Thursday, December 18, 2014

लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौर the unsung hero of indo pak bangladesh war in 1971

Photo: जय हिन्द,जय राजपूताना -------------
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लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौर the unsung hero of indo pak bangladesh war in 1971
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मित्रों आज ही दिन 16 दिसम्बर 1971 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर जबर्दस्त विजय हासिल की थी.ढाका में पाकिस्तान सेना के 93000 सैनिको ने भारतीय सेना के समक्ष हथियार डाल कर आत्मसमर्पण कर दिया था,जिससे एक नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ था,इस विजय के नायक थे लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौर,जिन्होंने इस युद्ध में भारतीय सेना के अभियान का नेत्रत्व किया था,सगत सिंह राठौर भारतीय सेना के सबसे कामयाब सेनानायक रहे हैं,उन्हें जो भी लक्ष्य दिया गया इन्होने उससे बढकर परिणाम दिए.वे हमेशा आगे बढकर नेत्रत्व करते थे और अपने सैनिको का हौसला बढ़ाते थे.
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जीवन परिचय--------------
सगत सिंह जी का जन्म 14 जुलाई 1919 को बीकानेर में ठाकुर बृजपाल सिंह राठौर के यहाँ हुआ था,सगत सिंह बचपन से देशप्रेमी थे और सेना में जाना उनका सपना था,स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हुए ही उन्होंने इंडियन मिलेट्री एकेडमी ज्वाइन कर ली और उसके बाद बीकानेर स्टेट फ़ोर्स ज्वाइन कर ली,दुसरे विश्व युद्ध में इन्होने मेसोपोटामिया,सीरिया,फिलिस्तीन के युद्धों में अपना जौहर दिखाया,
सन 1947 में देश आजाद होने के बाद उन्होंने भारतीय सेना ज्वाइन करने का निर्णय लिया और सन 1949 में उन्हें भारतीय सेना में कमीशंड ऑफिसर के रूप में 3 गोरखा राइफल्स में नियुक्ति मिल गई,
1955 में सगत सिंह को लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में 2/3 गोरखा राइफल्स की कमान दी गई,गोरखा राइफल्स में इससे पहले सिर्फ ब्रिटिश ऑफिसर्स ही तैनात होते थे और ब्रिटिश यह मानते थे कि गोरखा सैनिकं भारतीय सेनानायक का नेत्रत्व स्वीकार नहीं करेंगे,किन्तु यह आशंका निर्मूल सिद्ध हुई और गोरखा सैनिको का सगत सिंह राठौर ने बखूबी नेत्रत्व किया,
इसके बाद इन्हें 3/3 गोरखा राइफल्स का भी नेत्रत्व दिया गया,
वर्ष 1961 में इन्हें ब्रिगेडियर के रूप में प्रमोशन देते हुए पैराशूट ब्रिगेड की कमांड दी गई,
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गोवा मुक्ति अभियान में सगत सिंह राठौर की भूमिका------

उपनिवेशिक काल से गोवा पर पुर्तगालियों का शासन रहा था,आजादी के बाद भारतीय सरकार ने पुर्तगाल से गोवा मुक्त करने को कहा पर पुर्तगाल सरकार ने साफ़ मना कर दिया,और वहां आन्दोलन कर रहे भारतीय गोवा मुक्ति क्रांतिकारियों का उत्पीडन शुरू कर दिया,तंग आकर भारत सरकार ने गोवा में पुर्तगालियों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही का निर्णय लिया,
50 पैराशूट ब्रिगेड ने सगत सिंह के नेत्रत्व में इसमें बड़ी भूमिका निभाई,सगत सिंह ने इस अभियान का की रणनीति बनाकर इस पर अमल करने के लिए वरिष्ठ सैन्य अधिकारीयों को तैयार कर लिया,
भारतीय सेना ने चारो ओर से, जल थल एवं वायु सेना की उस समय की आधुनिकतम तैयारियों के दिसम्बर 17-18 साथ की रात में ऑपरेशन विजय के अंतर्गत सैनिक कार्यवाही शुरू कर दी ऑपरेशन विजय 40 घंटे का था .. भारतीय सेना के इस 40 घंटे के युद्ध ने गोवा पर 450 साल से चले आ रहे पुर्तगाली शासन का अंत किया और गोवा भारतीय गणतंत्र का एक अंग बना,
यधपि इस युद्ध का परिनाम सबको अपेक्षित था,मगर भारतीय सेना की तेजी ने सभी को चौका दिया और इस सफल रणनीति का श्रेय सगत सिंह राठौर को जाता है,
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चीन के विरुद्ध संघर्ष--------

