Sunday, November 4, 2018

क्या क्षत्रिय मांसाहार करते थे ????


"क्या क्षत्रिय मांसाहार करते थे ????"
आज मांसाहारी मांस सेवन को सही और युक्तियुक्त ठहराने के लिए प्रमाणहीन तर्क देते हैं । क्षत्रिय कभी मांसाहारी नहीं थे वास्तविक में परंतु मैकॉले शिक्षा में एवं वामपंथी इतिहास में क्षत्रियों को मांसाहारी ठहराने के लिए तर्क देते हैं महाराजा दशरथ की शिकार का तो इस कुतर्क का खंडन करते हुए आगे क्षत्रिय धर्म से भी अवगत करवाऊंगी ।
प्रथम शङ्का का खंडन
वाल्मीकि रामायण अयोध्याकांड के 64 वें अध्याय में कथा मिलती है। श्रीराम के वनगमन पर दुखी दशरथ अपनी मृत्यु से पहले रानी कौशल्या को यह कथा बताते हैं। इसके अनुसार दशरथ शब्द भेदी बाण चलाते थे यानी शब्द व ध्वनि सुनकर बाण चलाने में समर्थ थे।
एक दिन हिंसक पशु के आक्रमण के भ्रम में उन्होंने श्रवण कुमार जिनके माता-पिता वृद्ध और नेत्रहीन थे, उनपर बाण चला दिया था । तो इससे यह सिद्ध होता है कि महाराजा दशरथ जी ने किसी पशु के हत्या की मंशा से बाण नहीं चलाया था , और इन्ही महाराज दशरथजी के परदादा महाराज दिलीप ने गौ माताके प्राण बचाने के लिये , स्वयं को सिंह का भोजन बना दिया था , वो किसी अन्य जानवर को मारकर भी सिंहका पेट भर सकते थे ।
चंद्रवंशी राजपूत आनव कुल में पुरुवंशी नरेश शिबि उशीनगर देश के महाराजा की त्याग की गाथा सुनकर इंद्र और आग
शिबि की त्याग की भावना तात्कालिक और अस्थायी है या उनके स्वभाव का स्थायी गुण, इसकी परीक्षा करने के लिए इंद्र और अग्नि ने एक योजना बनायी। अग्नि ने एक कबूतरका रूप धारण किया और इन्द्र ने एक बाज का। कबूतर को अपना आहार बनाने के लिए बाज ने उसका शिकार करने के लिए पीछा किया। कबूतर तेजी से उड़ता हुआ राजा शिबि के चरणों में जा पड़ा और बोला- मेरी रक्षा कीजिए। शिबि ने उसे रक्षा का आश्वासन दिया। पीछे-पीछे बाज भी आ पहुंचा। उसने शिबि से कहा, महाराज! मैं इस कबूतर का पीछा करता आ रहा हूं और इसे अपना आहार बना कर अपनी भूख मिटाना चाहता हूं, यह मेरा भक्ष्य है। आप इसकी रक्षा न करें।
शिबि ने बाज से कहा, मैंने इस पक्षी को अभय प्रदान किया है। इसे कोई मारे यह मैं कभी सह नहीं सकता। तुम्हें अपनी भूख मिटाने के लिए मांस चाहिए, सो मैं तुम्हें अपने शरीर से इस कबूतर के वजन के बराबर मांस काटकर देता हूं। उन्होंने एक तराजू मंगवाई और उसके एक पलड़े में कबूतर को रख दिया। दूसरे पलड़े में महाराज शिबि अपने शरीर से मांस काटकर डालने लगे। काफी मांस काट डाला किंतु कबूतर वाला पलड़ा तनिक भी नहीं हिला और अंत में महाराज शिबि स्वयं उस पलड़े पर जा बैठे और बाज से बोले, मेरा पूरा शरीर तुम्हारे सामने है, आओ भोजन करो।
महाराज शिबि की त्याग बुद्धि को स्वीकार करते हुए अग्नि और इंद्र अपने स्वाभाविक रूप में प्रकट हुए और महाराज शिबि को भी उठा कर खड़ा कर दिया। उन्होंने शिबि की त्याग भावना की बड़ी प्रशंसा की, आशीर्वाद दिया और फिर चले गए।
