Thursday, October 29, 2015

भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण

 

भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरुआत १८५७ के
विद्रोह के बाद उत्पन्न स्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक अंग्रेज के उस विचार के मद्दे नजर हुई जिसमे उसने कहा था की अगर भारतीय ब्रिटिश शासन हिंदू हित पर मुस्लिमों को तरजीह देना शुरू कर दे तो सत्ता को स्थायी बनाया जा सकता है. इसके पीछे दर्शन यह था की हिंदू कभी भी भारत में अंग्रेजी हुकूमत को स्वीकार नही करेंगे और अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करते रहेंगे साथ ही अगर मुस्लिम भी उनका साथ देते रहेंगे तो अंग्रेजी हुकूमत पर हमेशा खतरा मंडराता रहेगा,ऐसे में हिंदू हित पर मुस्लिमों को तरजीह देकर मुस्लिमों का समर्थन हासिल किया जा सकता है जिसका परिणाम यह होगा की एक तो मुस्लिम अंग्रेजों के समर्थक बन जायेंगे दूसरी ओर हितों के टकराव के कारण हिंदुओं की कुछ शक्ति मुस्लिमों के विरुद्ध
इस्तेमाल होगी और अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध संघर्ष कमजोर पड़ जायेगा (वर्तमान कांग्रेस पार्टी आज भी इस नीति को अपना रही है)भारतीय ब्रिटिश सरकार ने तत्काल प्रभाव से इसे मान लिया और सर सैयद अहमद खान को अपना प्रथम मोहरा बनाकर इसकी नींव रखी जिसे कालान्तर में मुस्लिम लीग का गठन कर संगठित रूप दिया गया और जिसका विस्तृत प्रभाव मोरले-मिन्टो के सुधार में सामने आया,परिणामतः हिंदू-मुस्लिम एकता और हिंदू-मुस्लिम के सम्मिलित हित की बात करने वाला सैय्यद अहमद खान मुस्लिम हित की बात करने लगे. सैय्यद अहमद खां अलीगढ़ मुस्लिम
विश्वविद्यालय स्थापित कर मुस्लिमो को एक नई ही दिशा देने लगा जिसका परिणाम पृथक निर्वाचन के रूप में सामने आया. यह पृथकता केवल निर्वाचन तक ही सिमित नही रहा वरन एक जुट होकर अंग्रेजों का विरोध करने वाले हिंदू-मुस्लिमों की एकता को भी बुरी तरह प्रभावित किया. ऐसे समय में ही गाँधी नामक एक व्यक्ति का प्रार्दुभाव हुआ. सौभाग्यवश जिसका हठयोग दक्षिण अफ्रीका में आंशिक रूप से सफल रहा था और अपने उसी हठयोग को अहिंसात्मक आन्दोलन का जामा पहना कांग्रेस का कमान सम्भाल लिया. हिंदू-मुस्लिम झगड़े पर उनका विचार था “मुस्लिम अल्पसंख्यक है और बहुसंख्यक उन्हें दबाने की कोशिश करता है,फलतः मुस्लिम हिंदुओं से अलग होते जा रहे है.” उसने हिंदुओं और मुस्लिमों को अपने इसी त्रुटिपूर्ण दर्शन के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया. परिणामतः अपने इस प्रयास में वह धीरे-धीरे मुस्लिम परस्त होते गए. जैसे-जैसे इनकी मुस्लिमपरस्ती बढती गयी हिंदुओं में असंतोष बढ़ता गया. मुसलमान भी अब खुद को
हिंदू से अलग देखने लगे जिसकी भूमिका तो मोरले-मिन्टो ने तैयार की थी परन्तु जिसे खाद पानी गाँधी के त्रुटिपूर्ण दर्शन से प्राप्त हो रहा था. परिणामतः हिंदू-मुस्लिम के बिच मतभेद बढता गया.
