कर अपने अपराध छुड़ा लेंगे और जो अपराध नहीं करते, वे भी अपराध करने में न डर कर पाप करने में प्रवृत्त हो जायेंगे। इसलिए सब कर्मों का फल यथावत् देना ही ईश्वर का काम है, क्षमा करना नहीं"।

वैदिक विचारधारा में ईश्वर को न्यायकारी एवं दयालु बताया गया हैं। परमेश्वर न्यायकारी है,क्यूंकि ईश्वर जीव के कर्मों के अनुपात से ही उनका फल देता है कम या ज्यादा नहीं। परमेश्वर दयालु है, क्यूंकि कर्मों का फल देने की व्यवस्था इस प्रकार की है जिससे जीव का हित हो सके। शुभ कर्मों का अच्छा फल देने में भी जीव का कल्याण है और अशुभ कर्मों का दंड देने में भी जीव का ही कल्याण है। दया का अर्थ है जीव का हित चिंतन और न्याय का अर्थ है, उस हितचिंतन की ऐसी व्यवस्था करना कि उसमें तनिक भी न्यूनता या अधिकता न हो।

ईसाई मत में प्रचलित पापों को क्षमा करना ईश्वर के न्यायप्रियता और दयालुता गुण के विपरीत हैं। अव्यवहारिक एवं असंगत होने के कारण अन्धविश्वास मात्र हैं।

3. गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित करना

ईसाई मत को मानने वालो में गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित कर शामिल करने की सदा चेष्टा बनी रहती हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता हैं कि जैसे वही ईसाई सच्चा ईसाई तभी माना जायेगा जो गैर ईसाईयों को ईसाई नहीं बना लेगा। ऐसा प्रतीत होता है कि ईसाईयों में आचरण और पवित्र व्यवहार से अधिक धर्मान्तरण महत्वपूर्ण हो चला हैं। धर्मांतरण के लिए ईसाई समाज हिंसा करने से भी भी पीछे नहीं हटता। अपनी बात को मैं उदहारण देकर सिद्ध करना चाहता हूँ। ईसाई प्रभुत्व वाले पूर्वोत्तर के राज्य मिजोरम से वैष्णव हिन्दू रीति को मानने वाली रियांग जनजाति को धर्मान्तरण कर ईसाई न बनने पर चर्च द्वारा समर्थित असामाजिक लोगों ने हिंसा द्वारा राज्य से निकाल दिया[vii]। हिंसा के चलते रियांग लोग दूसरे राज्यों में शरणार्थी के रूप में रहने को बाधित हैं। सरकार द्वारा बनाई गई नियोगी कमेटी के ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण के लिए अपनाये गए प्रावधानों को पढ़कर धर्मान्तरण के इस कुचक्र का पता चलता हैं[viii]। चर्च समर्थित धर्मान्तरण एक ऐसा कार्य हैं जिससे देश की अखंडता और एकता को बाधा पहुँचती हैं।

इसीलिए हमारे देश के संभवत शायद ही कोई चिंतक ऐसे हुए हो जिन्होंने प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण करने की निंदा न की हो। महान चिंतक एवं समाज सुधारक स्वामी दयानंद का एक ईसाई पादरी से शास्त्रार्थ हो रहा था। स्वामी जी ने पादरी से कहा की हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के तीन तरीके है। पहला जैसा मुसलमानों के राज में गर्दन पर तलवार रखकर जोर जबरदस्ती से बनाया जाता था। दूसरा बाढ़, भूकम्प, प्लेग आदि प्राकृतिक आपदा जिसमें हज़ारों लोग निराश्रित होकर ईसाईयों द्वारा संचालित अनाथाश्रम एवं विधवाश्रम आदि में लोभ-प्रलोभन के चलते भर्ती हो जाते थे और इस कारण से आप लोग प्राकृतिक आपदाओं के देश पर बार बार आने की अपने ईश्वर से प्रार्थना करते है और तीसरा बाइबिल की शिक्षाओं के जोर शोर से प्रचार-प्रसार करके। मेरे विचार से इन तीनों में सबसे उचित अंतिम तरीका मानता हूँ। स्वामी दयानंद की स्पष्टवादिता सुनकर पादरी के मुख से कोई शब्द न निकला। स्वामी जी ने कुछ ही पंक्तियों में धर्मान्तरण के पीछे की विकृत मानसिकता को उजागर कर दिया[ix]

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ईसाई धर्मान्तरण के सबसे बड़े आलोचको में से एक थे। अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी लिखते है "उन दिनों ईसाई मिशनरी हाई स्कूल के पास नुक्कड़ पर खड़े हो हिन्दुओं तथा देवी देवताओं पर गलियां उड़ेलते हुए अपने मत का प्रचार करते थे। यह भी सुना है की एक नया कन्वर्ट (मतांतरित) अपने पूर्वजों के धर्म को, उनके रहन-सहन को तथा उनके गलियां देने लगता है। इन सबसे मुझमें ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई।" इतना ही नहीं गांधी जी से मई, 1935 में एक ईसाई मिशनरी नर्स ने पूछा कि क्या आप मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगाना चाहते है तो जवाब में गांधी जी ने कहा था,' अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा धंधा ही बंद करा दूँ। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिन्दू परिवारों में जहाँ मिशनरी पैठे है, वेशभूषा, रीतिरिवाज एवं खानपान तक में अंतर आ गया है[x]


