Thursday, December 4, 2014

HOW RAJPUT SAVED COWS AND BRAHMANS- GAU GHAT IN PUSKAR

Photo: जब ब्राह्मणो और गौ माता को बचाने के लिए राठोड़ी सेना ने किया पुष्कर में मुगलो से युद्ध अपने जीते जी एक भी गौ काटने न दी उनके याद में पुष्कर में आज गौ घाट बना है 

संवत 1737 विक्रमी के भाद्रपद मास की कृष्ण सप्तमी का दोपहर ढल चुका था और कुंवर राजसिंह सिर पर मोड बांधे दूल्हा के भेष मे घोडी पर सवार थे उनके पीछे चल रहे रथो मे एक रथ मे उनकी दुल्हन और दूसरे रथ मे महिलाए पावन संगीत गा रही थी मांगलिक ढोल बज रहे थे पूरा गांव विवाहत्सव मे झूम रहा था कि उसी समय हांफते हुए एक घुडसवार अजमेर की तरफ से आया और कुंवर राजसिंह से कुछ कहा और देखते ही देखते मांगलिक संगीत बंद हो गया शुभ शहनाई रंणभेरी मे बदल गई। 
ठाकुर प्रताप सिंह जी गढ मे बुर्ज पर चढकर वर्षा की संभावना पर विचार कर रहे थे पर पावन संगीत को रंणभेरी मे बदला सुनकर उनके मन मे सवालो का तूफान उमड पडा के ये रंग मे भंग कैसा? इतना सोचते ही उन्होंने जैसे ही दरवाजे की ओर देखा तो आनंदसिंह उनको सरपट आते नजर आए और घोडे से चढे चढे ही आनंदसिंह ने चिल्लाकर कहा कि अजमेर का फौजदार तहव्वर खान मेड़ता की पराजय का बदला लेने के लिए अपनी विशाल सेना लेकर पुष्कर मे आ चुका है और वो जन्माष्टमी के पावन अवसर पर एक सौ एक गायो की कुर्बानी कर वाराहजी के मंदिर को ध्वस्त कर ब्राह्मणों का कत्लेआम करेगा इतना सुनते ही ठाकुर प्रताप सिंह ने कहां कि ये तो बहुत गलत हुआ और गहरी सोच मे पडकर मग्न हो गए, कि जब ओरंगजेब का राजपूतो के अत यह युद्ध था, जमरूद के थाने पर औरंगजेब ने विष देकर जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह को धोखे से मरवा दिया था और मारवाड पर अपनी सेना भेजकर उस पर अपना अधिकार कर लिया था। बालक महाराज अजीत सिंह को वीरवर दुर्गादास आदि स्वामिभक्त सरदारो की संरक्षण मे सुरक्षित करके राठौड सरदारो ने मुगलो के थानो पर आक्रमण शुरू कर दिया था और जोधपुर, सोजत, डीडवाना,सिवाना आदि शाही खजाने लूट लिए थे। ये ही सुनकर कुवंर राजसिंह ने अपने मेडतिया साथीयो के साथ मेडता पर हमलाकर वहां के शाही हकीम सदुल्लाह खान को मारकर लूट लिया था और इसके बाद कुंवर राजसिंह का विवाह हो गया था उस समय मेडता अजमेर सूबे मे था और ये ही सुनकर तहव्वुर खान आग बबूला होकर जन्माष्टमी के पावन अवसर पर एक सौ एक गायो की कुर्बानी पुष्कर जी के घाटो पर करके वाराहजी का मंदिर ध्वस्त करते हुए राठौडो को कत्लेआम करता हुआ मेडता को पुनः हासिल करना चाहता था और ये खबर सुनकर ब्राह्मणो मे त्राही त्राही मच गई और वो गुरूपुष्कर राज के सामने निराश होकर बोलने लगे के करोडो मनुष्य जो इस धाम पर आकर स्नान करते है उनमे से कोई नही जो इस मंदिर की और हमारी रक्षा कर सके? क्या कोई ऐसा वीर इस धरती पर नही जो श्रीकृष्ण जो गायो को प्यार करने वाले थे क्या उनकी संतानो मे इतना साहस नही के उनके जन्म के दिन उन गायो की रक्षा कर सके? 
