Wednesday, July 2, 2014

अब्बक्का रानी: एक वीरांगना जिन्होंने पोर्तुगीजोंको पराभूत किया !

१. परिचय

Article Image     अब्बक्का रानी अथवा अब्बक्का महादेवी तुलुनाडूकी रानी थीं जिन्होंने सोलहवीं शताब्दीके उत्तरार्धमें पोर्तुगीजोंके साथ युद्ध किया । वह चौटा राजवंशसे थीं जो मंदिरोंका शहर मूडबिद्रीसे शासन करते थे । बंदरगाह शहर उल्लाल उनकी सहायक राजधानी थी ।
२. बचपन
     चौटा राजवंश मातृसत्ताकी पद्धतिसे चलनेवाला था, अत: अब्बक्काके मामा, तिरुमला रायने उन्हें उल्लालकी रानी बनाया । उन्होंनेने मैंगलोरके निकटके प्रभावी राजा लक्ष्मप्पा अरसाके साथ अब्बक्काका विवाह पक्का किया । बादमें यह संबंध पोर्तुगीजों हेतु चिंताका विषय बननेवाला था । तिरुमला रायने अब्बक्काको युद्धके अलग-अलग दांवपेचोंसे अवगत कराया । किंतु यह विवाह अधिक समयतक नहीं चला और अब्बक्का उल्लाल वापिस आ गर्इं । उनके पतिने अब्बक्कासे प्रतिशोध लेनेकी इच्छासे बादमें अब्बक्काके विरुद्ध पोर्तुगीजोंके साथ हाथ मिलाया ।

३. बहादुरी

     पोर्तुगीजोंने उल्लाल जीतनेके कई प्रयास किए, क्योंकि रणनीतिकी दृष्टिसे वह बहुत महत्वपूर्ण था । किंतु लगभग चार दशकों तक अब्बक्काने उन्हें हर समय खदेडकर भगा दिया । अपनी बहादुरीके कारण वह ‘अभया रानी’ के नामसे विख्यात हो गर्इं । औपनिवेशक शक्तियोंके विरुद्ध लडनेवाले बहुत अल्प भारतीयोंमेंसे वह एक थीं तथा वह प्रथम भारतीय स्वतंत्रता सेनानी मानी जाती थीं ।
     रानी अब्बक्का भले ही एक छोटे राज्य उल्लाकी रानी थीं, वह एक अदम्य साहस एवं देशभक्तिवाली महिला थीं । झांसीकी रानी साहसका प्रतीक बन गई हैं, उनके ३०० वर्ष पूर्व हुई अब्बक्काको इतिहास भूल गया है ।
     पोर्तुगीजोंके साथ उनकी साहसपूर्ण लडाईयोंका ब्यौरा ठीकसे नहीं रखा गया । किंतु जो भी उपलब्ध है, उससे इस उत्तुंग, साहसी एवं तेजस्वी व्यक्तित्वका पता चलता है ।

४. व्यक्तिगत जीवन

     स्थानीय किंवदंतियोंके अनुसार अब्बक्का एक बहुत ही होनहार बच्ची थीं, तथा जैस-जैसे वह बडी होती गर्इं, एक द्रष्टा होनेके सारे लक्षण उनमें दिखाई देने लगे; धनुर्विद्या तथा तलवारबाजीमें उनका मुकाबला करनेवाला कोई नहीं था । इस हेतु उनके पिताजीने उन्हें उत्तेजना दी, परिणामस्वरूप वह हर क्षेत्रमें प्रवीण हो गर्इं । उनका विवाह पडोसके बांघेरके राजाके साथ हुआ । किंतु यह विवाह अधिक चला नहीं, तथा अब्बक्का पतिद्वारा दिए हीरे-जवाहरात लौटाकर घर आ गर्इं । अब्बक्काके पतिने उनसे प्रतिशोध लेने हेतु तथा उनसे युद्ध करने हेतु एक संधिमें पोर्तुगीजोंसे हाथ मिलाया ।
     उल्लालका स्थान अब्बक्काके राज्यकी राजधानी उल्लाल किला अरब सागरके किनारे मंगलोर शहरसे मुछ ही मीलोंकी दूरीपर था । वह एक ऐतिहासिक स्थान तथा एक तीर्थस्थल भी था, क्योंकि रानीने वहां शिवका सुंदर मंदिर निर्माण किया । वहां एक नैसर्गिक अद्वितीय शिला भी थी, जो ‘रुद्र शिला’ के नामसे जानी जाती थी । उसपर पानीकी बौछार होते ही हर पल उस शिलाका रंग बदलता रहता था ।