समाज सुधारक एवं देशभक्त लाला लाजपत राय द्वारा प्राकृतिक आपदाओं में अनाथ बच्चों एवं विधवा स्त्रियों को मिशनरी द्वारा धर्मान्तरित करने का पुरजोर विरोध किया गया जिसके कारण यह मामला अदालत तक पहुंच गया। ईसाई मिशनरी द्वारा किये गए कोर्ट केस में लाला जी की विजय हुई एवं एक आयोग के माध्यम से लाला जी ने यह प्रस्ताव पास करवाया की जब तक कोई भी स्थानीय संस्था निराश्रितों को आश्रय देने से मना न कर दे तब तक ईसाई मिशनरी उन्हें अपना नहीं सकती[xi]
समाज सुधारक डॉ अम्बेडकर को ईसाई समाज द्वारा अनेक प्रलोभन ईसाई मत अपनाने के लिए दिए गए मगर यह जमीनी हकीकत से परिचित थे की ईसाई मत ग्रहण कर लेने से भी दलित समाज अपने मुलभुत अधिकारों से वंचित ही रहेगा। डॉ आंबेडकर का चिंतन कितना व्यवहारिक था यह आज देखने को मिलता है।''जनवरी 1988 में अपनी वार्षिक बैठक में तमिलनाडु के बिशपों ने इस बात पर ध्यान दिया कि धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जाति के ईसाई परंपरागत अछूत प्रथा से उत्पन्न सामाजिक व शैक्षिक और आर्थिक अति पिछड़ेपन का शिकार बने हुए हैं। फरवरी 1988 में जारी एक भावपूर्ण पत्र में तमिलनाडु के कैथलिक बिशपों ने स्वीकार किया 'जातिगत विभेद और उनके परिणामस्वरूप होने वाला अन्याय और हिंसा ईसाई सामाजिक जीवन और व्यवहार में अब भी जारी है। हम इस स्थिति को जानते हैं और गहरी पीड़ा के साथ इसे स्वीकार करते हैं।' भारतीय चर्च अब यह स्वीकार करता है कि एक करोड़ 90 लाख भारतीय ईसाइयों का लगभग 60 प्रतिशत भाग भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार है। उसके साथ दूसरे दर्जे के ईसाई जैसा अथवा उससे भी बुरा व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों को अपनी बस्तियों तथा गिरिजाघर दोनों जगह अलग रखा जाता है। उनकी 'चेरी' या बस्ती मुख्य बस्ती से कुछ दूरी पर होती है और दूसरों को उपलब्ध नागरिक सुविधओं से वंचित रखी जाती है। चर्च में उन्हें दाहिनी ओर अलग कर दिया जाता है। उपासना (सर्विस) के समय उन्हें पवित्र पाठ पढऩे की अथवा पादरी की सहायता करने की अनुमति नहीं होती। बपतिस्मा, दृढि़करण अथवा विवाह संस्कार के समय उनकी बारी सबसे बाद में आती है। नीची जातियों से ईसाई बनने वालों के विवाह और अंतिम संस्कार के जुलूस मुख्य बस्ती के मार्गों से नहीं गुजर सकते। अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों के कब्रिस्तान अलग हैं। उनके मृतकों के लिए गिरजाघर की घंटियां नहीं बजतीं, न ही अंतिम प्रार्थना के लिए पादरी मृतक के घर जाता है। अंतिम संस्कार के लिए शव को गिरजाघर के भीतर नहीं ले जाया जा सकता। स्पष्ट है कि 'उच्च जाति' और 'निम्न जाति' के ईसाइयों के बीच अंतर्विवाह नहीं होते और अंतर्भोज भी नगण्य हैं। उनके बीच झड़पें आम हैं। नीची जाति के ईसाई अपनी स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष छेड़ रहे हैं, गिरजाघर अनुकूल प्रतिक्रिया भी कर रहा है लेकिन अब तक कोई सार्थक बदलाव नहीं आया है। ऊंची जाति के ईसाइयों में भी जातिगत मूल याद किए जाते हैं और प्रछन्न रूप से ही सही लेकिन सामाजिक संबंधोंं में उनका रंग दिखाई देता है[xii]
           महान विचारक वीर सावरकर धर्मान्तरण को राष्ट्रान्तरण मानते थे। आप कहते थे "यदि कोई व्यक्ति धर्मान्तरण करके ईसाई या मुसलमान बन जाता है तो फिर उसकी आस्था भारत में न रहकर उस देश के तीर्थ स्थलों में हो जाती है जहाँ के धर्म में वह आस्था रखता है, इसलिए धर्मान्तरण यानी राष्ट्रान्तरण है।
इस प्रकार से प्राय: सभी देशभक्त नेता ईसाई धर्मान्तरण के विरोधी रहे है एवं उसे राष्ट्र एवं समाज के लिए हानिकारक मानते है।


[i] Read Congregation for the doctrine of the faith: Instruction on prayers for healing published from Vatican
[ii] Ref. The final Verdict by Aroup Chatterjee
[iii] Popular Christianity in India: Riting between the Lines edited by Selva J. Raj, Corinne G. Dempsey.Page 129
[iv] Vatican hid Pope's Parkinson's disease diagnosis for 12 years: News published in The telegraph, Rome on 19 Mar 2006
[v] Pulliam Bailey, Sarah (25 March 2015). "Televangelist Benny Hinn has been admitted to the hospital for heart trouble" The Washington Post.
[vi] सप्तम समुल्लास
[vii] Religious cleansing of Hindus,Dr. Koenraad ELST, speaking in The Hague, 7 Feb. 2004, at the Agni conference on the persecution of Hindus in various countries.
[viii] The Niyogi committee gave the following recommendations:[2]
 (1) those missionaries whose primary object is proselytisation should be asked to withdraw and the large influx of foreign missionaries should be checked;
 (2) the use of medical and other professional services as a direct means of making conversions should be prohibited by law;
 (3) attempts to convert by force or fraud or material inducements, or by taking advantage of a person’s inexperience or confidence or spiritual weakness or thoughtlessness, or by penetrating into the religious conscience of persons for the purpose of consciously altering their faith, should be absolutely prohibited;
 (4) the Constitution of India should be amended in order to rule out propagation by foreigners and conversions by force, fraud and other illicit means;
 (5) legislative measures should be enacted for controlling conversion by illegal means;
 (6) rules relating to registration of doctors, nurses and other personnel employed in hospitals should be suitably amended to provide a condition against evangelistic activities during professional service; and
 (7) Circulation of literature meant for religious propaganda without approval of the State Government should be prohibited.  
 [Vindicated by Time: The Niyogi Committee Report](edited by Sita Ram Goel, 1998)
[ix] Biography of Swami Dayanand
[x] M.K. Gandhi, Christian Missions, Ahmedabad, 1941 and Collected Works
[xi] Socio-Religious Reform Movements in British India by K W Jones
[xii] Caste based Discrimination inside church is common practice. Read news published as title “SC Christians Allege Caste Discrimination” in The New Indian Express dated Wednesday, September 30, 2015.
from vedictruth.blogspot.com

Tuesday, September 29, 2015

भारत में ईसाई मत के कारनामे -Christian and Islam are more or less same-Conversion game.