और ये ब्राह्मणों की बाते सुनकर ही घुडसवार कुवंर राजसिंह जी को कह चुका था पर इतने मे कुवंर आनंद जी आकर उनको बोलते है कि पिताजी ने कहलवाया है कि पहले पूजा कर लो बाद मे इस बारे मे विचार करेंगें पर कुवंर राजसिंह जी बोलते है कि आनंद मै पूजा के लिए ही जा रहा हूं जो अपने भगवान के मंदिर की रक्षा, ब्रह्मणो के प्राणो को बचाना और गाय माता के प्राणो की रक्षा करे ऐसा सौभाग्य तो किसी किसी क्षत्रिय को मिलता है और अब मैने केसरिया धारण कर लिया है तो वापस लौटना पाप होगा पर आनंद उनको समझाता है कि ये केसरीया तो विवाह निम्मित है और ये सुनकर कुवंर राजसिंह हंसकर बोलते है कि ये केसरिया तो मैने युद्ध निम्मित मान लिया है और ये बात सुनकर आनंद ने पिता को कही और पिता जी ने भी कहा के कोई बात नही तुम चतरसिंह, रूपसिंह भी उसके साथ चले जाओ जैसे ही वो चले तो दुल्हन ने खुद वीरता के संगीत सुनाकर उनका जोश दोगुना कर दिया और वो 50-60 घोडो पर सवार होकर वाराहजी के मंदिर मे गए और आशिर्वाद लेकर पुष्कर मे शाही सेना पर जोरदार हमला कर दिया और मुसलमानों का कत्लेआम करते हुए सभी गायो को बंधन मुक्त करा दिया और मुगलो की दूसरी टुकडी पर रात्री मे ही हमला कर दिया पूरे पुष्कर मे जय वाराह जय पुष्कर और अल्लाहो अकबर की गूंज चारो दिशाओ मे गूंजने लगी सप्तमी की सारी रात और अष्टमी के पूरे दिन यह युद्ध होता रहा पुष्कर की मिट्टी रक्त से लाल हो गई और अष्टमी को सूर्य जैसे ही छिपने लगा तो सैंकडो कंठो से आवाज आई "रंणबंका राठौड" और लडते हुए राजसिंह जी से एक घुडसवार ने आकर कहा कि सावधान! कुंवर केशरीसिंह रियां, ठाकुर गोकुल सिह बजोली, ठाकुर हट्टी सिंह, जगत सिंह सुजाण सिंह अपनी सेना लेकर आ रहे है इतने सुनते ही राजसिंह जी ने जोश के साथ रणबंका राठौड बोलकर दुशमनो की सेना के बीच कूद गया और जब कुवंर केसरसिंह रिया सरदारो के साथ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक बिना सिर का दुल्हा दोनो हाथो मे तलवार लेकर दुशमनो का नरसंहार कर रहा है यह देखकर फिर रणबंका राठौड का उद्धोष होता है और नवमी तक युद्ध चलता रहा और रक्त की धारा पुष्कर की गलीयो मे बहती रही तब एक घुडसवार अलसाई हुई चाल से आलनियावास की और चलता है और रास्ते मे जो भी पूछता है उसको बोलता है कि राजसिंह, केशरसिंह, सुजाणसिंह, चातरसिंह, रूपसिंह हठी सिंह गोकुल सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए और सारे मुगलो की सेना का नरसंहार कर दिया तहव्वुरखां भागकर तारागढ पहुंच गया और इन वीरो ने हमारी गाय माता को बचा लियाजब ब्राह्मणो और गौ माता को बचाने के लिए राठोड़ी सेना ने किया पुष्कर में मुगलो से युद्ध अपने जीते जी एक भी गौ काटने न दी उनके याद में पुष्कर में आज गौ घाट बना है 

संवत 1737 विक्रमी के भाद्रपद मास की कृष्ण सप्तमी का दोपहर ढल चुका था और कुंवर राजसिंह सिर पर मोड बांधे दूल्हा के भेष मे घोडी पर सवार थे उनके पीछे चल रहे रथो मे एक रथ मे उनकी दुल्हन और दूसरे रथ मे महिलाए पावन संगीत गा रही थी मांगलिक ढोल बज रहे थे पूरा गांव विवाहत्सव मे झूम रहा था कि उसी समय हांफते हुए एक घुडसवार अजमेर की तरफ से आया और कुंवर राजसिंह से कुछ कहा और देखते ही देखते मांगलिक संगीत बंद हो गया शुभ शहनाई रंणभेरी मे बदल गई।
ठाकुर प्रताप सिंह जी गढ मे बुर्ज पर चढकर वर्षा की संभावना पर विचार कर रहे थे पर पावन संगीत को रंणभेरी मे बदला सुनकर उनके मन मे सवालो का तूफान उमड पडा के ये रंग मे भंग कैसा? इतना सोचते ही उन्होंने जैसे ही दरवाजे की ओर देखा तो आनंदसिंह उनको सरपट आते नजर आए और घोडे से चढे चढे ही आनंदसिंह ने चिल्लाकर कहा कि अजमेर का फौजदार तहव्वर खान मेड़ता की पराजय का बदला लेने के लिए अपनी विशाल सेना लेकर पुष्कर मे आ चुका है और वो जन्माष्टमी के पावन अवसर पर एक सौ एक गायो की कुर्बानी कर वाराहजी के मंदिर को ध्वस्त कर ब्राह्मणों का कत्लेआम करेगा इतना सुनते ही ठाकुर प्रताप सिंह ने कहां कि ये तो बहुत गलत हुआ और गहरी सोच मे पडकर