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खिलाफत आन्दोलन की असफलता के बाद तो यह मतभेद खुनी संघर्ष में बदल गया और हिंदू-मुस्लिम दंगों से देश जलने लगा,यहाँ तक की ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ गानेवाला इक़बाल ‘सारे जहां से महान हमारा प्यारा पाकिस्तान’ गाने लगा परन्तु गाँधी के त्रुटिपूर्ण दर्शन पर कोई प्रभाव नही
पड़ा .गाँधी का मानना था की भारत में अल्पसंख्यक मुस्लिम बहुसंख्यक हिंदुओं से उलझ ही नही सकते है,वे प्रत्येक हिंदू मुस्लिम दंगों के लिए हिंदुओं के द्वारा अहिंसा की निति का पालन न करने को जिम्मेदार मानते थे. मुस्लिमों द्वारा प्रायोजित मोपला दंगे,जिसमे बहुतायत में हिंदू मारे गए थे,के बाद मुस्लिमों के लिए चंदा इकठ्ठा करते हुए उन्होंने यहाँ तक कहा की हिंदू मुस्लिमों को दबाते है इसलिए दंगा होता है
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यूँ तो गाँधी के मुस्लिमपरस्ती के कार्य बहुत अधिक है परन्तु यहाँ कुछ प्रमुख कार्यों और विचारों को रखा जा रहा है ताकि इतने से ही भारत में छद्म धर्मनिरपेक्षता के मूल को समझने में मदद मिले क्योंकि भारतीय धर्मनिरपेक्षता गाँधी के इन कुत्सित विचारों से ग्रस्त है. अतः देश को इससे मुक्त करने का प्रयास किया जा सके:
१. गाँधी अहिंसा का पाठ सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं को ही सिखाते थे. उन्होंने किसी मुसलमान को उसके हिंसक अथवा हिंदू विरोधी,समाज विरोधी कार्यों के लिए कभी भी फटकार नही लगाई.
प्रमाण:
रावलपिंडी से बमुश्किल जान बचाकर भागकर भारत पहुंचे एक व्यक्ति द्वारा बिडला भवन में गाँधी से पाकिस्तान में हो रहे हिंदुओं के नरसंहार और बलात्कार से रक्षा करने की गुहार लगाने पर गाँधी की प्रतिक्रिया:
“आप यहाँ क्यों आये? वहाँ मर क्यों नही गए? मैं
तो इसी चीज पर कायम हु की हम पर जुल्म हो तो भी हम जहाँ पड़े है, वहीँ पड़े रहें, मर जाएँ.लोग मारे तो मर जाएँ,यह न कहें की हम अब क्या कर सकते है,मकान नहीं,कुछ नही. मकान तो पड़ा है, धरती माता हमारी मकान है, उपर आकाश है.जो मुसलमान डर से भाग गए, उनके मकान पड़े है,जमीन पड़ी है. तो क्या मैं कहूँ की आप मुसलमानों के घरों में चले जाएँ? मेरी जुबान से
ऐसा नही निकल सकता. मुसलमानों के घर कल तक थे, वे आज उनके है. उसमे जो हमारे शरणार्थी हैं वे अपने आप चले जाएँ. मैं आपसे यह कहूँगा,
रावलपिंडी वालों से भी कहो की आप वहाँ जाएँ और जो सिक्ख और हिंदू शरणार्थी है उनको मिले, उनसे कहें की भाई, आप वापिस जाएँ और अपने आप,आप पुलिस के मार्फत नही,मिलिट्री के मार्फत नही.”
“जो लोग पंजाब में मर चुके है उनमे से एक भी वापिस नही आ सकता. हमे भी अंत में मरना है.यह सच है की वे कत्ल कर दिए गए लेकिन कोई बात
नही. बहुत से हैं जो और दूसरे कारणों से मारे जाते
है. यदि वे कत्ल हुए तो वीरता से मरे, उन्होंने कुछ
खोया नही, पाया है. लेकिन प्रश्न यह है की उनका क्या होगा जिन्होंने संहार किया?
