Friday, May 22, 2015

Ottoman Empire- Part 1 उस्मानिया साम्राज्य – खिलाफत और खलीफा के संक्षिप्त इतिहास-1,

खिलाफत आंदोलन अधिकांश मित्र नहीं जानते कि यह क्या था या खिलाफत का मतलब ही क्या है वो खिलाफत को खिलाफ का करीबी रिश्तेदार शब्द समझ लेते हैं जबकि खिलाफ होने को उर्दू ही में मुखालफत कहते हैं जबकि ” सुन्नी/वहाबी इस्लामी खलीफा साम्राज्य ” को खिलाफत कहा जाता है ..!!
उस्मानी साम्राज्य (1299 – 1923) या ऑटोमन साम्राज्य या तुर्क साम्राज्य, उर्दू में कहें तो सल्तनत-ए-उस्मानिया 1299 में पश्चिमोत्तर अंतालिया / Antalya से स्थापित एक एक तुर्क इस्लामी सुन्नी साम्राज्य था, महमूद द्वितीय द्वारा 1493 में कॉन्सटेंटिनोपोल / Constantinople जीतने के बाद यह एक वृहद इस्लामी साम्राज्य में बदल गया।
उस्मानी साम्राज्य सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में अपने चरम शक्ति पर था, अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष के समय यह एशिया, यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीकी हिस्सों में फैला हुआ था , यह साम्राज्य पश्चिमी तथा पूर्वी सभ्यताओं के लिए विचारों के आदान प्रदान के लिए एक सेतु की तरह भी था ,, इस ऑटोमन या उस्मानिया साम्राज्य ने 1453 में कुस्तुनतुनिया / आज के इस्ताम्बूल को जीतकर बैजन्टाईन साम्राज्य का समूल अन्त कर दिया इस्ताम्बुल बाद में इनकी राजधानी बनी रही , एक ऐतिहासिक सत्य यह भी है कि इस्ताम्बूल पर इस खिलाफत की जीत ने यूरोप में पुनर्जागरण को प्रोत्साहित किया था।
चलें पुन: खिलाफत के इतिहास और खिलाफत आंदोलन की ओर चलें,, एशिया माईनर में सन 1300 तक सेल्जुकों का पतन हो गया था पश्चिम अंतालिया में अर्तग्रुल एक तुर्क सेनापति व सरदार था एक समय जब वो एशिया माइनर की तरफ़ कूच कर रहा था तो उसने अपनी चार सौ घुड़सवारों की सेना को भाग्य की कसौटी पर आजमाया उसने हारते हुए पक्ष का साथ दिया और युद्ध जीत लिया उन्होंने जिनका साथ दिया वे सेल्जुक थे तू सेल्जुक प्रधान ने अर्तग्रुल को उपहार स्वरूप एक छोटा-सा प्रदेश दिया,, “अर्तग्रुल के पुत्र उस्मान” ने 1281 में अपने पिता की मृत्यु के पश्चात प्रधान का पद हासिल किया उसने 1299 में अपने आपको सेल्जुकों से स्वतंत्र घोषित कर दिया बस यहीं से महान् तुर्क उस्मानी साम्राज्य व इस्लामी खिलाफत की स्थापना हुई,, इसके बाद जो साम्राज्य उसने स्थापित किया उसे उसी के नाम पर उस्मानी साम्राज्य कहा जाता है (अंग्रेज़ी में ऑटोमन, Ottoman Empire)
तुर्की के ऑटोमन / उस्मानी साम्राज्य का राजसी चिन्ह
यह चिन्ह हमें तुगलकों, ऐबकों समेत मुगल साम्राज्यवाद तक में दिखता रहा है यहां तक कि पुरानी ऐतिहासिक हिंदी ब्लैक एंड व्हाईट व रंगीन फिल्मों में बारंबार उस्मानिया सल्तनत का जिक्र किया जाता है।मुराद द्वितीय के बेटे महमद या महमूद द्वितीय ने राज्य और सेना का पुनर्गठन किया और 29 मई 1453 को कॉन्सटेंटिनोपोल जीत लिया,, महमद ने तत्कालीन रूढ़िवादी चर्च की स्वायत्तता भी बनाये रखी और बदले में ऑर्थोडॉक्स चर्च ने उस्मानी प्रभुत्ता स्वीकार कर ली, चूँकि बाद के बैजेन्टाइन साम्राज्य और पश्चिमी यूरोप के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे इसलिए ज्यादातर रूढ़िवादी/ऑर्थोडॉक्स ईसाईयों ने विनिशिया/बेजेन्टाईन के शासन के बजाय उस्मानी शासन को ज्यादा पसंद किया ,,पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में उस्मानी साम्राज्य का विस्तार हुआ, उस दौरान कई प्रतिबद्ध और प्रभावी सुल्तानों के शासन में साम्राज्य खूब फला फूला, यूरोप और एशिया के बीच के व्यापारिक रास्तो पर नियंत्रण की वजह से उसका आर्थिक विकास भी काफी हुआ।
सुल्तान सलीम प्रथम (1512-1520) ने पूर्वी और दक्षिणी मोर्चों पर चल्द्रान की लड़ाई में फारस के साफवी/शिया राजवंश के शाह इस्माइल को हराया!
