Thursday, October 29, 2015

राष्‍ट्रगान का अर्थ और असलियत जिससे आप अनजान हैं.indian national song -truth

अध्यापक भारत's photo.
राष्‍ट्रगान का अर्थ और असलियत जिससे आप अनजान हैं..
जन गण मन अधिनायक जय हे, — (हे भारत के जन गण और मन के नायक (जिनके हम अधीन हैं))
भारत-भाग्य-विधाता —(आप भारत के भाग्य के विधाता हैं)
पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, —(वह भारत जो पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र)
द्वाविड़, उत्कल, बंग — (तमिलनाडु, उड़ीसा, और बंगाल जैसे प्रदेश से बना है)
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना-गंगा, — (जहाँ विन्ध्याचल तथा हिमालय जैसे पर्वत हैं और यमुना-गंगा जैसी नदियाँ हैं)
उच्छल जलधि तरंगा —(और जिनकी तरंगे उच्छश्रृंखल होकर उठतीं हैं)
तव शुभ नामे जागे — (आपका शुभ नाम लेकर ही प्रातः उठते हैं)
तव शुभ आशिष माँगे — (और आपके आर्शीवाद की याचना करते हैं)
जन-गण-मंगलदायक जय हे, — (आप हम सभी जनों का मंगल करने वाले हैं, आपकी जय हो)
गाहे तव जयगाथा, — (सभी आपकी ही जय की गाथा गायें)
जन-गण-मंगलदायक जय हे —(हे जनों का मंगल करने वाले आपकी जय हो)
भारत भाग्य विधाता — (आप भारत के भाग्य विधाता हैं)
जय हे, जय हे, जय हे, — (आपकी जय हो, जय हो, जय हो)
जय, जय, जय, जय हे — (जय, जय, जय, जय हो)
जन गण मन का इतिहास
सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ” जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड लाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया। रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम
अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को
लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ किन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल। गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से
समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत “जन गण मन” गाया करते थे और गरम दल वाले “वन्दे मातरम”। नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र
हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था। बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों
ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ? ये उस पत्र का चित्र है जिसे रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाँधी को जन गण मन पर खेद जताते हुए क्षमायाचक भाव से लिखा था जो आज भी गाँधी स्न्ग्रहली गुजरात में संरक्षित है.



वंदेमातरम और जन गण मन का इतिहास: सच्‍चाई, सोच और साजिश
1905 में तत्‍कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने हिंदू-मुसलमान जनसंख्‍या को आधार बनाकर बंगाल का विभाजन कर दिया। पूर्वी बंगाल मुस्लिम बहुल और पश्चिम बंगाल हिंदू बहुल। इतिहास में इसे बंग-भंग के नाम से जाना जाता है। यह अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का पहला क्रियान्‍वयन था। अत: इसके विरोध में सम्पूर्ण देश में ‘बंग-भंग’ आन्दोलन शुरु हो गया, जिसके लिए प्रेरणा बना ‘वंदेमामरत’। इस आंदोलन को बंकिमचंद्र चटर्जी के गीत ‘वंदे मातरम्’ ने वह ऊंचाई प्रदान की कि अंग्रेज घबरा कर अपना फैसला वापस लेने को विवश हो उठे। राष्‍ट्रभक्‍तों ने कामागाटामारू नामक जहाज के झंडे पर ‘वन्दे मातरम्’ अंकित कर दिया था। तब से लेकर 1947 तक स्वतंत्रता सेनानियों का सबसे प्रेरक और प्रिय नारा ‘वन्दे मातरम्’ ही रहा।
जॉर्ज पंचम के सम्‍मान में लिखा गया था जन-गण-मन
बंग-भंग आंदोलन से घबरा कर अंग्रेजों ने भारत की राजधानी को कोलकाता से दिल्‍ली लाने के लिए 1911 में दिल्‍ली दरबार का आयोजन किया गया था, जिसका शिलान्‍यास तत्‍कालीन ब्रिटिश शासक जॉर्ज पंचम ने किया था। अंग्रेजों ने जॉर्ज पंचम की स्‍तुति में गाना लिखने के लिए रविंद्रनाथ टैगोर से कहा और उन्‍होंने जन-गण-मन की रचना की।
जन-गण-मन राष्ट्रगान को लेकर विवाद की शुरुआत 27 दिसंबर 1911 को हुई और उसी दिन देश की जनता को यह पता चला कि रविंद्र नाथ टैगोर ने यह गीत अंग्रेज शासक जॉर्ज पंचम को खुश करने के लिए लिखा था। 27 दिसंबर 2011 को कांग्रेस के 27वें अधिवेशन में इस गाने को पहली बार गाया गया था। इसका विरोध करते हुए दूसरे दिन कई अखबारों ने लिखा कि टैगोर ने यह गान जॉर्ज पंचम को खुश करने के लिए लिखा था। इसलिए इसे कांग्रेस के अधिवेशन में जगह नहीं मिलनी चाहिए थी। अखबारों ने इस गाने पर सवाल उठाते हुए लिखा कि आखिर इस गाने में वर्णित भारत का ‘भाग्यविधाता कौन है?’