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यह समझ लो की मनुष्य बड़ी भूलें करता है. पंजाब में अंग्रेजी सेना ने हमारी रक्षा की, परन्तु यह कोई
रक्षा नही है. लोगों को चाहिए खुद अपनी रक्षा करे और मौत से न डरे. मारनेवाले तो हमारे मुस्लिम भाई हैं. हमारे भाई अपना धर्म बदल दें तो क्या वे अपने भाई न रहेंगे? क्या हम भी उन जैसा व्यवहार नहीं करते. हमने स्त्रियों के साथ बिहार में क्या कुछ नही किया (कलकत्ता और नोआखाली में प्रत्यक्ष कार्यवाही के दौरान हो रहे हिंदुओं के कत्ल लूट और बलात्कार के प्रतिक्रिया स्वरूप बिहार में उनके परिजनों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की जहाँ नेहरु ने सैनिक भेजकर हिंदुओं को गोली से भुनवा दिया था
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“तुम्हे शांतिपूर्वक विचार करना चाहिए की तुम कहाँ बहे जा रहे हो. हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध क्रोध नही करना चाहिए, चाहे मुसलमान उन्हें मिटाने का विचार ही क्यों न रखते हो.अगर मुसलमान सभी को मार डाले तो हम बहादुरी से मर जाये. इस दुनिया में भले उन्ही का राज हो जाये, हम नई दुनिया के बसनेवाले हो जायेंगे. कम से कम मरने से तो हमे बिलकुल नहीं डरना चाहिए. जन्म और मरण तो हमारे नसीब में लिखा है फिर उसमे हर्ष-शोक क्यों करें? अगर हंसते हंसते म्र्रेंगे तो सचमुच एक नए जीवन में प्रवेश करेंगे. एक नए हिंदुस्तान का निर्माण करेंगे.”(सितम्बर १९४७ की प्रार्थना सभा)
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सवाल है, हिंदुओं की लाश पर गाँधी किस नए
हिंदुस्तान की जन्म की बात कह रहे थे. कहीं उनका नया हिन्दुस्तान मुस्लिमस्तान तो नही था? १-हिंदुओं को मुस्लिमों के हाथों खुशी खुशी मरने की सीख देने वाले गाँधी क्या मुस्लिमों को हिंदुओं की हत्या न करने की सीख भी नही दे सकते थे. मैंने गाँधी के “प्रार्थना और प्रवचन” के तीनों भाग पढ़ा है उसमे कहीं भी वे मुस्लिम हिंसा का खुलकर विरोध नही किये है.
२. गाँधी मंदिरों और आपने सभी सभाओं में गीता के साथ कुर-आन का भी पाठ किया करते थे पर इनकी कभी भी हिम्मत नही हुई की वह किसी मस्जिद में जाकर गीता का पाठ करें
३. गाँधी ने छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविन्द सिंह, महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों को मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए पथभ्रष्ट देशभक्त कहकर अपमानित किया क्योंकि इन्होने उस समय मुस्लिम शासकों से लोहा लिया जब देश उनके अत्याचार से त्राहि त्राहि कर रहा था.
४. स्वामी दयानंद सरस्वती की हत्या एक कट्टर मुस्लिम ने की थी. गाँधी ने उस हत्यारे का पक्ष लिया और मुस्लिमों से माफ़ी मांगी थी.
५. मोपला विद्रोह में अधिकांश में हिंदू मारे गए थे पर इसने मुस्लिमों के लिए चंदा इकट्ठा किया था
६. हैदराबाद के निजाम के गैर मुस्लिमों पर अत्याचारी शासन के विरुद्ध सिक्खों और हिंदुओं के संघर्ष को समर्थन देने से गाँधी ने यह कहकर मना कर दिया की वे महामहिम निजाम को परेशान नही करना चाहते है.
७. जब मुस्लिम लीग के मतांध सदस्यों ने पाकिस्तान को प्राप्त करने के लिए बल प्रयोग की धमकी दी तो गाँधी ने मुस्लिम लीग से प्रार्थना की की वे मुसलमानों द्वारा शासित होने के लिए तैयार है.
