Wednesday, July 2, 2014

स्वामी विवेकानंद

१. जन्म, बाल्यावस्था तथा शिक्षणशिक्षा

तेजस्वी विचारोंसे ओतप्रोत हिंदु धर्मप्रसारक : स्वामी विवेकानंद        स्वामी विवेकानंदका मूल नाम नरेंद्रनाथ था । उनका जन्म १२ जनवरी १८६३ के दिन कोलकातामें हुआ । बाल्यावस्थामें ही विवेकानंदके व्यवहारमें दो बातें स्पष्ट रूपसे दिखाई देने लगीं । प्रथम वे वृत्तिसे श्रद्धालु एवं दयालु थे तथा बचपनसे ही कोई भी साहसी कृत्य बेधडक साहस एवं निर्भयतासे करते थे । स्वामी विवेकानंदका संपूर्ण कुटुंबपरिवार धार्मिक होनेके कारण बाल्यावस्थामें ही उनपर धर्मविषयक योग्य धार्मिक संस्कार होते गए । १८७० में उनका नामांकन ईश्वरचंद्र विद्यासागरकी पाठशालामें कराया गया । पाठशालामें रहते हुए अध्ययन करनेके साथ-साथ विवेकानंदने बलोपासना भी की । स्वामी विवेकानंदमें स्वभाषाभिमान भी था, यह दर्शानेवाली एक घटना । अंग्रेजी शिक्षणके समय उन्होंने कहा, `गोरोंकी, अर्थात यवनोंकी इस भाषामें मैं कदापि नहीं पढूंगा ।' ऐसा कहकर लगभग ७-८ महीने उन्होंने वह भाषा सीखना ही अस्वीकार कर दिया । अंतमें विवश होकर उन्होंने अंग्रेजी सीखी । विवेकानंदने मैट्रिककी माध्यामिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर कुल तथा पाठशालाकी प्रतिष्ठा बढाई । आगे कोलकाताके प्रेसिडेन्सी महाविद्यालयसे उन्होंने `तत्त्वज्ञान' विषयमें एम.ए. किया ।

२. गुरुभेंट तथा संन्यासदीक्षा

        नरेंद्रके घरमें ही पले-बढे उनके एक संबंधी डॉ. रामचंद्र दत्त रामकृष्णजीके भभक्त थे । धर्मके प्रति लगावसे प्रेरित हो नरेंद्र के मनमें बचपनसे ही तीव्र वैराग्य देख डॉ. दत्त एक बार उनसे बोले, `भाई, यदि धर्मलाभ ही तुम्हारे जीवनका उद्देश्य हो, तो तुम ब्राह्मोसमाज इत्यादिके झंझटमें मत पडो । तुम दक्षिणेश्वरमें श्रीरामकृष्णजीके पास जाओ ।' एक दिन उनके पडोसी श्री. सुरेंद्रनाथके घरपर ही उन्हें श्रीरामकृष्ण परमहंसजीके दर्शन हुए । प्रारंभके कुछ दिन श्रीरामकृष्ण नरेंद्रनाथको अपनेसे क्षणभर भी दूर नहीं रखना चाहते थे । उन्हें पास बिठाकर अनेक उपदेश दिया करते । इन दोनोंकी भेंट होनेपर आपसमें बहुत चर्चाएं हुआ करती थीं । श्रीरामकृष्ण अपना अधूरा कार्यभार नरेंद्रनाथपर सौंपनेवाले थे । एक दिन श्रीरामकृष्णने एक कागदके टुकडेपर लिखा, `नरेंद्र लोकशिक्षणका कार्य करेगा ।' कुछ मुंह बनाकर नरेंद्रनाथ उन्हें बोले, `यह सब मुझसे नहीं होगा ।' श्री रामकृष्ण तुरंत दृढतासे बोले, `क्या ? नहीं होगा ? अरे तेरी अस्थियां ये कार्य करेंगी ।' तत्पश्चात श्रीरामकृष्णने नरेंद्रनाथकाको संन्यासदीक्षा देकर उनका नामकरण `स्वामी विवेकानंद' किया ।

३. गुरुके प्रति अनन्य निष्ठा

        एक बार किसी शिष्य ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और निष्क्रियता दिखाते हुए नाक-भौं सिकोड़ीं । यह देखकर विवेकानन्द को क्रोध आ गया । वे अपने उस गुरु भाई को सेवा का पाठ पढाते और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पाससे रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेंकते थे । गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु की देह और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके । गुरुदेव को समझ सके और स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके तथा आगे चलकर समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भण्डार की महक पैâला सके । ऐसी थी उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा जिसका परिणाम सारे संसार ने देखा ।