निष्कर्ष तो यही निकलता है क्षत्रिय मांसाहारी नहीं थे क्योंकि उनके मुख में गंगा और कंठ में वेद होते थे और भुजाओं में महादेव विराजते थे सर कटने के बाद भी धर निरंतर युद्ध करता था ऐसे अशीर्वादित देह को किसी निर्दोष पशुओं का वक्षण कर भोजन कर के दुषित नहीं करना चाहते थे । अगर क्षत्रिय मांसाहारी होते तो खुद की बलि देकर हिंसक पशुओं का पेठ नही भरते दूसरे जानवर को बलि चढ़ा देते त्याग, दया और स्नेह विनम्रता किसी भी मांसाहारी व्यक्ति में ना के बराबर मिलेगी । क्षत्रिय अगर शिकार कर के पशुओं की मांस का भोजन करता था तो उन्हें गौ-ब्राह्मण प्रति पालक क्यों कहा गया ??? क्यों महाराजा दिलीप और शिबि ने अपनी मांस की जगह किसी अन्य पशु का शिकार करके मांस नहीं खिलाया ????
©Copyright मनीषा सिंह बाईसा जगह मेवाड़ / मेड़ता , राजपुताना राजस्थान की कलम से :

बिजया” मंदिर बना “बीजामंडल” मस्जिद


“बिजया” मंदिर बना “बीजामंडल” मस्जिद
मूल नाम: बीजा मंडल या बिजया मंदिर (हिन्दू देवी को समर्पित)
स्थान: विदिशा, मध्य प्रदेश
इस्लामिक अत्याचार के बाद परिवर्तित नाम: बीजा मंडल मस्जिद
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग ६० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है – विदिशा शहर। विदिशा अपनी बीजामंडल मस्जिद और उसके दिलचस्प इतिहास के लिए प्रसिध्द है।
इस्लामिक राज में भारतवर्ष के बहुत से अद्भुत वैभवशाली मंदिर विनष्ट कर मस्जिद में बदल दिए गए थे। हिन्दू मंदिरों को लूट-खसोट कर, उनकी संपत्ति हड़प कर, उसे तबाह करने के बाद उसी ढहाए हुए मंदिर के बचे हुए अवशेषों से वहां मस्जिद बना दी जाती थी। और इस तरह एक हिन्दू मंदिर मस्जिद में तब्दील कर दिया जाता था, बीजामंडल मस्जिद भी इसी का एक उदाहरण है।
आज अपना सारा वैभव खोकर खड़ा बीजामंडल मुग़ल और इस्लामिक लुटेरों के भीषण क्रूर अत्याचार की दर्दनाक कहानी कह रहा है।
बिजया मंदिर परमार राजाओं द्वारा बनवाया गया प्रतिष्ठा की देवी चर्चिका का मंदिर था। इस मंदिर को ध्वस्त कर उसी की तोड़ी गई सामग्री से वहां बीजामंडल मस्जिद बना दी गई।
वहां मौजूद एक स्तंभ पर मिले संस्कृत अभिलेख के अनुसार मूलतः यह मंदिर विजय दिलाने वाली देवी ‘विजया’ को अर्पित था, जिसे मालवा के राजा नरवर्मन ने बनवाया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) भी इसका स्पष्ट उल्लेख करता है।
बीजा या बिजया शब्द – देवी विजया रानी के नाम का ही बिगड़ा हुआ रूप है। इस तरह बीजा मंडल या बिजया मंदिर एक हिन्दू देवी को समर्पित मंदिर था।
सन् १६५८-१७०७ में औरंगजेब की क्रूर निगाह इस पर पड़ी, जिसने अपना शिकार बनाते हुए इसे लूट-खसोट कर तहस-नहस कर दिया। उसने कीमती मूर्तियों को मंदिर के उत्तरी भाग में दबवा दिया और इसे एक मस्जिद में परिवर्तित कर दिया।