“शाह इस्माइल ही फारस / ईरान को वो बादशाह था जिसके साथ तथाकथित मोगुल सरदार ज़हीरूद्दीन मुहम्मद बाबर ने संधि करके बाबर ने अपने को शिया परम्परा में ढाल कर दिया उसने शिया मुसलमानों के अनुरूप वस्त्र पहनना आरंभ किया ,, शाह इस्माईल के शासन काल में फ़ारस शिया मुसलमानों का गढ़ बन गया और वो अपने आप को सातवें शिया इमाम मूसा अल क़ाज़िम का वंशज मानता था, वहाँ सिक्के शाह के नाम में ढलते थे तथा मस्जिद में खुतबे शाह इस्माइल के नाम से पढ़े जाते थे हालाँकि क़ाबुल में सिक्के और खुतबे बाबर के नाम से ही थे और मोगुल सरदार बाबर समरकंद का शासन शाह इस्माईल के सहयोगी की हैसियत से चलाता था,, शाह की मदद से बाबर ने बुखारा पर चढ़ाई की वहाँ पर बाबर, एक तैमूरवंशी होने के कारण, लोगों की नज़र में उज़्बेकों के मुक्तिदाता के रूप में देखा गया और गाँव के गाँव उसको बधाई देने के लिए खाली हो गए इसके बाद बाबर ने सत्ता मदान्ध होकर फारस के शाह इस्माइल की मदद को अनावश्यक समझकर शाह की सहायता लेनी बंद कर दी और अक्टूबर 1511 में उसने अपनी जन्मभूमि समरकंद पर चढ़ाई की और एक बार फिर उसे अपने अधीन कर लिया वहाँ भी उसका स्वागत हुआ और एक बार फिर गाँव के गाँव उसको बधाई देने के लिए खाली हो गए वहाँ सुन्नी मुसलमानों के बीच वह शिया वस्त्रों में एकदम अलग लगता था हालाँकि उसका शिया हुलिया सिर्फ़ शाह इस्माईल के प्रति साम्यता और वफादारी को दर्शाने के लिए था, उसने अपना शिया स्वरूप बनाए रखा यद्यपि उसने फारस के शाह को खुश करने हेतु सुन्नियों का नरसंहार नहीं किया पर उसने शिया के प्रति आस्था भी नहीं छोड़ी जिसके कारण जनता में उसके प्रति भारी अनास्था की भावना फैल गई इसके फलस्वरूप, 8 महीनों के बाद, कट्टर सुन्नी उज्बेकों ने समरकंद पर फिर से अधिकार कर लिया।
तब फरगना घाटी के ओश शहर (वर्तमान के किर्गीजस्तान देश का दूसरा बडा शहर ओश/Osh) में पवित्र सुलेमान पहाड के निकटस्थ अपने घर में रहते बाबर को लगता था कि दिल्ली सल्तनत पर फिर से तैमूरवंशियों का शासन होना चाहिए एक तैमूरवंशी होने के कारण वो दिल्ली सल्तनत पर कब्ज़ा करना चाहता था उसने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को अपनी इच्छा से अवगत कराया पर इब्राहिम लोदी के जबाब नहीं आने पर उसने छोटे-छोटे आक्रमण करने आरंभ कर दिए सबसे पहले उसने कंधार पर कब्ज़ा किया इधर फारस के शाह इस्माईल को तुर्कों के हाथों भारी हार का सामना करना पड़ा इस युद्ध के बाद शाह इस्माईल तथा बाबर, दोनों ने बारूदी हथियारों की सैन्य महत्ता समझते हुए इसका उपयोग अपनी सेना में आरंभ किया,, इसके बाद उसने इब्राहिम लोदी पर आक्रमण किया,, पानीपत में लड़ी गई इस लड़ाई को पानीपत का प्रथम युद्ध के नाम से जानते हैं इसमें बाबर की सेना इब्राहिम लोदी की सेना के सामने बहुत छोटी थी पर सेना में संगठन के अभाव में इब्राहिम लोदी यह युद्ध बाबर से हार गया और इसके बाद दिल्ली की सत्ता पर बाबर का अधिकार हो गया और उसने सन 1526 में मुगलवंश की नींव डाली।”
हाँ तो हम मूलतः बात कर रहे थे उस्मानिया साम्राज्य व खिलाफत की जिसमें सुल्तान सलीम प्रथम (1512-1520) ने पूर्वी और दक्षिणी मोर्चों पर चल्द्रान की लड़ाई में फारस के साफविया/साफवी राजवंश के शाह इस्माइल को हराया और इस तरह उसने नाटकीय रूप से साम्राज्य का विस्तार किया,, उसने मिस्र में उस्मानी साम्राज्य स्थापित किया और लाल सागर में नौसेना खड़ी की, उस्मानी साम्राज्य के इस विस्तार के बाद पुर्तगाली और उस्मानी साम्राज्य के बीच उस इलाके की प्रमुख शक्ति बनने की होड़ लग गई।