वर्ष 1965 में सगत सिंह को मेजर जनरल के रूप में नियुक्ति देकर 17 माउंटेन डिविजन की कमांड देकर चीन की चुनौती का सामना करने के लिए सिक्किम में तैनात किया गया,वहां चीन ने नाथू ला में लाउड स्पीकर लगाकर भारतीय सेना को चेतावनी दी मगर सगत सिंह ने अविचलित होकर अपना काम जारी रखा,उन्होंने चीनी सैनिको को उन्ही की भाषा में जवाब दिया और सीमा निर्धारण कर तार बाड का काम जारी रखा जिसे रोकने की चीन ने पूरी कोशिस की.यहाँ चीन और भारतीय सैनिको में संघर्ष हुआ जिसमे भारत के 265 और चीन के 300 से ज्यादा सैनिक हताहत हुए,चीन ने हमले का आरोप भारत पर लगाया,
सगत सिंह द्वारा नाथू ला को ख़ाली न करने का निर्णय आज भी देश के काम आ रहा है और नाथू ला आज भी भारत के कब्जे में है,अन्यथा चीन इस पर कब्ज़ा कर लेता,
वर्ष 1967 में सगत सिंह को जनरल सैम मानेकशा ने मिजोरम में अलगाववादियों से निपटने की जिम्मेदारी दी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया,
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बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में सगत सिंह राठौर की भूमिका----

वर्ष 1970 में सगत सिंह राठौर को लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर प्रोन्नति दी गई और 4 corps के कमांडर के रूप में तेजपुर में नियुक्ति दी गई,यह नियुक्ति भी सैम मानेकशा के कारण दी गई क्योंकि सैम सगत सिंह की काबिलियत को बखूबी पहचानते थे,लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह के नेत्रत्व में 4 corps ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में जबर्दस्त भूमिका निभाई,

उस समय ईस्ट पाकिस्तान(बांग्लादेश) में आजादी का आन्दोलन चल रहा था और पाकिस्तान सेना वहां जबर्दस्त नरसंहार कर रही थी जिससे लाखो बंगलादेशी शरणार्थी भारत आ रहे थे जिनसे भारत पर बड़ा संकट आ रहा था,बार बार संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगाने और पाकिस्तान को समझाने के बाद भी जब पाकिस्तान बाज नहीं आया तो भारत ने पूरी तैय्यारी के साथ ईस्ट पाकिस्तान में सैन्य कार्यवाही कर बांग्लादेश को आजाद कराने का निर्णय लिया.