भले ही यह परिसर अब भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा स्मारक के रूप में संरक्षित है लेकिन पिछले ३०० वर्षों से इसका इस्तेमाल खासतौर से ईद के मौके पर ईदगाह के रूप में और बड़ी महफिलों के लिए होता आ रहा है।
सन् १९९१ की एक तूफानी रात में इस मस्जिद के उत्तरी किनारे की दीवार भारी बारिश के कारण भहराकर गिर पड़ी। टूट कर उलट-पुलट हो चुकी इस दीवार ने बिजया मंदिर की ३०० वर्ष पुरानी दबी हुई समृद्धि को उजागर कर दिया। भारतीय पुरातत्व विभाग भी यह स्वीकार करता है कि उनके द्वारा वहां खुदाई करवा कर कई तराशी हुई मूर्तियां, बहुमूल्य ख़जाना और प्रतिमाएं प्राप्त की गईं।
बीजामंडल मस्जिद की दिवारों और स्तंभों पर रामायण और महाभारत के अभिलेख खुदे हुए हैं। यह सभी प्रमाण लोगों के देखने के लिए वहां उपलब्ध हैं।
मुसलमानों को इस बात को समझना होगा कि कैसे उनके हिन्दू पूर्वजों (काफिरों) को और उनकी सांस्कृतिक धरोहरों को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया गया है। सांस्कृतिक धरोहर को वापस पाने की इस मुहीम में उन्हें हिन्दुओं के साथ आकर इसे और गति प्रदान करनी चाहिए।

©Copyright मनीषा सिंह बाईसा जगह मेवाड़ / मेड़ता , राजपुताना राजस्थान की कलम से : 

भारतवर्ष का प्राचीन नाम हिमवर्ष


पुराणों में बताया गया है कि प्रलयकाल के पश्चात् स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत ने रात्रि में भी प्रकाश रखने की इच्छा से ज्योतिर्मय रथ के द्वारा सात बार भूमण्डल की परिक्रमा की। परिक्रमा के दौरान रथ की लीक से जो सात मण्डलाकार गड्ढे बने, वे ही सप्तसिंधु हुए। फिर उनके अन्तर्वर्ती क्षेत्र सात महाद्वीप हुए जो क्रमशः जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप कहलाए। ये द्वीप क्रमशः दुगुने बड़े होते गए हैं और उनमें जम्बूद्वीप सबके बीच में स्थित है-
‘जम्बूद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यसंस्थितः’
(ब्रह्ममहापुराण, 18.13)
प्रियव्रत के 10 पुत्रों में से 3 के विरक्त हो जाने के कारण शेष 7 पुत्र— आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ट, मेधातिथि और वीतिहोत्र क्रमशः जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप के अधिपति हुए।
प्रियव्रत ने अपने पुत्र आग्नीध्र को जम्बूद्वीप दिया था-
‘जम्बूद्वीपं महाभाग साग्नीध्राय ददौ पिता’
मेधातिथेस्तथा प्रादात्प्लक्षद्वीपं तथापरम् ।।’
(विष्णुमहापुराण, 2.1.12)
जम्बूद्वीपाधिपति आग्नीध्र के 9 पुत्र हुए- नाभि, किंपुरुष, हरिवर्ष, इलावृत्त, रम्यक, हिरण्यमय, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमाल। सम विभाग के लिए आग्नीध्र ने जम्बूद्वीप के 9 विभाग करके उन्हें अपने पुत्रों में बाँट दिया और उनके नाम पर ही उन विभागों के नामकरण हुए-