८. यहाँ तक की मुस्लिम लीग के हिंदुओं के विरुद्ध
प्रत्यक्ष कार्यवाही घोषित किये जाने पर उन्हें रोकने का कोई प्रयत्न नही किया परिणामतः वर्तमान बंगलादेश, पाकिस्तान और कोलकाता
में हजारों से लाखों हिंदुओं को मार दिया गया और स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ जिनमे कोलकाता और रावलपिंडी सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए थे. इसके बाबजूद (हिंदुस्तान को मुस्लिमस्तान बनाने के लिए) गाँधी ने १९४७ में लार्ड माउन्ट बेटन को यह सुझाव दिया की पुरे भारत का शासन जिन्ना को सौंप दिया जाये और उन्हें अपना मन्त्रिमन्डल बनने का पूरा अधिकार दे दिया जाये...कांग्रेस इसका पूरा समर्थन करेगी (Why I Assassinated Gandhi).गाँधी ने अपने पत्र यंग इंडिया में लिखा की यदि भारत आजाद होता है और इसमें राजतन्त्र की स्थापना होगी तो हैदराबाद का निजाम भारत का शासक होगा.
९. दिनरात आपने अल्पसंख्यक प्रजा की जान मॉल की रक्षा की चिंता में डूबे जम्मू-कश्मीर के शासक हरिसिंह पर ये हमेशा दबाव देते रहे की वे सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौंपकर तीर्थयात्रा पर चले जाये पर यही सुझाव ये हैदराबाद के अत्याचारी निजाम को कभी नही दिए. जब गाँधी का कहना था की अल्पसंख्यक बहुसंख्यक से उलझ ही नही सकते तो फिर जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक हिंदू सिक्ख से बहुसंख्यक मुस्लिमों को भला क्या खतरा था? (कांग्रेस के वर्तमान सांप्रदायिक दंगा निरोधक कानून ऐसे ही विचारों से ग्रस्त है)
१०. कश्मीर पर हुए पाकिस्तानी आक्रमण का प्रतिकार अहिंसा से कैसे किया जाये इसपर गाँधी की राय थी की “जिनपर आक्रमण हुआ है उनको सैनिक सहायता न दी जाय. संघ राज्य अहिंसक सहायता करें, और वह विपुल मात्रा में.भले ही एसी सहायता मिले न मिले. जो आक्रमित है. वे विनयबद्ध सेना का, अर्थात आक्रमणकारियों का प्रतिरोध न करें. आक्रमित अपने नियत स्थान पर क्रोध रहित और द्वेषरहित हृदय से आक्रामकों के शस्त्रों की बली चढें. शस्त्र प्रयोग नही करें. हाथ की मुट्ठी से भी प्रतिप्रहार न करें. ऐसा अहिंसामय प्रतिकार इस प्रथ्वी पर इतिहास को आज तक ज्ञात नही है, ऐसा नेत्र दीपक शूरता का दर्शन कराएगा
फिर कश्मीर पवित्र भूमि होगी. उस पवित्रता की सुगंध हिंदुस्तान में ही नही अपितु पुरे विश्व में महकेगी.” (Saradar Patel’s Correspondence)
उपर्युक्त बातें गाँधी जी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कही थी. जब गाँधी जी से यह पूछा गया की “अहिंसक सहायता” का स्वरूप क्या होगा और वो आक्रमितों को किस प्रकार दी जा सकेगी तो गाँधी ने चुप्पी मार ली. जाहिर है “अहिंसक सहायता” शब्द से वे सिर्फ हिंदुओं के विरुद्ध अपना “अहिंसक हथियार” इस्तेमाल कर रहे थे.
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सवाल है हिंदुओं और सिक्खों की लाश पर ही कश्मीर पवित्र भूमि क्यों बनती? क्या उनके रहते कश्मीर पवित्र भूमि नही थी या इन्हें लगता था हिंदू शासक, हिंदू बौद्ध और सिक्ख प्रजा और उनके भगवान के रहते कश्मीर पवित्र भूमि नही बन सकती? फिर हमेशा हिंदुओं को ही मरने की सलाह क्यों और उनके कायरता पूर्ण मौत को बार बार ‘वीरता की मौत’ कहकर किस अभीष्ट की सिद्धि करना चाहते थे? सवाल यह भी है की क्या आप इससे सहमत होंगे? और अगर आप इससे सहमत हो भी गए तो क्या एसी नीति, ऐसा सोच राजनितिक सामाजिक दृष्टि से किसी देश या समाज के लिए उचित हो सकता है?