५. ऐतिहासिक पार्श्वभूमि

     गोवाको कुचलकर उसे नियंत्रणमें लेनेके पश्चात पोर्तुगीजोंकी आंख दक्षिणकी ओर तथा सागरके किनारेपर पडी । उन्होंने सबसे पहले १५२५ में दक्षिण कनाराके किनारेपर आक्रमण किया तथा मंगलोर बंदरगाह नष्ट किया । उल्लाल एक समृद्ध बंदरगाह था तथा अरब एवं पश्चिमके देशोंके लिए मसालेके व्यापारका केंद्र था । लाभप्रद व्यापारकेंद्र होनेके कारण पोर्तुगीज, डच तथा ब्रिटिश उस क्षेत्रपर एवं व्यापारी मार्गोंपर नियंत्रण पाने हेतु एक दूसरेसे टकराते रहते थे । किंतु वे उस क्षेत्रमें अधिक अंदरतक घुस नहीं पाए, क्योंकि स्थानीय सरदारोंद्वारा होनेवाला प्रतिरोध बडा दृढ (मजबूत) था । स्थानीय शासकोंने जाति एवं धर्मसे ऊपर उठकर कई जाली गठबंधन बनाए ।
     अब्बक्का भले ही जैनी थीं, उनके शासनमें हिंदू एवं मुसलमानोंका अच्छा प्रतिनिधित्व था । उनकी सेनामें सभी जाति एवं संप्रदायके लोग, यहांतक कि मूगावीरा मच्छीमार भीसम्मिलित थे । उन्होंने कालिकतके जामोरीन तथा दक्षिण तुलूनाडूके मुसलमान शासनकर्ताओंके साथ जाली गठबंधन बनाए । पडोसके बंगा राजवंशसे विवाहबंधनसे स्थानीय शासनकर्ताओंके गठबंधन और दृढ हो गए ।

६. पोर्तुगीजोंके साथ युद्ध

६ अ. प्रथम आक्रमण

     पोर्तुगीजोंने १५२५ में दक्षिण कनारा तटपर पहला आक्रमण कर मंगलोर बंदरगाह नष्ट किया । इस घटनासे रानी सतर्क हो गर्इं तथा अपने राज्यकी सुरक्षाकी तैयारीमें जुट गर्इं ।

६ आ. द्वितीय आक्रमण

     अब्बक्काकी रणनीतिसे पोर्तुगीज अस्वस्थ हो गए थे, तथा चाहते थे कि वह उनके सामने झुक जाएं, उनका सम्मान करें, किंतु अब्बक्काने झुकना अस्वीकार किया । १५५५ में पोर्तुगीजोंने एडमिरल डॉम अलवरो दा सिलवेरिया को रानीसे युद्ध करने भेजा क्योंकि उन्होंने उनका सम्मान करना अस्वीकार किया था । तदुपरांत हुए युद्धमें रानीने एक बार पुन: स्वयंको बचाया तथा आक्रमणकारियोंको सफलतापूर्वक खदेड दिया ।

६ इ. तृतीय आक्रमण

     १५५७ में पोर्तुगीजोंने मंगलोरको लूट कर उसे बर्बाद कर दिया । १५५८ में पोर्तुगीजोंने मंगलोरके साथ प्रचंड क्रौर्य कर बडा पापकर्म किया, कई युवा एवं बूढे स्त्री-पुरुषोंकी हत्या की, एक मंदिरको लूटा, जहाज जलाए तथा अंतमें पूरे शहरमें आग लगा दी ।

६ र्इ. चतुर्थ आक्रमण

     १५६७ में पोर्तुगीजोंने पुन: उल्लालपर आक्रमण किया, मृत्यु एवं विनाश की वर्षा की । महान अब्बक्काने इसका भी प्रतिकार किया ।

