Wednesday, November 19, 2014

50 साल से सीमा पर ड्यूटी दे रही है शहीद जसवंत सिंह की आत्मा Jaswant Singh's ghost keeps vigil on border of China from 1962

50 साल से सीमा पर ड्यूटी दे रही है शहीद जसवंत सिंह की आत्मा

Jaswant Singh's ghost keeps vigil on border of China from 1962

50 साल से सीमा पर ड्यूटी दे रही है शहीद जसवंत सिंह की आत्माअरूणाचल प्रदेश। यह सच्ची गाथा है एक वीर सैनिक की। भारत मां के इस सच्चे सपूत की जिंदगी तो देश की रक्षा के लिए समर्पित थी ही, यह सैनिक शहीद होने के बाद भी आज तक सीमा की सुरक्षा में लगा है। यह जांबाज सैनिक था जसवंत सिंह रावत। इसकी बहादुरी के चलते सेना ने जसवंत के शहीद होने के 40 साल बाद रिटायरमेंट देने की घोषणा की। इस बीच जसवंत को पदोन्नति भी दी जाती रही। देश के इतिहास में यह एक मात्र उदाहरण है 
जसवंत की आत्मा भी दे रही सीमा पर पहरा : - भारतीय सेना ही नहीं आम लोगों में भी जसवंत सिंह को लेकर कई तरह की कहानियां कही जाती हैं। बताया जाता है कि जिस कमरे में जसवंत सिंह रहा करते थे, उस कमरे में आज भी उनके जूतों को पॉलिश करके रखा जाता है। उनके कपड़ों को भी धोकर और प्रेस कर रखा जाता है। लोगों का कहना है कि रात में रखे गए जूते और कपड़ों को जब सुबह देखा जाता है तो ऎसा लगता है कि उनका इस्तेमाल किया गया है। कपड़े मैले और जूते गंदे मिलते हैं। जसवंत सिंह के लिए हर रोज बिस्तर भी लगाया जाता है। यह बिस्तर भी सुबह ऎसा लगता है कि यहां कोई सोया था। 




Jaswant Singh's ghost keeps vigil on border of China from 1962
ऎसी ही किंवदंतियों में से एक है जसवंत सिंह की आत्मा का लोगों को थप्पड़ मारना। हालांकि इस शहीद की आत्मा केवल पोस्ट पर तैनात झपकी ले रहे सैनिकों को ही थप्पड़ मारती है। शहीद की आत्मा झपकी ले रहे सैनिकों को यह भी समझाती है कि देश की सीमा की सुरक्षा उनके जिम्मे है इसलिए जागते रहो।
Jaswant Singh's ghost keeps vigil on border of China from 1962

जहां पर शहीद जसवंत सिंह का स्मारक बना हुआ है, वहां से गुजरने वाले लोग जसवंत सिंह को नमन करके ही गुजरते हैं। बताया जाता है कि नमन नहीं करने वाले यात्रियों को कुछ ना कुछ नुकसान जरूर होता है। इसलिए ड्राइवर तो ऎसा करने में जरा भी चूक नहीं करते हैं। ... आगे की स्लाइड में पढिए जसवंत की आत्मा के लिए तैनात हैं सैनिक 
Jaswant Singh's ghost keeps vigil on border of China from 1962

जसवंत सिंह की बहादुरी के चलते सेना ने उनके लिए ऎसा काम किया जो आज भी एक मिसाल है। जसंवत सिंह को शहीद होने के साथ ही सेवानिवृत नहीं किया गया। जब उनकी रिटायरमेंट का समय आया तब ही उन्हें रिटायर किया गया। लगभग 40 साल बाद उन्हें रिटायर घोषित किया गया। इस बीच उन्हें समय-समय पर पदोन्नती भी दी गई 
अकेले ही 300 चीनी सैनिकों को उतारा मौत के घाट : - भारत और चीन के बीच नवंबर 1962 में हुए युद्ध में चौथी गढ़वाल राइफल इंफेंटरी रेजीमेंट के जसवंत सिंह 10000 फीट की ऊंचाई पर स्थित नूरानांग पोस्ट पर तैनात थे। चीनी सेना तवांग जिले से होते हुए नूरानांग तक पहुंच गई। 17 नवंबर को चीनी और भारतीय सेना में नूरानांग में लड़ाई छिड़ गई। इस लड़ाई में लांस नायक त्रिलोकी सिंह नेगी, परमवीर चक्र विजतेा जोगिंदर सिंह और राइफलमैन गोपाल सिंह गोसाई सहित अन्य सैनिक शहीद हो गए। इससे सारी जिम्मेदारी जसंवत सिंह पर आ पड़ी। जसवंत सिंह ने गजब का शौर्यप्रदर्शन करते हुए लगातार 3 दिनों तक चीनी सेना से मुकाबला किया। जसवंत सिंह ने समझदारी का परिचय देते हुए अलग-अलग बंकरों से जा कर गोलीबारी की, इससे चीनी सेना को लगा कि वहां बहुत सारे जवान अभी भी जिंदा हैं और गोलीबारी कर रहे हैं। इस दौरान जसवंत सिंह ने करीब 300 चीनी सैनिकों को अकेले ही मौत के घाट उतार दिया। यह देखते हुए चीनी सेना ने इस सेक्टर को चारों ओर से घेर लिया। आखिरकार जब यह सेक्टर चीनी सैनिकों के घेरे में आ गया, तो मालूम चला कि यहां बहुत सारे सैनिक नहीं थे, केवल एक ही सैनिक चीनी सेना को बेवकूफ बना रहा था, तो चीनी सैनिक चिढ़ गए। चीनी सैनिकों ने जसवंत सिंह को बंदी बना लिया और एक टेलिफोन तार के सहारे पेड़ पर फांसी पर लटका दिया। इसके बाद जसवंत सिंह का सिर काटकर साथ ले गए। जसवंत सिंह के शहीद होने के बारे में एक और तथ्य सामने आता है। बताया जाता है कि जब जसवंत सिंह को लगा कि अब चीनी सैनिक उसे गिरफ्तार कर लेंगे, तो उसने खुद को गोली मार ली। बाद में चीनी सैनिक उसका सिर काटकर ले गए। हालांकि युद्ध विराम होने के बाद चीनी कमांडर ने जसवंत सिंह की बहादुरी से प्रभावित होकर उसका सिर और एक तांबे का लोकेट वापस कर दिया।
नूरानांग की इस पोस्ट पर जसवंत सिंह का साथ गांव की दो लड़कियों ने भी दिया। शैला और नूरा नाम की इन लड़कियों ने जसवंत सिंह को हथियार और असलहे मुहैया करवाए। इन दोनो लड़कियों को भी सम्मान दिया गया। यहां के एक दर्रे का नाम शैला रखा गया और हाईवे का नाम नूरा