शानदार सुलेमान (1512-1566) ने 1521 में बेलग्रेड पर कब्ज़ा किया उसने उस्मानी-हंगरी युद्धों में हंगरी राज्य के मध्य और दक्षिणी हिस्सों पर विजय प्राप्त की,,1526 की मोहैच की लड़ाई में एतिहासिक विजय प्राप्त करने के बाद उसने तुर्की का शासन आज के हंगरी (पश्चिमी हिस्सों को छोड़ कर) और अन्य मध्य यूरोपीय प्रदेशो में स्थापित किया,,1529 में उसने वियना पर चढाई की पर शहर को जीत पाने में असफल रहा,,1532 में उसने वियना पर दुबारा हमला किया पर गून्स की घेराबंदी के दौरान उसे वापस धकेल दिया गया, समय के साथ ट्रांसिल्वेनिया, वेलाचिया (रोमानिया) और मोल्दाविया(आज का Maldova देश) उस्मानी साम्राज्य की आधीनस्त रियासतें बन गयी। पूर्व में 1535 में उस्मानी तुर्कों ने फारसियों से बग़दाद जीत लिया और इस तरह से उन्हें मेसोपोटामिया पर नियंत्रण और फारस की खाड़ी जाने के लिए नौसनिक रास्ता मिल गया।
फ्रांस और उस्मानी साम्राज्य हैंब्सबर्ग के शासन के विरोध में संगठित हुए और पक्के सहयोगी बन गए। फ्रांसिसियो ने 1543 में नीस पर और 1553 में कोर्सिका पर विजय प्राप्त की ये जीत फ्रांसिसियो और तुर्को के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी जिसमे फ्रांसिसी राजा फ्रांसिस प्रथम और सुलेमान की सेनायों ने हिस्सा लिया था और जिसकी अगुवाई उस्मानी नौसेनाध्यक्षों बर्बरोस्सा हयरेद्दीन पाशा और तुर्गुत रईस ने की थी।
1543 में नीस पर कब्जे से एक महीने पहले फ्रांसिसियो ने उस्मानियो को सेना की एक टुकड़ी दे कर एस्तेरेगोम पर विजय प्राप्त करने में सहायता की थी,,1543 के बाद भी जब तुर्कियों का विजयाभियान जारी रहा तो आखिरकार 1547 में हैंब्सबर्ग के शासक फेर्डिनांड / Ferdinand ने हंगरी का उस्मानी साम्राज्य में आधिकारिक रूप से विलय स्वीकार कर लिया।
इस तरह विश्वप्रसिद्ध उस्मानी साम्राज्य / उस्मानिया सल्तनत / इस्लामी खलीफा की खिलाफत का उदय हुआ था अब हम भारत चलते हैं और खिलाफत की हुक्मरानी / निर्देश मानने की बाध्यता के कुछ उदाहरण लेते हैं।
मिसाल के तौर पर सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश (1211-1236) शहंशाह ऐ हिन्दुस्तान (विश्वप्रसिद्ध रजिया सुल्तान का बाप) के ज़माने के चान्दी के सिक्के है, जिनके एक तरफ खलीफा अलमुस्तंसिर तुर्की के सम्राट / खलीफा ऐ खिलाफत और दूसरी तरफ खुद अल्तमश का नाम खलीफा के नायब की हैसियत से लिखा है।
हिन्दुस्तान मे इस्लामी हुकूमत के दौर मे इस्लाम के विद्वान बडे औलमा पैदा हुऐ मसलन हज़रत शेख अहमद सरहिन्दी (रहमतुल्लाहे अलैय) जिन की वफात 1624 इसवी मे दिल्ली मे हुई यह फिक़हे इस्लामी के बहुत बडे आलिम/विद्वान थे जो मुजद्दिद अल्फसानी के नाम से जाने जाते है उन्होने उस्मानी खलीफा को 536 खत व खुस्बे लिखे जिन का मजमून /मतलब “मक्तूबात” के नाम से मशहूर है..!!
अब हम सब भारत में और दुनिया में खिलाफत या ऑटोमन साम्राज्य के तथाकथित पतन और बहुप्रचारित ‘इस्लाम खतरे में के जन्म की किवदंती’ की ओर चलते हैं ..!
19 वीं शताब्दी में जो दुनिया पश्चिमी साम्राज्यवादिता की घोषित ताकतों ने बनाई वह (1) मुक्त व्यापार, (2) गोल्ड स्टैण्डर्ड, (3) बैलेंस ऑफ़ पॉवर और (4) औपनिवेशिक लूट के उपर आधारित थी…!!
1814 से 1914 तक पश्चिम की साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच में शांति बनी रही और उनकी आक्रामक शक्ति एशिया-अफ्रीका के देशों व क्षेत्रों के खिलाफ इस्तेमाल होती रही इसमे यूरोप की एक साम्राज्यवादी ताकत नें दूसरी साम्राज्यवादी ताकत के प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं किया,,वास्तविकता में 19 वीं सदी एक क्रूर सदी थी जिसमे हर साल एक नया युद्ध होता था, 1857 में हिन्दुस्तान की जंग ऐ आजादी को ब्रिटिश हूकूमत द्वारा बर्बरता से दबा दिया गया और अन्य यूरोपियन शक्तियों ने इसमें भी हस्तक्षेप नहीं किया..!!