‘आग्नीध्रसुतास्तेमातुरनुग्रहादोत्पत्तिकेनेव संहननबलोपेताः पित्रा विभक्ता आत्म तुल्यनामानियथाभागं जम्बूद्वीपवर्षाणि बुभुजः’
(भागवतमहापुराण, 5.2.21; मार्कण्डेयमहापुराण, 53.31-35)
पिता (आग्नीध्र) ने दक्षिण की ओर का ‘हिमवर्ष’ (जिसे अब ‘भारतवर्ष’ कहते हैं) नाभि को दिया-
‘पिता दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्’
(विष्णुमहापुराण, 2.1.18)
आठ विभागों के नाम तो ‘किंपुरुषवर्ष’, ‘हरिवर्ष’ आदि ही हुए, किंतु ज्येष्ठ पुत्र का भाग ‘नाभि’ से ‘अजनाभवर्ष’ हुआ।
जय एकलिंगजी ।। ✍️✍️
copyright मनीषा सिंह सूर्यवंशी की कलम से "

The Peshva kingdom of India


17वी से 18वी सती तक चित्पावन ब्राह्मणों की शौर्यपूर्ण पराक्रम एवं कूटनीतिज्ञता के बल पर संपूर्ण अटक , कटक से लेकर अफ़ग़ान , सिंध , रावी , बंगाल की खाड़ी तक पेशवाओं ने एकछत्र हिन्दू स्वराज्य की स्थापना किया पेशवा अर्थात प्रधानमंत्री क्षत्रिय राजा महाराजों ने प्रधानमंत्री के स्थान पर सदैव चित्पावन ब्राह्मण को नियुक्त किया क्योंकि प्रधानमंत्री (पेशवा) सबसे महत्वपूर्ण पद होता था जिसमे केवल चित्पावन ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता था क्योंकि इस पद की विशेषता थी शास्त्र एवं शस्त्र दोनों से शत्रु एवं मित्र को उत्तर देना पहले के समय में भी इस पद पर ब्राह्मण को ही नियुक्त किया जाता था (अयाचक एवं याचक दोनों को) । क्षत्रिय और चित्पावन ब्राह्मण की एकत्रीकरण से तुर्क ,मुग़ल , निज़ाम, नवाब सबके पसीने छूट गए थे तभी तो क्षत्रिय राजा छत्रपति महाराजा शिवाजी के साम्राज्य का पेशवा श्रीमंत मोरोपंत त्र्यम्बंक पिंगले जी ने संपूर्ण दक्कन से लेकर सूरत तक केसरिया पताका फैराया था । शिवाजी महाराज के बाद उनके वंशज छत्रपति शाहूजी महाराज के शासन काल तक पेशवाओं ने संपूर्ण धरा को भगवामयी कर दिए थे एवं हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना कर चुके थे । क्षत्रिय राजा सर्वोच्च पद सलाहकार के पद पर याचक ब्राह्मण को एवं प्रधानमंत्री के पद पर चित्पावन ब्राह्मण को नियुक्त करते थे ।
मोरोपन्त त्रयम्बक पिंगले (1620 – 1683), मराठा साम्राज्य के प्रथम पेशवा थे। उन्हें 'मोरोपन्त पेशवा' भी कहते हैं। वे छत्रपति शिवाजी के अष्टप्रधानों में से एक थे।
प्रारंभिक जीवन
मोरोपन्त त्रयम्बक पिंगले जी का जन्म 1620 निमगांव में देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
पेशवा मोरोपंत जी ने छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल में राजस्व प्रणाली की शुरुआत की, और छत्रपति शिवाजी महाराज पेशवा मोरोपंत की कुशल रणनीतिज्ञता से प्रशन्न होकर उन्हें रणनीति विशेषज्ञ एवं रक्षा सलाहकार के पद पर भी पेशवा मोरोपंत जी को नियुक्त कर दिया । पेशवा मोरोपंत उनके अष्ट प्रधान में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं महाराज के निकटवर्ती थे पेशवा मोरोपंत जी महाराज छत्रपति शिवाजी ने उनके संरक्षण में किला , मंदिर एवं मठों का निर्माण, मरम्मत एवं देखरेख का दायित्व सौंप दिए थे इनसबके उपरांत संसाधन योजना बनाने का दायित्व भी पेशवा मोरोपंत जी के उपर था ।