इस युद्ध में एक से बढकर एक वीरता के कार्य भारतीय सेना ने किये,इस युद्ध में जिस कमांडर ने नेत्रत्व की मिसाल कायम करते हुए आगे बढ़कर सेना का नेत्रत्व किया उनमे सर्वोत्तम रहे सगत सिंह राठौर.
बांग्लादेश मुक्ति अभियान में लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेत्रत्व में सगत सिंह राठौर,टी एन रैना,m l थापा,जे एस गिल ने बेहतरीन रणनीति से पाकिस्तान सेना के छक्के छुड़ा दिए,
कई गहरी नदियों को पार करते हुए भारतीय सेना एक के बाद एक शहर जीतती चली गयी,पर निर्णायक रहा भारतीय सेना का विशाल मेघना नदी पार करने का सगत सिंह का निर्णय,
जिसमे युद्ध इतिहास में पहली बार किसी मैदानी सेना ने वायु ब्रिगेड की मदद से कोई विशाल नदी पार करने का कारनामा हुआ,यह बहुत ही दुस्साहसी निर्णय था,अगर यह प्लान असफल हो जाता तो इसकी गाज सगत सिंह पर ही गिरती,
और कहा भी जाता है कि कमजोर दिल वाले कमांडर युद्ध नही जीत सकते ,इसके लिए रिस्क लेना पड़ता है,

"every military operation is a gamble,and stakes are invariably high.sagat was one of them who played for a jackpot,and won"

जब दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी,रक्षा मंत्री बाबु जगजीवन राम,रक्षा सचिव बी बी लाल ने यह सुना कि सगत सिंह राठौर ने मेघना नदी पार कर ली है तो किसी को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ,और जब विश्वास हुआ तो सब ख़ुशी से झूम उठे.

इसके बाद ही पाकिस्तानी सेना के हौसले टूट गए और यहाँ तक टूट गए कि जब भारतीय सेना ने ढाका को घेर लिया तो वहां 93000 पाकिस्तान सेना थी और भारतीय सनिको की संख्या मात्र तीन हजार थी ,
मगर आज ही के दिन 16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने 93000 सैनिको के साथ भारतीय लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया,और बांग्लादेश आजाद हो गया,
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बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और सबसे कामयाब कमांडर सगत सिंह राठौर को बांग्लादेश सरकार ने भी मान्यता दी और उन्हें सम्मान दिया गया,
भारत सरकार ने उन्हें पदमभूषण पुरूस्कार दिया जो सिविलियन को दिया जाता है,
यहाँ बहुत आश्चर्यजनक बात ये हुई कि किसी अनजानी वजह से उन्हें गैलेंट्री अवार्ड नही दिया गया जो सैन्य अभियानों को दिया जाता है,इसी को भांपते हुए राजनितिक नेत्रत्व ने उन्हें सिविलियन अवार्ड दिया,
कितना दुर्भाग्य की बात है कि उनसे कम सफल सैन्य अधिकारी पुरुस्कृत हुए और इस युद्ध की सफलता के हीरो बन गए.
तभी एक सैन्य अधिकारी जो खुद इस अभियान में शामिल थे उन्होंने लिखा है कि

"it was ironical that the most successful corp commander in the 1971 war had to be content with a civilian award,while several others,whose performance was much below par were decorated for gallantry,and became war heroes"

अगर सगत सिंह कुछ सदी पहले यूरोप या अमेरिका में पैदा हुए होते और इसी प्रकार बड़े युद्ध उन्हें लड़ने पड़ते तो उनकी गिनती विश्व में आज तक के सर्वोत्तम सेनानायको में होती,पर दुर्भाग्य से भारत में उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जो उनके जैसी प्रतिभा,महान सेनानायक,और देश के प्रति उनके योगदान को देखकर दिया जाना चाहिए था,
सगत सिंह आगे बढकर अपने सैनिको का नेत्रत्व करते थे और उनके सैनिक उनके लिए जान देने को तैयार रहते थे,