४. धर्मप्रसार के कार्यका प्रारंभ : रामकृष्ण मठकी स्थापना

        श्रीरामकृष्णके महासमाधि लेनेके उपरांत स्वामी विवेकानंदने अपने एक गुरुबंधु तारकनाथकी सहायतासे कोलकाताके निकट वराहनगर भागके एक खंडहरमें रामकृष्ण मठकी स्थापना की । इससे पूर्व उस स्थानपर भूतोंका डेरा है, लोगोंकी ऐसी भ्रांति थी । विवेकानंदने श्रीरामकृष्णकी उपयोगमें लाई गई वस्तुएं तथा उनके भस्म एवं अस्थियोंका कलश वहां रखा और उनके भक्त वहां रहने लगे ।

५. स्वामी विवेकानंदद्वारा दिग्विजित सर्वधर्मपरिषद सभा शिकागो जानेके विषयमें पूर्वसूचना

        एक दिन रात्रि अर्धजागृत अवस्थामें स्वामी विवेकानंदको एक अद्भुत स्वप्न दिखाई दिया । श्री रामकृष्ण ज्योतिर्मय देह धारण कर समुद्र मार्गसे आगे-आगे बढे जा रहे हैं तथा स्वामी विवेकानंदको अपने पीछे-पीछे आनेका संकेत कर रहे हैं । क्षणभरमें स्वामीजीके नेत्र खुल गए । उनका हृदय अवर्णनीय आनंदसे भर उठा । उसके साथ ही `जा', सुस्पष्ट रूपसे उन्हें यह देववाणी सुनाई दी । परदेश प्रस्थान करनेका संकल्प दृढ हो गया । एक-दो दिनमें ही यात्राकी सर्व सिद्धता पूर्ण हो गई ।

६. धर्मसभापरिषद के लिए प्रस्थान

        ३१ मई १८९३ को `पेनिनशुलर' जलयानने मुंबईका समुद्रतट छोडा । स्वामीजी १५ जुलाईको कनाडाके वैंकुवर बंदरगाहपर पहुंचे । वहांसे रेलगाडीसे अमेरिकाके प्रख्यात महानगर शिकागो आए । धर्मसभा परिषद ११ सितंबरको आयोजित हो रही है, ऐसा उन्हें ज्ञात हुआ । धर्मसभापरिषदमें सहभाग लेने हेतु आवश्यक परिचयपत्र उनके पास नहीं था । प्रतिनिधिके रूपमें नाम प्रविष्ट करानेकी कालावधि भी समाप्त हो चुकी थी । विदेशमें स्वामीजी जहां भी जाते, वहां लोग उनकी और आकृष्ट होते जाते । पहले ही दिन हार्वर्ड विद्यापीठमें ग्रीक भाषाके प्रा. जे.एच. राईट स्वामीजीसे चार घंटेतक संवाद करते रहे । स्वामीजीकी प्रतिभा तथा कुशाग्र बुद्धिपर वे इतने मुग्ध हुए कि धर्मपरिषदसभामें प्रतिनिधिके रूपमें प्रवेश दिलवानेका संपूर्ण दायित्व उस प्राध्यापकने स्वयंपर ले लिया ।