28 दिसंबर 1911 को कलकत्‍ता से प्रकाशित अखबार ‘द इंग्लिश मैन’ (कलकत्ता) ने लिखा था, ‘ अधिवेशन की कार्रवाई रवींद्रनाथ टैगोर के लिखे एक गीत से शुरू हुई। टैगोर का यह गीत राजा पंचम जॉर्ज के स्वागत के लिए खास तौर से लिखा गया था।’ उसी दिन 28 दिसंबर को ही कलकत्‍ता के अमृत बाजार पत्रिका ने लिखा, ‘कांग्रेस का अधिवेशन टैगोर के लिखे एक गीत से शुरू हुआ। जॉर्ज पंचम के लिए लिखा यह गीत अंग्रेज प्रशासन ने बेहद पसंद किया है।’
जब टैगोर से इस बारे में पूछा गया तो उन्‍होंने इस आरोप को बेबुनियाद बताकर पल्‍ला झाड़ लिया। यही नहीं, टैगोर ने गीत के अंग्रेजी अनुवाद में राज राजेश्वर को ‘किंग ऑफ ऑल किंग्स’ लिखकर विरोधों को और हवा दे दी। बाद में हिंदी के प्रसिद्ध साहित्‍यकार पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने एक लेख में लिखा, ‘भारत के राष्ट्रगान के संदर्भ में जो भी विवाद हैं वो अपनी जगह हैं, लेकिन अब भारतीयों को इस गान को स्वीकार कर लेना चाहिए। रवींद्र साहित्य का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि राज राजेश्वर ईश्वर को भी कहा जाता है।’
जन-गण-मन का पहले भावार्थ समझ लीजिए
जन-गण-मन गाने का अर्थ है, हे ब्रिटिश अधिनायक (शासक) तुम ही भारत के जन, गण और मन के भाग्‍य विधाता हो। भारत की सारी जनता तुम्‍हें आशीष देती है, तुम्‍हारे लिए शुभकामनाएं प्रेषित करती हैं। पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा, दक्षिण, उड़ीसा, बंगाल- सब ओर तुम्‍हारा ही शासन है। बिंध्‍याचल, हिमालय, यमुना, गंगा और गतिमान समुद्र अपनी लहरों-तरंगों के साथ उछाल लेती हुई तुम्‍हारी वंदना करती हैं। हम सब तुम्‍हारी जयगाथा गाते हैं। हे भारत के भाग्‍य विधाता तुम्‍हारी जय हो, जय हो, जय हो। ध्‍यान से धीरे धीरे और पूरे मनोयोग से जनगणमन को पढिए, अर्थ स्‍पष्‍ट हो जाएगा, क्‍योंकि न आपने इसके अर्थ को जानने की कोशिश की और न ही कांग्रेसी-ब्रिटिश-वामपंथी इतिहासकारों ने ही इसके वास्‍तविक अर्थ की जानकारी आपको आपके पाठय पुस्‍तक में दी।
रविंद्र नाथ टैगोर के इस स्‍तुति गान से खुश होकर 1913 में उन्‍हें साहित्‍य के क्षेत्र में ‘गीतांजलि’ के लिए नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया। लेकिन यह भी याद रखने योग्‍य बातें है कि खुद टैगोर ने अपने बहनोई सुरेंद्र नाथ बनर्जी को पत्र लिखकर जनगणमन को राष्‍ट्रीय गान बनाए जाने का विरोध किया था। 7 अगस्त 1941 को रविंद्रनाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने सार्वजनिक किया था।
मशहूर राष्‍ट्रवादी राजीव दीक्षित के अनुसार, रविंद्र नाथ टैगोर ने अपने बहनोई सुरेंद्र नाथ बनर्जी को जालियांवाला बाग हत्‍याकांड (13 अप्रैल 1919) के बाद एक पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा था कि ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया था। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाएं क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी मृत्‍यु हो जाये तो सबको बता दें। रविंद्रनाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने सार्वजनिक किया और सारे देश को ये कहा क़ि जन गण मन गीत न गाया जाये।