26 सितम्बर 2001 को इस महान नायक का देहांत हो गया,उनकी सेवाएँ और योगदान अतुलनीय है,
राजपूत सदैव देश के लिए निस्वार्थ भाव से जान देता आया है और देता रहेगा,मगर एक सवाल आप अब से-------------
सगत सिंह राठौर के साथ हुए इस अन्याय का दोषी कौन है?
क्या उस समय के राजनितिक नेत्रत्व ने उनके साथ जो अन्याय किया,उसका कारण सगत सिंह राठौर का जन्म से राजपूत होना ही था?????????????????
जवाब आपको देना है,
जय हिन्द,जय राजपूताना......
16 दिसम्बर 1971 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर जबर्दस्त विजय हासिल की थी.ढाका में पाकिस्तान सेना के 93000 सैनिको ने भारतीय सेना के समक्ष हथियार डाल कर आत्मसमर्पण कर दिया था,जिससे एक नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ था,इस विजय के नायक थे लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौर,जिन्होंने इस युद्ध में भारतीय सेना के अभियान का नेत्रत्व किया था,सगत सिंह राठौर भारतीय सेना के सबसे कामयाब सेनानायक रहे हैं,उन्हें जो भी लक्ष्य दिया गया इन्होने उससे बढकर परिणाम दिए.वे हमेशा आगे बढकर नेत्रत्व करते थे और अपने सैनिको का हौसला बढ़ाते .======================================
जीवन परिचय--------------
सगत सिंह जी का जन्म 14 जुलाई 1919 को बीकानेर में ठाकुर बृजपाल सिंह राठौर के यहाँ हुआ था,सगत सिंह बचपन से देशप्रेमी थे और सेना में जाना उनका सपना था,स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हुए ही उन्होंने इंडियन मिलेट्री एकेडमी ज्वाइन कर ली और उसके बाद बीकानेर स्टेट फ़ोर्स ज्वाइन कर ली,दुसरे विश्व युद्ध में इन्होने मेसोपोटामिया,सीरिया,फिलिस्तीन के युद्धों में अपना जौहर दिखाया,
सन 1947 में देश आजाद होने के बाद उन्होंने भारतीय सेना ज्वाइन करने का निर्णय लिया और सन 1949 में उन्हें भारतीय सेना में कमीशंड ऑफिसर के रूप में 3 गोरखा राइफल्स में नियुक्ति मिल गई,
1955 में सगत सिंह को लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में 2/3 गोरखा राइफल्स की कमान दी गई,गोरखा राइफल्स में इससे पहले सिर्फ ब्रिटिश ऑफिसर्स ही तैनात होते थे और ब्रिटिश यह मानते थे कि गोरखा सैनिकं भारतीय सेनानायक का नेत्रत्व स्वीकार नहीं करेंगे,किन्तु यह आशंका निर्मूल सिद्ध हुई और गोरखा सैनिको का सगत सिंह राठौर ने बखूबी नेत्रत्व किया,
इसके बाद इन्हें 3/3 गोरखा राइफल्स का भी नेत्रत्व दिया गया,
वर्ष 1961 में इन्हें ब्रिगेडियर के रूप में प्रमोशन देते हुए पैराशूट ब्रिगेड की कमांड दी गई,
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गोवा मुक्ति अभियान में सगत सिंह राठौर की भूमिका------

उपनिवेशिक काल से गोवा पर पुर्तगालियों का शासन रहा था,आजादी के बाद भारतीय सरकार ने पुर्तगाल से गोवा मुक्त करने को कहा पर पुर्तगाल सरकार ने साफ़ मना कर दिया,और वहां आन्दोलन कर रहे भारतीय गोवा मुक्ति क्रांतिकारियों का उत्पीडन शुरू कर दिया,तंग आकर भारत सरकार ने गोवा में पुर्तगालियों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही का निर्णय लिया,
50 पैराशूट ब्रिगेड ने सगत सिंह के नेत्रत्व में इसमें बड़ी भूमिका निभाई,सगत सिंह ने इस अभियान का की रणनीति बनाकर इस पर अमल करने के लिए वरिष्ठ सैन्य अधिकारीयों को तैयार कर लिया,
भारतीय सेना ने चारो ओर से, जल थल एवं वायु सेना की उस समय की आधुनिकतम तैयारियों के दिसम्बर 17-18 साथ की रात में ऑपरेशन विजय के अंतर्गत सैनिक कार्यवाही शुरू कर दी ऑपरेशन विजय 40 घंटे का था .. भारतीय सेना के इस 40 घंटे के युद्ध ने गोवा पर 450 साल से चले आ रहे पुर्तगाली शासन का अंत किया और गोवा भारतीय गणतंत्र का एक अंग बना,
यधपि इस युद्ध का परिनाम सबको अपेक्षित था,मगर भारतीय सेना की तेजी ने सभी को चौका दिया और इस सफल रणनीति का श्रेय सगत सिंह राठौर को जाता है,
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चीन के विरुद्ध संघर्ष--------