११. पाकिस्तान ने जब कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और अल्पसंख्यक हिंदुओं और सिक्खों को
बुरी तरह काटने मारने लगा तब भी सामूहिक असहमति के बाबजूद पाकिस्तान को ५५ करोड़
रूपये दिलाने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए और भारत से पाकिस्तान को ५५ करोड़ रूपया
दिलवाकर ही दम लिए. सरदार पटेल ने उन्हें जिद्द
छोड़ने के लिए हजार मिन्नतें की, सैनिकों के दर्द
का एहसास और अपनी बेबसी पर उस लौह पुरुष
की आँखों में आंसू आ गए पर गाँधी ने अपनी जिद
नही छोड़ी.परिणामतः देशभक्तों के सब्र की सीमा समाप्त हो गयी और मजबूरन इनकी हत्या करनी पड़ी.(My Frozen Turbulence of Kashmir)
१२. भारत की उदारता का पाकिस्तान पर कोइ सार्थक परिणाम नही दिखाई देने पर गाँधी की राय? मुझे दुःख है. अपेक्षित परिणाम तत्काल सामने नही आ रहे है और इसका कारण हिंदुओं को अहिंसा में पूर्ण विश्वास का न होना है. (Saradar Patel’s Correspondence)
१३. भारत के विभिन्न हिस्सों में होने वाली हिंदू-मुस्लिम दंगो के सम्बन्ध में गाँधी की राय था: निश्चय ही बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा अहिंसा के नियमों का पालन नही करने का परिणाम है क्योंकि अल्पसंख्यक मुसलमान बहुसंख्यक हिंदू से उलझ ही नही सकते है.
१४. ६ मई १९४६ को समाजवादी कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए गाँधी ने कहा था-“तब हम अहिंसा के डेरे लीग की हिंसा के क्षेत्र में भी गाढ़ सकेंगे. हम बगैर उनका (मुसलमानों का) खून बहाए अपने रक्त की भेंट देकर लीग के साथ समझौता कर सकेंगे. सवाल है कहीं यह गाँधी द्वारा हिंदुओं और सिक्खों को मरवाने की एक सोची समझी चाल तो नही थी.
१५. जब धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ तो कायदे से इस्लाम के सभी अनुयायी को
पाकिस्तान और बंगलादेश में चले जाना चाहिए था और हिन्द सभ्यता और संस्कृति के समर्थक को
भारत आ जाना चाहिए था, परन्तु एकमात्र गाँधी था जिसने इसका विरोध किया और फिर नेहरु ने इसका समर्थन किया जिसके कारण यह नही हो सका जिसका परिणाम यह हुआ है की गाँधी के छलावे में फंसकर बंगलादेश और पाकिस्तान में रह जाने वाले लाखों करोड़ों गैर मुस्लिम आज महज कुछ हजारों में सिमट गए है और मौत से भी बत्तर जिंदगी जीने को बाध्य है. वे आज भी लूट, हिंसा, बलात्कार और धर्मान्तरण का शिकार हो रहे है और भारत से शरण की मांग कर रहे है.
दूसरी ओर भारत स्वतंत्रता के बाद भी कभी चैन से नही रहा और अनवरत सांप्रदायिक दंगे का उसी प्रकार शिकार होता रहा है जैसे आजादी पूर्व था. साथ ही जनसंख्या वृद्धि,आतंकवाद, अलगाववाद, छद्मधर्मनिरपेक्षता और इन सबसे उत्पन्न वोट बैंक की घृणित राजनीती,भुखमरी, गरीबी बेकारी आदि समस्याओं से त्रस्त है.