यहां यह भी जानने वाली बात है कि राष्‍ट्रगान के रूप में बंदेमातरत की वकालत करते हुए उसे गेय बनाने का कार्य भी रविंद्र नाथ टैगोर ने ही किया था। बंदेमातरम का दो छंद संस्‍कृत में और बांकी के दो छंद बांग्‍ला में था। पंडित जवाहरलाल नेहरू के सलाह मांगने पर रविंद्रनाथ टैगोर ने ही इसके शुरुआती दो छंद को राष्‍ट्रगान बनाने की सिफारिश की थी, इसकी धुन तैयार की थी और ‘वंदेमामरत’ पर पहला स्‍टेज परफॉरमेंस भी कविंद्र रविंद्र ने ही दिया था।
शब्‍दवार जन-गण-मन का अर्थ भी जान लीजिए
शब्द- अंग्रेजी अर्थ- हिंदी अर्थ
जन: People= लोग
गण: Group= समूह
मन: Mind = दिमाग
अधिनायक: Leader= नेता
जय हे: Victory= जीत
भारत: India= भारत
भाग्य: Destiny= किस्मत
विधाता: Disposer= ऊपरवाला
पंजाब: Punjab= पंजाब
सिंधु: Sindhu =सिंधु
गुजरात: Gujarat= गुजरात
मराठा: Maratha= मराठा (महाराष्ट्र)
द्रविण: South= दक्षिण
उत्कल: Orissa= उड़िसा
बंगा: Bengal= बंगाल
विंध्य: Vindhyas= विन्धयाचल
हिमाचल: Himalay= हिमालय
यमुना: Yamuna = यमुना
गंगा: Ganges = गंगा
उच्छल: Moving= गतिमान
जलधि: Ocean = समुद्र
तरंगा: Waves = लहरें ( धाराएं)
तब : Your = तुम्हारा
शुभ: Auspicious = मंगल
नामे: name = नाम
जागे: Awaken = जागो
तब: Your = तुम्हारा
शुभ: Auspicious = मंगल
आशीष: Blessings = आशीर्वाद
मांगे : Ask = पूछो
गाहे : Gaahe = गाओ
तब : Your = तुम्हारी
जय : Victory = जीत
गाथा : Song = गीत
जन : People = लोग
गण : Group = समूह
मंगल : Fortune = भाग्य
दायक : Giver = दाता
जय हे : Victory Be = जीत
भारत : India = हिंदुस्तान
भाग्य : Destiny = किस्मत
विधाता : Dispenser= ऊपरवाला
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे: Victory, Victory, Victory, Victory Forever = विजय, विजय, विजय, विजय हमेशा के लिए
अब वंदेमातरम के इतिहास को जानिए
अब वंदेमातरम पर आइए। 7 नवम्वर 1876 में बंगाल के कांतल पाडा गांव में बंकिम चन्द्र चटर्जी ने ‘वंदे मातरम’ गाने की रचना की थी। बाद में 1882 में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में इस गीत को सम्मिलित कर लिया। 1882 में बंकिम चन्द्र चटर्जी ने ‘आनंदमठ’ की रचना की थी। ‘आनंदमठ’ 18 वीं सदी में बंगाल में हुए सन्‍यासी विद्रोह पर लिखा गया एक कालयजी उपन्‍यास है। इस उपन्‍यास का कथानक उन संन्‍यासियों के चारों ओर घूमता है, जिन्‍होंने अपना घर-बार छोड़कर मातृभूमि की सेवा के लिए संपूर्ण जीवन अर्पण कर दिया। जिनके लिए मातृभूमि ही पूजनीय बन गया।
1905 में अंग्रेजों ने जब बंगाल का विभाजन कर दिया तो बंग-भंग के विरोध में खड़े हुए आंदोलन की अलख जगाने वाला यह गीत ‘वंदेमातरम’ ही साबित हुआ। 1905 से लेकर देश की आजादी 1947 तक अंग्रेजों के विरुद्ध ‘वंदेमामरत’ से ही शंखनाद होता रहा, लोग इसे गाते-गाते ही फांसी पर झूलते रहे, अंग्रेजों की गोलियां खाते रहे। यह आजादी के मतवालों के लिए भावनात्‍मक प्रेरणा स्रेात था। इस गाने व इस उपन्‍यास ने लोगों को बलिदान की प्रेरणा दी। साल 1911 में ही जॉर्ज पंचम ने बंग-भंग का निर्णय रद्द कर दिया और ‘वंदेमातरम’ गीत अंग्रेजों की आंख की सबसे बड़ी किरकिरी बन गया। ‘बंग-भंग’ आंदोलन को सफल बनाने, स्‍वतंत्रता सेनानियों में राष्‍ट्रप्रेम जागृत करने और हंसते-हंसते उनके सूली पर चढ़ जाने ने ‘वंदेमातरम’ को स्‍वतंत्रता का प्रमुख प्रेरक बना दिया था।