वर्ष 1965 में सगत सिंह को मेजर जनरल के रूप में नियुक्ति देकर 17 माउंटेन डिविजन की कमांड देकर चीन की चुनौती का सामना करने के लिए सिक्किम में तैनात किया गया,वहां चीन ने नाथू ला में लाउड स्पीकर लगाकर भारतीय सेना को चेतावनी दी मगर सगत सिंह ने अविचलित होकर अपना काम जारी रखा,उन्होंने चीनी सैनिको को उन्ही की भाषा में जवाब दिया और सीमा निर्धारण कर तार बाड का काम जारी रखा जिसे रोकने की चीन ने पूरी कोशिस की.यहाँ चीन और भारतीय सैनिको में संघर्ष हुआ जिसमे भारत के 265 और चीन के 300 से ज्यादा सैनिक हताहत हुए,चीन ने हमले का आरोप भारत पर लगाया,
सगत सिंह द्वारा नाथू ला को ख़ाली न करने का निर्णय आज भी देश के काम आ रहा है और नाथू ला आज भी भारत के कब्जे में है,अन्यथा चीन इस पर कब्ज़ा कर लेता,
वर्ष 1967 में सगत सिंह को जनरल सैम मानेकशा ने मिजोरम में अलगाववादियों से निपटने की जिम्मेदारी दी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया,
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बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में सगत सिंह राठौर की भूमिका----

वर्ष 1970 में सगत सिंह राठौर को लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर प्रोन्नति दी गई और 4 corps के कमांडर के रूप में तेजपुर में नियुक्ति दी गई,यह नियुक्ति भी सैम मानेकशा के कारण दी गई क्योंकि सैम सगत सिंह की काबिलियत को बखूबी पहचानते थे,लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह के नेत्रत्व में 4 corps ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में जबर्दस्त भूमिका निभाई,

उस समय ईस्ट पाकिस्तान(बांग्लादेश) में आजादी का आन्दोलन चल रहा था और पाकिस्तान सेना वहां जबर्दस्त नरसंहार कर रही थी जिससे लाखो बंगलादेशी शरणार्थी भारत आ रहे थे जिनसे भारत पर बड़ा संकट आ रहा था,बार बार संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगाने और पाकिस्तान को समझाने के बाद भी जब पाकिस्तान बाज नहीं आया तो भारत ने पूरी तैय्यारी के साथ ईस्ट पाकिस्तान में सैन्य कार्यवाही कर बांग्लादेश को आजाद कराने का निर्णय लिया.

इस युद्ध में एक से बढकर एक वीरता के कार्य भारतीय सेना ने किये,इस युद्ध में जिस कमांडर ने नेत्रत्व की मिसाल कायम करते हुए आगे बढ़कर सेना का नेत्रत्व किया उनमे सर्वोत्तम रहे सगत सिंह राठौर.
बांग्लादेश मुक्ति अभियान में लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेत्रत्व में सगत सिंह राठौर,टी एन रैना,m l थापा,जे एस गिल ने बेहतरीन रणनीति से पाकिस्तान सेना के छक्के छुड़ा दिए,
कई गहरी नदियों को पार करते हुए भारतीय सेना एक के बाद एक शहर जीतती चली गयी,पर निर्णायक रहा भारतीय सेना का विशाल मेघना नदी पार करने का सगत सिंह का निर्णय,
जिसमे युद्ध इतिहास में पहली बार किसी मैदानी सेना ने वायु ब्रिगेड की मदद से कोई विशाल नदी पार करने का कारनामा हुआ,यह बहुत ही दुस्साहसी निर्णय था,अगर यह प्लान असफल हो जाता तो इसकी गाज सगत सिंह पर ही गिरती,
और कहा भी जाता है कि कमजोर दिल वाले कमांडर युद्ध नही जीत सकते ,इसके लिए रिस्क लेना पड़ता है,

