Thursday, December 4, 2014

RAJPUT BRAVERY

चुण्डावत और शक्तावत प्रतिद्वंदिता और उन्टाला दुर्ग विजय
शर्त जीतने हेतु उस वीर ने अपना सर काटकर दुर्ग में फेक दिया
Photo: चुण्डावत और शक्तावत प्रतिद्वंदिता और उन्टाला दुर्ग विजय
शर्त जीतने हेतु उस वीर ने अपना सर काटकर दुर्ग में फेक दिया

पूरा राजपूत इतिहास ऐसे अनगिनत वीरता के प्रसंगों से भरा पड़ा है जिनके सुनने से किसी भी व्यक्ति के रोंगटे खड़े हो सकते है। ये सभी प्रसंग राजपूतो के लिए ना केवल गौरव की बात है बल्कि उनको आज भी प्रेरणा देने के लिए सबसे उपयुक्त है। जब वीरता और बलिदान की बात की जाती है तो उसमे वीरभूमि मेवाड़ का नाम सबसे ऊपर आता है जिसके कण कण में वीरता और बलिदान के किस्से बिखरे पड़े है। इनमे ही सबसे मशहूर प्रसंग उन्ताला के दुर्ग को जीतने के लिए चुण्डावत और शक्तावत के बीच के मुकाबले का है जो राजपूतो के अपने कुल के गौरव के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की प्रवृत्ति का सबसे बड़ा उदाहरण है।

मेवाड़ की सेना में, राव चुणडावत के द्वारा मेवाड़ की गददी के त्याग करने के कारण और विशेष पराक्रमी होने के कारण "चुण्डावत" खांप के
वीरों को ही "हरावल"(युद्ध भूमि में अग्रिम पंक्ति) में रहने का गौरव प्राप्त था व वे उसे अपना अधिकार समझते थे | किन्तु महाराणा अमर सिंह के समय शक्ति सिंह के वंशज "शक्तावत" खांप के वीर राजपूत भी बहुत ताकतवर बनकर उभरे और वो भी कम पराक्रमी नहीं थे | उनके हृदय में भी यह अरमान जागृत हुआ कि युद्ध क्षेत्र में मृत्यु से पहला मुकाबला हमारा होना चाहिए क्योंकि हरावल में लड़ने का मौका मिलना राजपूतो में बहुत गौरव की बात मानी जाती थी।
अपनी इस महत्वाकांक्षा को महाराणा अमरसिंह के समक्ष रखते हुए शक्तावत वीरों ने कहा कि हम चुंडावतों से त्याग,बलिदान व शौर्य में किसी भी प्रकार कम नहीं है | अत: हरावल में रहने का अधिकार हमें मिलना चाहिए | मृत्यु से पाणिग्रहण होने वाली इस अदभूत प्रतिस्पर्धा को देखकर महाराणा धर्म-संकट में पड़ गए | किस पक्ष को अधिक पराक्रमी मानकर हरावल में रहने का अधिकार दिया जाय ? इसका निर्णय करने के लिए उन्होंने एक कसौटी तय की,जिसके अनुसार यह निश्चित किया गया कि दोनों दल उन्टाला दुर्ग (जो कि बादशाह जहाँगीर के अधीन था और फतेहपुर का नबाब समस खां वहां का किलेदार था) पर प्रथक-प्रथक दिशा से एक साथ आक्रमण करेंगे व जिस दल का व्यक्ति पहले दुर्ग में प्रवेश करेगा उसे ही हरावल में रहने का अधिकार दिया जायेगा| बस ! फिर क्या था ? प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए मौत को ललकारते हुए दोनों ही दलों के रण-बांकुरों ने उन्टाला दुर्ग पर आक्रमण कर दिया | शक्तावत वीर दुर्ग के फाटक के पास पहुँच कर उसे तोड़ने का प्रयास करने लगे तो चुंडावत वीरों ने समीप ही दुर्ग की दीवार पर सीढ़ी लगाकर उस पर चढ़ने का प्रयास शुरू किया | इधर शक्तावतों ने जब दुर्ग के फाटक को तोड़ने के लिए फाटक पर हाथी को टक्कर देने के लिए आगे बढाया तो फाटक में लगे हुए तीक्षण शूलों से सहम कर हाथी पीछे हट गया | यह देख शक्तावतों का सरदार बल्लू शक्तावत ,अदभूत बलिदान का उदहारण प्रस्तुत करते हुए फाटक के शूलों पर सीना अड़ाकर खड़ा हो गया व महावत को हाथी से अपने शरीर पर टक्कर दिलाने को कहा जिससे कि हाथी शूलों के भय से पीछे न हटे | एक बार तो महावत सहम गया ,किन्तु फिर "वीर बल्लू" के मृत्यु से भी भयानक क्रोधपूर्ण आदेश की पालना करते हुए उसने हाथी से टक्कर मारी जिसके परिणामस्वरूप फाटक में लगे हुए शूल वीर बल्लू शक्तावत के सीने में बिंध गए और वह वीर-गति को प्राप्त हो गया | किन्तु उसके साथ ही दुर्ग का फाटक भी टूट गया | दूसरी और चूंडावतों के सरदार जैतसिंह चुण्डावत ने जब यह देखा कि फाटक टूटने ही वाला है तो उसने पहले दुर्ग में पहुँचने की शर्त जितने के उद्देश्य से अपने साथी को कहा कि "मेरा सिर काटकर दुर्ग की दीवार के ऊपर से दुर्ग के अन्दर फ़ेक दो | " साथी जब ऐसा करने में सहम गया तो उसने स्वयं अपना मस्तक काटकर दुर्ग में फेक दिया |
फाटक तोड़कर जैसे ही शक्तावत वीरों के दल ने दुर्ग में प्रवेश किया ,उससे पहले ही चुण्डावत सरदार का कटा मस्तक दुर्ग के अन्दर मौजूद था| इस प्रकार चूंडावतों ने अपना हरावल में रहने का अधिकार अदभूत बलिदान देकर कायम रखा |