दिसम्बर 1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में ‘वंदेमातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया। बंग भंग आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय नारा बना। 1906 में ‘वंदे मातरम’ देव नागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 27 दिसंबर 1911 को इसे बंगाली व हिंदी दोनों भाषाओं में गाया गया।
‘वंदेमातरत’ के लिए सन 1905 में गाँधीजी ने लिखा था, ”आज लाखों लोग एकत्र होकर वन्दे मातरम्‌ गाते हैं। मेरे विचार से इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है। मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कई अन्य गीतों के विपरीत यह किसी अन्य राष्ट्र-राज्य की नकारात्मकताओं के बारे में शोर-शराबा नहीं करता। 1936 में गाँधीजी ने लिखा, ”कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो अनके सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है।”
दूसरी तरफ, 30 दिसम्बर 1908 को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग अधिवेशन के द्वितीय सत्र में सैयद अली इमाम ने अपने संबोधन में इस गाने का विरोध करते हुए सबसे पहले ‘वंदे मातरम’ को सांप्रदायिक करार दिया। उन्‍होंने कहा, ‘क्या अकबर और औरंगजेब द्वारा किया गया योग असफल हो गया? सभी भावनाओं और संवेदनाओं, जरूरतों और आवश्यकताओं के प्रति आदर सच्चे भारतीय राष्ट्रवाद का आधार है। मैं भारतीय राष्ट्रवाद के शिल्पियों से, चाहे वे कलकत्ता में हों या पूना में, पूछता हूँ कि क्या वे भारत के मुसलमानों से ‘वंदे मातरम्‌ और शिवाजी उत्सव स्वीकार करने की उम्मीद करते हैं? मुसलमान हर मामले में कमजोर हो सकते हैं लेकिन अपने स्‍वर्णिम अतीत की परंपराओं का अस्वाद लेने में कमजोर नहीं हैं।’
वन्दे मातरम्‌ का दूसरा जोरदार विरोध सून 1923 में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया। तब उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पुरोधा पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम्‌ गाने के बीच में टोका। लेकिन पंडित पलुस्कर ने बीच में रुककर कर इस महान गीत का अपमान नहीं होने दिया और वह पूरा गाना गाकर ही रुके।
बंदेमातरम का तीसरी बार जोरदार विरोध 15-18 अक्‍टूबर 1937 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की लखनऊ बैठक में बकायदा प्रस्‍ताव पारित कर किया गया। मुस्लिम लीग ने प्रस्‍ताव पारित किया कि लीग कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम गान को देश के राष्‍ट्रगान के रूप में थोपने के प्रयासों की घोर निंदा करती है। यह मुस्लिम समुदाय की घोर अनदेखी करने वाली मानती है। इसे इस्‍लाम विरोधी और मूर्तिपूजक मानती है। यह मुस्लिम सदस्‍यों से अनुरोध करती है कि वे किसी भी रूप में इस घोर आपत्तिजनक गान से दूर रहें। (के.के. अजीज: मुस्लिम्‍स अंडर कांग्रेस रूल-खंड-1)
इस अधिवेशन में विरोध के बाद कांग्रेस के साथ हर समझौते में मुस्लिम लीग यह शर्त रखने लगा कि ‘वंदे मातरम का गान असेम्‍बली व कांग्रेसी अधिवेशनों में बंद हो।’