मोरोपंत जी एक योद्धा एवं अभियंता के रूप में- पेशवा ने किला निर्माण कार्य एवं रणभूमि में योद्धाओं की भांति युद्ध करने जैसी अतिमहत्वपूर्ण भूमिका निभाई,
यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि पेशवा मोरोपंत जी एक कुशल वास्तुशिल्प अभियन्ता थे और इस बात का पता हमें इन संदर्भों से प्राप्त होता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने प्रतापगढ़ के निर्माण और प्रशासनिक कार्य की ज़िम्मेदारी पेशवा मोरोपंत को दिया था एवं छत्रपति शिवाजी की असमय देहत्याग करने पर मोरोपंत पिंगले नाल जिले में साल्हेर-मुल्हर किलों के विकास कार्य एवं निर्माण कार्य एवं किले का शिल्पकार करने का दायित्व पेशवा मोरोपंत को दिया गया था ,पेशवा मोरोपंत जी किले निर्माणकार्य में एक पर्यवेक्षक के रूप में काम कर रहे थे । अब उनका दूसरा एवं सबसे महत्वपूर्ण स्वरूप जिनकी वजह से वो महाराज छत्रपति के सर्वाधिक प्रिय थे वो है एक योद्धा का स्वरूप वो युद्धकला में दक्षता प्राप्त किये थे पेशवा (अयाचक ब्राह्मण) केवल शास्त्र के नहीं शस्त्र के भी धनी थे ।
मोरोपंत जी द्वारा लड़ा गया प्रमुख युद्ध - पेशवा मोरोपंत जी के नेतृत्व में दो निर्णायक युद्ध लड़ा गया जिसके लिए उनको महाराजा छत्रपति शिवाजी ने उनको सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान पर नियुक्त किया ।त्रयम्बकेश्वर किला विजय अभियान एवं वानी-डिंडोरी का युद्ध सन 1670 ईसवी में लड़े जानेवाली ऐतिहासिक युद्ध था जिसमें मुग़ल सल्तनत की और से दाऊद ख़ाँ , इखलास ख़ाँ , मीर अब्दुल माबूद लड़ रहे थे। मुग़ल सल्तनत के प्रमुख सेनापति की तीन टुकड़ी बनी जिसमें त्रयम्बकेश्वर किले को मुग़ल के अधीनस्थ करने का दायित्व दाऊद ख़ाँ को मिला उसके नेतृत्व में 52,000 सैन्यबल था और दाऊद ख़ाँ के समक्ष थे श्री मोरोपंत पिंगले पेशवा , छत्रपति शिवाजी ने त्रयम्बकेश्वर किले पर हिन्दवी स्वराज्य का ध्वज फहराने का दायित्व पेशवा को दिया था। पेशवा के नेतृत्व में 1200 के संख्या में सैन्यबल था जिन्हें घात लगाकर युद्ध करने की पद्धति एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध पद्धत्ति में महारथ हासिल थी ।
पेशवा मोरोपंत पिंगले जी मनोवैज्ञानिक युद्ध कला के जनक - पेशवा मोरोपंत जी का मुख्य हथियार था मनोवैज्ञानिक युद्ध पद्धत्ति इसी युद्ध पद्धत्ति के बल पर उन्होंने दाऊद ख़ाँ को परास्त करके शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज्य के साम्राज्य में त्र्यम्बकेश्वर किले को सम्मिलित करने का कर्तव्य निभाया।
पेशवा मोरोपंत पिंगले जी को मनोवैज्ञानिक युद्धकला का जनकपिता माना जाता हैं ।