उधर अरब में वहाबी विचारधारा के प्रवर्तक मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब का जन्म 1703 में उयायना, नज्द के बनू तमीम कबीले में हुआ था , इस्लामी शिक्षा की चार व्याख्याओं में से एक हम्बली व्याख्या का उसने बसरा, मक्का और मदीना में अध्ययन किया इब्न अब्दुल वहाब की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं काफी थीं सो 1730 में उयायना लौटने के साथ ही उसने स्थानीय नेता “मुहम्मद इब्न सऊद” (सऊदी अरब का संस्थापक शेख बादशाह) से एक समझौता किया, जिसमें दोनों परिवारों ने मिल कर सऊदी साम्राज्य खड़ा करने की सहमति बनाई ,तय हुआ कि सत्ता कायम होने पर सऊद परिवार को राजकाज मिलेगा; हज और धार्मिक मामलों पर इब्न अब्दुल वहाब के परिवार यानी अलशेख का कब्जा रहेगा (यही समझौता आज तक कायम है) सऊदी अरब का बादशाह अल सऊद-परिवार से होता है और हज और मक्का-मदीने की मस्जिदों की रहनुमाई वहाबी-सलफी विचारधारा वाले अल शेख परिवार के वहाबी इमामों के हाथ होती है, इब्न अब्दुल वहाब की विचारधारा को कई नामों से जाना जाता है, उसके नाम के मुताबिक उसकी कट्टर विचारधारा को वहाबियत यानी वहाबी विचारधारा कहा जाता है और खुद इब्न अब्दुल वहाब ने अपनी विचारधारा को सलफिया यानी ‘बुजुर्गों के आधार पर’ कहा था। आज दुनिया में वहाबी और सलफी नाम से अलग-अलग पहचानी जाने वाली विचारधारा दरअसल एक ही चीज है।
पूर्वी तट से लेकर दक्षिण के खतरनाक तापमान वाले रबी उल खाली के रेगिस्तान और उत्तर के नज्द (वर्तमान राजधानी रियाद का इलाका) और पश्चिमी तट के हिजाज (मक्का और मदीना सहित प्रांत) को वहाबी विचारधारा के एक झंडे के नीचे लाने में सऊद परिवार ने दो सौ साल संघर्ष किया और जहां-जहां वे इलाका जीतते, सलफी उर्फ वहाबी विचारधारा के मदरसे खोलते गए बद्दुओं यानी ग्रामीण कबीलों में बंटे अरबों को एक नकारात्मकतावादी विचारधारा के तहत लाकर 1922 और फिर 1925 के संघर्ष में अल सऊद ने वर्तमान सऊदी अरब के लगभग सारे इलाके जीत लिए, अब्दुल अजीज इब्न सऊद को इस संघर्ष में ब्रिटेन ने जोरदार सहयोग किया ब्रिटेन जानता था कि उस्मानिया खिलाफत को मार भगाने के लिए अब्दुल अजीज इब्न सऊद ही उसकी मदद कर सकता है क्योंकि आगामी राजनीति और आर्थिक नीति के सबसे बडे बम “कच्चे तेल / काले सोने” की खोज हो चुकी थी और दुनिया गाड़ी, टैंक, कार पर चलनी शुरू हो चुकी थी ।
जब भारत के लोग 1919 में महात्मा गांधी समर्थित और मौलाना महमूद हसन, मौलाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना हसरत मोहानी, मौलाना अबुल कलाम आजाद समेत कई मुसलिम नेताओं की अगुआई में हिजाज यानी मक्का और मदीना के पवित्र स्थल ब्रिटेन के हाथों में जाने के डर से खिलाफत आंदोलन चला रहे थे, अब्दुल अजीज इब्न सऊद ब्रिटेन के साथ मिल कर उस्मानिया खिलाफत और स्थानीय कबीलों को मार भगाने के लिए लड़ रहा था अंग्रेजों के दिए हथियार और आर्थिक मदद से अब्दुल अजीज इब्न सऊद ने वर्तमान सऊदी अरब की स्थापना की और वर्षों से ‘वक्फ’ यानी ‘धर्मार्थ समर्पित सार्वजनिक स्थल’ वाले मक्का और मदीना के संयुक्त नाम ‘हिजाज’ को भी ‘सऊदी अरब’ कर दिया गया साथ ही खिलाफत को खत्म करने के पीछे इन अंग्रेजियत व सुन्नी; वहाबी कारणों के अलावा भी एक और कारण था और वो था कि अगस्त 4, 1914 को ब्रिटेन ने जर्मनी पर युद्ध की घोषणा कर दी जापान फ्रांस और रूस उसके साथ शामिल हो गए अक्टूबर 1914 में तुर्की जर्मनी और ऑस्ट्रिया के साथ युद्ध में शामिल हो गया और प्रथम विश्वयुद्ध में दो पक्ष थे ,,,एक तरफ अलाइड ताकतें – ब्रिटेन , फ्रांस और रूस तथा दूसरी तरफ सेंट्रल ताकतें जिसमे जर्मनी तथा आस्ट्रियन हैंब्सबर्ग राज्य,, अलाइड ताकतों के साथ बाद में अमेरिका भी शामिल हो गया क्योंकि अरब का तेल और लाल सागर सबकी आंखों.में वहां की अनपढता और जहालत के कारण नजर में आ चुका था।
बस सेंट्रल ताकतों के साथ बाद में तुर्की शामिल हो गया जापान और इटली प्रथम विश्वयुद्ध में पक्षरहित/न्यूट्रल रहे,,यह युद्ध कितना भयानक ,,, कितना ही भयानक था इसकी चर्चा करना बहुत अनावश्यक है बस यह जान लेना काफी है कि सभी साम्राज्यवादी शक्तियों ने एक दूसरे के खिलाफ मोर्चाबंदी में लगभग 6 करोड़ सेनाओं को गोलबंद किया और लगभग साठ लाख लोग इस लड़ाई में मारे गए, तत्कालीन ब्रिटिशकाल के हिंदुस्तान की फ़ौज की संख्या लगभग 10 लाख थी और इसके 1 लाख से ज्यादा भारतीय लोग लड़ाई में मारे गए, लेकिन ब्रिटिश नेतृत्व की गुलाम हिंदुस्तान की फ़ौज ने मध्य एशिया मे उस्मानी सल्तनत को हराने में बहुत अहम् भूमिका अदा की जिसके दूरगाम परिणाम हुए…!!