७. शिकागो सर्वधर्मपरिषदमें विवेकानंदका सहभाग

        इस सुवर्णभूमिके सत्पुरुषद्वारा संसारको श्रेष्ठतम हिंदु धर्मकी पहचान कराना , यह एक दैवी योग ही था । अमेरिकाके शिकागोमें ११ सितंबर १८९३ को हुई सर्वधर्मपरिषद सभाके माध्यमसे समूचे संसारको आवाहन करनेवाले स्वामी विवेकानंद हिंदु धर्मके सच्चे प्रतिनिधि प्रमाणित हुए । सोमवार, ११ सितंबर १८९३ को प्रात: धर्मगुरुओंके मंत्रोच्चारके उपरांत संगीतमय वातावरणमें धर्मपरिषदका शुभारंभ हुआ । व्यासपीठके मध्यभागमें अमेरिकाके रोमन वैâथलिक पंथके धर्मप्रमुख थे । स्वामी विवेकानंद किसी एक विशिष्ट पंथके प्रतिनिधि नहीं थे । वे संपूर्ण भारतवर्षमें सनातन हिंदु वैदिक धर्मके प्रतिनिधिके नाते इस परिषदमें आए थे । इस परिषदमें छः से सात सहस्र स्त्री-पुरुष उपस्थित थे । अध्यक्षकी सूचनानुसार व्यासपीठसे प्रत्येक प्रतिनिधि अपने पूर्वसे ही सिद्ध किया हुआ भाषण पढकर सुना रहा था । स्वामीजी अपना भाषण लिखकर नहीं लाए थे । अंततः अपने गुरुदेवजीका स्मरण कर स्वामीजी अपने स्थानसे उठे । `अमेरिकाकी मेरी बहनों तथा बंधुओं' कहकर उन्होंने सभाको संबोधित किया । उनकी चैतन्यपूर्ण, तथा ओजस्वी वाणीसे सभी मंत्रमुग्ध हो गए । इन शब्दोंमें कुछ ऐसी अद्भुत शक्ति थी कि स्वामीजीके ये शब्द कहते ही सहस्रों स्त्री-पुरुष अपने स्थान से उठकर खडे हो गए तथा तालियोंका प्रखर स्वर प्रतिध्वनित होने लगा । लोगोंकी हर्षध्वनि और तालियां रोके नहीं रुकती थीं । स्वामीजीके उन भावपूर्ण शब्दोंके अपनत्वसे सभी श्रोताओंके हृदय स्पंदित हो गए । `बहनों और बंधुओं' इन शब्दोंसे सारी मानवजातिका आवाहन करनेवाले स्वामी विवेकानंद एकमेव  वक्ता थे ।
        "हिंदु समाज पददलित होगा; किन्तु घृणास्पद नहीं है । वह दीन होगा-दु:खी होगा; परंतु बहुमूल्य पारमार्थिक संपत्तिका उत्तराधिकारी है । धर्मके क्षेत्रमें तो वह जगद्गुरु हो सकता है, ऐसी उसकी योग्यता है ।' इन शब्दोंमें हिंदु धर्मके महत्त्वका वर्णन कर अनेक शतकोंके उपरांत स्वामी विवेकानंदने हिंदु समाजको उसकी  विस्तृत सीमासे परिचित करा दिया । स्वामीजीने किसी भी धर्मकी निंदा नहीं की, कोई टीका-टिप्पणी नहीं की । किसी भी धर्मको उन्होंने तुच्छ नहीं कहा । अन्योंसे मिला घृणास्पद व्यवहार तथा अपमानकी कीचडमें पडे हिंदु धर्मको एक ओर रखकर उसके मूल तेजस्वी रूपके साथ अंतर्राष्ट्रीय सर्वधर्मपरिषद सभामें सर्वोच्च आसनपर विराजमान कर दिया । इस परिषदमें हिंदुस्थानके विषयमें बोलते हुए उन्होंने कहा, `हिंदुस्थान पुण्यभूमि है, कर्तव्य कर्मभूमि है, यह परिष्कृत सत्य है, जिसे अंतर्दृष्टि तथा आध्यात्मिकताका जन्मस्थान कह सकते हैं, वह हिंदुस्थान है ! प्राचीन कालसे ही यहां अनेक धर्मसंस्थापकोंका उदय हुआ । उन्होंने परम पवित्र एवं सनातन जैसे आध्यात्मिक सत्यके शांतिजलसे त्राहि-त्राहि करनेवाले जगतको तृप्त किया है । संसारमें परधर्मके लिए सहिष्णुता तथा प्रेम केवल इसी भूमिमें अनुभव किया जा सकता है ।"

८. अमेरिकामें  प्रसारकार्य

        २५ वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिए थे । तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की । यूरोप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे । वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद में बोलने का समय ही न मिले । परन्तु उन्हें थोडा समय मिला । उस परिषद में उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए । इसके पश्चात तो अमेरिका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ । वहां उनके भक्तों का एक बडा समुदाय बन गया । तीन वर्ष वे अमेरिका में रहे और वहांके लोगों को उन्होंने भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की । उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहां के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दु का नाम दिया ।  `अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा' यह स्वामी विवेकानन्द का दृढ विश्वास था । अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं स्थापित कीं । अनेक अमेरिकी विद्वानोंने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया । वे सदा अपने को निर्धनों का सेवक कहते थे । उन्होंने सदैव भारत के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का प्रयत्न किया ।

