Friday, November 27, 2015

हकीम खान सूरी -महाराणा प्रताप

हकीम खान सूरी -
इनका जन्म 1538 ई. में हुआ | ये अफगान बादशाह शेरशाह सूरी के वंशज थे | महाराणा प्रताप का साथ देने के लिए ये बिहार से मेवाड़ आए व अपने 800 से 1000 अफगान सैनिकों के साथ महाराणा के सामने प्रस्तुत हुए | हकीम खान सूरी को महाराणा ने मेवाड़ का सेनापति घोषित किया | हकीम खान हरावल (सेना की सबसे आगे वाली पंक्ति) का नेतृत्व करते थे | ये मेवाड़ के शस्त्रागार (मायरा) के प्रमुख थे | मेवाड़ के सैनिकों के पगड़ी के स्थान पर शिरस्त्राण पहन कर युद्ध लड़ने का श्रेय इन्हें ही जाता है |
1573 ई.
महाराणा प्रताप ने एक ब्राह्मण को भूमि दान की व कुछ समय बाद लखा बारठ को मनसुओं का गाँव प्रदान किया
इसी वर्ष अकबर ने खुद गुजरात विजय के लिए कूच किया और इसी दौरान अकबर ने गुजरात में पहली बार समन्दर देखा | अकबर ने गुजरात विजय की याद में बुलन्द दरवाजा बनवाया |
इसी वर्ष गुजरात में ईडर की राजगद्दी पर राय नारायणदास बैठे | ये महाराणा प्रताप के ससुर थे व इन्होंने महाराणा प्रताप का खूब साथ दिया | इन्होंने भी महाराणा की तरह घास की रोटियाँ खाई थीं |
अबुल फजल लिखता है "ईडर के राय नारायणदास को घास-फूस खाना मंजूर था, पर बादशाही मातहती कुबूल करना नहीं"
1574 ई.
अकबर की बंगाल व बिहार विजय
इसी वर्ष आमेर के राजा भारमल का देहान्त हुआ | भगवानदास आमेर का शासक बना |
इसी वर्ष बीकानेर नरेश राव कल्याणमल का देहान्त हुआ | राजा रायसिंह (महाराणा प्रताप के बहनोई) बीकानेर के शासक बने | इन्होंने अकबर का साथ दिया |
इसी वर्ष अकबर ने मारवाड़ के राव चन्द्रसेन को दण्डित करने के लिए राजा रायसिंह को भेजा, पर रायसिंह को सफलता नहीं मिली |
यूरोप के साथ मुगलों का व्यापार मेवाड़ के भीतर होकर सूरत या किसी और बन्दरगाह से होता था | महाराणा प्रताप और उनके साथी गुजरात मार्ग को आए दिन बन्द कर देते थे व मुगलों की सामग्री लूट लेते, जिससे अकबर का यूरोप के साथ व्यापार ठप्प होने लगा | अकबर ने राजा रायसिंह को गुजरात मार्ग खोलने व लूटमार रोकने के लिए नियुक्त किया | महाराणा प्रताप ने अपने बहनोई से लड़ना ठीक न समझा, पर राजा रायसिंह के जाते ही महाराणा ने फिर गुजरात मार्ग बन्द कर लूटमार शुरु की |
(हल्दीघाटी युद्ध का ये एक महत्वपूर्ण कारण था)
1575 ई.
इसी वर्ष अकबर ने चित्तौड़ को अजमेर सूबे का हिस्सा बनाया | अकबर ने महाराणा के खिलाफ अपनी जंग को धर्म से जोड़ते हुए मेवाड़ के रायला, बदनोर, शाहपुरा, अरनेता, कटड़ी, कान्या आदि इलाकों को सूफी सन्त मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह (अजमेर) के हिस्से में दे दिये |
इसी वर्ष अकबर ने महाराणा प्रताप पर बादशाही मातहती कुबूल करने का दबाव बढ़ाने के लिए फिर से जजिया कर लागू कर दिया |
(अकबर ने जजिया कर लगाने के लिए ही मेवाड़ के इलाके अजमेर के हिस्से में दिये थे)....(हालांकि कुछ समय बाद उसने जजिया कर हटा दिया)
इसी वर्ष अकबर ने महाराणा प्रताप व राव चन्द्रसेन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सैयद हाशिम व जलाल खान कोरची को भेजा |
मारवाड़ के राव चन्द्रसेन, जिन्हें मारवाड़ का राणा प्रताप, प्रताप का अग्रगामी, भूला बिसरा राजा भी कहा जाता है, उन्होंने जलाल खान कोरची की हत्या कर दी |