अब तक हमने उस्मानिया सल्तनत / उस्मानी साम्राज्य / खलीफा ऐ खिलाफत का ही आधारभूत मानकर तथा इतिहास की कडी कडी जोडकर और फिर हिंदुस्तान के परिप्रेक्ष्य में प्रारंभिक मतलबों से ही जाना है अब आगे हम वास्तविक खिलाफत आंदोलन के बारे में और उसके ढंके छुपे वास्तविक सत्य का पूरा पोस्टमार्टम करके अकाट्य दस्तावेजी सबूतों व तथ्यों सहित पूरा इतिहास व सच खोदक
खिलाफत आन्दोलन (1919-1924) तत्कालीन ब्रिटिश हिंदुस्तान में मुख्यत: मुसलमानों द्वारा चलाया गया राजनैतिक-धार्मिक आन्दोलन था,, इस आन्दोलन का उद्देश्य तुर्की में खलीफा ऐ खिलाफत यानि सुन्नी इस्लामी साम्राज्य के बादशाह खलीफा के पद की पुन:स्थापना कराने के लिये अंग्रेजों पर दबाव बनाना था,, सन् 1908 ई. में तुर्की में युवा तुर्की दल (ब्रिटिश समर्थन से मुस्तफा कमाल पाशा “अतातुर्क” के दल) द्वारा शक्तिहीन हो चुके खलीफा के प्रभुत्व का उन्मूलन खलीफत (खलीफा के पद) की समाप्ति का प्रथम चरण था, इसका भारतीय मुसलमान जनता पर नगण्य प्रभाव पड़ा किंतु, 1912 में तुर्की-इतालवी तथा बाल्कन युद्धों में, तुर्की के विपक्ष में, ब्रिटेन के योगदान को इस्लामी संस्कृति तथा सर्व इस्लामवाद / इस्लामी उम्मा पर प्रहार समझकर (यही समझाया गया था) भारतीय ‘मुसलमान’ ब्रिटेन के प्रति उत्तेजित हो उठे, यह विरोध भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध रोषरूप में परिवर्तित हो गया यह भी कहा व लिखा गया है जबकि मूलतः इसका भारत में ब्रिटिश विरोध से कुछ लेना देना ही नहीं था।
भारतीय इतिहास में खिलाफत आन्दोलन का वर्णन तो है किन्तु कही विस्तार से नहीं बताया गया कि खिलाफत आन्दोलन वस्तुत:भारत की स्वाधीनता के लिए नहीं अपितु वह एक राष्ट्र विरोधी व हिन्दू विरोधी आन्दोलन था ,, खिलाफत आन्दोलन दूर स्थित देश तुर्की के खलीफा को गद्दी से हटाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आन्दोलन था, चतुर राजनीतिज्ञ और वस्तुतः अंग्रेज मित्रों द्वारा असहयोग आन्दोलन भी खिलाफत आन्दोलन की सफलता के लिए चलाया गया आन्दोलन ही था आज भी अधिकांश भारतीयों को यही पता है कि असहयोग आन्दोलन स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु चलाया गया कांग्रेस का प्रथम आन्दोलन था किन्तु सत्य तो यही है कि इस आन्दोलन का कोई भी राष्ट्रीय लक्ष्य नहीं था।
इस आंदोलन की सबसे मजेदार बात यह है कि तुर्की की “इस्लामिक” जनता ने बर्बर व रूढिवादी इस्लामी कानूनों से तंग आ कर एकजुटता से मुस्तफा कमाल पाशा ‘अतातुर्क’ ( तुर्क भाषा में अतातुर्क का मतलब तुर्की का पिता या तुर्कों का राष्ट्रपिता सरीखा होता है, तुर्की,चुगताई,उज्बेक,कजाख,किर्गीज,मंगोल व पूर्वी यूरोपियन देशों, कफकाजी देशों की स्थानीय भाषा में अता /Ata का मतलब पिता ही होता है) के सटीक नेतृत्व में तुर्की के खलीफा को देश निकला दे दिया था ,, भारत में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी ने जमियत-उल-उलेमा के सहयोग से ही खिलाफत आंदोलन का संगठन किया तथा मोहम्मद अली जौहर ने 1920 में खिलाफत घोषणापत्र प्रसारित किया, भारत में मोहम्मद अली जौहर व शौकत अली जौहर दो भाई खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे..!!
तो मित्रों खिलाफत आंदोलन के जन्मदाताओं में से प्रमुख मौलाना मोहम्मद अली जौहर 1878 में रामपुर में पैदा हुए .(जी हां आज के महा बकैत आजम खां के विधानसभा क्षेत्र रामपुर में, जहां उसने जमीनें हडप कर/अलॉट करवा कर मौ.मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी बनाई है,,गत 18 सितम्बर, 2012 को रामपुर (उप्र) में मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर एक विश्वविधालय का उदघाटन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया। इस अवसर पर उनके पिता श्री मुलायम सिंह तथा प्रदेश की लगभग पूरी सरकार मय महाबकैत मंत्री आजम खां वहां उपस्थित रही थी)