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क्या गाँधी को इस बात का थोडा भी एहसास था? चलो मान लिया गाँधी भ्रम में था की अल्पसंख्यक मुस्लिम हिंदुओं के विरुद्ध कुछ नही कर सकते, परन्तु जब उन्ही अल्पसंख्यक मुस्लिमों ने १९४६ में हिंदुओं के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्यवाही की खुली धमकी दी और किया भी जिसमे लाखों हिंदुओं को मौत के घात उतार दिया और हिंदू स्त्रियों के साथ
बलत्कार किया आगजनी और लूट पाट किया तब
तो उसकी आँखे खुल जानी चाहिए थी और इस्लाम की प्रकृति को समझते हुए, जो गैर मुस्लिमों के अस्तित्व को ही स्वीकार नही करता, धर्म पर आधारित विभाजन का सम्मान करते हुए हिंदू और मुस्लिमों के स्थानांतरण पर सहमत हो जाना चाहिए था, परन्तु उसने ऐसा नही किया जिसकी कीमत आज हिंदुस्तान और हिंदुस्तान की जनता को चुकाना पड़ रहा है.स्थिति तो एसी उत्पन्न होती दिख रही है की हिंदुस्तान की अखंडता एक बार फिर खतरे में पड़ती जान पड़ रही है. हिंदुस्तान का इतिहास हिंदू और हिंदुस्तान के विरुद्ध किये गए गाँधी के इस छल को कभी माफ़ नही कर पायेगा.
१६. गाँधी ने सोमनाथ के मंदिर को सरकारी खजाने से बनबाने के मन्त्रिमन्डल के निर्णय का
खुला विरोध करते हुए कहा की मंदिर का निर्माण सरकारी खजाने से न होकर जनता के कोष से किया जाये, पर इसी गाँधी ने जनवरी १९४८ में नेहरु और पटेल पर दबाव डाला की दिल्ली की जामा मस्जिद का नवीनीकरण सरकारी खजाने से किया जाये और करवाकर ही माने.
१७. गाँधी ने भारत के प्रधान मंत्री के लिए सिर्फ दो व्यक्ति का समर्थन किया एक था जिन्ना और दूसरा जवाहर लाल नेहरु. जिन्ना तो गाँधी का व्यक्तिगत पसंद था पर जब नेहरु के प्रधान मंत्री बनने पर मतदान हुआ तो नेहरु के पक्ष में सिर्फ एक मत पड़े थे, परन्तु फिर भी गाँधी ने नेहरु को ही प्रधानमंत्री बनाया. क्या इसलिए की नेहरु के संदर्भ में यह प्रचलित था की “नेहरु जन्म से तो हिंदू पर विचार से विदेशी और कर्म से मुसलमान है” (भारत गाँधी नेहरु की छाया में).
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गाँधी के समर्थक कहते है की नेहरु ने गाँधी जी को धमकी दी थी की अगर उन्हें प्रधान मंत्री नही बनाया गया तो वे कांग्रेस को भंग कर देंगे और भारत की आजादी का स्वप्न साकार नही हो पायेगा.इस बात में दम नही लगता क्योंकि मुस्लिम लीग पाकिस्तान के वगैर मानने वाला नही था अतः
भारत विभाजन अवश्यम्भावी था. उसी तरह भारत का आजाद होना किसी एक व्यक्ति या संगठन की शक्ति का परिणाम नही था बल्कि भारत के आजाद होने के बहुत से देशी और विदेशी कारक थे. ऐसे में नेहरु सिर्फ कुछ देर के लिए सम्भव है बाधा डाल सकता था; कुछ ज्यादा नही कर सकता था. यदि मान भी लिया जाय की यह सत्य है तो फिर गाँधी ने आजादी बाद भी नेहरु का समर्थन क्यों किया? इतना ही नही अकेले दम पर भारत के ५०० से अधिक रियासतों को भारत में शामिल करनेवाले और जम्मू कश्मीर पर नेहरु की असफलता पर बार बार उनकी सहयोग की बात करने वाले सरदार बल्लभ भाई पटेल पर हमेशा पदत्याग का दबाव क्यों बनाते रहे? यह बात गाँधी की की नियत पर सवाल खड़ा करता है.