निष्कर्ष:- सिर्फ इतना ही नहीं बंगाल में प्रतिहार राजपूत राजाओं के साथ संयुक्त मोर्चा बनाकर पेशवा मोरोपंत जी ने बंगाल को अबीसीनिया के अरबी लूटेरों आक्रांताओं से मुक्त करवाया , महाराज सवाई जय सिंह के साथ संयुक्त मोर्चा कर पेशवा बाजी राव ने मुग़ल सल्तनत की साम्राज्य पर आखरी कील ठोका था। यह तो केवल एक झलक है पेशवाओं के वीरगाथा की ऐसे सैकड़ो सफल युद्ध अभियान कर पेशवाओं ने हिन्दू स्वराज्य की स्थापना में एवं धर्म रक्षा में अपना योगदान दिया था।
लेकिन आज के समय के हालात ये हैं कि वर्तमान सरकार के आँखों मे चुभ रहा है ब्राह्मण वर्ण यही नहीं कुछ लोगों ने चित्पावन ब्राह्मण को विदेशी भी बताना शुरू कर दिया है परंतु यह कथन "पेशवा की पेशवाई ना होता तो अटक- कटक से लेकर रावी-सिंध भगवामयी ना होता" उतना ही सत्य है जितना अंधेरे के बाद उजाले का होना । पेशवाओं को विदेशी बताने वाले लोगों और उन्हें लुटेरे की संज्ञा देने वाले कुछ इतिहासविदुरों से एक सवाल है कि पेशवाओं के साथ किसी आक्रमणकारी की व्यक्तिगतरूप से तो शत्रुता नहीं थी फ़िर क्यों पेशवाओं ने निरंतर युद्ध कर भारतवर्ष से आक्रमणकारियों को खदेड़ कर भारतवर्ष पर हिन्दू साम्राज्य का स्थापना किया आखिर किसके लिए खुद के लिए या सम्पूर्ण आर्यवर्त के लिए ???
आज की परिस्थिति ऐसी है कि महाराष्ट्र जो कि पेशवाओं की प्रमुख कर्मभूमि एवं जन्मभूमि रही है वहां कोरेगांव जयंती जैसी शर्मनाक कार्यक्रम का आयोजन करके पेशवाओं के साथ गद्दारी करके हरा के उनकी हार का जश्न मनाया जाता है तब किसी पार्टी का मुंह नहीं खुलता है लेकिन जब सर्वोच्च न्यायालय के एक सही निर्णय के खिलाफ यही तथाकथित शोषित वर्ग जब पब्लिक प्रॉपर्टी को नष्ट करते हुए हल्ला बोलते हैं तब तुरंत वर्तमान सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ दो दो बार पुनर्विचार याचिका दायर कर दिया जाता है, अंत में बस भारत सरकार से यही एक अनुरोध है कि 125 करोड़ भारतीय आपके सन्तानतुल्य है और पिता का कर्तव्य होता है कि सन्तान जब मार्ग से भटके तो उसे सही मार्ग बताये ना कि मार्ग भटकाये और भ्रम पैदा करे क्योंकि वर्तमान भारत सरकार ने न्यायालय के फैसले के खिलाफ जो पुनर्विचार याचिका दायर की है वो आग में घी डालने का कार्य कर रही है और इससे यह भी सिद्ध होता है कि भारत सरकार भी इतिहास शायद बॉलीवुड के उन फिल्मों से सीखते हैं जिसमें मनगढंत कहानी बनाकर ब्राह्मणों और क्षत्रियों को हमेशा विलेन बताया जाता है ।
© COPYRIGHT मनीषा सिंह सूर्यवंशी (इतिहासकार) की कलम से ✍️✍️

मरियम उद ज़मानी”, जोधा बाई बता कर एक झूठी अफवाह


जब भी कोई हिन्दू राजपूत किसी मुग़ल की गद्दारी की बात करता है तो कुछ मुग़ल प्रेमियों द्वारा उसे जोधाबाई का नाम लेकर चुप करने की कोशिश की जाती है!
बताया जाता है की कैसे जोधा ने अकबर की आधीनता स्वीकार की या उससे विवाह किया!
