Wednesday, February 3, 2016

24,000 पाकिस्तानी मदरसों की वहाबी फंडिंग कर रहा सऊदी अरब

"पैसों की सुनामी" लाकर सउदी अरब "असहिष्णुता का निर्यात" कर रहा है और पाकिस्तान में लगभग 24,000 'मदरसों' की फंडिंग कर रहा है. यह जानकारी देते हुए एक शीर्ष अमेरिकी सीनेटर ने कहा कि अमेरिका को कट्टरपंथी इस्लामवादियों के सउदी अरब द्वारा प्रायोजन किए जाने पर अपनी मौन स्वीकृति को समाप्त करने की जरूरत है.

शुक्रवार को एक शीर्ष अमेरिकन थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस को संबोधित करते हुए अमेरिकी सीनेटर क्रिस मर्फी ने कहा कि पाकिस्तान इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जहां सउदी अरब से आने वाली रकम को घृणा और आतंकवाद का पाठ पढ़ाने वाले धार्मिक स्कूलों में भेज दिया जाता है.

उन्होंने कहा, "1956 में पाकिस्तान में 244 मदरसे थे. आज इनकी संख्या 24,000 हो गई है. यह मदरसे पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रहे हैं. मोटे तौर पर इन स्कूलों में हिंसा नहीं सिखाई जाती है.

1956 में पाकिस्तान में 244 मदरसे थे. आज इनकी संख्या 24,000 हो गई है

ये अल-कायदा या आईएसआईएस के छोटे केंद्र नहीं हैं. लेकिन ये इस्लाम का ऐसा संस्करण पढ़ाते हैं जो बहुत आसानी से शिया विरोध और पश्चिम विरोधी आतंकवाद में बदल जाता है.

मर्फी बोले, "पाकिस्तान के उन 24,000 धार्मिक स्कूलों में से हजारों की फंडिंग सऊदी अरब से आई रकम से की जा रही है." कुछ अनुमानों के मुताबिक 1960 के दशक के बाद से सउदी अरब ने कट्टरपंथी वहाबी इस्लाम के दुनिया भर में कड़े प्रसार के मिशन के साथ ऐसे स्कूलों और मस्जिदों में 6,80,000 करोड़ रुपये से ज्यादा लगा दिए हैं.

तुलनात्मक रूप में शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि पूर्व सोवियत संघ ने 1920 से लेकर 1991 तक साम्यवादी विचारधारा के प्रसार के लिए 47,600 करोड़ रुपये खर्च किए थे. मर्फी ने कहा, "सउदी अरब के साथ हमारे गठबंधन के सभी सकारात्मक पहलुओं के अलावा एक असुविधाजनक सच भी है. वो यह कि सउदी अरब का एक दूसरा पहलू भी है जिसकी अनदेखी अब हम बर्दाश्त नहीं सकते हैं क्योंकि इस्लामी उग्रवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई ज्यादा केंद्रित और अधिक जटिल हो चुकी है.

उन्होंने यह भी कहा, "अमेरिका को यमन में सऊदी अरब के सैन्य अभियान को रोक देना चाहिए. वो भी जब तक हमें यह आश्वासन नहीं मिलता कि यह अभियान आईएस और अलकायदा के खिलाफ लड़ाई के अलावा किसी और उद्देश्य के लिए नहीं चलाया जा रहा."