६ उ. पांचवां आक्रमण

     १५६८ में पोर्तुगीज वाईसराय एंटोनियो नोरान्हाने जनरल जोआओ पिक्सोटो के साथ सैनिकोंका एक बेडा देकर उसे उल्लाल भेजा । उन्होंने उल्लालपर नियंत्रण किया तथा राजदरबारमें घुस गए । किंतु अब्बक्का रानी भाग गर्इं तथा एक मस्जिदमें आश्रय लिया । उसी रात उसने २०० सैनिकोंको इकट्ठा कर पोर्तुगीजोंपर आक्रमण किया । लडाईमें जनरल पिक्सोटो मारा गया तथा ७० पोर्तुगीज सैनिकोंको बंदी बनाया गया, कई सैनिक भाग गए । बादमें हुए आक्रमणोंमें रानी तथा उसके समर्थकोंने एडमिरल मस्कारेन्हसकी हत्या की और पोर्तुगीजोंको मंगलोर किला खाली करनेपर बाध्य किया ।

६ ऊ. छठां आक्रमण

     १५६९ मे पोर्तुगीजोंने केवल मंगलोर वापिस लिया इतना ही नहीं अपितु कुंडपुर (बसरुर) पर विजय प्राप्त किया । यह सब पानेके पश्चात अब्बक्का रानी खतरेका स्रोत बनी हुई थीं । रानीके विभक्त पतिकी मददसे वे उल्लालपर आक्रमण करते रहे । घमासान युद्धके पश्चात अब्बक्का रानी अपने निर्णयपर अटल थीं । १५७० में उन्होेंने अहमदनगरके बीजापुर सुलतान तथा कालिकतके झामोरीनके साथ गठबंधन किया, जो पोर्तुगीजोंके विरुद्ध थे । झामोरीनका सरदार कुट्टी पोकर मार्कर अब्बक्काकी ओरसे लडा तथा पोर्तुगीजोंका मंगलोरका किला उध्वस्त किया किंतु वापिस आते समय पोर्तुगीजोंने उसे मार दिया । निरंतरकी हानि तथा पतिके विश्वासघातके कारण अब्बक्का हार गर्इं, वह पकडी गर्इं तथा उन्हें कारागृहमें रखा गया । किंतु कारागृहमें भी उन्होेंने विद्रोह किया तथा लडते-लडते ही अपने प्राण त्याग दिए ।
     पारंपारिक कथनानुसार वह बहुत ही लोकप्रिय रानी थीं, जिसका पता इस बातसे चलता है कि वह आज भी लोगसाहित्यका एक हिस्सा हैं । रानीकी कहानी पीढी-दर-पीढी लोकसंगीत तथा यक्षगान (जो तुलुनाडूका लोकप्रिय थिएटर है)द्वारा पुन:पुन: दोहराई जाती है । भूटा कोला एक स्थानीय नृत्य प्रकार है, जिसमें अब्बक्का महादेवीके महान कारनामे दिखाए जाते थे । अब्बक्का सांवले रंगकी, दिखनेमें बडी सुंदर थीं; सदैव सामान्य व्यक्तिजैसे वस्त्र पहनती थीं । उन्हें अपनी प्रजाकी बडी चिंता थी तथा न्याय करने हेतु देर राततक व्यस्त रहती थीं । किंवदंतियोंके अनुसार ‘अग्निबाण’ का उपयोग करनेवाली वह अंतिम व्यक्ति थीं । कुछ जानकारीके अनुसार रानीकी दो बहादुर बेटियां थीं, जो पोर्तुगीजोंके विरुद्ध उनके साथ-साथ लडी थीं । परंपराओंके अनुसार तीनों-मां तथा दोनों बेटियां एक ही मानी जाती हैं । 

७. एक महान रानीकी याद

     अब्बक्काको उनके अपने नगर उल्लालमें बहुुत याद किया जाता है । हर वर्ष उनकी स्मृतिमें ‘वीर रानी अब्बक्का उत्सव’ मनाया जाता है । ‘वीर रानी अब्बक्का प्रशस्ति’ पुरस्कार किसी अद्वितीय महिलाको दिया जाता है । १५ जनवरी २००३ को डाक विभागने एक विशेष कवर जारी किया । बाजपे हवाई अड्डेको तथा एक नौसैनिक पोतको रानीका नाम देने हेतु कई लोगोंकी मांग है । उल्लाल तथा बंगलुरूमें रानीकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है । ‘कर्नाटक इतिहास अकादमी’ने राज्यकी राजधानीके ‘क्वीन्स रोड’ को ‘रानी अब्बक्का देवी रोड’ नाम देनेकी मांग की है ।