बिंधियो जा निज आण बस,
गज माथै बण मोड़ |
सुरग दुरग परवेस सथ,
निज तन फाटक तोड़ ||
अपनी आन की खातिर उस
वीर ने दुर्ग का फाटक तोड़ने के लिए फाटक पर लगे शूलों से अपना सीना अड़ाकर हाथी से टक्कर
दिलवा अपना शरीर शूलों से बिंधवा लेता है और वीर गति को प्राप्त होता है इस प्रकार वह वीर गति को प्राप्त होने के साथ ही अपने शरीर से फाटक तोड़ने में सफल हो दुर्ग व स्वर्ग में एक साथ प्रवेश करता है ।

दलबल धावो बोलियौ,
अब लग फाटक सेस |
सिर फेक्यो भड़ काट निज ,
पहलां दुर्ग प्रवेस ||
वीरों के दोनों दलों ने दुर्ग पर आक्रमण
किया जब एक दल के सरदार को पता चला कि दूसरा दल अब फाटक तोड़कर दुर्ग में प्रवेश करने
ही वाला है तो उसने अपना खुद का सिर काट कर दुर्ग में फेक दिया ताकि वह उस प्रतिस्पर्धी दल से पहले दुर्ग में प्रवेश कर जाये |

नजर न पूगी उण जगां,
पड्यो न गोलो आय |
पावां सूं पहली घणो,
सिर पडियो गढ़ जाय ||
जब वीरो के एक दल ने दुर्ग का फाटक तोड़कर दुर्ग में प्रवेश किया परन्तु जब उनकी दृष्टि किले में
पड़ी तो देखा कि किले में उनके पैर व
दृष्टि पड़ने पहले ही चुण्डावत सरदार
का सिर वहां पड़ा है जबकि उस वीर के सिर से पहले प्रतिस्पर्धी दल का दागा तो कोई गोला भी नही पहुंचा।

