Friday, January 2, 2015

Bible story is wrong about Christ- in hindi.


must read it..
क्राइस्ट का नाम क्राइस्ट क्यों है?
Aditya Agnihotri's photo.

यीशु का नाम ईसा मसीह क्यों है? और यह नाम किसने व कब रखे? आप कुछ भी कहानी गढ़ सकते हैं। लेकिन हम यहां तथ्यों की बात करेंगे तर्कों की नहीं।
ईसा मसीह ने 13 साल से 30 साल की उम्र के मध्य में क्या किया, यह रहस्य की बात है। बाइबबिल में उनके इन वर्षों के बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं मिलता है। 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने येरुशलम में यूहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली। दीक्षा के बाद वे लोगों को शिक्षा देने लगे।
अनुसार सन् 29 ई. को प्रभु ईसा गधे पर चढ़कर येरुशलम पहुंचे। वहीं उनको दंडित करने का षडयंत्र रचा गया। अंतत: उन्हें विरोधियों ने पकड़कर क्रूस पर लटका दिया। उस वक्त उनकी उम्र लगभग 33 वर्ष थी।
ईसा मसीह का जिक्र भविष्य पुराण में मिलता है। भविष्य पुराण कब लिखा गया इस पर विवाद हो सकता है, पर यह तो तय है कि इसे ईसा मसीह के बाद लिखा गया था। यह संभवत: मध्यकाल में लिखा गया होगा।
हिमालय क्षेत्र में ईसा मसीह की मुलाकात उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के पौत्र से होने का छोटा-सा वर्णन मिलता है। इससे यह भी तय हो गया कि भविष्य पुराण विक्रमादित्य के पौत्र के बाद या उसके काल में लिखा गया होगा। हिन्दू लोग भले ही कहते रहे हैं कि इसे वेद व्यास ने लिखा था, लेकिन सच तो सच ही होता है।
लुइस जेकोलियत ने 1869 ई. में अपनी एक पुस्तक 'द बाइबिल इन इंडिया' में लिखा है कि जीसस क्राइस्ट और भगवान श्रीकृष्ण एक थे। लुइस जेकोलियत फ्रांस के एक साहित्यकार थे।
'द बाइबिल इन इंडिया में कृष्ण और क्राइस्ट पर एक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। 'जीसस' शब्द के विषय में लुइस ने कहा है कि क्राइस्ट को 'जीसस' नाम भी उनके अनुयायियों ने दिया है। इसका संस्कृत में अर्थ होता है 'मूल तत्व'।
'द बाइबिल इन इंडिया में यह भी कहा है कि क्राइस्ट शब्द कृष्ण का ही रूपांतरण है, हालांकि उन्होंने कृष्ण की जगह क्रिसना शब्द का इस्तेमाल किया। भारत में गांवों में कृष्ण को क्रिसना ही कहा जाता है।
क्रिसना ही क्राइस्ट और ख्रिस्तान हो गया। बाद में यही क्रिश्चियन हो गया। लुइस के अनुसार ईसा मसीह अपने भारत भ्रमण के दौरान जगन्नाथ के मंदिर में रुके थे।
एक रूसी लेखक निकोलस नोकोविच ने भारत में कुछ वर्ष रहकर प्राचीन हेमिस बौद्घ आश्रम में रखी पुस्तक 'द लाइफ ऑफ संत ईसा' पर आधारित फ्रेंच भाषा में 'द अननोन लाइफ ऑफ जीसस क्राइस्ट' नामक पुस्तक लिखी है।
प्राचीन हेमिस बौद्घ आश्रम लद्दाख के लेह मार्ग पर स्थित है। किताब के अनुसार ईसा मसीह सिल्क रूट से भारत आए थे और यह आश्रम इसी तरह के सिल्क रूट पर था। उन्होंने 13 से 29 वर्ष की उम्र तक यहां रहकर बौद्घ धर्म की शिक्षा ली और निर्वाण के महत्व को समझा।
30 साल की उम्र में येरुशलम लौटकर उन्होंने यूहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली। दीक्षा के बाद वे लोगों को शिक्षा देने लगे। ज्यादातर विद्वानों के अनुसार सन् 29 ई. को प्रभु ईसा गधे पर चढ़कर येरुशलम पहुंचे।
षडयंत्र रचा गया। अंतत: उन्हें विरोधियों ने पकड़कर क्रूस पर लटका दिया। उस वक्त उनकी उम्र थी लगभग 33 वर्ष।