भारत में ईसाई मत के कारनामे



 भारत देश में ईसाई मत का आगमन  52 AD में संत थॉमस का आगमन दक्षिण भारत में हुआ। भारत में ईसाईयों के इतिहास में दो हस्तियों के कारनामे सबसे अधिक प्रसिद्द हैं।
पहले फ्रांसिस ज़ेवियर और दूसरे रोबर्ट दी नोबिली।
पुर्तग़ालियों के भारत आने और गोवा में जम जाने के बाद ईसाई पादरियों ने भारतीयों का बलात् धर्म-परिवर्तन करना शुरू कर दिया[ii]। इस अत्याचार को आरम्भ करने वाले ईसाई पादरी का नाम 
फ्रांसिस ज़ेवियर (Francis Xavier, 7 April 1506–3 December 1552) था। फ्रांसिस ज़ेवियर ने हिन्दुओं को धर्मान्तरित करने का भरसक प्रयास किया मगर उसे आरम्भ में विशेष सफलता नहीं मिली। उसने देखा की उसके और ईसा मसीह की भेड़ों की संख्या में वृद्धि करने के मध्य हिन्दू ब्राह्मण सबसे अधिक बाधक हैं। फ्रांसिस जेविअर के अपने ही शब्दों में ब्रह्माण उसके सबसे बड़े शत्रु थे क्यूंकि वे उन्हें धर्मांतरण करने में सबसे बड़ी रुकावट थे। फ्रांसिस ज़ेवियर ने इस समस्या के समाधान के लिए ईसाई शासन का आश्रय लिया। वाइसराय द्वारा यह आदेश लागू किया गया कि सभी ब्राह्मणों को पुर्तगाली शासन की सीमा से बाहर कर दिया जाये । गोवा में किसी भी स्थान पर नए मंदिर के निर्माण एवं पुराने मंदिर की मरमत करने की कोई इजाज़त नहीं होगी[iii]। इस पर भी असर न देख अगला आदेश लागू किया गया की जो भी हिन्दू ईसाई शासन के मार्ग में बाधक बनेगा उसकी सम्पति जप्त कर ली जाएगी। इससे भी सफलता न मिलने अधिक कठोरता से अगला आदेश लागू किया गया। राज्य के सभी ब्राह्मणों को धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने का अथवा देश छोड़ने का फरमान जारी हुआ। इस आदेश के साथ हिन्दुओं विशेष रूप से ब्राह्मणों पर भयंकर अत्याचार आरम्भ हो गये। हिन्दू पंडित और वैद्य पालकी पर सवारी नहीं कर सकता था। ऐसा करने वालो को दण्डित किया जाता था। यहाँ तक जेल में भी ठूस दिया जाता था[iv]। हिन्दुओं को ईसाई बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। ईसाई बनने पर राज संरक्षण की प्राप्ति होना एवं हिन्दू बने रहने पर प्रताड़ित होने के चलते हजारों हिन्दू ईसाई बन गए[v]। हिन्दुओं को विवाह आदि पर उत्सव करने की मनाही करी गई। ईसाई शासन के अत्याचारों के चलते हिन्दू बड़ी संख्या में पलायन के लिए विवश हुए[vi]फ्रांसिस ज़ेवियर के शब्दों में परिवर्तित हुए हिन्दुओं को ईसाई बनाते समय उनके पूजा स्थलों को,उनकी मूर्तियों को उन्हें तोड़ने देख उसे अत्यंत प्रसन्नता होती थी। हजारों हिन्दुओं को डरा धमका कर, अनेकों को मार कर, अनेकों को जिन्दा जला कर, अनेकों की संपत्ति जब्त कर, अनेकों को राज्य से निष्कासित कर अथवा जेलों में डाल कर ईसाई मत ने अपने आपको शांतिप्रिय एवं न्यायप्रिय सिद्ध किया[vii]। हिन्दुओं पर हुए अत्याचार का वर्णन करने भर में लेखनी कांप उठती है।
 गौरी और गजनी का अत्याचारी इतिहास फिर से सजीव हो उठा था[
 विडंबना देखिये की ईसा मसीह के लिए भेड़ों की संख्या में वृद्धि के बदले फ्रांसिस जेविअर को ईसाई समाज ने संत की उपाधि से नवाजा गया। गोवा प्रान्त में एक गिरिजाघर में फ्रांसिस ज़ेवियर की अस्थिया सुरक्षित रखी गई है। हर वर्ष कुछ दिनों के लिए इन्हें दर्शनार्थ रखा जाता है। सबसे बड़ी विडंबना देखिये इनके दर्शन एवं सम्मान करने गोवा के वो ईसाई आते है जिनके पूर्वज कभी हिन्दू थे एवं उन्हें इसी ज़ेवियर ने कभी बलात ईसाई बनाया गया था।
रोबर्ट दी नोबिली नामक ईसाई का आगमन 1606 में मदुरै, दक्षिण भारत में हुआ। उसने पाया की वहां पर हिन्दुओं को धर्मान्तरित करना लगभग असंभव ही है। उसने देखा की हिन्दू समाज में ब्राह्मणों की विशेष रूप से प्रतिष्ठा हैं। इसलिए उसने धूर्तता करने की सोची। उसने पारम्परिक धोती पहन कर एक ब्राह्मण का वेश धरा। जनेऊ, शिखा रख कर शाकाहारी भोजन करना आरम्भ कर दिया। उसने यह प्रचलित कर दिया की वह सुदूर रोम से आया हुआ ब्राह्मण है। उसके पूर्वज भारत से रोम गए थे। उसने तमिल और संस्कृत भाषा में ग्रन्थ रचना करने का नया प्रपंच भी किया। इस ग्रन्थ को उसने "वेद" का नाम दिया। ब्राह्मण वेश धरकर नोबिली ने सत्संग करना आरम्भ कर दिया। उसके सत्संग में कुछ हिन्दू आने लग गए। धीरे धीरे उसने सत्संग में ईसाई प्रार्थनों का समावेश कर दिया। उसके प्रभाव से अनेक हिन्दू ईसाई बन गए[ix] कालांतर में मैक्समूलर ने नोबिली के छदम "वेद" का रहस्य उजागर कर दिया। पाठक सोच रहे होंगे की मैक्समूलर ने ऐसा क्यों किया। जबकि दोनों ईसाई थे। उत्तर सुनकर रोंगटे खड़े हो जायेगे। नोबिली ईसाइयत के एक सम्प्रदाय रोमन कैथोलिक से सम्बंधित था जबकि मैक्समूलर प्रोटोस्टेंट सम्प्रदाय से सम्बंधित था। दोनों के आपसी जलन और फुट ने इस भेद का भंडाफोड़ कर दिया। जहाँ पर धर्म का स्थान मज़हब/मत मतान्तर ले लेते हैं। वहां पर ऐसा ही होता है।