९. प्रवचनोंके द्वारा प्रसारकार्य

        परदेशमें भारतका नाम उज्ज्वल कर कोलकाता आनेपर नागरिकोंने आदरके साथ स्वामीजीका बडे प्रमाणपर स्वागत किया । `मेरे अभियानकी योजना', `भारतीय जीवनमें वेदांत', ‘हमारा आजका कर्तव्य', `भारतीय महापुरुष', `भारतका भविष्य' जैसे विषयोंपर उन्होंने व्याख्यान देना आरंभ किया । स्वामी विवेकानंदने परदेश तथा स्वदेशमें दिए व्याख्यानोंसे समय-समयपर ओजपूर्ण स्वरमें अपने मत प्रकट किए । स्वामी विवेकानंदके इन विचारोंका बहुत बडा प्रभाव पडा । परदेशमें भी उन्होंने वेदांतकी वैश्विक वाणीका प्रचार किया । इसके कारण पूरे संसारमें आर्यधर्म, आर्यजाति एवं आर्यभूमिको प्रतिष्ठा मिली ।

१०. स्वामी विवेकानंदजीके विषयमें विद्वानोंके गौरवोद्गार

        गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढिए । उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं ।"
        रोमां रोलां ने उनके  विषयमें कहा था-"उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है वे जहां भी गए, सर्वप्रथम ही रहे । हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था । वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी । हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव !’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो ।"
        वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी थे । अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था-`नया भारत निकल पडे मोची की दुकान से, भडभूंजे के भाड से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाडियों, जंगलों, पहाडों एवं पर्वतों से ।' और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया । वह गर्व के साथ निकल पडी । गांधीजी को आजादी की लडाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वानका ही फल था । इस प्रकार वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने । उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है । यहीं बडे-बडे महात्माओं एवं ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं-केवल यहीं-आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्तिका द्वार खुला हुआ है । उनके कथन-‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ । अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए ।'

११. `परहितार्थ सर्वस्वका समर्पण अर्थात खरा संन्यास', यह वचन सार्थक !

        भारतकी आध्यात्मिक संस्कृतिके प्रति गर्व होनेपर भी उसमें प्रविष्ट अनिष्ट रूढि, परंपरा, जातिभेद जैसे हीन घटकोंपर अपने भाषणोंसे करारा प्रहार कर निद्रितोंको एक झटकेमें जगा दिया । ऐसेमें वे सौदामिनीके अभिनिवेशसे समाजकी निष्क्रियतापर प्रहार करते तथा अपने देशबांधवोंको जागृत होनेके लिए आतंरिक आवाहन करते । निराकार समाधिमें मग्न रहनेकी स्वयंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति एक ओर बाजू रख उन्होंने सर्वसामान्य लोगोंके सुख-दु:खका ऐहिक स्तरपर भी विचार किया तथा उसके लिए परिश्रम किया । इस प्रकार उन्होंने `परहितार्थ सर्वस्वका समर्पण ही सच्चा संन्यास है', यह वचन सार्थ किया ।
        अंग्रेजोंका वर्चस्व रहते हुए भारतभूमि तथा हिंदु धर्मके उद्धारके लिए अहर्निश (दिन-रात) चिंता करनेवाले तथा इस उद्धारकार्यके लिए तन, मन, धन एवं प्राण अर्पण करनेवाले कुछ नवरत्न भारतमें हुए हैं । उनमेंसे एक दैदीप्यमान रत्न थे स्वामी विवेकानंद । धर्मप्रवर्तक, तत्त्वचिंतक, विचारवान एवं वेदांतमार्गी राष्ट्रसंत इत्यादि विविध रूपोंमें विवेकानंदका नाम सर्व जगतमें विख्यात है । तारुण्यमें ही संन्यासाश्रमकी दीक्षा लेकर हिंदु धर्मका प्रसारक बना एक तेजस्वी तथा ध्येयवादी व्यक्तित्व । उनकी जयंतीके निमित्त `अंतर्राष्ट्रीय युवक दिवस' मनाया जाता है । स्वतंत्रताके उपरांत भारतभूमि तथा हिंदु धर्मकी हुई दुरावस्थाको रोकनेके लिए आज भी स्वामी विवेकानंदके तेजस्वी विचारों की आवश्यकता है, भारतवासियोंको इसका ज्ञान हो, इस हेतु यह लेखप्रपंच !