परन्तु अकबर कालीन किसी भी इतिहासकार ने जोधा और अकबर की प्रेम कहानी का कोई वर्णन नही किया!
सभी इतिहासकारों ने अकबर की सिर्फ 5 बेगम बताई है!
1.सलीमा सुल्तान
2.मरियम उद ज़मानी
3.रज़िया बेगम
4.कासिम बानू बेगम
5.बीबी दौलत शाद
अकबर ने खुद अपनी आत्मकथा अकबरनामा में भी किसी हिन्दू रानी से विवाह का कोई जिक्र नहीं किया!
परन्तु हिन्दू राजपूतों को नीचा दिखने के लिए कुछ इतिहासकारों ने अकबर की मृत्यु के करीब 300 साल बाद 18 वीं सदी में “मरियम उद ज़मानी”, को जोधा बाई बता कर एक झूठी अफवाह फैलाई!
और इसी अफवाह के आधार पर अकबर और जोधा की प्रेम कहानी के झूठे किस्से शुरू किये गए!
जबकि खुद अकबरनामा और जहांगीर नामा के अनुसार ऐसा कुछ नही था!
18वीं सदी में मरियम को हरखा बाई का नाम देकर हिन्दू बता कर उसके मान सिंह की बेटी होने का झूठ पहचान शुरू किया गया!
फिर 18वीं सदी के अंत में एक ब्रिटिश लेखक जेम्स टॉड ने अपनी किताब "एनालिसिस एंड एंटटीक्स ऑफ़ राजस्थान" में मरीयम से हरखा बाई बनी इसी रानी को जोधा बाई बताना शुरू कर दिया!
और इस तरह ये झूठ आगे जाकर इतना प्रबल हो गया की आज यही झूठ भारत के स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया है और जन जन की जुबान पर ये झूठ सत्य की तरह आ चूका है!
और इसी झूठ का सहारा लेकर राजपूतों को निचा दिखाने की कोशिश जारी है!
जब भी मैं जोधाबाई और अकबर के विवाह प्रसंग को सुनता या देखता हूं तो मन में कुछ अनुत्तरित सवाल कौंधने लगते हैं!
आन,बान और शान के लिए मर मिटने वाले शूरवीरता के लिए पूरे विश्व मे प्रसिद्ध भारतीय क्षत्रिय अपनी अस्मिता से क्या कभी इस तरह का समझौता कर सकते हैं??
हजारों की संख्या में एक साथ अग्नि कुंड में जौहर करने वाली क्षत्राणियों में से कोई स्वेच्छा से किसी मुगल से विवाह कर सकती हैं??
जोधा और अकबर की प्रेम कहानी पर केंद्रित अनेक फिल्में और टीवी धारावाहिक मेरे मन की टीस को और ज्यादा बढ़ा देते हैं!
अब जब यह पीड़ा असहनीय हो गई तो एक दिन इस प्रसंग में इतिहास जानने की जिज्ञासा हुई तो पास के पुस्तकालय से अकबर के दरबारी 'अबुल फजल' द्वारा लिखित 'अकबरनामा' निकाल कर पढ़ने के लिए ले आया!
उत्सुकतावश उसे एक ही बैठक में पूरा पढ़ डाला पूरी किताब पढ़ने के बाद घोर आश्चर्य तब हुआ जब पूरी पुस्तक में जोधाबाई का कहीं कोई उल्लेख ही नही मिला!
मेरी आश्चर्य मिश्रित जिज्ञासा को भांपते हुए मेरे मित्र ने एक अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ 'तुजुक-ए-जहांगिरी' जो जहांगीर की आत्मकथा है उसे दिया!
इसमें भी आश्चर्यजनक रूप से जहांगीर ने अपनी मां जोधाबाई का एक भी बार जिक्र नही किया!
हां कुछ स्थानों पर हीर कुँवर और हरका बाई का जिक्र जरूर था!