नोबिली को ईसाई समाज में दक्षिण भारत में धर्मान्तरण के लिए बड़े सम्मान से देखा जाता है। पाठक स्वयं विचार करे। वेश बदल कर धोखा देने वाला नकल करने वाला सम्मान के योग्य है अथवा तिरस्कार के योग्य है? प्रसिद्द राष्ट्रवादी लेखक सीता राम गोयल द्वारा ईसाई समाज द्वारा हिन्दू वेश धारण करने, हिन्दू मंदिरों के समान गिरिजाघर बनाने, हिन्दू धर्मग्रंथों के समान ईसाई भजन एवं मंत्र बनाने, हिन्दू देवी देवताओं के समान ईसा मसीह एवं मरियम की मूर्तियां बनाने, ईसाई शिक्षण संस्थान को गुरुकुल की भाँति नकल करने की अपने ग्रंथों में भरपूर आलोचना करी है[x]। विचार करे क्या ईसाईयों को अपने धर्म ग्रंथों एवं सिद्धांतों पर इतना अविश्वास है की उन्हें नकल का सहारा लेकर अपने मत का प्रचार करना पड़ता है। धर्म की मूल सत्यता पर टीकी है। न की जूठ,फरेब, नकल और धोखे पर टिकी हैं।

भारत देश के विशाल इतिहास के ईसाईयों के अत्याचार, जूठ, धोखे से सम्बंधित दो कारनामों का सत्य इतिहास मैंने अपने समक्ष रखा हैं। यह इतिहास उस काल का है जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत की स्थापना नहीं हुई थी। पाठक कल्पना करे अंग्रेजों के संरक्षण में ईसाईयों ने कैसे कैसे कारनामे करे होगे।



डॉ विवेक आर्य


[i] The myth of Saint Thomas and the Mylapore Shiva Temple by Ishwar Sharan, Voice of India, New Delhi, 1991


[ii] Alfredo DeMello, “The Portuguese Inquisition in Goa”


[iii] Viceroy António de Noronha issued in 1566, an order applicable to the entire area under Portuguese rule:

“I hereby order that in any area owned by my master, the king, nobody should construct a Hindu temple and such temples already constructed should not be repaired without my permission. If this order is transgressed, such temples shall be, destroyed and the goods in them shall be used to meet expenses of holy deeds, as punishment of such transgression.”


[iv] Priolkar, A. K. The Goa Inquisition. (Bombay, 1961)


[v] Shirodhkar, P. P., Socio-Cultural life in Goa during the 16th century, p. 35


[vi] Shirodhkar, P. P., Socio-Cultural life in Goa during the 16th century, p. 35


[vii] Charles Dellon ,L'Inquisition de Goa (The Inquisition of Goa)


[viii] The words Auto da fé reverberated throughout Goa, reminiscent of the furies of Hell, which concept, incidentally does not exist in the Hindu pantheon. On April 1st 1650 for instance, four people were burnt to death, the next auto da fé was on December 14, 1653, when 18 were put to the flames, accused of the crime of heresy. And from the 8th April 1666 until the end of 1679 – during which period Dellon was tried – there were eight autos da fé, inwhich 1208 victims were sentenced. In November 22, 1711 another auto da fé took place involving 41 persons. Another milestone was on December 20, 1736, when the Inquisition burnt an entire family of Raaim, Salcete, destroying their house, putting salt on their land, and placing a stone padrao, which still existed in the place (at least in 1866)-Alfredo De Mello (‘Memoirs of Goa’ Chapter 21)


[ix] History of Hindu Christian encounters by Sita Ram Goel, Chap 4


[x] The masquerade of Robert Di Nobili has been described in detail in Sita Ram Goel, Catholic Ashrams: Sannyasins or Swindlers?, Voice of India, New Delhi, 1995.

