Wednesday, July 2, 2014

हिंदू राष्ट्र क्यों आवश्यक है ? - (प.पू.) डॉ . आठवलेजी

(प.पू.) डॉ. आठवलेजीप्रश्न - हिंदू राष्ट्र आवश्यक है ? सारे धर्म साथ लेकर क्यों नहीं चलते ? समाजके अनेक व्यक्तियोंके मनमें निरंतर यह प्रश्न रहता है । तथा इस प्रश्नद्वारा यह ध्यानमें आता है कि हिंदू कितने अंधे, बहरे एवं गूंगे हैं ।

१. विविध कारण

हिंदू राष्ट्र स्थापित करनेका ध्येय रखनेके निम्नांकित कुछ कारण :
अ. केवल हिंदू धर्म ही `जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृति और उतने साधनामार्ग’, सिद्धांतानुसार हर व्यक्तिको आवश्यक, अलग-अलग साधना बताता है । डॉक्टर हर रुग्णको उसकी प्रकृतिनुसार तथा बीमारीनुसार अलग-अलग औषधि देते हैं । यह बिलकुल वैसा ही है । दूसरे धर्मोंमें सबको एक ही साधना करनेको कहा जाता है । अत: उनकी अध्यात्मिक उन्नति नहीं होती ।
आ. दूसरे धर्मांनुसार स्वर्गसुख अंतिम ध्येय है, किंतु हिंदू धर्मानुसार सुख नहीं, किंतु चिरंतन आनंद देनेवाली मोक्षप्राप्ति, ईश्वरप्राप्तिका ध्येय ही अंतिम है ।
इ. हिंदू धर्म कुराणके अनुसार अन्य धर्मियोंकी हत्या करें, अथवा ईसाईयों जैसे धोखा देकर अन्य धर्मियोंका धर्मांतरण करें, ऐसी सीख नहीं देता ।

२. हिंदुओंकी दयनीय स्थिति

भारतमें प्रतिदिन घटनेवाली हिंदुविरोधी घटनाएं पढकर भी हिंदुओंके मनमें प्रश्न उठता है कि सारे धर्मोंको साथ लेकर क्यों नहीं जाते ? इसका किसीको भी आश्चर्य लगेगा । इसके दो महत्त्वपूर्ण कारण है, हिंदुओंको धर्मशिक्षा प्राप्त नहीं होती तथा उनपर किया गया सर्वधर्मसमभावका संस्कार ! अन्य धर्मीय सर्वधर्मसमभाव नहीं मानते , अपितु अपना ही धर्म सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, यह बात यहां ध्यानमें रखनी चाहिए ।

३. हिंदुओंकी दयनीय स्थितिका उपाय

हिंदू यदि हिंदू धर्मका चिंतन करें तथा साधना करें, तो उनकी सर्वधर्मसमभावकी विषबाधा अथवा उनके सिरपर सवार सर्वधर्मसमभावका भूत तत्काल दूर होनेसे वे शारीरिक, मानसिक एवं अध्यात्मिकदृष्टिसे बलवान होंगे ।

४. हिंदू राष्ट्रकी स्थापना होनेसे सारे मानव आनंदकी दिशामें अग्रसर होने लगेंगे !

हिंदू राष्ट्र स्थापित होनेपर केवल भारतके हिंदुओंको ही नहीं, अपितु दुनियाभरके मानवोंको उनकी वर्तमान नैराश्यसे बाहर आने हेतु साधनामार्ग दिखाया जा सकेगा । अत: सारे मानव आनंदकी दिशामें  अग्रसर होने लगेंगे तथा हिंदू धर्ममें आगे दी गई प्रार्थना सफल होगी ।
सर्वेऽत्र सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा क्वश्चिद् दुःखमाप्नुयात् ?
अर्थ : सारे प्राणीमात्र सुखी हों । सबको अच्छे स्वास्थ्यका लाभ हों । सारे लोग एकदूसरेका कल्याण चाहें । कोई भी, कभी भी दुख न पाए ।