तो मित्रों कांग्रेस के लंपट परिवार के अलावा बाकी इतिहास में जिन अली भाइयों (मोहम्मद अली तथा शौकत अली) का नाम आता है, ये उनमें से एक थे, रोहिल्ला पठानों के यूसुफजर्इ कबीले से सम्बद्ध जौहर का जन्म 10 दिसम्बर, 1878 को रामपुर में हुआ था,, देवबंद, अलीगढ़ और फिर आक्सफोर्ड से उच्च शिक्षा प्राप्त कर इनकी इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवा में जाकर अंग्रेजों की चाकरी करें, इसके लिए इन्होंने कर्इ बार आर्इ.सी.एस की परीक्षा दी पर कभी सफल हो ही नहीं सके सो विवश होकर उन्हें रामपुर में उच्च शिक्षा अधिकारी के पद पर काम करना पड़ा, कुछ दिनों तक उन्होंने रियासत बड़ौदा में भी काम किया, लेकिन मौलाना को उपर वाले ने किसी और ‘काम’ के लिए पैदा किया था, शुरू से ही उनकी ख्वाहिश थी कि वह पत्रकारिता को अपना पेशा चुने तो 1910 से उन्होंने कलकत्ता से एक अंग्रेज़ी अख़बार कामरेड निकालना शुरू किया, 1912 में जब अंग्रेज़ों ने दिल्ली को अपना केंद्र बना लिया तो मौलाना जौहर भी दिल्ली आ गए और यहां से उन्होंने 1914 से उर्दू दैनिक हमदर्द निकालना शुरू किया ये दोनों अपने समय के मशहूर इस्लामी अख़बार थे, फिर ये हिन्दुओं को धर्मान्तरित कर इस्लाम की सेवा करने लगे इसके पुरस्कारस्वरूप इन्हें मौलाना की पदवी दी गयी, प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने अंग्रेजों के विरुद्ध जर्मनी का साथ दिया। इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने युद्ध जीतकर तुर्की को विभाजित कर दिया तुर्की के शासक को मुस्लिम जगत में ‘खलीफा कहा जाता था उसका सुन्नी इस्लामी साम्राज्य टूटने से मुसलमान नाराज हो गये तब ये दोनो अली भार्इ तुर्की के शासक को फिर खलीफा बनवाना चाहते थे,,तब अबुलकलाम आजाद,जफर अली खाँ तथा मोहम्मद अली जौहर ने मिलकर अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी बनाई इस खिलाफत कमेटी ने जमियत-उल-उलेमा के सहयोग से खिलाफत आंदोलन का सुनियोजित संगठन किया तथा मोहम्मद अली ने 1920 में खिलाफत घोषणापत्र प्रसारित किया था,, उधर अस्तित्व को जूझ रही वकीलों और जमींदारों की पार्टी कांग्रेस और उसके रणनीतिक चाणक्य बने बैठे “महात्मा” गांधी चाहते थे कि मुसलमान भारत की ‘आजादी के आंदोलन’ से किसी भी तरह जुड़ जाएं। अत: उन्होंने 1921 में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी से जुड कर ‘खिलाफत आंदोलन’ की घोषणा कर दी,,यद्यपि इस आंदोलन की पहली मांग खलीफा पद की पुनर्स्थापना तथा दूसरी मांग भारत की डोमेनियन स्टेट की मांग यानि / स्वायतशाषी देश की मांग थी,,काँग्रेस की इस मांग की जड में भी ब्रिटिश अमेरिकन “कच्चा तेल रणनीति और भविष्य की अर्थव्यवस्था व यातायात की धुरी” बनने जा रहा अरब का तेल ही था, इस तेल हेतु उधर अरब में ब्रिटेन सऊदों और वहाबी गठजोड को इस्तेमाल कर रहा था तो इधर गांधी महात्मा व कांग्रेस के जरिये तथा अपने स्तर पर सिर्फ ‘हिंदुस्तानी फौज’ (सनद रहे ब्रिटिश फौज नहीं) बढा रहा था डोमेनियन स्टेट के वादे के झांसे में,, कुल मिला कर ब्रिटिश व यूरोपीय साम्राज्यवादिता को काले सोने की उपयोगिता व भविष्य की कुल अर्थव्यवस्था की जड समझ आ गई थी और कांग्रेस व गांधी को सत्ता ही समझ आ पाई थी…!!
मूढ मुसलमान सुन्नी इस्लामी उम्मत और खलीफा, खिलाफत के आगे सोचने लायक तो थे ही नहीं उन्हे बस 1000 साल से हिंदुस्तान पर की गई तथाकथित हूकूमत का टिमटिमाहट वाला बुझता दिया इस्लामी रोशनी के साये में उम्मीद जगाने हेतु मिल गया था।
तब भावी सत्ता व अन्य अप्रत्यक्ष कारणों के मद्देनजर लालची कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण का जो देशघाती मार्ग उस समय अपनाया था,उसी पर आज तक कांग्रेस समेत उसकी नाजायज ‘सेक्यूलर संताने’ बने हुऐ भारत के सभी राजनीतिक दल चल रहे हैं..!!
इस खिलाफत आंदोलन के दौरान ही मोहम्मद अली जौहर ने अफगानिस्तान के शाह अमानुल्ला को तार भेजकर भारत को दारुल इस्लाम बनाने के लिए अपनी सेनाएं भेजने का अनुरोध किया इसी बीच तुर्की के खलीफा सुल्तान अब्दुल माजिद अंग्रेजों की ही शरण में आकर सपरिवार माल्टा चले गये, आधुनिक विचारों के समर्थक मुस्तफा कमाल पाशा ‘अतातुर्क’ नये शासक बने और देशभक्त तुर्क जनता ने भी उनका साथ दिया इस प्रकार वास्तविकता में तो खिलाफत आंदोलन अपने घर तुर्की में पैदा होने से पहले ही मर गया पर भारत में इसके नाम पर अली भाइयों ,खिलाफत कमेटी, जमात उल उलेमा और कांग्रेस ने ने अपनी रोटियां अच्छी तरह सेंक लीं,