मग्न हो गए, कि जब ओरंगजेब का राजपूतो के अत यह युद्ध था, जमरूद के थाने पर औरंगजेब ने विष देकर जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह को धोखे से मरवा दिया था और मारवाड पर अपनी सेना भेजकर उस पर अपना अधिकार कर लिया था। बालक महाराज अजीत सिंह को वीरवर दुर्गादास आदि स्वामिभक्त सरदारो की संरक्षण मे सुरक्षित करके राठौड सरदारो ने मुगलो के थानो पर आक्रमण शुरू कर दिया था और जोधपुर, सोजत, डीडवाना,सिवाना आदि शाही खजाने लूट लिए थे। ये ही सुनकर कुवंर राजसिंह ने अपने मेडतिया साथीयो के साथ मेडता पर हमलाकर वहां के शाही हकीम सदुल्लाह खान को मारकर लूट लिया था और इसके बाद कुंवर राजसिंह का विवाह हो गया था उस समय मेडता अजमेर सूबे मे था और ये ही सुनकर तहव्वुर खान आग बबूला होकर जन्माष्टमी के पावन अवसर पर एक सौ एक गायो की कुर्बानी पुष्कर जी के घाटो पर करके वाराहजी का मंदिर ध्वस्त करते हुए राठौडो को कत्लेआम करता हुआ मेडता को पुनः हासिल करना चाहता था और ये खबर सुनकर ब्राह्मणो मे त्राही त्राही मच गई और वो गुरूपुष्कर राज के सामने निराश होकर बोलने लगे के करोडो मनुष्य जो इस धाम पर आकर स्नान करते है उनमे से कोई नही जो इस मंदिर की और हमारी रक्षा कर सके? क्या कोई ऐसा वीर इस धरती पर नही जो श्रीकृष्ण जो गायो को प्यार करने वाले थे क्या उनकी संतानो मे इतना साहस नही के उनके जन्म के दिन उन गायो की रक्षा कर सके?
और ये ब्राह्मणों की बाते सुनकर ही घुडसवार कुवंर राजसिंह जी को कह चुका था पर इतने मे कुवंर आनंद जी आकर उनको बोलते है कि पिताजी ने कहलवाया है कि पहले पूजा कर लो बाद मे इस बारे मे विचार करेंगें पर कुवंर राजसिंह जी बोलते है कि आनंद मै पूजा के लिए ही जा रहा हूं जो अपने भगवान के मंदिर की रक्षा, ब्रह्मणो के प्राणो को बचाना और गाय माता के प्राणो की रक्षा करे ऐसा सौभाग्य तो किसी किसी क्षत्रिय को मिलता है और अब मैने केसरिया धारण कर लिया है तो वापस लौटना पाप होगा पर आनंद उनको समझाता है कि ये केसरीया तो विवाह निम्मित है और ये सुनकर कुवंर राजसिंह हंसकर बोलते है कि ये केसरिया तो मैने युद्ध निम्मित मान लिया है और ये बात सुनकर आनंद ने पिता को कही और पिता जी ने भी कहा के कोई बात नही तुम चतरसिंह, रूपसिंह भी उसके साथ चले जाओ जैसे ही वो चले तो दुल्हन ने खुद वीरता के संगीत सुनाकर उनका जोश दोगुना कर दिया और वो 50-60 घोडो पर सवार होकर वाराहजी के मंदिर मे गए और आशिर्वाद लेकर पुष्कर मे शाही सेना पर जोरदार हमला कर दिया और मुसलमानों का कत्लेआम करते हुए सभी गायो को बंधन मुक्त करा दिया और मुगलो की दूसरी टुकडी पर रात्री मे ही हमला कर दिया पूरे पुष्कर मे जय वाराह जय पुष्कर और अल्लाहो अकबर की गूंज चारो दिशाओ मे गूंजने लगी सप्तमी की सारी रात और अष्टमी के पूरे दिन यह युद्ध होता रहा पुष्कर की मिट्टी रक्त से लाल हो गई और अष्टमी को सूर्य जैसे ही छिपने लगा तो सैंकडो कंठो से आवाज आई "रंणबंका राठौड" और लडते हुए राजसिंह जी से एक घुडसवार ने आकर कहा कि सावधान! कुंवर केशरीसिंह रियां, ठाकुर गोकुल सिह बजोली, ठाकुर हट्टी सिंह, जगत सिंह सुजाण सिंह अपनी सेना लेकर आ रहे है इतने सुनते ही राजसिंह जी ने जोश के साथ रणबंका राठौड बोलकर दुशमनो की सेना के बीच कूद गया और जब कुवंर केसरसिंह रिया सरदारो के साथ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक बिना सिर का दुल्हा दोनो हाथो मे तलवार लेकर दुशमनो का नरसंहार कर रहा है यह देखकर फिर रणबंका राठौड का उद्धोष होता है और नवमी तक युद्ध चलता रहा और रक्त की धारा पुष्कर की गलीयो मे बहती रही तब एक घुडसवार अलसाई हुई चाल से आलनियावास की और चलता है और रास्ते मे जो भी पूछता है उसको बोलता है कि राजसिंह, केशरसिंह, सुजाणसिंह, चातरसिंह, रूपसिंह हठी सिंह गोकुल सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए और सारे मुगलो की सेना का नरसंहार कर दिया तहव्वुरखां भागकर तारागढ पहुंच गया और इन वीरो ने हमारी गाय माता को बचा लिया