मुस्लिम लीग के लगातार विरोध को देखते हुए 26 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में एक समिति गठित की गई, जिसमें मौलाना अब्दुल कलाम अजाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव शामिल थे। इस समिति ने 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में ‘वंदेमातरम’ के गायन की अनिवार्यता को समाप्‍त करने की संस्‍तुति दी और इसे गाने की बाध्‍यता से मुक्‍त कर दिया। इस समिति ने कहा कि इस गीत के शुरुआती दो पैरे ही प्रासंगिक है। इस समिति का मार्गदर्शन रवीन्द्रनाथ टैगोर ने किया था।
नेहरू ने स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर से वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन का मंत्र बनाए जाने के लिए उनकी राय माँगी थी। रवींद्रनाथ ठाकुर बंकिम चंद्र की कविताओं और राष्ट्रभक्ति के प्रशंसक रहे थे और उन्होंने नेहरू से कहा कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक रूप से गाया जाए तो ज्‍यादा उचित रहेगा और इसे मान लिया गया। रविंद्र नाथ टैगोर की सलाह व नेहरू के नेतृत्‍व वाली कमेटी की संस्‍तुति पर भारतीय राष्टीय कांग्रेस ने सन 1937 में इस गीत के उन अंशों को छांट दिया जिनमें मुसलमानों को बुतपरस्ती के भाव दिखता था। और गीत के संपादित अंश को राष्ट्रगान के रूप में अपना लिया गया। लेकिन आजादी मिलने के बाद नेहरू अपने नेतृत्‍व वाली इस कमेटी की संस्‍तुति से स्‍वयं ही मुकर गए और संविधान समिति में वह अकेले ऐसे शख्‍स के रूप में उभर कर सामने आए, जिसने ‘वंदेमातरम’ का विरोध किया।
मुस्लिम लीग और मुसलमान नेता जबरदस्‍त मौका परस्‍त थे। खिलाफत आंदोलन चलाने के लिए जब उन्‍हें महात्‍मा गांधी के सहयोग की आवश्‍यकता थी तो उन्‍हें ‘वंदेमातरम’ से कोई गुरेज नहीं रह गया था। तब उन्‍हें इसमें मूर्ति पूजा और सांप्रदायिकता नजर आना बंद हो गया था। खिलाफत आंदोलन के अधिवेशनों की शुरुआत भी वन्दे मातरम्‌ से होने लगी थी। अहमद अली, शौकत अली, जफर अली जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता इस गाने के सम्मान में उठकर खड़े होते थे। मोहम्‍मद अली जिन्‍ना तो ‘वंदेमातरम’ के सम्मान में खडे न होने वाले मुसलमानों को जबरदस्‍त फटकार लगाते थे। रफीक जकारिया ने हाल में लिखे अपने निबन्ध में इसका जिक्र भी किया है। उनके अनुसार, मुस्लिमों द्वारा वन्दे मातरम्‌ के गायन पर विवाद निरर्थक है। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काँग्रेस के सभी मुस्लिम नेताओं द्वारा गाया जाता था। जो मुस्लिम इसे गाना नहीं चाहते, न गाए लेकिन गीत के सम्मान में उठकर तो खड़े हो जाए क्योंकि इसका एक संघर्ष का इतिहास रहा है और यह संविधान में राष्ट्रगान घोषित किया गया है।’
आजाद भारत में बहुमत के निर्णय के खिलाफ जवाहरलाल नेहरू ने की ‘वंदेमातरम’ की अवहेलना
14 अगस्‍त 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ ‘वंदे मातरम’ के साथ हुआ था और समापन ‘जन गण मन’ के साथ हुआ। महात्‍मा गांधी जन-गण-मन को राष्‍ट्रीय गान बनाने को तैयार नहीं थे। उनका मानना था कि यह जॉर्ज पंचम की स्‍तुति में गाया गया है तो जवाहरलाल नेहरू मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण वंदेमातरत को राष्‍ट्रीय गान का दर्जा नहीं देना चाहते थे। महात्मा गाँधी ने राष्‍ट्रगान के लिए तीसरे विकल्‍प के रूप में ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा’- का विकल्‍प दिया, लेकिन नेहरू इसके लिए भी तैयार नहीं थे। नेहरू ने गांधी जी के समक्ष तर्क दिया कि यह गाना ओर्केस्ट्रा पर सुनने में मधुर प्रतीत नहीं होगा, जबकि जन गन मन आर्केस्ट्रा पर बेहतरीन बजेगा। गांधी जी को नेहरू का यह तर्क समझ में नहीं आया, लेकिन वह चुप रहे।