भारत आकर मोहम्मद अली जौहर ने भारत को दारुल हरब (संघर्ष की भूमि) कहकर मौलाना अब्दुल बारी से हिजरत का फतवा जारी करवाया। इस पर हजारों मुसलमान अपनी सम्पत्ति बेचकर अफगानिस्तान चल दिये इनमें उत्तर भारतीयों की संख्या सर्वाधिक थी पर वहां उनके ही तथाकथित मजहबी भाइयों / इस्लामी उम्मा ने ही उन्हें खूब मारा तथा उनकी सम्पत्ति भी लूट ली, वापस लौटते हुए उन्होंने देश भर में दंगे और लूटपाट की ,केरल में तो 20,000 हिन्दू धर्मांतरित किये गये,इसे ही ‘मोपला कांड भी कहा जाता है …
उन दिनों कांग्रेस के अधिवेशन वंदेमातरम के गायन से प्रारम्भ होते थे, 1923 का अधिवेशन आंध्र प्रदेश में काकीनाड़ा नामक स्थान पर था,, मोहम्मद अली जौहर उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे जब प्रख्यात गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने वन्देमातरम गीत प्रारम्भ किया, तो मोहम्मद अली जौहर ने इसे इस्लाम विरोधी बताकर रोकना चाहा इस पर श्री पलुस्कर ने कहा कि यह कांग्रेस का मंच है, कोर्इ मस्जिद नहीं और उन्होंने पूरे मनोयोग से वन्दे मातरम गाया। इस पर जौहर विरोधस्वरूप मंच से उतर गया था।
इसी अधिवेशन के अपने अध्यक्षीय भाषण में जौहर ने 1911 के बंगभंग की समापित को अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों के साथ किया गया विश्वासघात बताया। उन्होंने पूरे देश को कर्इ क्षेत्रों में बांटकर इस्लाम के प्रसार के लिए विभिन्न गुटों को देने तथा भारत के सात करोड़ दलित हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की वकालत की ,, उनकी इन देशघाती नीतियों के कारण कांग्रेस में ही उनका प्रबल विरोध होने लगा अत: वे कांग्रेस छोड़कर अपनी पुरानी संस्था मुस्लिम लीग में चले गये, मुस्लिम लीग से उन्हें प्रेम था ही चूंकि 1906 में ढाका में इसके स्थापना अधिवेशन में उन्होंने भाग लिया था 1918 में वे इसके अध्यक्ष भी रहे थे,,मोहम्मद अली जौहर 1920 में दिल्ली में प्रारम्भ किये गये जामिया मिलिया इस्लामिया के भी सहसंस्थापक थे 19 सितम्बर, 2008 को बटला हाउस मुठभेड़ में इस संस्थान की भूमिका बहुचर्चित रही है, जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मोहन चंद्र शर्मा ने प्राणाहुति दी थी।
मोहम्मद अली जौहर ने 1924 के मुस्लिम लीग के अधिवेशन में सिंध से पशिचम का सारा क्षेत्र अफगानिस्तान में मिलाने की मांग की थी और तो और गांधी के बारे में पहला सार्वजनिक कटु व अकाट्य सत्य उन्होने ही कहा था, 1930 के दांडी मार्च के समय गांधी जी की लोकप्रियता देखकर मोहम्मद अली जौहर ने कहा था कि “व्यभिचारी से व्यभिचारी मुसलमान भी गांधी से अच्छा है।”
1931 में वे मुस्लिम लीग की ओर से लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गये वहीं 4 जनवरी, 1931 को उनकी मृत्यु हो गयी मरने से पहले उन्होंने दारुल हरब भारत की बजाय दारुल इस्लाम मक्का में दफन होने की इच्छा व्यक्त की थी पर मक्का के वहाबियों ने इस सुन्नी के शरीर को इसकी अनुमति नहीं दीअत: उन्हें येरुशलम में दफनाया गया,, यहां यह भी ध्यान देने की महत्वपूर्ण बात है कि मोहम्मद अली जिन्ना पहले भारत भक्त ही थे उन्होंने इस खिलाफत आंदोलन का प्रखर विरोध किया था पर जब उन्होंने गांधी जी के नेतृत्व में पूरी कांग्रेस को अली भाइयों तथा मुसलमानों की अवैध मांगों के आगे झुकते देखा, तो वे भी इसी मार्ग पर चल पड़े। जौहर की मृत्यु के बाद जिन्ना मुसलमानों के एकछत्र नेता और फिर पाकिस्तान के निर्माता बन गये।
दूर देश तुर्की में मुस्लिम राज्य/ इस्लामी उम्मा/ खिलाफत की पुन: स्थापना के लिए स्वराज्य की मांग को कांग्रेस द्वारा ठुकराना और भारत व हिंदू विरोधी इस आन्दोलन को चलाना किस प्रकार राष्ट्रवादी था या कितना राष्ट्रविरोधी भारतीय इतिहास में इस सत्य का लिखा जाना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा भारतीय आजादी का दंभ भरने वाली कांग्रेस लगातार भारत को ऐसे ही झूठ भरे इतिहास के साथ गहन अन्धकार की और रहेगी।
महात्मा गांधी ने 1920-21 में खिलाफत आंदोलन क्यों चलाया, इसके दो दृष्टिकोण हैं –