"every military operation is a gamble,and stakes are invariably high.sagat was one of them who played for a jackpot,and won"

जब दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी,रक्षा मंत्री बाबु जगजीवन राम,रक्षा सचिव बी बी लाल ने यह सुना कि सगत सिंह राठौर ने मेघना नदी पार कर ली है तो किसी को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ,और जब विश्वास हुआ तो सब ख़ुशी से झूम उठे.

इसके बाद ही पाकिस्तानी सेना के हौसले टूट गए और यहाँ तक टूट गए कि जब भारतीय सेना ने ढाका को घेर लिया तो वहां 93000 पाकिस्तान सेना थी और भारतीय सनिको की संख्या मात्र तीन हजार थी ,
मगर आज ही के दिन 16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने 93000 सैनिको के साथ भारतीय लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया,और बांग्लादेश आजाद हो गया,
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बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और सबसे कामयाब कमांडर सगत सिंह राठौर को बांग्लादेश सरकार ने भी मान्यता दी और उन्हें सम्मान दिया गया,
भारत सरकार ने उन्हें पदमभूषण पुरूस्कार दिया जो सिविलियन को दिया जाता है,
यहाँ बहुत आश्चर्यजनक बात ये हुई कि किसी अनजानी वजह से उन्हें गैलेंट्री अवार्ड नही दिया गया जो सैन्य अभियानों को दिया जाता है,इसी को भांपते हुए राजनितिक नेत्रत्व ने उन्हें सिविलियन अवार्ड दिया,
कितना दुर्भाग्य की बात है कि उनसे कम सफल सैन्य अधिकारी पुरुस्कृत हुए और इस युद्ध की सफलता के हीरो बन गए.
तभी एक सैन्य अधिकारी जो खुद इस अभियान में शामिल थे उन्होंने लिखा है कि

"it was ironical that the most successful corp commander in the 1971 war had to be content with a civilian award,while several others,whose performance was much below par were decorated for gallantry,and became war heroes"


अगर सगत सिंह कुछ सदी पहले यूरोप या अमेरिका में पैदा हुए होते और इसी प्रकार बड़े युद्ध उन्हें लड़ने पड़ते तो उनकी गिनती विश्व में आज तक के सर्वोत्तम सेनानायको में होती,पर दुर्भाग्य से भारत में उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जो उनके जैसी प्रतिभा,महान सेनानायक,और देश के प्रति उनके योगदान को देखकर दिया जाना चाहिए था,
सगत सिंह आगे बढकर अपने सैनिको का नेत्रत्व करते थे और उनके सैनिक उनके लिए जान देने को तैयार रहते थे,

26 सितम्बर 2001 को इस महान नायक का देहांत हो गया,उनकी सेवाएँ और योगदान अतुलनीय है,
राजपूत सदैव देश के लिए निस्वार्थ भाव से जान देता आया है और देता रहेगा,मगर एक सवाल आप अब से-------------
सगत सिंह राठौर के साथ हुए इस अन्याय का दोषी कौन है?
क्या उस समय के राजनितिक नेत्रत्व ने उनके साथ जो अन्याय किया,उसका कारण सगत सिंह राठौर का जन्म से राजपूत होना ही था?????????????????
जवाब आपको देना है,
जय हिन्द,जय राजपूताना......