Saturday, January 17, 2015

JESUS BLUFF =STOP CHRISTIAN MISSIONARY ALL OVER WORLD.GRAND HINDUISM NEEDS A KING

"मैं इन हिन्दुओं को मंदिरों में चढ़ाव और प्रसाद चढाते देखता हूँ।
मैं प्रभु ईशु से प्रार्थना करता हूँ की वो इन हिन्दुओं का विशवास ख़त्म करें,उनकी इस दिनचर्या पे रोक लगायें।
हिन्दुओं को इनके राक्षसी देवी - देवों की पूजा से मुक्ति दिलाएं और उन्हें ईशु की प्रभुता में प्रवेश करवाएं ।"
-- एकेबालो ईशु प्रोजेक्ट भारत ।
बड़े दुःख की बात है की यह वो भाषा एवं भाव है जो इसाई मिशनरी भारतियों के लिए भारत में प्रयोग करते हैं।
अजीब बात ये है की १५ सदी (जब ये पहली बार भारत आये थे), से आज तक कुछ भी नहीं बदला।
अभी भी उतनी ही घृणा एवं हेय दृष्टिकोण है दूसरे मनुष्यों के लिए ।
उससे भी बड़ी दुःख की बात है की यही भाव और यही सोच ये भारत के कोने-कोने में प्रसारित कर रहे हैं ।
क्या कोई भी अच्छा इसाई इनका समर्थन करेगा ?
संभवतः नहीं , लेकिन पता नहीं क्यों आजतक किसी भी इसाई संगठन ने इन सब का विरोध नहीं किया।
ये जो धर्मपरिवर्तन की जल्दबाजी है,जो दूसरे पंथों के लिए द्वेष है - यह विकसित देशों में प्रायः देखने को नहीं मिलता लेकिन अविकसित देशों में अब आम बात होती जा रही है, इस विषय पे भारत के सन्दर्भ में बात करें तो पायेंगे की विदेशी चंदा जो की FCRA पालिसी के तहत आता है, उसमें देश के सर्वोच्च 10 संगठनों में से 8 इसाई संगठन हैं (गृह मंत्रालय के अनुसार )।
इस हज़ारों करोड़ों के विदेशी चंदे, चर्च की संपत्ति एवं धर्मान्तरण में सीधा सम्बन्ध दिखता है।
और ये धार्मिक कट्टरता ठीक वैसे ही है जैसे आज से सदियों पहले श्वेत नस्ल के कुछ लोग कहा करते थे "प्रभु ने दुनिया को सभ्यता देने का बोझ उनके कन्धों पे डाला है।"
उनके इस कट्टरता का एक उदहारण देखने को तब मिला जब कुछ समाजसेवी पाकिस्तान से विस्थापित शरणार्थियों से मिलने गए।
उन्होंने इस सन्दर्भ में अपना अनुभव बताया, कहा की जब वे अत्यंत विकट परिस्थितियों में घिरे थे तब समीप के चर्च से कुछ इसाई एजेंट उनके पास आये तथा उन्हें रुपये, नौकरी,धन-जायदाद आदि का आश्वाशन दिया था । यह आश्वासन सुन के सभी शरणार्थी अत्यंत प्रसन्न हुए किन्तु तब ज्ञात हुआ की एक शर्त है - उन्हें अपना धर्म परिवर्तित कर इसाई बनाना होगा; परधार्मियों के लिए कोई सहायता नहीं की जाएगी।
उन्हें अपने हिन्दू भगवानो की भर्त्सना भी करनी होगी।
जो शरणार्थी पकिस्तान से भीषण धर्मभेद देख कर आये थे उनके लिए ये पुनः वही तालिबानी मानसिकता थी! उसे कहने वाले बाहर से उतना सख्त नहीं दीखते थे, परन्तु अन्दर से वैसा ही परधार्मियों से घृणा करने वाला, उन्हें हेय दृष्टि से देखने वाला मन साफ़ झलकता था ।
शरणार्थीयों ने स्पष्ट मना कर दिया, उस पे जाते-जाते इसाई मिशनरी कहते गए की "देखना कोई तुम्हारी सहायता नहीं करने वाला"।
विडियो लिंक : https://www।youtube।com/watch?v=Ev4sRIVtwKk
विडियो में एक शरणार्थी को दुःख एवं क्रोध से कहते देखा जा सकता है की "एक और दूसरे धर्म के लोग अपने धर्म की और परिवर्तित के लिए करोड़ों व्यय करने को तत्पर हैं लेकिन दूसरी और हमारे हिन्दू भाई हैं जो दुसरे धर्म में जाने वालों की घर वापसी करवाना तो दूर, जो मात्र धन की आवश्यकता हेतु धर्मान्तरण को प्रेरित किये जा रहे हैं उनके भी सहायता करने के लिए सामने नहीं आ रहे ।
उनका धर्म रुपये के लालच के सामने नष्ट हो रहा है, क्या ये उन्हें स्वीकार है ?"
हिन्दुओं की ये समस्या मात्र इच्छा के कमी की नहीं होकर सूचना एवं ज्ञान के लोप की भी है।
वैसे तो हिन्दू अपने धर्म के नाम पर मंदिरों - मठों में हजारों लाखों दान करते हैं ; उनका सोचना है की ऐसा करने से अपने धर्म-समाज का कल्याण हो जायेगा। मंदिर संचालन एवं मठाधीश सभी हिन्दुओं के लिए कल्याण कार्य करेंगे । इन दान-दक्षिनाओं के पश्चात ज्यादातर हिन्दुओं के पास बचा धन घर-गृहस्थी इत्यादि के लिए ही बाख पाटा है इसलिए उनसे और की अपेक्षा करना व्यर्थ होगा ।
लेकिन यहीं पे हिन्दुओं की समस्या का आरम्भ होता है।
मंदिरों में दिए गए धन का सबसे बड़ा हिस्सा मंदिर बोर्ड के द्वारा सरकार को चला जाता है, बचे हुए धन का एक बड़ा भाग मंदिर के महन्तों-पुजारियों में बंट जाता है। अतः इन सब के पश्चात मंदिरों में आसपास के निर्धन हिन्दुओं के लिए ज्याद कुछ शेष नहीं बचता।
और यही कारण है की इतने दान दक्षिणा के पश्चात भी आपका धन निर्धन और असहाय के पास नहीं पहुँच पाता, आपके धर्म की रक्षा के लिए उपयोग नहीं होता।
मठों में भी यही विधान है , बस अंतर ये है की यहाँ थोडा हिस्सा सरकार को जाता है और बड़ा हिस्सा बाबा एवं मठाधीशों को जाता है।
इन्हीं सब कारणों से हिन्दू समाज के निम्न वर्ग में धन का सदा अभाव बना रहता है जिस बात का लाभ उठा कर अन्य धर्म हिंसा अथवा धन के बल पे उन्हें धर्मान्तरित कर देते हैं।
तो इस समस्या से कैसे निबटा जाए ?
समाधान ये है की या तो हिन्दू मंदिर - मठों में दान तो करे परन्तु कुछ धन को अपने आस पास के निर्धन हिन्दुओं को, गौशालाओं को एवं अन्य धर्म कार्यों में भी दान दें ।
(मंदिर में दिया तो सरकार उठा ले जाएगी ।)
अथवा,हिन्दुओं के मंदिरों का सरकार द्वारा अधिग्रहण बंद करवाना होगा।
सभी मंदिरों को हिन्दुओं के प्रति जवाबदेह बनाने की व्यवस्था स्थापित करवानी होगी । उनमें आनेवाला धन और उनके द्वारा किया जाने वाला व्यय का लेखा जोखा होना चाहिए जिसे जो भी चाहे जांच सके।
यही सनातन धर्म की रीत है की मंदिर अथवा धर्मस्थल धन उपार्जन का कार्य नहीं करेंगे,उनका कार्य है आते हुए धन-दान से समाजकल्याण करना। समय आ गया है की इस नियम का पालन हो,यही धर्मोचित है ।
एक समाज जो सच्चे रूप में स्वतंत्र हो उसमें किसी को भी अपने विश्वास एवं आस्था (या आस्था के अभाव) के पालन का सम्पूर्ण अधिकार होना चाहिए।
लेकिन इसके साथ ही किसी धर्म के लोगों का धर्मान्तरण सिर्फ इसलिए हो जाये क्योंकि उनके पास खाने के पैसे नहीं थे, तो ये देश के मूलधर्म एवं उनके अनुयायियों के लिए लज्जा का विषय है।
समाज के इसी विपन्नता, असमानता का लाभ कुछ धर्म के ठेकेदार उठा ले जाते हैं जिनका उद्देश्य धर्म तक सीमित नहीं रह जाता - देर सवेर अर्थ एवं राजनीति का समावेश हो ही जाता है।
ऐसे में जोमो केन्याटा की कही हुई बात स्मरण
हो जाती है :"..जब इसाई मिशनरी अफ्रीका में आये तो उनके पास बाइबिल थी और हमारे पास जमीन।
उन्होंने हमसे कहा प्रभु ईशु की आँख बंद कर प्रार्थना करो।
जब हमने आँखें खोली तो पाया, हमारे पास बाइबिल थी और उनके पास जमीन।"
JESUS BLUFF

