Thursday, December 18, 2014

HOLOGRAM OF SRI YANTRA

Photo: !!!---: श्रुति-सूक्ति :---!!!
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"यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा।
न किः स दभ्यते जनः।।"
(सामवेदः--185)

ऋषिः--कण्वः।
देवताः--इन्द्रः।
छन्दः---गायत्री।

अन्वयः----(हे इन्द्र) यं प्रचेतसः वरुणः मित्रः अर्यमा रक्षन्ति स जनः न किः दभ्यते।।

शब्दार्थः---(हे इन्द्र) परमात्मन् अथवा राजन् ! (यम्) जिस मनुष्य की (प्रचेतसः) महाज्ञानी (वरुणः) वरणीय (मित्रः) सुहृद् (अर्यमा) न्यायकारी (रक्षन्ति) रक्षा करते हैं, (सः) वह (जनः) मनुष्य (न किः) नहीं (दभ्यते) मारा जाता है।।

व्याख्याः---इन मन्त्र में एक व्यक्ति की सफलता का रहस्य बताते हुए कहा है कि वह मनुष्य जिसके वरुण, मित्र और अर्यमा रक्षक हैं, कभी मारा नहीं जा सकता, अर्थात् आन्तरिक और बाह्य शत्रु उसे असफल नहीं कर सकते, दबा नहीं सकते। दूसरे शब्दों में भाव यह हुआ कि मनुष्य को अपना आचरण ऐसा बनाना चाहिए कि संसार के वरणीय श्रेष्ठ पुरुष उसके उदात्त चरित्र से प्रभावित होकर उसकी रक्षा करें। प्रेमी और मित्र भी सन्मार्ग में चलने की प्रेरणा करके रक्षा ही करने वाले हों। न्यायप्रिय न्यायाधीश भी मर्यादा-पालन करने वाले ऐसे व्यक्ति के रक्षक बनें।

मन्त्र में समाज के उत्तम कोटि के मनुष्यों के चार विशेषण दिए हैं---

(1.) प्रचेतसः---व्यापक ज्ञान के आधार पर विवेकपूर्वक आचरण करने वाले को प्रचेतस् कहते हैं। इस कोटि के उदात्त पुरुषों को किसी के विशेष गुण ही अपनी ओर आकृष्ट कर सकते हैं।

(2.) वरुणः--गुणों के आधार पर व्यक्तियों का वरण करने वाले। ऐसे व्यक्तियों  के सम्मुख गुणों की ही मुख्यता होती है। सांसारिक रिश्ते-नाते उनके समक्ष तुच्छ और नगण्य होते हैं।

(3.) मित्रः---जिसका स्नेह प्रत्येक प्रकार से त्राण करने वाला होता है। ऐसे महापुरुष सम्पर्क में आने वालों को बुराई से बचाते हैं, शुभ कर्मों में प्रेरित करते हैं। उनकी छिपाने योग्य बातों पर पर्दा डालते हैं। उनके सद्गुणों की समाज में प्रशंसा करते हैं। संकट आने पर उसके प्रतिकारों में प्राणपण से साहाय्य करते हैं और आवश्यकता होने पर तो सब-कुछ दे देते हैं। जिसको संसार में ऐसे कृपालु मित्र मिल जायें, उसका कोई काम अधूरा नहीं रहता।

(4.) अर्यमाः---मन्त्र में अन्तिम विशेषण है---अर्यमा। जो महात्मा निष्पक्ष होकर श्रमानुसार फल देते हैं, वे अर्यमा शब्द के वाचक हैं।

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