अब जोधाबाई के बारे में सभी एतिहासिक दावे झूठे समझ आ रहे थे कुछ और पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के पश्चात हकीकत सामने आयी कि “जोधा बाई” का पूरे इतिहास में कहीं कोई जिक्र या नाम नहीं है!
इस खोजबीन में एक नई बात सामने आई जो बहुत चौकानें वाली है!
ईतिहास में दर्ज कुछ तथ्यों के आधार पर पता चला कि आमेर के राजा भारमल को दहेज में 'रुकमा' नाम की एक पर्सियन दासी भेंट की गई थी जिसकी एक छोटी पुत्री भी थी!
रुकमा की बेटी होने के कारण उस लड़की को 'रुकमा-बिट्टी' नाम से बुलाते थे आमेर की महारानी ने रुकमा बिट्टी को 'हीर कुँवर' नाम दिया चूँकि हीर कुँवर का लालन पालन राजपूताना में हुआ इसलिए वह राजपूतों के रीति-रिवाजों से भली भांति परिचित थी!
राजा भारमल उसे कभी हीर कुँवरनी तो कभी हरका कह कर बुलाते थे!
राजा भारमल ने अकबर को बेवकूफ बनाकर अपनी परसियन दासी रुकमा की पुत्री हीर कुँवर का विवाह अकबर से करा दिया जिसे बाद में अकबर ने मरियम-उज-जमानी नाम दिया!
चूँकि राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था इसलिये ऐतिहासिक ग्रंथो में हीर कुँवरनी को राजा भारमल की पुत्री बता दिया!
जबकि वास्तव में वह कच्छवाह राजकुमारी नही बल्कि दासी-पुत्री थी!
राजा भारमल ने यह विवाह एक समझौते की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन किया था!
इस विवाह के विषय मे अरब में बहुत सी किताबों में लिखा है!
(“ونحن في شك حول أكبر أو جعل الزواج راجبوت الأميرة في هندوستان آرياس كذبة لمجلس”) हम यकीन नहीं करते इस निकाह पर हमें संदेह
इसी तरह ईरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में एक भारतीय मुगल शासक का विवाह एक परसियन दासी की पुत्री से करवाए जाने की बात लिखी है!
'अकबर-ए-महुरियत' में यह साफ-साफ लिखा है कि (ہم راجپوت شہزادی یا اکبر کے بارے میں شک میں ہیں) हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है क्योंकि निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आखों में आँसू नही थे और ना ही हिन्दू गोद भरई की रस्म हुई थी!
सिक्ख धर्म गुरू अर्जुन और गुरू गोविन्द सिंह ने इस विवाह के विषय मे कहा था कि क्षत्रियों ने अब तलवारों और बुद्धि दोनो का इस्तेमाल करना सीख लिया है, मतलब राजपुताना अब तलवारों के साथ-साथ बुद्धि का भी काम लेने लगा है!
17वी सदी में जब 'परसी' भारत भ्रमण के लिये आये तब उन्होंने अपनी रचना ”परसी तित्ता” में लिखा “यह भारतीय राजा एक परसियन वैश्या को सही हरम में भेज रहा है अत: हमारे देव(अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें"!
भारतीय राजाओं के दरबारों में राव और भाटों का विशेष स्थान होता था वे राजा के इतिहास को लिखते थे और विरदावली गाते थे उन्होंने साफ साफ लिखा है-
”गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज ले ग्याली पसवान कुमारी ,राण राज्या राजपूता ले ली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत!
(1563 AD)
मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है!
हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने इतिहास में ले ली बिना लड़े पहली जीत 1563 AD!
ये ऐसे कुछ तथ्य हैं जिनसे एक बात समझ आती है कि किसी ने जानबूझकर गौरवशाली क्षत्रिय समाज को नीचा दिखाने के उद्देश्य से ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की और यह कुप्रयास अभी भी जारी है!
लेकिन अब यह षडयंत्र अधिक दिन नही चलेगा ।
🚩🚩जय माँ भवानी. 🚩🚩