महात्‍मा गांधी की हत्‍या होने तक जन-गण-मन राष्‍ट्रीय गान नहीं बन पाया था, लेकिन गांधी जी की हत्‍या होते ही नेहरू अपनी मनमानी चलाने को लगभग स्‍वतंत्र हो गए थे। गांधी जी की मौत के बाद जब आज़ाद भारत का नया संविधान लिखा जा रहा था तब वंदे मातरम् को न राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया और न ही उसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला। लेकिन इस पर डॉ राजेंद्र प्रसाद अड़ गए।
1947 में असेंबली में इस बात पर लंबी बहस चली कि राष्ट्रगान वंदे मातरम हो या जन-गण-मन। अंत में ज्यादा वोट वंदे मातरम के पक्ष में पड़े, लेकिन जवाहरलाल नेहरू जन गण मन को ही राष्ट्रगान बनाना चाहते थे। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसदों ने ‘वंदेमातरम’ को राष्‍ट्रगान बनाने के लिए लिखित में अपनी सहमति प्रदान की। एक मात्र जवाहरलाल नेहरू ही थे, जो मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण इसके विरोध में थे जबकि इसके बुतपरस्‍ती वाले हिस्‍से को उनके नेतृत्‍व वाली समिति 1937 में पहले ही निकाल चुकी थी। डॉ राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे और वह भारत के पहले राष्ट्रपति थे। राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा के सभी सदस्‍यों की मर्जी को देखते हुए नेहरू की मनमानी को वीटो कर दिया। राजेंद्र बाबू ने 24 जनवरी 1950 को घोषणा की कि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जा रहा है। इस तरह 1950 में ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गीत और ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान बना।
आप राष्‍ट्रगान को सम्‍मान दें, लेकिन जरूरी नहीं कि उसे गाएं: सुप्रीम कोर्ट
क्या किसी को कोई गीत गाने के लिये मजबूर किया जा सकता है अथवा नहीं? यह प्रश्‍न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोए एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य AIR 1987 SC 748 [3] नाम के एक वाद में उठाया गया था। इस वाद में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल से इसलिये निकाल दिया गया था क्योंकि उन्‍होंने राष्ट्रगान जन-गण-मन को गाने से मना कर दिया था। यह विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्र-गान के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे तथा इसका सम्मान करते थे पर गाते नहीं थे। गाने के लिये उन्होंने साफ मना कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इनकी याचिका स्वीकार कर इन्हें स्कूल को वापस लेने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र-गान का सम्मान करता है परंतु उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है। अत: इसे न गाने के लिये उस व्यक्ति को दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।
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