१९. ३० जनवरी को यदि गांधी वध रुक जाता तो ३ फरवरी १९४८ को देश का एक और विभाजन पक्का था,जिन्ना की मांग थी कि पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समय लगता है और हवाई जहाज से जाने की सभी की औकात नहीं, तो हमको बिलकुल बीच भारत से एक कोरिडोर बना कर दिया जाए जो :-
• लाहौर से ढाका जाता हो
• दिल्ली के पास से जाता हो
• जिसकी चौड़ाई कम से कम १० मील यानि १६ किलोमीटर हो
• १० मील के दोनों और सिर्फ मुस्लिम बस्तियां ही बनेगी,तत्कालीन परिस्थितियों में सभी भारतीय और पाकिस्तानी इस सत्य से परिचित थे कि एक और विभाजन निश्चिंत था.
20. शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने पर अहिंसा के महान पुजारी गांधी ने कहा था,‘‘हमें ब्रिटेन के विनाश के बदले अपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’और आगे कहा,‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत हानि हुई और हो रही है,वहीं इसका परिणाम गुंडागर्दी का पतन है,फांसी शीघ्र दे दी जाए ताकि 30 मार्च से करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में कोई बाधा न आवे ।”
अर्थात् गांधी की परिभाषा में किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी । इसी प्रकार एक ओर महान् क्रान्तिकारी जतिनदास को जो आगरा में अंग्रेजों ने शहीद किया तो गांधी आगरा में ही थे और जब गांधी को उनके पार्थिक शरीर पर माला चढ़ाने को कहा गया तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया,परन्तु यही गाँधी दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का समर्थन
किया यहाँ तक की अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने का सभी समर्थन किया. क्या यह हिंसा का समर्थन नहीं था? उधमसिंह ने जलियाँवाला बाग के अपराधी माईकल डायर को इंग्लैण्ड में मारा तो गांधी ने उन्हें पागल कहा इसलिए नीरद चौधरी ने गांधी को दुनियां का सबसे बड़ा सफल पाखण्डी लिखा है
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इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते हैं –
“भारत की आजादी का सेहरा गांधी के सिर बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह कहना की उसने सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन सभी क्रान्तिकारियों का अपमान है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना खून बहाया ।” गाँधी की इसी निति को नेहरु ने कांग्रेस में शामिल पाकिस्तान की मांग करनेवाले और
पाकिस्तान बनने पर भी पाकिस्तान न जाकर कांग्रेस में शामिल हो जाने वाले देशद्रोही मुस्लिमों के सहयोग से धर्मनिरपेक्षता का स्वांग रचकर संगठित रूप दिया. इसी धर्मनिरपेक्षता की आड़ में देश की एकता अखंडता और सुरक्षा को दाव पर रख कर भी मुस्लिम परस्ती की सारी हदें पार करने की परम्परा चली आ रही है. (दैनिक जागरण) इटालियन सोनिया आज धर्मनिरपेक्षता की आड़ में उसी मुस्लिम तुष्टिकरण और फूट डालो राज करो की निति को अपना रही है जिसका ज्वलंत उदहारण सांप्रदायिक दंगा निरोधक बिल है जो इसी के नेतृत्व में बनायीं गयी है और गाँधी की उसी
सिद्धांत पर आधारित है की अल्पसंख्यक मुस्लिम
और ईसाई बहुसंख्यक हिंदू से उलझ ही नही सकते है.
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अतः किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा के लिए सिर्फ और सिर्फ हिंदू ही दोषी माने जायेंगे. इसका वास्तविक उद्देश्य सिर्फ इतना ही नही है. इस कैथोलिक क्रिश्चियन का वास्तविक उद्देश्य यह है की हिंदू-मुस्लिम को आपस में लड़ाएं और धर्मान्तरण के माध्यम से लोगों को ईसाई बनाकर अपनी सत्ता और पोप की भारत को ईसाई बनाने की घोषणा दोनों के लिए कार्य प्रगति पर रहे.
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सच तो ये है की-देश बचा गए नाथूराम
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वन्देमातरम