Friday, January 2, 2015

Bible story is wrong about Christ- in hindi.


must read it..
क्राइस्ट का नाम क्राइस्ट क्यों है?
Aditya Agnihotri's photo.

यीशु का नाम ईसा मसीह क्यों है? और यह नाम किसने व कब रखे? आप कुछ भी कहानी गढ़ सकते हैं। लेकिन हम यहां तथ्यों की बात करेंगे तर्कों की नहीं।
ईसा मसीह ने 13 साल से 30 साल की उम्र के मध्य में क्या किया, यह रहस्य की बात है। बाइबबिल में उनके इन वर्षों के बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं मिलता है। 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने येरुशलम में यूहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली। दीक्षा के बाद वे लोगों को शिक्षा देने लगे।
अनुसार सन् 29 ई. को प्रभु ईसा गधे पर चढ़कर येरुशलम पहुंचे। वहीं उनको दंडित करने का षडयंत्र रचा गया। अंतत: उन्हें विरोधियों ने पकड़कर क्रूस पर लटका दिया। उस वक्त उनकी उम्र लगभग 33 वर्ष थी।
ईसा मसीह का जिक्र भविष्य पुराण में मिलता है। भविष्य पुराण कब लिखा गया इस पर विवाद हो सकता है, पर यह तो तय है कि इसे ईसा मसीह के बाद लिखा गया था। यह संभवत: मध्यकाल में लिखा गया होगा।
हिमालय क्षेत्र में ईसा मसीह की मुलाकात उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के पौत्र से होने का छोटा-सा वर्णन मिलता है। इससे यह भी तय हो गया कि भविष्य पुराण विक्रमादित्य के पौत्र के बाद या उसके काल में लिखा गया होगा। हिन्दू लोग भले ही कहते रहे हैं कि इसे वेद व्यास ने लिखा था, लेकिन सच तो सच ही होता है।
लुइस जेकोलियत ने 1869 ई. में अपनी एक पुस्तक 'द बाइबिल इन इंडिया' में लिखा है कि जीसस क्राइस्ट और भगवान श्रीकृष्ण एक थे। लुइस जेकोलियत फ्रांस के एक साहित्यकार थे।
'द बाइबिल इन इंडिया में कृष्ण और क्राइस्ट पर एक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। 'जीसस' शब्द के विषय में लुइस ने कहा है कि क्राइस्ट को 'जीसस' नाम भी उनके अनुयायियों ने दिया है। इसका संस्कृत में अर्थ होता है 'मूल तत्व'।
'द बाइबिल इन इंडिया में यह भी कहा है कि क्राइस्ट शब्द कृष्ण का ही रूपांतरण है, हालांकि उन्होंने कृष्ण की जगह क्रिसना शब्द का इस्तेमाल किया। भारत में गांवों में कृष्ण को क्रिसना ही कहा जाता है।
क्रिसना ही क्राइस्ट और ख्रिस्तान हो गया। बाद में यही क्रिश्चियन हो गया। लुइस के अनुसार ईसा मसीह अपने भारत भ्रमण के दौरान जगन्नाथ के मंदिर में रुके थे।
एक रूसी लेखक निकोलस नोकोविच ने भारत में कुछ वर्ष रहकर प्राचीन हेमिस बौद्घ आश्रम में रखी पुस्तक 'द लाइफ ऑफ संत ईसा' पर आधारित फ्रेंच भाषा में 'द अननोन लाइफ ऑफ जीसस क्राइस्ट' नामक पुस्तक लिखी है।
प्राचीन हेमिस बौद्घ आश्रम लद्दाख के लेह मार्ग पर स्थित है। किताब के अनुसार ईसा मसीह सिल्क रूट से भारत आए थे और यह आश्रम इसी तरह के सिल्क रूट पर था। उन्होंने 13 से 29 वर्ष की उम्र तक यहां रहकर बौद्घ धर्म की शिक्षा ली और निर्वाण के महत्व को समझा।
30 साल की उम्र में येरुशलम लौटकर उन्होंने यूहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली। दीक्षा के बाद वे लोगों को शिक्षा देने लगे। ज्यादातर विद्वानों के अनुसार सन् 29 ई. को प्रभु ईसा गधे पर चढ़कर येरुशलम पहुंचे।
षडयंत्र रचा गया। अंतत: उन्हें विरोधियों ने पकड़कर क्रूस पर लटका दिया। उस वक्त उनकी उम्र थी लगभग 33 वर्ष।
18 वर्ष भारत के कश्मीर और लद्दाख के हिन्दू और बौद्ध आश्रमों में रहकर बौद्घ एवं हिन्दू धर्म ग्रंथों एवं अध्यात्मिक विषयों का गहन अध्ययन किया। निकोलस लिखते हैं कि वे लद्दाख के बौद्ध हेमिस मठ में रुके थे।
अपनी भारत यात्रा के दौरान जीसस ने उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर की भी यात्रा की थी एवं यहां रहकर इन्होंने अध्ययन किया था।
क्रूस पर लटका ने के 3 दिन बाद ये अपने परिवार और मां मैरी के साथ तिब्बत के रास्ते भारत आ गए। भारत में श्रीनगर के पुराने इलाके को इन्होंने अपना ठिकाना बनाया।