साभार- स्व.आयुवानसिंह शेखावत हुडील एवं ज्ञान दर्पण ब्लॉग।


पूरा राजपूत इतिहास ऐसे अनगिनत वीरता के प्रसंगों से भरा पड़ा है जिनके सुनने से किसी भी व्यक्ति के रोंगटे खड़े हो सकते है। ये सभी प्रसंग राजपूतो के लिए ना केवल गौरव की बात है बल्कि उनको आज भी प्रेरणा देने के लिए सबसे उपयुक्त है। जब वीरता और बलिदान की बात की जाती है तो उसमे वीरभूमि मेवाड़ का नाम सबसे ऊपर आता है जिसके कण कण में वीरता और बलिदान के किस्से बिखरे पड़े है। इनमे ही सबसे मशहूर प्रसंग उन्ताला के दुर्ग को जीतने के लिए चुण्डावत और शक्तावत के बीच के मुकाबले का है जो राजपूतो के अपने कुल के गौरव के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की प्रवृत्ति का सबसे बड़ा उदाहरण है।


मेवाड़ की सेना में, राव चुणडावत के द्वारा मेवाड़ की गददी के त्याग करने के कारण और विशेष पराक्रमी होने के कारण "चुण्डावत" खांप के
वीरों को ही "हरावल"(युद्ध भूमि में अग्रिम पंक्ति) में रहने का गौरव प्राप्त था व वे उसे अपना अधिकार समझते थे | किन्तु महाराणा अमर सिंह के समय शक्ति सिंह के वंशज "शक्तावत" खांप के वीर राजपूत भी बहुत ताकतवर बनकर उभरे और वो भी कम पराक्रमी नहीं थे | उनके हृदय में भी यह अरमान जागृत हुआ कि युद्ध क्षेत्र में मृत्यु से पहला मुकाबला हमारा होना चाहिए क्योंकि हरावल में लड़ने का मौका मिलना राजपूतो में बहुत गौरव की बात मानी जाती थी।
अपनी इस महत्वाकांक्षा को महाराणा अमरसिंह के समक्ष रखते हुए शक्तावत वीरों ने कहा कि हम चुंडावतों से त्याग,बलिदान व शौर्य में किसी भी प्रकार कम नहीं है | अत: हरावल में रहने का अधिकार हमें मिलना चाहिए | मृत्यु से पाणिग्रहण होने वाली इस अदभूत प्रतिस्पर्धा को देखकर महाराणा धर्म-संकट में पड़ गए | किस पक्ष को अधिक पराक्रमी मानकर हरावल में रहने का अधिकार दिया जाय ? इसका निर्णय करने के लिए उन्होंने एक कसौटी तय की,जिसके अनुसार यह निश्चित किया गया कि दोनों दल उन्टाला दुर्ग (जो कि बादशाह जहाँगीर के अधीन था और फतेहपुर का नबाब समस खां वहां का किलेदार था) पर प्रथक-प्रथक दिशा से एक साथ आक्रमण करेंगे व जिस दल का व्यक्ति पहले दुर्ग में प्रवेश करेगा उसे ही हरावल में रहने का अधिकार दिया जायेगा| बस ! फिर क्या था ? प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए मौत को ललकारते हुए दोनों ही दलों के रण-बांकुरों ने उन्टाला दुर्ग पर आक्रमण कर दिया | शक्तावत वीर दुर्ग के फाटक के पास पहुँच कर उसे तोड़ने का प्रयास करने लगे तो चुंडावत वीरों ने समीप ही दुर्ग की दीवार पर सीढ़ी लगाकर उस पर चढ़ने का प्रयास शुरू किया | इधर शक्तावतों ने जब दुर्ग के फाटक को तोड़ने के लिए फाटक पर हाथी को टक्कर देने के लिए आगे बढाया तो फाटक में लगे हुए तीक्षण शूलों से सहम कर हाथी पीछे हट गया | यह देख शक्तावतों का सरदार बल्लू शक्तावत ,अदभूत बलिदान का उदहारण प्रस्तुत करते हुए फाटक के शूलों पर सीना अड़ाकर खड़ा हो गया व महावत को हाथी से अपने शरीर पर टक्कर दिलाने को कहा जिससे कि हाथी शूलों के भय से पीछे न हटे | एक बार तो महावत सहम गया ,किन्तु फिर "वीर बल्लू" के मृत्यु से भी भयानक क्रोधपूर्ण आदेश की पालना करते हुए उसने हाथी से टक्कर मारी जिसके परिणामस्वरूप फाटक में लगे हुए शूल वीर बल्लू शक्तावत के सीने में बिंध गए और वह वीर-गति को प्राप्त हो गया | किन्तु उसके साथ ही दुर्ग का फाटक भी टूट गया | दूसरी और चूंडावतों के सरदार जैतसिंह चुण्डावत ने जब यह देखा कि फाटक टूटने ही वाला है तो उसने पहले दुर्ग में पहुँचने की शर्त जितने के उद्देश्य से अपने साथी को कहा कि "मेरा सिर काटकर दुर्ग की दीवार के ऊपर से दुर्ग के अन्दर फ़ेक दो | " साथी जब ऐसा करने में सहम गया तो उसने स्वयं अपना मस्तक काटकर दुर्ग में फेक दिया |
फाटक तोड़कर जैसे ही शक्तावत वीरों के दल ने दुर्ग में प्रवेश किया ,उससे पहले ही चुण्डावत सरदार का कटा मस्तक दुर्ग के अन्दर मौजूद था| इस प्रकार चूंडावतों ने अपना हरावल में रहने का अधिकार अदभूत बलिदान देकर कायम रखा |