18 वर्ष भारत के कश्मीर और लद्दाख के हिन्दू और बौद्ध आश्रमों में रहकर बौद्घ एवं हिन्दू धर्म ग्रंथों एवं अध्यात्मिक विषयों का गहन अध्ययन किया। निकोलस लिखते हैं कि वे लद्दाख के बौद्ध हेमिस मठ में रुके थे।
अपनी भारत यात्रा के दौरान जीसस ने उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर की भी यात्रा की थी एवं यहां रहकर इन्होंने अध्ययन किया था।
क्रूस पर लटका ने के 3 दिन बाद ये अपने परिवार और मां मैरी के साथ तिब्बत के रास्ते भारत आ गए। भारत में श्रीनगर के पुराने इलाके को इन्होंने अपना ठिकाना बनाया।
80साल की उम्र में जीसस क्राइस्ट की मृत्यु हुई। उन्हें वहीं दफना दिया गया और उनकी कब्र आज भी वहीं पर है। लोग इस पर विश्वास करें या न करें लेकिन यह सत्य है।
लोकोविच ने तिब्बत के मठों में ईसा से जुड़ी ताड़ पत्रों पर अंकित दुर्लभ पांडुलिपियों का अनुवाद किया जिसमें लिखा था, 'सुदूर देश इसराइल में ईसा मसीह नाम के दिव्य बच्चे का जन्म हुआ।
13-14 वर्ष की आयु में वो व्यापारियों के साथ हिन्दुस्तान आ गया तथा सिंध प्रांत में रुककर बुद्ध की शिक्षाओं का अध्ययन किया। फिर वो पंजाब की यात्रा पर निकल गया और वहां के जैन संतों के साथ समय व्यतीत किया।
इसके बाद जगन्नाथपुरी पहुंचा, जहां के पुरोहितों ने उसका भव्य स्वागत किया। वह वहां 6 वर्ष रहा। वहां रहकर उसने वेद और मनु स्मृति का अपनी भाषा में अनुवाद किया।
वहां से निकलकर वो राजगीर, बनारस समेत कई और तीर्थों का भ्रमण करते हुए नेपाल के हिमालय की तराई में चला गया और वहां जाकर बौद्ध ग्रंथों तथा तंत्रशास्त्र का अध्ययन किया फिर पर्शिया आदि कई मुल्कों की यात्रा करते हुए वह अपने वतन लौट गया।
एक जर्मन विद्वान होल्गर कर्स्टन ने 1981 में अपने गहन अनुसन्धान के आधार पर एक पुस्तक लिखी 'जीसस लिव्ड इन इण्डिया: हिज लाइफ बिफोर एंड ऑफ्टर क्रूसिफिक्शन' में ये सिद्ध करने का प्रयास किया कि जीसस ने भारत में रहकर ही बुद्ध धर्म में दीक्षा ग्रहण की और वे एक बौद्ध थे।
उन्होंने बौद्धमठ में रहकर तप-योग ध्यान साधना आदि किया। इस योग साधना के कारण ही क्रॉस पर उनका जीवन बच गया था जिसके बाद वो पुनः अपने अनुयायियों की सहायता से भारत आ गए थे।
लदाख में हेमिस गुम्फा नामक बौद्ध मठ में रहे। बाद में श्रीनगर में उनका वृद्धावस्था में देहांत हुआ। वहां आज भी उनकी मजार है।
यीशु पर लिखी किताब के लेखक स्वामी परमहंस योगानंद ने दावा किया है कि यीशु के जन्म के बाद उन्हें देखने बेथलेहेम पहुंचे तीन विद्वान भारतीय ही थे, जो बौद्ध थे। भारत से पहुंचे इन्हीं तीन विद्वानों ने यीशु का नाम 'ईसा' रखा था।
जिसका संस्कृत में अर्थ 'भगवान' होता है। एक दूसरी मान्यता अनुसार बौद्ध मठ में उन्हें 'ईशा' नाम मिला जिसका अर्थ है, मालिक या स्वामी। 'ईश' या 'ईशान' शब्द का इस्तेमाल भगवान शंकर के लिए भी किया जाता है।
स्वामी परमहंस योगानंद की किताब 'द सेकेंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट: द रिसरेक्शन ऑफ क्राइस्ट विदिन यू' में यह दावा किया गया है कि प्रभु यीशु ने भारत में कई वर्ष बिताए और यहां योग तथा ध्यान साधना की।
इस पुस्तक में यह भी दावा किया गया है कि 13 से 30 वर्ष की अपनी उम्र के बीच ईसा मसीह ने भारतीय ज्ञान दर्शन और योग का गहन अध्ययन व अभ्यास किया था।