80साल की उम्र में जीसस क्राइस्ट की मृत्यु हुई। उन्हें वहीं दफना दिया गया और उनकी कब्र आज भी वहीं पर है। लोग इस पर विश्वास करें या न करें लेकिन यह सत्य है।
लोकोविच ने तिब्बत के मठों में ईसा से जुड़ी ताड़ पत्रों पर अंकित दुर्लभ पांडुलिपियों का अनुवाद किया जिसमें लिखा था, 'सुदूर देश इसराइल में ईसा मसीह नाम के दिव्य बच्चे का जन्म हुआ।
13-14 वर्ष की आयु में वो व्यापारियों के साथ हिन्दुस्तान आ गया तथा सिंध प्रांत में रुककर बुद्ध की शिक्षाओं का अध्ययन किया। फिर वो पंजाब की यात्रा पर निकल गया और वहां के जैन संतों के साथ समय व्यतीत किया।
इसके बाद जगन्नाथपुरी पहुंचा, जहां के पुरोहितों ने उसका भव्य स्वागत किया। वह वहां 6 वर्ष रहा। वहां रहकर उसने वेद और मनु स्मृति का अपनी भाषा में अनुवाद किया।
वहां से निकलकर वो राजगीर, बनारस समेत कई और तीर्थों का भ्रमण करते हुए नेपाल के हिमालय की तराई में चला गया और वहां जाकर बौद्ध ग्रंथों तथा तंत्रशास्त्र का अध्ययन किया फिर पर्शिया आदि कई मुल्कों की यात्रा करते हुए वह अपने वतन लौट गया।
एक जर्मन विद्वान होल्गर कर्स्टन ने 1981 में अपने गहन अनुसन्धान के आधार पर एक पुस्तक लिखी 'जीसस लिव्ड इन इण्डिया: हिज लाइफ बिफोर एंड ऑफ्टर क्रूसिफिक्शन' में ये सिद्ध करने का प्रयास किया कि जीसस ने भारत में रहकर ही बुद्ध धर्म में दीक्षा ग्रहण की और वे एक बौद्ध थे।
उन्होंने बौद्धमठ में रहकर तप-योग ध्यान साधना आदि किया। इस योग साधना के कारण ही क्रॉस पर उनका जीवन बच गया था जिसके बाद वो पुनः अपने अनुयायियों की सहायता से भारत आ गए थे।
लदाख में हेमिस गुम्फा नामक बौद्ध मठ में रहे। बाद में श्रीनगर में उनका वृद्धावस्था में देहांत हुआ। वहां आज भी उनकी मजार है।
यीशु पर लिखी किताब के लेखक स्वामी परमहंस योगानंद ने दावा किया है कि यीशु के जन्म के बाद उन्हें देखने बेथलेहेम पहुंचे तीन विद्वान भारतीय ही थे, जो बौद्ध थे। भारत से पहुंचे इन्हीं तीन विद्वानों ने यीशु का नाम 'ईसा' रखा था।
जिसका संस्कृत में अर्थ 'भगवान' होता है। एक दूसरी मान्यता अनुसार बौद्ध मठ में उन्हें 'ईशा' नाम मिला जिसका अर्थ है, मालिक या स्वामी। 'ईश' या 'ईशान' शब्द का इस्तेमाल भगवान शंकर के लिए भी किया जाता है।
स्वामी परमहंस योगानंद की किताब 'द सेकेंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट: द रिसरेक्शन ऑफ क्राइस्ट विदिन यू' में यह दावा किया गया है कि प्रभु यीशु ने भारत में कई वर्ष बिताए और यहां योग तथा ध्यान साधना की।
इस पुस्तक में यह भी दावा किया गया है कि 13 से 30 वर्ष की अपनी उम्र के बीच ईसा मसीह ने भारतीय ज्ञान दर्शन और योग का गहन अध्ययन व अभ्यास किया था।

Thursday, November 27, 2014

FRANCIS XAVIER ~ XTIAN MASS MURDERER AND TERRORIST.


"Saint" FRANCIS XAVIER ~ XTIAN MASS MURDERER AND TERRORIST.
“Goa is sadly famous for its Inquisition, equally contrary to humanity and commerce. The Portuguese monks made us believe that the people worshipped the devil, and it is they who have served him.” – Voltaire
Francis Xavier was born on April 7, 1506 in Spain and had come to Goa in 1542, for christian conversion activities. Frustrated by his failures in Goa, Francis Xavier wrote to King D. João III of Portugal, for an Inquisition to be installed in Goa. Vatican authorized and established inquisition in 1560 in Goa. . The inhuman torture of local population by the christian fanatics resulted in significant sections of the Hindu population to migrate from Goa to Mangalore. Only after eight years after the death of this christian terrorist Francisco Xavier did the Hindus come back to Goa.. Conversion by torture and terrorism initiated by Xavier, earned him sainthood from the Pope in 1622.