बिंधियो जा निज आण बस,
गज माथै बण मोड़ |
सुरग दुरग परवेस सथ,
निज तन फाटक तोड़ ||
अपनी आन की खातिर उस
वीर ने दुर्ग का फाटक तोड़ने के लिए फाटक पर लगे शूलों से अपना सीना अड़ाकर हाथी से टक्कर
दिलवा अपना शरीर शूलों से बिंधवा लेता है और वीर गति को प्राप्त होता है इस प्रकार वह वीर गति को प्राप्त होने के साथ ही अपने शरीर से फाटक तोड़ने में सफल हो दुर्ग व स्वर्ग में एक साथ प्रवेश करता है ।

दलबल धावो बोलियौ,
अब लग फाटक सेस |
सिर फेक्यो भड़ काट निज ,
पहलां दुर्ग प्रवेस ||
वीरों के दोनों दलों ने दुर्ग पर आक्रमण
किया जब एक दल के सरदार को पता चला कि दूसरा दल अब फाटक तोड़कर दुर्ग में प्रवेश करने
ही वाला है तो उसने अपना खुद का सिर काट कर दुर्ग में फेक दिया ताकि वह उस प्रतिस्पर्धी दल से पहले दुर्ग में प्रवेश कर जाये |

नजर न पूगी उण जगां,
पड्यो न गोलो आय |
पावां सूं पहली घणो,
सिर पडियो गढ़ जाय ||
जब वीरो के एक दल ने दुर्ग का फाटक तोड़कर दुर्ग में प्रवेश किया परन्तु जब उनकी दृष्टि किले में
पड़ी तो देखा कि किले में उनके पैर व
दृष्टि पड़ने पहले ही चुण्डावत सरदार
का सिर वहां पड़ा है जबकि उस वीर के सिर से पहले प्रतिस्पर्धी दल का दागा तो कोई गोला भी नही पहुंचा।

साभार- स्व.आयुवानसिंह शेखावत हुडील एवं ज्ञान दर्पण ब्लॉग।