★ एक वर्ग का कहना था कि गांधी की उपरोक्त रणनीति व्यवहारिक अवसरवादी गठबंधन का उदाहरण था, मोहनदास करमचंद गाँधी ने कहा था “यदि कोई बाहरी शक्ति ‘इस्लाम की प्रतिष्ठा’ की रक्षा के लिए और न्याय दिलाने के लिए आक्रमण करती है तो वो उसे वास्तविक सहायता न भी दें तो उसके साथ उनकी पूरी सहानुभूति रहेगी “(गांधी सम्पूर्ण वांग्मय – 17.527 – 528) ,वे समझ चुके थे कि अब भारत में शासन करना अंग्रेजों के लिए आर्थिक रूप से महंगा पड़ रहा है अब उन्हें हमारे कच्चे माल की उतनी आवश्यकता नहीं है अब सिन्थेटिक उत्पादन बनाने लगे हैं, अंग्रेजों को भारत से जो लेना था वे ले चुके हैं सो अब वे जायेंगे (जो कि मैं उपर, काँग्रेस + ब्रिटिश झांसे समेत सऊदी,ब्रिटेन अमेरिकी गठबंधन और सुन्नी खिलाफत खत्म कर वहाबी सऊदियों और मक्का मदीना पर उनके अधिकार सहित एकछत्र इस्लामी बादशाह बनने की सुनियोजित नीति और कच्चा तेल आधारित अर्थव्यवस्था और भविष्य पर बता चुका हूँ।) अत: अगर शांति पूर्वक असहयोग आंदोलन चलाया जाए, सत्याग्रह आंदोलन चलाया जाए तो वे जल्दी चले जाएंगे, इसके लिए (तथाकथित) हिन्दू-मुस्लिम एकता ( जो दौराने खिलाफत और आजतक नहीं हुई हम सभी अब साक्षी हैं) आवश्यक है दूसरी ओर अंग्रेजों ने इस राजनीतिक गठबंधन को तोड़ने की चाल चली (जो साबित कर चुका हूं पर दूसरे अनकहे नजरिये और विश्लेषण से).. एक दूसरा दृष्टिकोण भी है। वह मानता है कि गांधी ने इस्लाम के पारम्परिक स्वरूप को पहचाना था। धर्म के ऊपरी आवरण को दरकिनार करके उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के स्वभाविक आधार को देख लिया था। 12वीं शताब्दी से साथ रहते रहते हिन्दु-मुसलमान सह-अस्तित्व सीख चुके थे। दबंग लोग दोनों समुदायों में थे। लेकिन फिर भी आम हिन्द-मुसलमान पारम्परिक जीवन दर्शन मानते थे, उनके बीच एक साझी विराजत भी थी। उनके बीच आपसी झगड़ा था लेकिन सभ्यतामूलक एकता भी थी। दूसरी ओर आधुनिक पश्चिम से सभ्यतामूलक संघर्ष है। गांधी यह भी जानते थे कि जो इस शैतानी सभ्यता में समझ-बूझकर भागीदारी नहीं करेगा वह आधुनिक दृष्टि से भले ही पिछड़ जाएगा लेकिन पारम्परिक दृष्टि से स्थितप्रज्ञ कहलायेग.. (जो कि कतई झूठा दृष्टिकोण है और बिलकुल वैसा ही सच है कि Discovery of India का वास्तविक लेखक और विचारकर्ता मूढ नेहरू ही था)
मोहनदास करमचंद गाँधी ने बिना विचार किये ही इस आन्दोलन को अपना समर्थन दे दिया जबकि इससे हमारे देश का कुछ भी लेना-देना नहीं था जब यह आन्दोलन असफल हो गया, जो कि होना ही था, तो केरल के मुस्लिमबहुल मोपला क्षेत्र में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर अमानुषिक अत्याचार किये गए, माता-बहनों का शील भंग किया गया और हत्याएं की गयीं मूर्खता की हद तो यह है कि गाँधी ने इन दंगों की कभी आलोचना नहीं की और दंगाइयों की गुंडागर्दी को यह कहकर उचित ठहराया कि वे तो अपने धर्म का पालन कर रहे थे सिर्फ मोपला ही नहीं अपितु पूरे तत्कालीन ब्रिटिश भारत में अमानवीय मुस्लिम दंगे, लूटपाट और हिंदू हत्याऐं हुई थी पर गांधी ने उन पर कभी किसी हिंदू हेतु संज्ञान नहीं लिया उल्टा हिंदुओं को ईश्वर अल्ला तेरो नाम का वर्णसंकर गाना सुनाता गवाता रहा,, तो देखा आपने कि गाँधी को गुंडे-बदमाशों के धर्म की कितनी गहरी समझ थी?
पर उनकी दृष्टि में उन माता-बहनों का कोई धर्म नहीं था, जिनको गुंडों ने भ्रष्ट किया मुसलमानों के प्रति गाँधी के पक्षपात का यह अकेला उदाहरण नहीं है, ऐसे उदाहरण हम पहले भी देख चुके हैं इतने पर भी उनका और देश का दुर्भाग्य कि हिन्दू-मुस्लिम एकता कभी नहीं हुई ना अब हो सकती है ..!!
इतिश्री प्रथम भाग, अब भाग दो जिसमें 1919 से लेकर 1940 तक के सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं, राजनीतियों और हिंदू व भारत द्रोहिता का अतिविस्तृत वर्णन करूंगा इस लेख सीरीज के उदाहरण कई सटीक स्रोतों, वेबसाईटों समेत इतिहास से लिये गये हैं जिन सबके लिंक या उद्धरण करना यहां संभव नहीं है पर यथासंभव आगे भाग 2 में करने की कोशिश कर अधूरापन पूरा करूँगा, आप सब निश्चिंत रहें कि यहां कुछ भी कपोल कल्पित नहीं लिखा गया है।
Note : यहाँ इस प्रथम भाग में मैनें उस्मानिया साम्राज्य – खिलाफत और खलीफा के संक्षिप्त इतिहास समेत यूरोपीय व अमेरिकी + सऊदियों की राजनैतिक तथा धार्मिक सत्ता अधिग्रहण तेल राजनीति से संबंधता रखते हुऐ बताया है जो कि ऐतिहासिक सत्य है.. सुन्नी खिलाफत का खात्मा ब्रिटिश कूटनीतिज्ञों ने अतातुर्क, गांधी + कांग्रेस व सऊदियों सहित मिल कर किस तरह किया यह भी बताया, भारत पर पडे उसके प्रभाव और हिंदू नरसंहार पर भी संक्षिप्त में लिखा है किंतु दूसरा भाग सिर्फ और सिर्फ भारत के खिलाफत आंदोलन की अनजानी सचाईयों पर आधारित रहेगा