Sunday, October 26, 2014

TWO SONS OF SATANIC MAN-ABRAHAM- ARE ISLAM AND CHRISTIANITY

Le sacrifice d'Abraham (Matthias Stom)The following 30 violent exhortations are drawn from Jewish, Christian and Muslim scriptures. The generic word “God” is used for all deity names, and names of places or people have been replaced with generic terms. How well do you know your Torah, Bible or Quran and Hadith? Can you tell which is which? Give it a try and then check the key at the bottom.
1. Anyone arrogant enough to reject the verdict of the [holy man] who represents God must be put to death. Such evil must be purged.
2. I decided to order a man to lead the prayer and then take a flame to burn all those, who had not left their houses for the prayer, burning them alive inside their homes.
3. I will fill your mountains with the dead. Your hills, your valleys, and your streams will be filled with people slaughtered by the sword. I will make you desolate forever. Your cities will never be rebuilt. Then you will know that I am God.
4. Fight them until there is no more [disbelief or worshipping of other gods] and worship is for God alone.
5. Think not that I am come to send peace on earth: I came not to send peace, but a sword. For I am come to set a man at variance against his father, and the daughter against her mother, and the daughter in law against her mother-in-law. And a man’s foes shall be they of his own household.
6. Whoso fighteth in the way of God, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.
7. Make ready to slaughter [the infidel’s] sons for the guilt of their fathers; Lest they rise and posses the earth, and fill the breadth of the world with tyrants.
8. [God’s messenger]… was asked whether it was permissible to attack the pagan warriors at night with the probability of exposing their women and children to danger. The [holy man] replied, “They [women and children] are from them [unbelievers].”
9. Then I heard God say to the other men, “Follow him through the city and kill everyone whose forehead is not marked. Show no mercy; have no pity! Kill them all – old and young, girls and women and little children.”
10. I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them.
11. Keep [my holiday], for it is holy. Anyone who desecrates it must die.
12. The punishment of those who wage war against God and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement.
13. If a man commits adultery with another man’s wife, both the man and the woman must be put to death.
14. It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…
15. Now therefore kill every male among the little ones, and kill every woman that hath known man by lying with him. But all the women children, that have not known a man by lying with him, keep alive for yourselves.
16. I shall terrorize the [heathens]. So wound their bodies and incapacitate them, because they oppose God and his apostle.
17. A [holy man’s] daughter who loses her honor by committing fornication and thereby dishonors her father also, shall be burned to death.
18. So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.
19. Everyone who would not seek God was to be put to death, whether small or great, whether man or woman.
20. And when We wish to destroy a town, We send Our commandment to the people of it who lead easy lives, but they transgress therein; thus the word proves true against it, so We destroy it with utter destruction.
21. But if [a girl wasn't a virgin on her wedding night] and evidence of the girl’s virginity is not found, they shall bring the girl to the entrance of her father’s house and there her townsman shall stone her to death, because she committed a crime against God’s people by her unchasteness in her father’s house. Thus shall you purge the evil from your midst.
22. The Hour will not be established until you fight with the Jews, and the stone behind which a Jew will be hiding will say, “O [believer]! There is a Jew hiding behind me, so kill him.”
23. If your own full brother, or your son or daughter, or your beloved wife, or you intimate friend, entices you secretly to serve other gods, whom you and your fathers have not known, gods of any other nations, near at hand or far away, from one end of the earth to the other: do not yield to him or listen to him, nor look with pity upon him, to spare or shield him, but kill him. Your hand shall be the first raised to slay him; the rest of the people shall join in with you.
24. God’s Apostle said, “I have been ordered to fight the people till they say: ‘None has the right to be worshipped but God.”
25. Cursed be he who does God’s work remissly, cursed he who holds back his sword from blood.
26. God said, “A prophet must slaughter before collecting captives. A slaughtered enemy is driven from the land. [Prophet], you craved the desires of this world, its goods and the ransom captives would bring. But God desires killing them to manifest the religion.”
27. Anyone who blasphemes God’s name must be stoned to death by the whole community of [believers].
28. When you meet your enemies who are polytheists, invite them to three courses of action. If they respond to any one of these, you also accept it and withhold yourself from doing them any harm. Invite them to (accept) [your religion]; if they respond to you, accept it from them and desist from fighting against them… If they refuse to accept Islam, demand from them [a tax]. If they agree to pay, accept it from them and hold off your hands. If they refuse to pay the tax, seek God’s help and fight them.
29. Anyone else who goes too near the [Holy Place] will be executed.
30. Killing Unbelievers is a small matter to us.
Is the Quran more violent than the Bible? The question is hard to answer. A tally at the Skeptic’s Annotated Bible counts 842 violent or cruel passages in the Bible as compared to 333 in the Quran. That said, the Bible is a much thicker tome, and even though the New Testament endorses and adds to the violence in the Old, when percentages are compared, the Quran comes out ahead. In addition, the kinds of cruelty and violence vary as do the perpetrator and victim and the extent to which any verse can be interpreted as divine sanction for the behavior in question. Either way, this short test offers an illustrative sample from each sacred text.
Bible and Quran believers who recognize verses in this list will no doubt protest that they have been taken out of context, as indeed they have. I think the appropriate response to such a complaint is a question: What context, exactly, would make these verses uplifting, inspiring or worthy of praise? In what context are passages like these some of the most important and holy guidance that the creator of the universe might think to impart to humankind? In what context is a book that contains these passages and many, many more like them the apogee of divine goodness and timeless wisdom?
Members of each Abrahamic tradition are quick to point out the rational and moral flaws in the others. I wonder sometimes, what this world might be like if they were as quick to examine the flaws in their own.
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Key: Odd numbered quotes are from the Bible, even numbers from the Quran or Hadith. 1. Deuteronomy17:12 NLT; 2. Bukhari 11:626; 3. Ezekiel 35:7-9 NLT; 4. Quran 2:193; 5. Matthew 10:34-35; 6. Quran 4:74; 7.Isaiah 14:21 NAB; 8. Bukhari 52:256; 9. Ezekiel 9:5 NLT; 10. Quran 8:12; 11. Exodus 31:12-15 NLT; 12. Quran5:33; 13. Leviticus 20:10 NLT; 14. Quran 8:67; 15. Numbers 31: 17-18 KJV; 16. Quran 8:12; 17. Leviticus 21:9 NAB; 18. Quran 9:5; 19. 2 Chronicles 15:12-13 NAB; 20. Quran 17:16; 21. Deuteronomy 22:20-21 NAB; 22.Bukhari 52:177; 23. Deuteronomy 13:7-12 NAB; 24. Bukhari 8:387; 25. Jeremiah 48:10 NAB; 26. Ibn Ishaq/Hisham 484; 27. Leviticus 24:16 NLT; 28. Muslim 19:4294; 29. Numbers 1: 51 NLT; 30. Tabari 9:69